अजमेर की फौजिया तोपची, जो तोप के धमाके से निभाती हैं रमजान में सेहरी व इफ्तार के अलार्म का फर्ज
फौजिया खान रमजान में तोप दागकर रोजेदारों को सेहरी और इफ्तार का संकेत देती हैं. उनकी आठवीं पीढ़ी यह परंपरा निभा रही है.

Published : February 25, 2026 at 5:56 PM IST
अजमेर: राजस्थान के पवित्र शहर अजमेर में रमजान का महीना आते ही एक खास आवाज गूंज उठती है. अंधेरे रात में जब पूरा शहर सोया होता है, तब अजमेर की बड़ी पीर पहाड़ी से एक जोरदार तोप की गरज सुनाई देती है. यह आवाज हजारों रोजेदारों के लिए अलार्म का काम करती है कि अब सेहरी का वक्त हो गया है. इस आवाज को सुनकर लोग नींद से उठते हैं, हल्का-फुल्का नाश्ता करते हैं और सेहरी की रश्म अदा करते हैं. इसके बाद सेहरी खत्म होने के समय भी तोप दागी जाती है.
8 साल की उम्र में सीखा: तोप दागने का काम कर रही हैं अजमेर की एक साधारण मुस्लिम महिला फौजिया खान, जिन्हें शहर में लोग "फौजिया खान तोपची" के नाम से जानते हैं. फौजिया ये काम तब से कर रही हैं, जब उनकी उम्र मात्र 8 साल थी. फौजिया के पिता ने अपनी देखरेख में 8 साल की उम्र में फौजिया से तोप चलवाई थी. आज वे अपने परिवार की आठवीं पीढ़ी हैं, जो ख्वाजा गरीब नवाज की दरगाह शरीफ की इस पुरानी और खास परंपरा को निभा रही हैं.
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मुगलों के समय से चली आ रही परंपरा: फौजिया खान ने बताया कि रमजान में रोजा रखना इस्लाम का पांचवां फर्ज है. रमजान के पूरे महीने मुस्लिम समाज के लोग सूरज निकलने से पहले सेहरी करते हैं और सूरज डूबने तक कुछ भी नहीं खाते. सुबह सेहरी का समय भी बहुत कम होता है, अगर लोग सोए रहे तो सेहरी छूट सकती है, इसीलिए सदियों से अजमेर में लोगों को जगाने के लिए मुगलों के समय से तोप दागने की परंपरा चली आ रही है. तोप की गरज सुनकर लोग एक साथ जाग जाते हैं और सेहरी करते हैं. इसके बाद शाम को फिर तोप दागी जाती है, जिससे पता चलता है कि अब इफ्तार का समय हो गया है. पूरे अजमेर शहर के मुस्लिम समुदाय के लोग एक साथ में रोजे खोलते हैं. यह नजारा देखने लायक होता है.

सदियों से परिवार निभा रहा परंपरा: फौजिया खान बताती हैं, “मैं 8 साल की थी जब मेरे पिता हनीफ मोहम्मद ने मुझे पहली बार तोप दागना सिखाया. उस दिन से मैंने अपना जीवन ख्वाजा साहब के नाम कर दिया, अब तो यह मेरी जिंदगी का मकसद बन गया है." उनके परिवार के सदस्य दरगाह कमेटी के मौरूसी अमले में शामिल हैं, यानी सदियों से उनका परिवार ही यह जिम्मेदारी निभा रहा है. खर्चा भी पूरी तरह दरगाह कमेटी उठाती है. फौजिया ने बताया कि "वो 7 बहनें हैं, लेकिन केवल मैं ही तोप दागने के काम करती हूं."

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महिला होने के चलते चुनौतियां: फौजिया खान ने बताया कि एक महिला के लिए यह काम आसान नहीं था. इस्लाम में औरतों को पर्दे में रहने का चलन है. एक औरत का तोप दागना, पहाड़ी पर जाना, रात के अंधेरे में काम करना, ये सब बातें कई लोगों को अजीब लगती थीं. फौजिया को दरगाह कमेटी से अनुमति लेने में काफी परेशानी हुई. कई बार विरोध भी हुआ, लेकिन उनके पिता हनीफ मोहम्मद और पूरे परिवार ने उनका पूरा साथ दिया. फौज़िया कहती हैं, "परिवार की हिम्मत और पिता का समर्थन ही मेरी ताकत है, अगर वे न होते तो शायद मैं यह काम नहीं कर पाती." आज वे पूरे देश में मिसाल बन चुकी हैं.

हर रोज सुबह-शाम दागती हैं तोप: फौजिया सिर्फ अकेली नहीं हैं. उनके चाचा और ताया के परिवार के कुछ सदस्य भी इस काम में उनका साथ देते हैं, लेकिन महिला के रूप में सिर्फ फौज़िया ही तोप दागने का पूरा जिम्मा संभालती हैं. रमजान के लगभग 30 दिनों तक हर रोज सुबह सेहरी के लिए और शाम में इफ्तार के लिए वे तोप दागती हैं. अजमेर उर्स के दौरान भी यही परंपरा निभाई जाती है. फौजिया कहती हैं कि, वे मुगल काल की रस्मों के अनुसार ही तोप दागती हैं. दरगाह शरीफ की धार्मिक परंपराओं का पूरा ख्याल रखा जाता है. तोप की आवाज सुनकर न सिर्फ अजमेर शहर, बल्कि आसपास के इलाकों के रोजेदारों को भी समय का पता लगाना में आसानी होती है.

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फौजिया खान की यह कहानी सिर्फ एक परंपरा की नहीं, बल्कि हौसले, समर्पण और परिवार के साथ की भी कहानी है, जहां समाज में महिलाओं के लिए कई रास्ते बंद माने जाते हैं, वहां फौज़िया ने अपनी मेहनत और लगन से एक नई मिसाल कायम की है. हर रमज़ान में जब अजमेर की बड़ी पीर पहाड़ी से तोप गूंजती है, तब न सिर्फ रोजेदार जागते हैं, बल्कि पूरा शहर फौज़िया खान के हौसले को सलाम करता है. यह आवाज सिर्फ सेहरी और इफ्तार का संकेत नहीं, बल्कि अजमेर की सदियों पुरानी साझा संस्कृति और एकता का भी प्रतीक है.


