'तेज रफ्तार ले रही है सबसे ज्यादा जान': रोड सेफ्टी एक्सपर्ट भार्गव मैत्रा ने सुझाए सुरक्षा के 3 बड़े मंत्र
IIT खड़गपुर के प्रोफेसर भार्गव मैत्रा ने ETV Bharat के साथ खास बातचीत की, सड़क हादसों को कम करने पर अपने विचार रखे. पढ़ें...


Published : January 7, 2026 at 3:28 PM IST
"सड़कें सिर्फ वाहनों की आवाजाही के लिए नहीं होतीं, बल्कि ये हर किसी की सुरक्षा के लिए होनी चाहिए. वैसे तो हादसों के कई कारण होते हैं, लेकिन तेज रफ्तार सबसे ज्यादा लोगों की जान लेती है. जहां रोड इंजीनियरिंग और तकनीक के जरिए लगातार निगरानी रहती है, वहां वाहन चलाने वाले लोग गति सीमा का पालन करते हैं और हेलमेट व सीट बेल्ट पहनते हैं. अगर निगरानी कमजोर हो, तो अच्छी सड़कों पर भी हादसे बढ़ जाते हैं. सड़क सुरक्षा न केवल सरकार की जिम्मेदारी है, बल्कि यह हर नागरिक की सामाजिक जिम्मेदारी भी है."
ये बातें आईआईटी खड़गपुर के प्रोफेसर भार्गव मैत्रा ने बुधवार को हैदराबाद में 'ईनाडु-ईटीवी भारत' को दिए एक इंटरव्यू में कहीं. प्रोफेसर मैत्रा रोड सेफ्टी नेटवर्क (RSN) के सदस्य भी हैं. प्रोफेसर भार्गव मैत्रा ने बताया कि भारत दुनिया के उन देशों में से एक है जहां सड़क दुर्घटनाएं सबसे ज़्यादा होती हैं. उन्होंने इसके तीन मुख्य कारण बताये, जो इस प्रकार हैं:
- तेज रफ्तार : यह पहला कारण है. 2023 में, लगभग 68% दुर्घटनाओं और मौतों का मुख्य कारण तेज रफ्तार ही पाया गया था.
- सुरक्षा और बुनियादी सुविधाओं की कमी : सड़कों पर सुरक्षा और बुनियादी सुविधाओं का अभाव दूसरी बड़ी कमी है.
- प्रवर्तन प्रणाली की कमी : यह सुनिश्चित करने के लिए एक उचित प्रवर्तन प्रणाली का अभाव कि सभी नियमों का पालन किया जाए.
प्रोफेसर भार्गव मैत्रा ने बताया कि कई सड़कों पर पैदल चलने वालों और साइकिल सवारों के लिए उचित सुविधाओं की कमी है. इसके परिणामस्वरूप, वे खतरनाक तरीके से सड़कों का उपयोग करने को मजबूर होते हैं. यही कारण है कि सड़क दुर्घटनाओं में होने वाली मौतों में पैदल चलने वालों और साइकिल सवारों की हिस्सेदारी 67% तक है. सड़क के डिजाइन में उनके लिए समर्पित लेन शामिल की जानी चाहिए.

सड़कों पर इंजीनियरिंग से जुड़े कौन से महत्वपूर्ण बदलाव सबसे ज्यादा जरूरी हैं?
प्रोफेसर भार्गव मैत्रा कहते हैं, आधुनिक सड़कें वाहनों की रफ्तार को ध्यान में रखकर बनाई गई हैं, लेकिन कुछ बदलाव बेहद आवश्यक हैं. जहां राष्ट्रीय राजमार्ग गुजरते हैं, वहां स्थानीय यातायात के लिए सर्विस रोड की कमी के कारण दुर्घटनाएं होती हैं. कई चौराहों पर सामने की सड़क की दृश्यता का कम होना और छोटी सड़कों से आने वाले ट्रैफिक पर नियंत्रण की कमी एक बड़ी समस्या बन रही है. जमीन की अनुपलब्धता के कारण, डिवाइडर की चौड़ाई कम कर दी जाती है, जिससे मोड़ और यू-टर्न (U-turns) पर हादसे होते हैं.
