26 दिन का छात्र आंदोलन: मांगों से सरकार के फैसले तक, दो मंचों में बंटा संघर्ष अब दो महीने के लिए स्थगित
रांची में 26 दिनों तक चला छात्रों का आंदोलन स्थगित हो चुका है. इस दौरान आंदोलन में क्या-क्या हुआ. चंदन भट्टाचार्य की रिपोर्ट.

Published : August 20, 2026 at 8:29 PM IST
रांची: झारखंड में प्रतियोगी परीक्षाओं की कथित अनियमितताओं, पेपर लीक और भर्ती प्रक्रिया में पारदर्शिता की मांग को लेकर शुरू हुआ छात्र आंदोलन 26 दिनों के लंबे संघर्ष के बाद फिलहाल दो महीने के लिए स्थगित हो गया है. 25 जुलाई से शुरू हुआ यह आंदोलन पहले बापू वाटिका में अनिश्चितकालीन सत्याग्रह के रूप में सामने आया और बाद में जयपाल सिंह मुंडा स्टेडियम आंदोलन का मुख्य केंद्र बन गया. 19 अगस्त को सरकार की ओर से परीक्षाओं को रद्द करने, जांच कराने और परीक्षा व्यवस्था में सुधार के फैसलों के बाद आंदोलनकारी मंचों ने आगे की रणनीति पर निर्णय लिया.
आंदोलन की खास बात यह रही कि इसकी शुरुआत कुछ परीक्षाओं में कथित गड़बड़ी और भर्ती प्रक्रिया में सुधार की मांग से हुई, लेकिन धीरे-धीरे यह झारखंड की प्रतियोगी परीक्षा व्यवस्था, सरकारी भर्ती में पारदर्शिता, जांच एजेंसियों की भूमिका और राजनीतिक हस्तक्षेप जैसे बड़े सवालों तक पहुंच गया. 26 दिनों तक बारिश, स्वास्थ्य संबंधी चुनौतियों, प्रशासनिक दबाव, मंचों के बीच मतभेद और राजनीतिक समर्थन के बीच छात्र डटे रहे.
हालांकि, सरकार के फैसले के बाद आंदोलन को स्थगित कर दिया गया है, लेकिन छात्रों की सभी मांगें पूरी होने का दावा स्वयं आंदोलनकारी मंच भी नहीं कर रहे हैं. रिफॉर्म्स मंच ने स्पष्ट किया है कि सरकार को दो महीने का समय दिया गया है. इस अवधि में यदि शेष मांगों पर ठोस कार्रवाई नहीं होती है तो आंदोलन फिर शुरू किया जा सकता है.
बापू वाटिका से शुरू हुआ संघर्ष
25 जुलाई को छात्रों ने रांची की बापू वाटिका में अनिश्चितकालीन सत्याग्रह शुरू किया. छात्रों की मुख्य मांग प्रतियोगी परीक्षाओं में कथित अनियमितताओं की जांच, विवादित परीक्षाओं को रद्द करना और भर्ती प्रक्रिया में सुधार थी. आंदोलनकारी लगातार यह सवाल उठा रहे थे कि सरकारी नौकरियों की परीक्षाओं में यदि पारदर्शिता पर सवाल खड़े हों तो अभ्यर्थियों के भविष्य की जिम्मेदारी कौन लेगा. शुरुआती दिनों में आंदोलन सीमित संख्या में छात्रों के साथ आगे बढ़ा, लेकिन धीरे-धीरे अलग-अलग जिलों और क्षेत्रों से अभ्यर्थियों के पहुंचने का सिलसिला तेज हुआ.

