अगर नंदा राजजात यात्रा 2027 में हुई तो सरकार पर बढ़ेगा दबाव, कुंभ-चुनाव-चारधाम भी हैं चुनौती
एशिया की सबसे कठिन नंदा राजजात यात्रा के आयोजन को लेकर विवाद, अगर 2027 में हुई तो उत्तराखंड सरकार के सामने पेश आएंगी ये चुनौतियां

By ETV Bharat Uttarakhand Team
Published : January 19, 2026 at 8:38 PM IST
|Updated : January 20, 2026 at 7:50 PM IST
किरनकांत शर्मा
देहरादून: देवभूमि उत्तराखंड में ऐतिहासिक एवं धार्मिक महत्व को समेटे हुए नंदा राजजात यात्रा का वही स्थान है, जो देश के अन्य हिस्सों में कुंभ या अमरनाथ यात्रा का माना जाता है. यह केवल मां नंदा की विदाई की परंपरा नहीं, बल्कि हिमालयी समाज की सामूहिक लोक आस्था के साथ सांस्कृतिक और आध्यात्मिक विरासत का प्रतीक है. अमूमन पर 12 साल के अंतराल पर होने वाली यह यात्रा अब एक बार फिर चर्चाओं में है. वजह है इसके आयोजन की तिथि में अचानक बदलाव की घोषणा.
दरअसल, नंदा देवी राजजात यात्रा को 2026 की बजाय अब अगले साल यानी 2027 में आयोजित कराने की बात कही जा रही है. ऐसे में अगर नंदा राजजात यात्रा को 2026 की बजाय 2027 में आयोजित किया जाता है तो यह फैसला सरकार और प्रशासन के लिए दबाव एवं चुनौतियां खड़ी कर सकता है. हालांकि, ऐसा पहली बार नहीं है, जब नंदा राजजात यात्रा के साल या तारीख में बदलाव हुए हों, इससे पहले भी इसी तरह के बदलाव यात्रा को लेकर समय-समय पर होते रहे हैं.
आस्था, परंपरा और इतिहास की यात्रा है नंदा राजजात: उत्तराखंड के गढ़वाल से लेकर कुमाऊं तक मां नंदा देवी को कुल देवी के रूप में पूजा जाता है. हर 12 साल में नंदा राजजात यात्रा निकाली जाती है. जिसे उत्तराखंड की सबसे लंबी, कठिन और भावनात्मक यात्राओं में गिना जाता है. मान्यता है कि यह यात्रा देवी नंदा और सुनंदा को उनके मायके से ससुराल यानी हिमालय की ऊंची चोटियों की ओर विदा करने का प्रतीक है.