सड़कों पर 'ब्लैक स्पॉट' की पहचान करने और उन्हें सुधारने के लिए किन वैज्ञानिक तरीकों को अपनाया जाना चाहिए?
प्रोफेसर भार्गव मैत्रा ने बताया कि अगर एक ही जगह पर बार-बार दुर्घटनाएं हो रही हैं, तो इसका मतलब है कि वहां बुनियादी ढांचे में कोई कमी है. 'ब्लैक स्पॉट' की पहचान भारतीय सड़क कांग्रेस और सड़क परिवहन एवं राजमार्ग मंत्रालय द्वारा निर्धारित दिशा-निर्देशों के अनुसार की जाती है. पश्चिम बंगाल में हमारे शोध के आधार पर, हमने महसूस किया है कि प्रत्येक राज्य के लिए अलग-अलग मानक होने चाहिए. आईआईटी खड़गपुर इसके लिए 'मशीन लर्निंग' और 'स्पेशियल एनालिसिस' विधियों का उपयोग कर रहा है.
जहां सड़कें अच्छी हैं वहां हादसे ज़्यादा होते हैं और जहां सड़कें खराब हैं वहां कम, इसे हम कैसे समझें?
प्रोफेसर भार्गव ने इस सवाल के जवाब में कहा,आज के वाहन आधुनिक तकनीक से लैस हैं और तेज़ रफ़्तार पकड़ने में सक्षम हैं. इसीलिए, अच्छी सड़कों पर तेज रफ़्तार एक बड़ी चुनौती बन गई है. रोड इंजीनियरिंग के ज़रिए गति को नियंत्रित करने के तरीके अपनाने चाहिए.
उन्होंने बताया कि नियमों का पालन न केवल कर्मियों द्वारा, बल्कि तकनीक के माध्यम से भी सुनिश्चित किया जाना चाहिए. इससे सड़क का उपयोग करने वालों में जिम्मेदारी बढ़ेगी. इसके अलावा, पैदल चलने वालों को तेज़ रफ्तार वाहनों से सुरक्षित रखने के लिए अलग बुनियादी ढांचा (जैसे फुटपाथ या ओवरब्रिज) प्रदान किया जाना चाहिए.
'गुड सेमेरिटन' (नेक मददगार) कानून के प्रति लोग कितने जागरूक हैं?
प्रोफेसर भार्गव मैत्रा ने बताया कि 'सेवलाइफ फाउंडेशन' के एक अध्ययन के अनुसार, 84% भारतीय अभी भी 'गुड सेमेरिटन' कानून से अनजान हैं. इसके परिणामस्वरूप, दुर्घटना के समय राहगीर पीड़ितों की मदद करने में हिचकिचाते हैं. एक 'रोड सेफ्टी नेटवर्क' के रूप में, हम नागरिक समाज, समूहों, गैर-सरकारी संगठनों (NGOs) और सामाजिक कार्यकर्ताओं के बीच जिम्मेदार यात्रा के प्रति जागरूकता पैदा करने के साथ-साथ नीति निर्धारण और उसके कार्यान्वयन में भी महत्वपूर्ण भूमिका निभा रहे हैं.
उन्होंने बताया- "हमने नीति निर्माताओं से 'भारतीय सड़क सुरक्षा अधिनियम' की चार प्रमुख कमियों को दूर करने का अनुरोध किया है. हमने बच्चों की सुरक्षा, गति नियंत्रण, राज्य स्तर पर मजबूत कार्ययोजना और मोटर वाहन अधिनियम में संशोधनों को लेकर सुझाव दिए हैं."
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