ओडिशा में पहली बार बड़े पैमाने पर ग्रीन शैवाल की खेती, जानें देश-विदेश में क्यों है इस 'सुपरफूड' की डिमांड
ओडिशा में पहली बार बड़े पैमाने पर हरी शैवाल की खेती, देश और विदेश में क्यों है इसकी डिमांड, क्या बोले पबित्र साहू

Published : February 18, 2026 at 8:36 PM IST
खोरधा: स्पिरुलिना या हरी शैवाल, जिसे एक सुपरफूड के रूप में जाना जाता है. आपको जानकर हैरानी होगी कि, नासा अंतरिक्ष यात्रियों को स्पिरुलिना दिया जाता है. शरीर में विटामिन और प्रोटीन की कमी को पूरा करने वाले इस सुपरफूड की खेती ओडिशा में की जा रही है.
खोरधा जिले के बेगुनिया ब्लॉक के अखुपदर में पहली बार स्पिरुलिना (हरी शैवाल) की खेती शुरू हुई है. चूंकि देश और विदेश में इसकी मांग अधिक है, इसलिए 57 वर्षीय आईटी पेशेवर पबित्र साहू इसकी खेती कर रहे हैं.

स्पिरुलिना की खेती कैसे की जाती है?
इससे संबंधित कई सवाल हैं, जैसे मार्केट में इस हरी शैवाल की मांग अधिक क्यों है और इसकी खेती करने से आपको क्या फायदा हो सकता है.
7 एकड़ जमीन पर स्पिरुलिना की खेती
विदेशों में स्पिरुलिना की मांग अधिक बताई जाती है. इस सुपरफूड में धीरे-धीरे बढ़ती रुचि को देखते हुए, एक आईटी पेशेवर पबित्र साहू ने पहली बार ओडिशा में इसकी खेती की है. विश्व स्वास्थ्य संगठन (WHO) ने स्पिरुलिना को सुपरफूड के रूप में प्रमाणित किया है. पश्चिमी देशों में इसकी मांग अधिक है, वहीं भारत में भी इसकी जरूरत बढ़ रही है.

स्पिरुलिना क्या है?
स्पिरुलिना एक प्रकार का हरा शैवाल या समुद्री शैवाल है, जो साधारण समुद्री शैवाल से अलग है. इस समुद्री शैवाल में 60 से 70 प्रतिशत प्रोटीन होता है. इसमें आयरन भी प्रचुर मात्रा में होता है. इसलिए इसे सुपरफूड कहा जाता है. NASA इसे अंतरिक्ष यात्रियों को देता है.
खेती कब शुरू की?
पबित्र साहू करीब दो साल से यह खेती कर रहे हैं. इसके लिए राज्य सरकार ने अपना सहयोग दिया है. पबित्र ने मुख्यमंत्री कृषि कल्याण योजना के जरिए करीब 11 करोड़ रुपये की लागत से यह नया फार्म शुरू किया है. उन्होंने न सिर्फ इसकी खेती की है, बल्कि अपनी लैब के जरिए खुद के मदर कल्चर को इकट्ठा करके 18 टैंकों में इसकी खेती भी की है.

सालाना पैदावार कितनी है?
उनके के मुताबिक, 18 फार्म हाउस के जरिए 7 एकड़ क्षेत्र में किए जा रहे इस प्रोजेक्ट की सालाना पैदावार 75 टन है. इसमें से सालाना 10 से 15 टन कैप्सूल और टैबलेट तैयार किए जा रहे हैं. इन्हें राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय बाजार में बेचने का मकसद है.

स्पिरुलिना से क्या तैयार होता है और इसकी कीमत क्या है?
भारत में स्पिरुलिना की कीमत 1400 से 1600 रुपये प्रति किलोग्राम है, जबकि अंतरराष्ट्रीय बाजार में इसकी कीमत 3000 से 7000 रुपये प्रति किलोग्राम है.