यह यात्रा केवल एक धार्मिक अनुष्ठान नहीं बल्कि, गांव-गांव को जोड़ने वाली सांस्कृतिक कड़ी है. लोक मान्यताओं और ऐतिहासिक संदर्भों के अनुसार, नंदा राजजात की परंपरा कत्यूरी राजाओं के समय से चली आ रही है. समय के साथ यह परंपरा राजसत्ता से निकलकर जन आस्था का पर्व बन गई. यात्रा के दौरान पारंपरिक छंतोलियां, लोकगीत, ढोल दमाऊं और कठिन पहाड़ी मार्गों पर पैदल चलने वाले श्रद्धालु इस आयोजन को विशिष्ट बनाते हैं.
नंदा राजजात यात्रा पौराणिक सांस्कृतिक, धार्मिक और ऐतिहासिक धरोहर माना जाता है. इसे सिर्फ उत्तराखंड ही नहीं, बल्कि एशिया की सबसे लंबी पैदल धार्मिक यात्राओं में से एक माना जाता है. जिसे जोखिम भरे पैदल रास्तों को पार कर पूरा किया जाता है. मां नंदा को पार्वती का रूप या हिमालयी की बेटी माना जाता है. ऐसे में हर 12 साल में मां नंदा को विदा किया जाता है. जिसकी अगुवाई चौसिंगा यानी चार सींग वाला खाडू करता है.
🔱 मां नन्दा की डोली जब चलती है... तो पूरा पहाड़ झूम उठता है
— Chamoli Police Uttarakhand (@chamolipolice) July 17, 2025
नन्दा देवी राजजात यात्रा 2026 – श्रद्धा, साहस और संस्कृति का अद्वितीय संगम।#NandaRajJat2026 #MaaNandaKiYatra #UttarakhandHeritage #Rajjat #ChamoliPolice #12YearsOfFaith pic.twitter.com/YaRV4TalmZ
280 किलोमीटर की कठिन पदयात्रा: यह यात्रा चमोली जिले के कर्णप्रयाग के नौटी गांव से निकलती है. जो रूपकुंड झील के पास होमकुंड में समाप्त होती है. राजजात यात्रा दुर्गम हिमालयी क्षेत्र से होकर गुजरती है. जिसमें पथरीले रास्ते, बुग्याल, ग्लेशियर शामिल हैं. मुख्य पड़ाव की बात करें तो यह नौटी से शुरू होकर कुरुड़ फिर लटूखाल उसके बाद वाण गांव पहुंचती है. जिसके बाद यात्रा बेदनी बुग्याल से होकर रूपकुंड फिर होमकुंड पहुंचती है.
नंदा राजजात यात्रा करीब 280 किलोमीटर लंबी मानी जाती है. यह यात्रा घने जंगलों, संकरी पहाड़ी रास्ते, बर्फीली चोटियों और दुर्गम दर्रों से होकर गुजरती है. यात्रा के दौरान हजारों श्रद्धालु, साधु संत और स्थानीय लोग शामिल होते हैं. पूरे रास्ते मां नंदा से जुड़े भजन कीर्तन करती मंडलियां जरा भी थकान का एहसास नहीं होने देती है. ऐसी मान्यता है कि नंदा राजजात यात्रा पूरे क्षेत्र में समृद्धि और आशीर्वाद बरसाती है.

यही वजह है कि यह आयोजन केवल धार्मिक नहीं बल्कि, प्रशासनिक और सुरक्षा दृष्टि से भी बेहद संवेदनशील मानी जाती है. स्वास्थ्य सुविधाएं, अस्थायी पड़ाव, संचार व्यवस्था, आपदा प्रबंधन और सुरक्षा इंतजाम इन सबकी योजना महीनों नहीं बल्कि, सालों पहले से बनानी पड़ती है. कुछ इन्हीं व्यवस्थाओं का भी हवाला देकर श्रीनंदा देवी राजजात समिति नौटी ने इस बार की यात्रा को अगली साल टालने की बात कही है. जबकि, महापंचायत ने इसी साल कराने की बात कही है.
12 साल की परंपरा और समय से जुड़ा विवाद: परंपरागत रूप से नंदा राजजात यात्रा 12 साल के अंतराल पर आयोजित होती रही है. हालांकि, इतिहास में कई ऐसे भी मौके आए, जब प्राकृतिक आपदाओं, प्रशासनिक कारणों या सामाजिक परिस्थितियों के चलते यात्रा तय समय पर नहीं हो सकी. इसके बावजूद श्रद्धालुओं की उम्मीद यही रहती है कि यात्रा अपनी पारंपरिक समय में ही संपन्न हो, लेकिन आयोजन की तिथि को लेकर विवाद शुरू हो गया.

दरअसल, 18 जनवरी को श्री नंदा राजजात समिति नौटी ने नंदा राजजात 2026 को स्थगित करने का फैसला लिया था. समिति के अध्यक्ष राकेश कुंवर और महासचिव भुवन नौटियाल ने कर्णप्रयाग में प्रेसवार्ता कर कहा था कि हिमालयी क्षेत्र में जरूरी काम समय पर पूरे नहीं हो पाए हैं. इसी कारण समिति ने राजजात को स्थगित करने का निर्णय लिया है. उन्होंने बताया कि अब यह ऐतिहासिक और धार्मिक यात्रा साल 2027 में आयोजित की जाएगी.
उनका ये भी कहना था कि पंचांग के अनुसार, यह यात्रा 19 व 20 सितंबर को उच्च हिमालयी क्षेत्रों में पहुंचती है. इस दौरान क्षेत्र में भारी बर्फबारी व प्रतिकूल मौसम की संभावना रहती है. साथ ही निर्जन पड़ावों पर अभी आवश्यक कार्य पूरे न होने के कारण यात्रा की सुरक्षा एवं व्यवस्थाएं चुनौतीपूर्ण हो सकती थी. इन सभी परिस्थितियों को ध्यान में रखते हुए समिति ने सर्वसम्मति से राजजात यात्रा को 2026 के स्थान पर 2027 में आयोजित करने का निर्णय लेने की घोषणा कर दी.