आंदोलन का आकार बढ़ने के साथ ही प्रशासन के सामने सुरक्षा, भीड़ प्रबंधन और आयोजन स्थल को लेकर चुनौती भी बढ़ी. बापू वाटिका में पहले से निर्धारित कार्यक्रम डूरंड कप फुटबॉल प्रतियोगिता और जनजातीय उत्सव को देखते हुए प्रशासन ने छात्रों से स्थान बदलने का आग्रह किया. प्रशासन का कहना था कि बापू वाटिका पर आंदोलन के लिए पूर्व अनुमति नहीं ली गई थी और निर्धारित कार्यक्रमों के कारण वहां लंबे समय तक धरना जारी रखना व्यावहारिक नहीं था. इसके बाद आंदोलनकारी जयपाल सिंह मुंडा स्टेडियम पहुंचे. स्थान बदला, लेकिन आंदोलन की धार कम नहीं हुई. बल्कि स्टेडियम पहुंचने के बाद आंदोलन का विस्तार और तेज हो गया.
जयपाल सिंह मुंडा स्टेडियम बना आंदोलन का केंद्र
स्टेडियम में पहुंचने के बाद छात्रों ने इसे अपना मुख्य धरना स्थल बना लिया. अलग-अलग जिलों से आने वाले छात्रों के लिए रहने, भोजन, पानी और स्वास्थ्य जैसी व्यवस्थाएं जनसहयोग से चलने लगीं. लगातार बारिश और खराब मौसम के बावजूद छात्र मैदान में डटे रहे. दिन बीतने के साथ आंदोलन में बड़ी संख्या में अभ्यर्थी जुड़ते गए. कई सामाजिक संगठनों, छात्र संगठनों और राजनीतिक दलों के प्रतिनिधि भी छात्रों से मिलने पहुंचे. आंदोलन को राष्ट्रीय स्तर पर भी समर्थन मिलने लगा. लेकिन स्टेडियम में आंदोलन का विस्तार होने के साथ एक नया विवाद भी सामने आया. आंदोलनकारी छात्रों के बीच नेतृत्व और आंदोलन की प्रकृति को लेकर मतभेद उभरने लगे.

एक आंदोलन, दो मंच
जयपाल सिंह मुंडा स्टेडियम में कुछ समय बाद दो अलग-अलग मंच नजर आने लगे. इसके पीछे सबसे बड़ा कारण आंदोलन को राजनीतिक समर्थन देने और उसे पूरी तरह गैर-राजनीतिक बनाए रखने को लेकर मतभेद रहा. एक पक्ष का मानना था कि आंदोलन को पूरी तरह छात्रों तक सीमित रखा जाए. तर्क था कि राजनीतिक दलों और नेताओं की सक्रिय भागीदारी से मूल मुद्दे कमजोर पड़ सकते हैं और सरकार आंदोलन को राजनीतिक रंग देकर उसकी गंभीरता कम करने की कोशिश कर सकती है.
दूसरी ओर, जेपीएससी-जेएसएससी अभ्यर्थी न्याय मंच के नेतृत्व में राजनीतिक समर्थन को भी आंदोलन की ताकत के रूप में देखा गया. छात्र नेता देवेंद्र नाथ महतो आंदोलन के प्रमुख चेहरों में शामिल हुए और उन्होंने भूख हड़ताल शुरू की. उनके साथ जुड़े राजनीतिक कार्यकर्ताओं और नेताओं के समर्थन के कारण आंदोलन का एक अलग स्वरूप भी सामने आया. राजनीतिक नेताओं की मौजूदगी को लेकर दोनों पक्षों में मतभेद बढ़ा. इसके बाद स्टेडियम परिसर में अलग-अलग टेंट और लाउडस्पीकर तक लगाए गए. सरकार से बातचीत को लेकर भी दोनों मंचों की रणनीति अलग रही और प्रतिनिधिमंडल अलग-अलग बातचीत के लिए पहुंचा. इस तरह आंदोलन की सबसे बड़ी चुनौती केवल सरकार से अपनी मांगें मनवाना नहीं रही, बल्कि आंदोलन के भीतर एकता बनाए रखना भी बन गई.