कितने लोग कर रहे हैं काम, कितना है मुनाफा?
पबित्र के पास 32 कर्मचारी हैं. इनमें से पांच कृषि-वैज्ञानिक कार्य कर रहे हैं. इस खेती से सालाना 4 से 5 करोड़ रुपये कमाने का लक्ष्य रखते हुए पबित्रा ने कहा कि वह 2 से 2.5 करोड़ रुपये कमाएंगे.
पबित्र साहू के बारे में जानें
पबित्र साहू पेशे से आईटी प्रोफेशनल थे जो स्पिरुलिना की खेती करते हैं. पबित्रा साहू ने कई वर्षों तक अमेरिका, ऑस्ट्रेलिया, रूस और यूरोपीय देशों सहित विभिन्न विदेशी देशों में काम किया है. विदेशों में स्पिरुलिना की मांग को देखते हुए उन्होंने ओडिशा में इसकी खेती करने का फैसला किया.

कोविड के बाद भुवनेश्वर लौटने के बाद उन्होंने इसकी खेती शुरू की. स्पिरुलिना की खेती से फायदा उठाने वाले पबित्रा साहू कहते हैं, 'मैंने शुरुआत में इस खेती में 8 करोड़ रुपये लगाए थे. लेकिन बाद में यह रकम बढ़कर 11 करोड़ रुपये हो गई. पिछले पांच से सात सालों से भारतीय बाजार में स्पिरुलिना की मांग बढ़ रही है."

उन्होंने कहा कि, देश में 22 से 23 बड़ी कंपनियां स्पिरुलिना बेच रही हैं लेकिन वे इसकी खेती नहीं कर रही हैं. हम यहां स्पिरुलिना की खेती कर रहे हैं और अच्छी ग्रेड की स्पिरुलिना का उत्पादन कर रहे हैं और इसका कारोबार कर रहे हैं.' कृषि वैज्ञानिक अभिजीत पानीग्रही के अनुसार, स्पिरुलिना या शैवाल की खेती फार्म हाउस में की जाती है। इसके लिए पानी की टंकी की जरूरत होती है. स्पिरुलिना की खेती पानी की टंकी में की जाती है.
इसे पहले एक ऑटोमेटन द्वारा छलनी में लाया जाता है. उसके बाद इसे सुखाया जाता है. इसे बिना गर्मी के सुखाया जाता है. इसे एक समान आग में गर्म करके सुखाया जाता है ताकि सीधी गर्मी न लगे. सुखाने के बाद इसे कैप्सूल, पाउडर और टैबलेट बनाया जाता है.
भारतीय बाजार में स्पिरुलिना का कारोबार बढ़ रहा है, वहीं पबित्रा का लक्ष्य पूरी दुनिया में व्यापार करना है. खासकर ऑस्ट्रेलिया और यूरोपीय देशों से बात करने के बाद भविष्य में अमेरिका जैसे देशों के साथ व्यापार करने का लक्ष्य है. आजकल स्पिरुलिना को कैप्सूल, पाउडर और टैबलेट के रूप में तैयार कर अपनी ही कंपनी के जरिए पैकेजिंग कर सैंपल राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय बाजारों में भेजे जाते हैं.
कृषि वैज्ञानिक अभिजीत पानीग्रही ने बताया, ‘1 ग्राम स्पिरुलिना एक किलोग्राम भोजन के बराबर होता है. क्योंकि मौजूदा जीवनशैली में शरीर को जरूरी मात्रा में प्रोटीन नहीं मिल पाता है. इसके फायदे यह हैं कि इसका सेवन करने से याददाश्त बढ़ती है. इससे रोग प्रतिरोधक क्षमता बढ़ती है और एकाग्रता बढ़ती है.’
सुपरफूड, दवा नहीं
बेगुनिया ब्लॉक सहायक कृषि अधिकारी सुभ्रण कुमार रौला ने बताया, ‘हमारे जिले और राज्य में पहली बार इसकी खेती की गई है. यह प्रोजेक्ट मुख्यमंत्री कृषि उद्यम योजना के तहत किया गया है. यह दवा नहीं, सुपरफूड है. जैसे पौधे कार्बन डाइऑक्साइड लेते हैं और ऑक्सीजन छोड़ते हैं और अपना भोजन खुद बनाते हैं, वैसे ही स्पिरुलिना भी सुपरफूड है.
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