उदयपुर: सरकारी स्कूल के बच्चों के बीच पहुंचे ग्रुप कैप्टन शुभांशु शुक्ला, साझा किए अंतरिक्ष के राज
उदयपुर के विद्या भवन में सरकारी स्कूल के बच्चों ने 'गूगल कर ले रे...' नाटक प्रस्तुत किया. अंतरिक्ष यात्री ग्रुप कैप्टन शुभांशु शुक्ला मौजूद रहे.

Published : December 13, 2025 at 9:34 PM IST
उदयपुर: झीलों की नगरी में विद्या भवन स्कूल के मुक्ताकाशी रंगमंच पर एक यादगार आयोजन हुआ, जहां सरकारी स्कूल के बच्चों ने नाटक ‘गूगल कर ले रे…’ की प्रस्तुति दी. इस दौरान हाल ही में अंतरिक्ष से लौटे भारतीय अंतरिक्ष यात्री ग्रुप कैप्टन शुभांशु शुक्ला स्वयं मंच पर बच्चों के साथ खड़े नजर आए. पूरा परिसर तालियों की गड़गड़ाहट और भावनाओं से गूंज उठा. यह महज एक नाट्य प्रस्तुति नहीं थी, बल्कि सपनों, आत्मविश्वास और संभावनाओं का सच्चा उत्सव थी.
यह खास रहा आयोजन: नाटक ‘गूगल कर ले रे…’ ने डिजिटल युग में तकनीक पर निर्भर न होकर सोचने, पढ़ने और अनुभव से सीखने की महत्वता को खूबसूरती से उकेरा. पहेलियों को सुलझाने की यह यात्रा पुस्तकालय से शुरू होकर समाज और अंततः एक अंतरिक्ष यात्री तक पहुंची. इससे बच्चों को यह विश्वास मिला कि ज्ञान केवल स्क्रीन तक सीमित नहीं, बल्कि जीवन के अनुभवों में भी छिपा है. कार्यक्रम की शुरुआत में अतिथियों का स्वागत क्रिएटिव सर्किल के सुनील एस. लड्ढा, डॉ. कमलेश शर्मा, हेमंत जोशी आदि ने किया.
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सरकारी स्कूल के बच्चों की दमदार प्रस्तुति: संभागीय आयुक्त प्रज्ञा केलरमानी की उपस्थिति में राजकीय उच्च माध्यमिक विद्यालय वरड़ा के विद्यार्थियों ने मंच संभाला. ग्रामीण पृष्ठभूमि से आए इन बच्चों ने अपने सशक्त अभिनय से दर्शकों को हंसाया, सोचने पर मजबूर किया और अंत में भावुक भी कर दिया. उनकी आंखों में चमक और संवादों में सच्चाई साफ झलक रही थी, जिसे दर्शकों ने दिल खोलकर सराहा.
शुभांशु की उपस्थिति ने डाली जान: नाटक की सबसे भावुक और प्रेरक पल तब आया, जब ग्रुप कैप्टन शुभांशु शुक्ला एक दृश्य में मंच पर आए. बच्चों के साथ संवाद करते हुए उन्होंने अंतरिक्ष के अनुभवों को सरल और आत्मीय अंदाज में साझा किया. बच्चों की जिज्ञासाओं का जिस अपनत्व से जवाब दिया, उसने पूरे वातावरण को संवेदना से भर दिया. यह दृश्य मानो संदेश दे रहा था कि बड़े सपने छोटे मंचों से ही शुरू होते हैं.

ब्रह्मांड से बड़ी सोच और जिज्ञासा: कार्यक्रम के समापन पर ग्रुप कैप्टन शुभांशु शुक्ला ने बच्चों को संबोधित करते हुए कहा कि ब्रह्मांड बहुत बड़ा है, लेकिन उससे भी बड़ी हमारी सोच और जिज्ञासा होनी चाहिए, अगर जिज्ञासा जीवित रहे, तो रास्ते खुद-ब-खुद बनते जाते हैं.
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नाटक में गांव के सरकारी स्कूल के बच्चों को शिक्षक तीन पहेलियां बिना गूगल की मदद से हल करने का टास्क देते हैं और दस हजार रुपये का पुरस्कार भी घोषित करते हैं. बच्चे गोपू, पुनम और टीकू पहले स्कूल लाइब्रेरी, फिर पत्रकार के पास जाते हैं, लेकिन सफलता नहीं मिलती. दो आर्किटेक्ट से दो पहेलियां हल होने के बाद तीसरी का जवाब उन्हें अंतरिक्ष यात्री ग्रुप कैप्टन शुभांशु शुक्ला से मिलता है. शुक्ला प्यार से अपने अंतरिक्ष अनुभव साझा करते हुए पहेली का जवाब देते हैं. बिना गूगल के जवाब ढूंढने की यह रोचक यात्रा ही नाटक का मूल थी.
बच्चों ने पूछे कई सवाल: शुभांशु शुक्ला से संवाद में बच्चों ने उत्साह से अंतरिक्ष यात्रा के कई सवाल पूछे. उन्होंने अंतरिक्ष में बिताए पल, पृथ्वी को ऊपर से देखने का अनुभव और वहां के जीवन की रोचक बातें बताईं. बच्चों ने अंतरिक्ष यात्री बनने की पढ़ाई, कोचिंग और प्रशिक्षण के बारे में भी जाना. शुक्ला ने सरल शब्दों में समझाया कि विज्ञान में मजबूत आधार, अनुशासन, मेहनत और आत्मविश्वास ही इस सपने की कुंजी हैं. उनका प्रेरक संवाद बच्चों को नया ज्ञान और अंतरिक्ष विज्ञान में आगे बढ़ने की ऊर्जा दे गया.
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