भूख हड़ताल ने बढ़ाया दबाव
आंदोलन के दौरान भूख हड़ताल सबसे महत्वपूर्ण घटनाक्रमों में रही. छात्र नेता देवेंद्र नाथ महतो समेत कई छात्र अनशन पर बैठे. लंबे समय तक भूख हड़ताल के कारण अनशनकारियों की स्वास्थ्य स्थिति को लेकर चिंता बढ़ी. मेडिकल टीम लगातार स्वास्थ्य की निगरानी करती रही. 19 अगस्त को आंदोलन स्थगित करने के फैसले के बाद भूख हड़ताल पर बैठे राहुल, सबिता और रूपेश का अनशन पद्मश्री मधु मंसूरी और कोतवाली इंस्पेक्टर सनोज कुमार चौधरी ने जूस पिलाकर समाप्त कराया. सनोज कुमार चौधरी की भूमिका आंदोलन के दौरान अलग तरह से चर्चा में रही. पुलिस अधिकारी होने के बावजूद उन्होंने कई मौकों पर छात्रों के बीच अभिभावक की भूमिका निभाई. आंदोलनकारी छात्रों और प्रशासन के बीच संवाद बनाए रखने में भी उनकी मौजूदगी दिखाई दी.

सरकार के फैसले ने बदला आंदोलन का रुख
आंदोलन के बीच सरकार की ओर से प्रतियोगी परीक्षाओं को लेकर कई महत्वपूर्ण फैसले सामने आए. विवादित एजेंसी TDPL से जुड़ी परीक्षाओं को रद्द करने का निर्णय लिया गया. आंदोलनकारी मंच के अनुसार, एजेंसी से जुड़ी 2014 से अब तक आयोजित 22 भर्ती परीक्षाओं को रद्द करने का फैसला हुआ है. इसके अलावा 14वीं जेपीएससी प्रारंभिक परीक्षा और वर्ष 2023 तथा 2025 में आयोजित जेपीएससी बैकलॉग परीक्षाओं को भी रद्द करने का निर्णय लिया गया. सरकार ने वर्ष 2014 से 2026 तक आयोजित अन्य परीक्षाओं की जांच का आदेश भी दिया. सरकार के फैसलों में भर्ती परीक्षा व्यवस्था में सुधार के लिए समिति गठित करने और परीक्षा में कदाचार तथा पेपर लीक से जुड़े मामलों की त्वरित सुनवाई के लिए फास्ट ट्रैक कोर्ट की दिशा में कदम उठाने की बात भी सामने आई.

इन फैसलों को आंदोलनकारी छात्रों ने अपने संघर्ष की बड़ी उपलब्धि के तौर पर देखा. रिफॉर्म्स मंच के प्रवक्ता रविंद्र कुमार पासवान ने कहा कि छात्रों की प्रमुख मांग परीक्षाओं को रद्द करने, जांच कराने और भर्ती व्यवस्था में सुधार की थी. सरकार ने कई महत्वपूर्ण परीक्षाओं को रद्द करने का फैसला लेकर छात्रों के हित में बड़ा कदम उठाया है. उन्होंने कहा कि 20 से अधिक परीक्षाओं को रद्द किया जाना छात्रों के लंबे संघर्ष का परिणाम है. हालांकि उन्होंने यह भी साफ किया कि अभी सभी मांगें पूरी नहीं हुई हैं.
किन परीक्षाओं को लेकर अब भी सवाल?
रिफॉर्म्स मंच ने पीजीटी, माध्यमिक, आचार्य, नगर पालिका सहायक, कांस्टेबल और फील्ड वर्कर जैसी कुछ परीक्षाओं को लेकर भी सवाल उठाए हैं. मंच की मांग है कि जिन परीक्षाओं को लेकर अनियमितताओं की शिकायतें सामने आई हैं, उनकी भी समीक्षा और आवश्यक कार्रवाई हो. यही वजह है कि आंदोलन को पूरी तरह खत्म करने के बजाय दो महीने के लिए स्थगित करने का निर्णय लिया गया.