नंदानगर महापंचायत में 2026 में ही यात्रा कराने की हुई बात: हालांकि, समिति ने आगामी 23 जनवरी को मनौती के दिन राजजात यात्रा 2027 की घोषणा करने की बात कही थी. जिसे लेकर विवाद खड़ा हो गया था. जिसके बाद आज यानी 19 जनवरी को चमोली के नंदानगर में महापंचायत हुई. इस महापंचायत में क्षेत्र के जनप्रतिनिधि, सामाजिक संगठन, मंदिर समिति के पदाधिकारी, बुद्धिजीवी, महिला मंगल दल और बड़ी संख्या में स्थानीय ग्रामीण शामिल हुए.

महापंचायत ने 'नंदा राजजात' का नाम भी बदला: इस दौरान महापंचायत में सर्वसम्मति से निर्णय लिया गया कि साल 2026 में यात्रा हर हाल में आयोजित की जाएगी. साथ ही ये भी तय किया गया कि अब यह यात्रा 'नंदा राजजात' नहीं बल्कि 'नंदा की बड़ी जात' (ठुलि जात) के नाम से जानी जाएगी. महापंचायत में स्पष्ट किया गया कि यात्रा का आयोजन पारंपरिक समयानुसार अगस्त–सितंबर महीने में ही किया जाएगा.

वहीं, यात्रा के स्थगन को लेकर चल रही तमाम अटकलों को खारिज करते हुए ग्रामीणों, जनप्रतिनिधियों और मंदिर समितियों ने सदियों पुरानी परंपरा को पूरी श्रद्धा एवं आस्था के साथ निभाने का संकल्प दोहराया. कुरुड़ मंदिर समिति के अध्यक्ष सुखवीर रौतेला ने कहा कि यह महापंचायत सभी लोगों की सहमति के बाद बुलाई गई है.
सेवानिवृत्त कर्नल हरेंद्र सिंह रावत ने कहा कि नंदा देवी की यात्रा को किसी भी प्रकार की राजनीति से दूर रखा जाना चाहिए. यह विशुद्ध रूप से आस्था और परंपरा से जुड़ा आयोजन है, जिसे लोक विश्वास के आधार पर ही संचालित किया जाना चाहिए. यात्रा स्थगन को लेकर आई चर्चाओं पर भी सरकार को स्थिति स्पष्ट करनी चाहिए.

उधर, अगर 2026 में प्रस्तावित यात्रा को 2027 तक टाल दिया जाता है तो यह निर्णय परंपरा और प्रशासनिक के बीच टकराव की स्थिति पैदा कर सकता है. एक ओर आस्था और धार्मिक अनुशासन का सवाल है तो दूसरी ओर सरकार की तैयारियों और संसाधनों की सीमाएं. फिलहाल, श्री नंदा राजजात समिति नौटी ने स्थगन की बात कही है तो कुरुड़ मंदिर समिति ने आयोजित कराने की बात कही है.

उत्तराखंड सरकार के लिए 2027 सबसे व्यस्त साल: साल 2027 उत्तराखंड सरकार और प्रशासन के लिए पहले से ही असाधारण रूप से व्यस्त रहने वाला है. यदि इसी साल नंदा राजजात यात्रा भी आयोजित होती है तो दबाव कई गुना बढ़ जाएगा. क्योंकि, इस साल हरिद्वार कुंभ मेला 2027 का आयोजन प्रस्तावित है. कुंभ मेला भी केवल एक धार्मिक आयोजन नहीं बल्कि, विश्व का सबसे बड़ा मानव समागम माना जाता है. हालांकि, इस बार हरिद्वार में अर्धकुंभ है, लेकिन सरकार इसे पूर्ण कुंभ की तरह ही बनाने की कोशिश में लगी है.