रविंद्र पासवान के मुताबिक, सरकार के प्रतिनिधियों और मंत्रियों के साथ बातचीत में छात्रों से समय देने का आग्रह किया गया था. इसी आधार पर मंच ने आंदोलन को फिलहाल रोकने का फैसला किया है. पीयूष कुमार ने भी कहा कि छात्रों को मुख्यमंत्री और सरकार की मंशा पर भरोसा है. सरकार को दो महीने का समय दिया गया है. यदि इस अवधि में छात्रों की शेष मांगों पर ठोस काम नहीं हुआ तो आंदोलन दोबारा शुरू किया जाएगा. यानी 19 अगस्त को आंदोलन का अंत नहीं, बल्कि एक विराम माना जा रहा है.
सीबीआई की मांग पर बदला रुख
आंदोलन के शुरुआती और महत्वपूर्ण चरण में सीबीआई जांच की मांग भी प्रमुख रही. छात्रों के एक वर्ग का मानना था कि राज्य की एजेंसी से जांच कराने के बजाय केंद्रीय एजेंसी से जांच कराई जानी चाहिए. इसी मांग को लेकर आंदोलन का राजनीतिक दबाव भी बढ़ा. हालांकि 19 अगस्त को आंदोलन स्थगित करते समय रिफॉर्म्स मंच ने फिलहाल सीबीआई जांच की मांग को आगे नहीं बढ़ाने का फैसला किया. मंच ने कहा कि सीआईडी जांच की प्रक्रिया पहले से चल रही है और अब सरकार द्वारा दिए गए आश्वासन तथा जांच की दिशा को देखा जाएगा. यह बदलाव आंदोलन के अंतिम चरण का एक महत्वपूर्ण राजनीतिक और रणनीतिक फैसला माना जा रहा है.

जांच एजेंसियों की कार्रवाई भी बनी मुद्दा
परीक्षा विवाद को लेकर जांच एजेंसियों की कार्रवाई भी आंदोलन के दौरान चर्चा में रही. आंदोलनकारियों की ओर से लगातार जांच तेज करने की मांग उठती रही. जांच के दायरे में विभिन्न परीक्षाओं से जुड़े दस्तावेज, डिजिटल डेटा और परीक्षा प्रक्रिया से संबंधित रिकॉर्ड शामिल किए जाने की बात सामने आई. छात्रों का तर्क था कि केवल परीक्षा रद्द करने से समस्या का स्थायी समाधान नहीं होगा. यह भी पता लगना चाहिए कि गड़बड़ी कहां हुई, इसके लिए जिम्मेदार कौन है और भविष्य में ऐसी स्थिति दोबारा न बने, इसके लिए क्या व्यवस्था होगी. यही वजह है कि आंदोलन के एजेंडे में परीक्षा रद्द करने के साथ-साथ भर्ती व्यवस्था में संरचनात्मक सुधार भी शामिल रहा.
राहुल गांधी की बातचीत ने बढ़ाया राजनीतिक दबाव
आंदोलन के 13वें दिन छात्र प्रतिनिधियों से कांग्रेस नेता और लोकसभा में नेता प्रतिपक्ष राहुल गांधी की फोन पर बातचीत भी हुई. छात्र प्रतिनिधि रविंद्र पासवान के अनुसार, बातचीत करीब तीन मिनट चली. छात्रों ने परीक्षा में कथित गड़बड़ी, परीक्षा माफिया और सीबीआई जांच समेत अपनी मांगों की जानकारी दी. राहुल गांधी ने छात्रों की मांगों को गंभीरता से लेने का आश्वासन दिया और अन्य मांगों का ड्राफ्ट भेजने को कहा.