स्वाभाविक है कि जिस तरीके से सरकार इसकी तैयारी और इसे प्रचारित कर रही है तो करोड़ों श्रद्धालुओं की संभावित भीड़ को देखते हुए सुरक्षा, यातायात, स्वच्छता, स्वास्थ्य सेवाएं और आपदा प्रबंधन को लेकर प्रशासन को पूरी ताकत झोंकनी पड़ेगी. ऐसे में साल 2027 में नंदा राजजात जैसी दुर्गम यात्रा का आयोजन करना प्रशासनिक क्षमता की कड़ी परीक्षा होगा. क्योंकि, अधिकारियो की बड़ी संख्या भी इस यात्रा में भी लगानी पड़ेगी.
विधानसभा चुनाव 2027 की भी चुनौती: इसके साथ ही सरकार और प्रशासनिक अमले के साथ बीजेपी संगठन के लिहाज से भी 2027 बेहद चुनौती भरा रहने वाला है. क्योंकि, उत्तराखंड विधानसभा चुनाव भी इसी साल प्रस्तावित हैं. चुनावी साल में प्रशासनिक अमले का बड़ा हिस्सा चुनाव आयोग के निर्देशों के तहत कार्य करता है.
आचार संहिता, मतदान व्यवस्था सुरक्षा और मतगणना जैसे कार्यों में अधिकारियों से लेकर कर्मचारियों तक की व्यस्तता चरम पर होती है. ऐसे समय में नंदा राजजात यात्रा या कुंभा मेला फिर चुनाव के लिए पर्याप्त कर्मचारी और संसाधन जुटाना सरकार के लिए बड़ी चुनौती बन सकता है.

चारधाम यात्रा का वार्षिक दबाव: वहीं, दूसरी ओर चारधाम यात्रा भी प्रशासन और सरकार को बेहद व्यस्त रखती है. चारधाम यात्रा उत्तराखंड के लिए हर साल एक बड़ा प्रशासनिक अभ्यास होती है. लाखों तीर्थयात्री, सीमित पर्वतीय सड़कें, मौसम की मार और आपदाओं का खतरा, इन सबके बीच प्रशासन को लगातार अलर्ट मोड में रहना पड़ता है. ऐसे में 2027 में यदि चारधाम यात्रा, कुंभ मेला और नंदा राजजात तीनों का दबाव एक साथ पड़ा तो प्रशासनिक संतुलन बनाए रखना आसान नहीं होगा.
संगठन सुरक्षा और आपदा प्रबंधन की परीक्षा: नंदा राजजात यात्रा के दौरान सुरक्षा और आपदा प्रबंधन सबसे बड़ी प्राथमिकता होती है. यात्रा मार्ग अत्यंत संवेदनशील और दुर्गम है. भूस्खलन, बारिश, बर्फबारी और स्वास्थ्य, आपात स्थितियों की आशंका हमेशा बनी रहती है.
इसके लिए एसडीआरएफ, पुलिस, स्वास्थ्य विभाग, लोक निर्माण विभाग और स्वयंसेवी संगठनों के बीच समन्वय जरूरी होता है. यदि 2027 में कुंभ और चुनाव पहले से ही इन एजेंसियों को व्यस्त रखते हैं तो नंदा राजजात के लिए अतिरिक्त प्रबंध करना सरकार के लिए कठिन चुनौती साबित हो सकता है.