इसके बाद उन्होंने सार्वजनिक रूप से भी परीक्षा व्यवस्था और छात्रों के मुद्दे पर सरकारों को छात्रों की बात सुनने की जरूरत बताई. 14 अगस्त को मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन को लिखे गए पत्र में भी छात्र प्रतिनिधियों से सीधे संवाद करने की सलाह दी गई. इस पूरे घटनाक्रम में रांची महानगर कांग्रेस अध्यक्ष कुमार राजा की भूमिका भी महत्वपूर्ण रही, जिन्होंने छात्र प्रतिनिधियों और कांग्रेस नेतृत्व के बीच संपर्क स्थापित कराया.

सत्ता पक्ष से विपक्ष तक समर्थन
आंदोलन के दौरान राजनीतिक समर्थन का दायरा भी लगातार बढ़ा. कांग्रेस के नेताओं और मंत्रियों ने छात्रों से मुलाकात की. मंत्री दीपिका पांडेय सिंह और इरफान अंसारी आंदोलन स्थल पहुंचे और छात्रों की मांगों पर बातचीत की. विपक्षी भाजपा के नेताओं ने भी आंदोलन को समर्थन दिया और परीक्षा विवाद की जांच की मांग उठाई. बाबूलाल मरांडी, केंद्रीय रक्षा राज्य मंत्री संजय सेठ, सांसद आदित्य साहू और अन्य नेताओं ने आंदोलन स्थल पहुंचकर छात्रों से मुलाकात की.
आजसू पार्टी ने भी छात्रों के समर्थन में कार्यक्रम किए. झारखंड लोकतांत्रिक क्रांतिकारी मोर्चा की सक्रियता आंदोलन के दूसरे मंच के साथ रही. वामपंथी और विभिन्न छात्र संगठनों ने भी अलग-अलग चरणों में आंदोलन का समर्थन किया. इस तरह आंदोलन का दायरा छात्र संगठनों से आगे बढ़कर राजनीतिक दलों और सामाजिक संगठनों तक पहुंच गया.
राष्ट्रीय चेहरों की मौजूदगी
आंदोलन को राष्ट्रीय स्तर पर भी समर्थन मिला. अभिनेता और लेखक पीयूष मिश्रा रांची पहुंचे और छात्रों के बीच अपनी मौजूदगी दर्ज कराई. उनके पहुंचने से आंदोलन को व्यापक सार्वजनिक चर्चा मिली. लद्दाख से सामाजिक कार्यकर्ता और शिक्षा सुधार से जुड़े सोनम वांगचुक ने भी छात्र नेता देवेंद्र नाथ महतो से वीडियो कॉल के जरिए बातचीत की. उन्होंने छात्रों के संघर्ष की सराहना की और स्वास्थ्य को देखते हुए भूख हड़ताल खत्म करने की अपील की.

अभिनेत्री और सामाजिक कार्यकर्ता कुनिका सदानंद भी 16 अगस्त को जयपाल सिंह मुंडा स्टेडियम पहुंचीं. उन्होंने छात्रों की मांगों को जायज बताया और सरकार से समाधान निकालने की अपील की. उन्होंने सीबीआई जांच को लेकर अपनी अलग राय रखते हुए कहा था कि लंबी जांच से नियुक्तियों में और देरी हो सकती है. उन्होंने सरकार से छात्रों को ठोस लिखित आश्वासन देने की बात कही.

नेहा बोरा की एंट्री
झारखंड की राजधानी रांची में JPSC-JSSC परीक्षाओं में कथित अनियमितताओं के खिलाफ चल रहे छात्र आंदोलन के 14वें दिन, 7 अगस्त 2026 को छात्र संगठन आइसा की राष्ट्रीय अध्यक्ष नेहा बोरा भी आंदोलन को समर्थन देने पहुंची थीं. हालांकि, आंदोलन के मंच से राजनीतिक बयानबाजी किए जाने को लेकर कुछ छात्रों ने उनका विरोध किया.
छात्रों का आरोप था कि आंदोलन को राजनीतिक दिशा देने की कोशिश की जा रही है. विरोध के बाद नेहा बोरा को मंच से नीचे उतरना पड़ा. इसी दिन विधानसभा घेराव के दौरान नेहा बोरा पर स्याही फेंके जाने की घटना भी सामने आई, जिसके बाद आंदोलन के दौरान यह मामला चर्चा में रहा.

आंदोलन के 17वें दिन विधानसभा घेराव
JPSC-JSSC परीक्षा में कथित अनियमितताओं और परीक्षा सुधारों की मांग को लेकर 10 अगस्त 2026 को छात्रों ने झारखंड विधानसभा घेराव किया. राज्य के सभी 24 जिलों से हजारों छात्र रांची पहुंचे और जयपाल सिंह मुंडा स्टेडियम से विधानसभा की ओर मार्च किया. विधानसभा से कुछ दूरी पर पुलिस ने बैरिकेडिंग कर छात्रों को रोकने की कोशिश की, लेकिन प्रदर्शनकारी बैरिकेडिंग पार कर आगे बढ़ गए. इसके बाद पुलिस ने भीड़ को नियंत्रित करने के लिए पानी की बौछार, आंसू गैस और लाठीचार्ज का इस्तेमाल किया.
झड़प में कई छात्र और पुलिसकर्मी घायल हुए. भूख हड़ताल पर बैठे छात्र नेता देवेंद्र नाथ महतो की तबीयत भी बिगड़ गई, जिन्हें सदर अस्पताल ले जाया गया. कार्रवाई के दौरान बड़ी संख्या में छात्रों को हिरासत में लिया गया और पुलिस ने मामले में एफआईआर भी दर्ज की. घटना के विरोध में भाजपा ने 11 अगस्त को झारखंड बंद का आह्वान किया.
26 दिन तक चलता रहा जनसहयोग
आंदोलन की एक बड़ी विशेषता यह रही कि 26 दिनों तक छात्रों के भोजन और पानी की व्यवस्था बड़े पैमाने पर जनसहयोग से चलती रही. अलग-अलग सामाजिक संगठन, स्थानीय लोग और स्वयंसेवक आंदोलन स्थल पर भोजन लेकर पहुंचे. टीम भैरव ने नियमित रूप से भोजन की व्यवस्था की. वर्ल्ड पंजाबी ऑर्गेनाइजेशन और सन फाउंडेशन की ओर से भी लंगर चलाया गया.
राज्यसभा सांसद विक्रमादित्य सिंह साहनी के नेतृत्व में आई टीम ने आंदोलनकारी छात्रों के लिए भोजन सेवा की. दिल्ली के जंतर-मंतर से जुड़े सामाजिक कार्यकर्ता मोहम्मद जुनैद मलिक भी रांची पहुंचे और भोजन वितरण में सहयोग किया. लेखक रवि सिंह चौधरी की टीम ने भी लंबे समय तक छात्रों के लिए भोजन की व्यवस्था की. हिंदू जागृत मंच, स्थानीय मंदिर समितियों, दुकानदारों और आम नागरिकों ने भी फल, पानी, दूध और अन्य जरूरी सामग्री उपलब्ध कराई. इस जनसहयोग ने आंदोलन को केवल छात्रों का विरोध प्रदर्शन नहीं रहने दिया, बल्कि इसे सामाजिक समर्थन वाला आंदोलन बना दिया.

बारिश और विपरीत परिस्थितियों के बीच डटे छात्र
26 दिनों के आंदोलन में मौसम भी बड़ी चुनौती रहा. लगातार बारिश के बीच छात्रों को खुले मैदान में रहना पड़ा. इसके बावजूद बड़ी संख्या में अभ्यर्थी धरना स्थल पर बने रहे. कई छात्रों ने अपने रोजगार और भविष्य से जुड़े सवालों को लेकर आंदोलन को व्यक्तिगत संघर्ष के रूप में देखा. कई ऐसे अभ्यर्थी थे जो वर्षों से प्रतियोगी परीक्षाओं की तैयारी कर रहे थे और परीक्षा प्रक्रिया में कथित अनियमितताओं को अपने भविष्य के साथ सीधे जुड़ा हुआ मुद्दा मान रहे थे. इसी कारण आंदोलन में केवल परीक्षा रद्द कराने की मांग नहीं रही, बल्कि भर्ती प्रक्रिया में स्थायी सुधार की मांग भी लगातार उठती रही.