पर्यटन और अंतरराष्ट्रीय छवि का सवाल: नंदा राजजात यात्रा को राज्य सरकार पर्यटन के दृष्टिकोण से भी महत्वपूर्ण मानती रही है. यह यात्रा उत्तराखंड की सांस्कृतिक पहचान को वैश्विक मंच पर प्रस्तुत करने का अवसर देती है, लेकिन यदि 2027 में अत्यधिक दबाव के कारण व्यवस्थाएं कमजोर पड़ती हैं तो इसका असर राज्य की पर्यटन छवि पर भी पड़ सकता है.
देश और दुनिया की नजरें कुंभ और चारधाम के साथ नंदा राजजात जैसे आयोजनों पर रहती है. ऐसे में किसी भी स्तर पर अव्यवस्था सरकार की छवि को नुकसान पहुंचा सकती है. हालांकि, राज्य के पर्यटन मंत्री सतपाल महाराज इस बात से इत्तेफाक नहीं रखते हैं. उनका कहना है कि सरकार हर आयोजन करवाने में सक्षम है.
"ये बात सही है कि उत्तराखंड के लिए साल 2027 बेहद महत्वपूर्ण साल होगा, लेकिन नंदा राजजात यात्रा करानी है या नहीं, ये फैसला समिति का है. हम पूरी व्यवस्था करके देंगे और अभी तक कई बैठकें और अधिकारियों के दौरे भी मार्ग पर हो चुके हैं. कुंभ में केंद्र से भी सहायता लेंगे. अब आगे देखेंगे कि कैसे और क्या करना है? लेकिन सरकार हर आयोजन को करवाने में सक्षम है."- सतपाल महाराज, पर्यटन मंत्री, उत्तराखंड
क्या बोले समिति के लोग? वहीं, नंदा राजजात यात्रा समिति के अध्यक्ष राकेश कुंवर कहते हैं कि हम यात्रा को आगे प्रशासनिक तैयारियां की वजह से ले जा रहे हैं. इसलिए भी इस यात्रा को आगे ले जाना पड़ रहा है. क्योंकि, जिस मार्ग से यात्रा जाएगी, वो मार्ग आपदा की वजह से अभी सही नहीं है. ऐसे में यात्रा को करवाना संभव नजर नहीं आ रहा है.
समिति ने उत्तराखंड सरकार से एक और बड़ी मांग की है. उनका कहना है कि नंदा देवी राजजात यात्रा के लिए कुंभ की तरह ही एक प्राधिकरण बनाकर इसकी पूरी तैयारी करनी चाहिए. इस प्राधिकरण का काम केवल व्यवस्थाओं को देखना होगा. जबकि, समिति इसके धार्मिक पहलुओं को देखेगी. इसमें और भी कई मेले ठेले और आयोजन शामिल हो सकते हैं. इतनी बड़ी यात्रा में अगर व्यवस्थाएं बेहतर नहीं होगी तो यात्रा करवाना संभव नहीं है.

पहले भी आगे पीछे होती रही है यात्रा: श्री नंदा राजजात समिति की मानें तो पहले भी कई बार 12 साल के बाद यात्राएं होती रहती हैं. यह तारीख कभी आपदा तो कभी अन्य वजहों से आगे बढ़ी हैं. साल 1843 में यात्रा हुई थी और उसके बाद 1886 में यात्रा हुई. उसके बाद 1905 में फिर उसके बाद 1925 में यात्रा हुई. उसके बाद यात्रा 1951 में हुई और फिर 1968 में साल 2000 के बाद यह यात्रा साल 2014 में आयोजित हुई थी.
फैसले की घड़ी में सरकार: नंदा राजजात यात्रा उत्तराखंड की आत्मा से जुड़ा आयोजन है. इसे 2026 में कराना या 2027 में स्थगित करना. दोनों ही विकल्पों पर समिति को हो निर्णय लेना है. यदि यह यात्रा 2027 में होती है तो कुंभ मेला, विधानसभा चुनाव, चारधाम यात्रा और अन्य राष्ट्रीय आयोजनों के बीच सरकार व प्रशासन को असाधारण समन्वय संसाधन प्रबंधन एवं संवेदनशीलता दिखानी होगी. आने वाले समय में इस यात्रा को लेकर लिया जाने वाला निर्णय ये भी तय करेगा कि सरकार आस्था, परंपरा और प्रशासनिक क्षमता के बीच किस तरह संतुलन साधती है.
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