जंतर-मंतर से अलग रही आंदोलन की तस्वीर
विशेषज्ञों और जानकारों के मुताबिक, झारखंड के इस छात्र आंदोलन की शैली दिल्ली के जंतर-मंतर पर होने वाले आंदोलनों से काफी अलग रही. यहां किसी व्यक्ति विशेष या सरकार के खिलाफ आपत्तिजनक भाषा के इस्तेमाल से बचने पर जोर दिया गया. आंदोलनकारियों की ओर से एक तरह का आचार-संहिता भी अपनाई गई, जिसके तहत देशविरोधी, धर्मविरोधी या अभद्र और व्यक्तिगत टिप्पणियों वाले नारों से दूरी बनाए रखने की कोशिश हुई.
आंदोलन स्थल पर अनुशासन भी इसकी एक अलग पहचान रही. यहां बड़ी संख्या में राजनीतिक कार्यकर्ताओं या केवल छात्र संगठनों के सदस्यों के बजाय प्रतियोगी परीक्षाओं की तैयारी कर रहे और रोजगार की तलाश में जुटे युवा नजर आए. उनके लिए आंदोलन किसी राजनीतिक एजेंडे से ज्यादा परीक्षा व्यवस्था, भर्ती प्रक्रिया और रोजगार के अवसरों से जुड़ा सवाल था. यही वजह रही कि 26 दिनों तक चले इस संघर्ष में नारे से ज्यादा मुद्दा और राजनीति से ज्यादा रोजगार केंद्र में दिखाई दिया.

सरकार के फैसले के बाद बदला माहौल
सरकार की ओर से परीक्षाओं को रद्द करने और जांच के आदेश जारी होने के बाद 19 अगस्त को स्टेडियम का माहौल बदल गया. लंबे समय से धरने पर बैठे छात्रों में उत्साह दिखाई दिया. अनशनकारियों का अनशन समाप्त कराया गया और मंच की ओर से आंदोलन स्थगित करने की घोषणा की गई. रिफॉर्म्स मंच ने साफ किया कि सरकार को दो महीने का समय दिया जा रहा है. इस अवधि में यदि शेष मांगों पर काम नहीं हुआ तो आंदोलन फिर शुरू किया जा सकता है. मंच से जेपीएससी-जेएसएससी रिफॉर्म्स को विधिवत रजिस्टर कराने की घोषणा भी की गई. इसका उद्देश्य आंदोलन खत्म होने के बाद भी छात्रों के मुद्दों पर संगठनात्मक रूप से काम जारी रखना बताया गया.
आभार यात्रा में दिखा जीत का उत्साह
जेपीएससी-जेएसएससी रिफॉर्म्स मंच की ओर से आभार यात्रा निकाली गई. जयपाल सिंह मुंडा स्टेडियम से शुरू हुई यह यात्रा अल्बर्ट एक्का चौक तक पहुंची. आंदोलनकारी छात्रों ने सरकार के फैसलों के प्रति आभार जताया. अल्बर्ट एक्का चौक पर छात्रों ने जश्न मनाया, अबीर-गुलाल उड़ाया और पटाखे भी फोड़े. 26 दिनों तक चले संघर्ष के बाद यह पल छात्रों के लिए राहत और उपलब्धि का प्रतीक बना.
हालांकि मंच इसे अंतिम जीत के बजाय संघर्ष की महत्वपूर्ण उपलब्धि मान रहा है. छात्रों का कहना है कि सरकार ने कई बड़ी मांगों पर कदम उठाया है, लेकिन भर्ती व्यवस्था में पूरी तरह पारदर्शिता लाने और बाकी परीक्षाओं पर कार्रवाई का इंतजार अभी बाकी है.
अब सबसे बड़ा सवाल यही है कि दो महीने बाद आंदोलन की तस्वीर क्या होगी?
रिफॉर्म्स मंच ने सरकार को स्पष्ट समय सीमा दी है. मंच का कहना है कि यदि दो महीने के भीतर शेष मांगों पर ठोस कार्रवाई नहीं होती है तो छात्र फिर मैदान में उतरेंगे. सरकार के सामने अब चुनौती केवल रद्द की गई परीक्षाओं की प्रक्रिया पूरी करना नहीं है, बल्कि जांच को निष्पक्ष और प्रभावी बनाना तथा भविष्य की भर्ती परीक्षाओं के लिए भरोसेमंद व्यवस्था तैयार करना भी है.

छात्रों की मांग है कि परीक्षा कैलेंडर स्पष्ट हो, भर्ती प्रक्रिया पारदर्शी हो और किसी भी स्तर पर गड़बड़ी की स्थिति में जिम्मेदारी तय की जाए. 26 दिनों का यह आंदोलन फिलहाल थम गया है, लेकिन इसके सवाल खत्म नहीं हुए हैं. बापू वाटिका से शुरू होकर जयपाल सिंह मुंडा स्टेडियम तक पहुंचे इस संघर्ष ने झारखंड की भर्ती व्यवस्था को लेकर कई गंभीर सवाल खड़े किए हैं. सरकार के फैसलों ने आंदोलन को विराम जरूर दिया है, लेकिन अगले दो महीने यह तय करेंगे कि यह विराम स्थायी समाधान की ओर बढ़ता है या फिर एक नए चरण के आंदोलन की भूमिका तैयार करता है. फिलहाल जयपाल सिंह मुंडा स्टेडियम खाली हो चुका है, लेकिन छात्रों का संदेश साफ है - आंदोलन स्थगित हुआ है, खत्म नहीं.
हाई कोर्ट ने सरकार के फैसले पर लगाई रोक
वहीं सरकार द्वारा 22 परीक्षाएं रद्द करने के फैसले को इन परीक्षाओं द्वारा चयनित होकर नौकरी कर रहे अभ्यर्थियों ने झारखंड हाई कोर्ट में चुनौती दी. सरकार के आदेश के खिलाफ कोर्ट में कई याचिकाएं दायर की गईं. जिस पर 20 अगस्त को सुनवाई हुई. इस दौरान कोर्ट ने 11वीं से 13वीं जेपीएससी, फूड सेफ्टी ऑफिसर के साथ-साथ सीडीपीओ की नियुक्ति को रद्द करने के सरकार के फैसले पर रोक लगा दी है. साथ ही सरकार की ओर से जवाब मांगा गया है.
वहीं हाई कोर्ट के फैसले के बाद जेपीएससी-जेएसएससी रिफॉर्म मंच से जुड़े सदस्य राजेश प्रसाद ने कहा कि 11वीं से 13वीं जेपीएससी, सीडीपीओ और FSO में सफल होकर नियुक्त हो चुके अभ्यर्थियों ने अदालत के सामने अपना पक्ष रखा, वहीं मंच की ओर से भी अपना पक्ष रखा गया. उन्होंने कहा कि दुर्भाग्यपूर्ण स्थिति यह रही कि राज्य सरकार को जिस मजबूती के साथ अपना पक्ष अदालत के सामने रखना चाहिए था, वह नहीं रखा गया.
यह भी पढ़ें:
जेपीएससी-जेएसएससी रिफॉर्म्स मंच ने दो महीने के लिए स्थगित किया आंदोलन, मंच को रजिस्टर कराने की घोषणा
JPSC Protest: जेपीएससी-जेएसएससी न्याय मंच ने आंदोलन किया समाप्त, रिफॉर्म्स मंच की बैठक जारी
सीजीएल समेत टीडीपीएल की सभी परीक्षाएं रद्द करने का सरकार का फैसला, मुख्यमंत्री ने की घोषणा

