देश में 35 अरब पेड़...25 साल में कटे 384 करोड़, लगाए सिर्फ 262 करोड़, क्या ये भीषण गर्मी की वजह?
वैश्चिवक स्तर पर प्रति व्यक्ति 422 पेड़ का औसत लेकिन, भारत में सिर्फ 28. आईए जानते हैं एक व्यक्ति को कितने पेड़ की जरूरत है.

Published : May 29, 2026 at 3:11 PM IST
Deforestation in India: पेड़ों को इंसानों की लाइफलाइन कहा जाता है. लेकिन, एक इंसान को कितने पेड़ की जरूरत होती है, इसका अंदाजा शायद बहुत से लोग न जानते हों. इस खबर में हम आपको ऐसे ही कुछ अनजान तथ्यों से रूबरू कराएंगे. तो आईए जानते हैं कि एक इंसान को साल भर तक सांस लेने के लिए कितने पेड़ों की जरूरत होती है. पूरी लाइफ में उसे कितने पेड़ों की जरूरत होगी. साथ ही पेड़ों का गर्मी और प्रदूषण से कितना गहरा कनेक्शन है.
भारतीय वन सर्वेक्षण (Forest Survey of India) की रिपोर्ट के अनुसार एक एडल्ट (वयस्क) व्यक्ति को सालभर में करीब 740 किलोग्राम शुद्ध ऑक्सीजन की जरूरत होती है. इसको पाने के लिए व्यक्ति को 7 से 8 पेड़ों की जरूरत पड़ती है. यदि व्यक्ति की औसत आयु 60 वर्ष मानी जाए तो उसे अपनी पूरी लाइफ में 480 पेड़ों की जरूरत होगी.
अब सवाल यह उठता है कि भारत में कितने पेड़ हैं? तो इसका जवाब भी ये रिपोर्ट देती है. इसके अनुसार भारत में लगभग 35 अरब पेड़ हैं. देश की जनसंख्या 147 करोड़ से ज्यादा है. इसके हिसाब से प्रति व्यक्ति लगभग 28 पेड़ आते हैं. सालाना जरूरत के हिसाब से तो ये ज्यादा हैं लेकिन, जीवनभर के लिए यह संख्या पर्याप्त नहीं है. यही कारण है कि देश में पेड़ों की कमी है और साल दर साल तापमान बढ़ता जा रहा है.
देश में साल दर साल बढ़ रही गर्मी के पीछे भी कहीं न कहीं हरियाली को ही कारण माना जा रहा है. हालांकि, आंकड़ों में तो देश में हरियाली जरूरत से ज्यादा है, फिर भी ये तापमान को नियंत्रित क्यों नहीं कर पा रही? इसकी वजह अनियंत्रित पौधरोपण (Uncontrolled Plantation) को माना गया है. यानी किसी क्षेत्र में पेड़ ही पेड़ लगा दिए गए तो दूसरी जगह हरियाली का नामेनिशान तक नहीं. तो आईए, सांस लेने और भीषण गर्मी की इस कहानी को विस्तार से समझते हैं.

भारत देश में कितने पेड़: नेचर जर्नल (Nature Journal) की एक रिपोर्ट और विभिन्न पर्यावरण आंकड़ों के अनुसार, भारत में कुल पेड़ों की संख्या लगभग 3,518 करोड़ है. इसके अनुसार देश में प्रति व्यक्ति 24 से 28 पेड़ हैं. संख्या के लिहाज से यह सांस लेने के लिए जरूरी 8 पेड़ों के आंकड़े से अधिक है, लेकिन यह वैश्विक औसत प्रति व्यक्ति 422 पेड़ और अन्य देशों की तुलना में बेहद कम है.
दुनिया का 32% क्षेत्र हरियालीयुक्त: खाद्य और कृषि संगठन (FAO) के ग्लोबल फॉरेस्ट रिसोर्सेज असेसमेंट 2025 के अनुसार, दुनिया का कुल वन क्षेत्र अब लगभग 4.14 अरब हेक्टेयर हो गया है, जो दुनिया के कुल जमीनी क्षेत्र का लगभग 32 प्रतिशत है. फिर भी, दुनिया के आधे से ज्यादा वन क्षेत्र पर सिर्फ 5 देशों का कब्जा है. इनमें रूसी संघ, ब्राजील, कनाडा, संयुक्त राज्य अमेरिका और चीन शामिल हैं.
किस देश में सबसे ज्यादा पेड़: वन क्षेत्र के मामले में रूसी संघ दुनिया में सबसे आगे है, जिसका विस्तार 832.6 मिलियन हेक्टेयर के विशाल क्षेत्र में है. दुनिया की कुल वन भूमि के 20 प्रतिशत से ज्यादा हिस्से को कवर करते हुए रूस का हरा-भरा क्षेत्र उसके साइबेरियाई इलाके तक फैला हुआ है, जो पृथ्वी पर बोरियल वनों का सबसे बड़ा है. ये वन समृद्ध जैव विविधता का भी घर हैं, जिनमें साइबेरियाई बाघ, भूरे भालू और कई प्रवासी पक्षियों की प्रजातियां रहती हैं.
भारत-चीन के पौधरोपण अभियानों ने एशिया की स्थिति सुधारी: अध्ययन के अनुसार 1990 के बाद से वन क्षेत्र में वृद्धि दर्ज करने वाला एशिया एकमात्र क्षेत्र है, जिसका मुख्य कारण चीन और भारत जैसे देशों में बड़े पैमाने पर चलाए गए पौधरोपण अभियान हैं. भारत के लिए यह अच्छी खबर है, क्योंकि 2025 की ग्लोबल रैंकिंग रिपोर्ट में देश एक पायदान ऊपर चढ़ गया है, जो उसकी शानदार प्रगति को दर्शाता है.
भारत का वन क्षेत्र कितना: भारत का वन क्षेत्र लगभग 72.7 मिलियन हेक्टेयर में फैला हुआ है. खास बात यह है कि FAO की 2025 की ग्लोबल रैंकिंग में देश एक स्थान ऊपर आ गया है. भारत के वन दुनिया के सबसे विविध वनों में से एक हैं. सुंदरबन के मैंग्रोव और पश्चिमी घाट के वर्षावनों से लेकर हिमालय के चीड़ और देवदार के जंगल दुनिया में मशहूर हैं.
वहीं, 'इंडिया स्टेट ऑफ फॉरेस्ट की रिपोर्ट के अनुसार, देश का वन और वृक्ष कवर 8,27,357 वर्ग किलोमीटर है, जो देश के कुल भौगोलिक क्षेत्रफल का 25.17 प्रतिशत है. इसमें 7,15,343 वर्ग किलोमीटर (21.76%) वन और 1,12,014 वर्ग किलोमीटर (3.41%) वृक्ष कवर शामिल है.
प्रति व्यक्ति पेड़ों की संख्या सबसे ज्यादा किस देश में: दुनिया में हर व्यक्ति के लिए 422 पेड़ का औसत तय किया गया है. हालाँकि, जंगलों की कटाई और जमीन के इस्तेमाल में बदलाव के कारण हर साल 15 अरब पेड़ खत्म हो रहे हैं. इस बीच, रूस प्रति व्यक्ति 4,856 पेड़ों के साथ इस सूची में सबसे ऊपर है. चीन में यह आंकड़ा प्रति व्यक्ति 130 पेड़ों का है. भारत में प्रति व्यक्ति केवल 28 पेड़ हैं. रूस और चीन की तुलना में भारत में पेड़ों की संख्या काफी कम है.
जंगल की भरमार, फिर भी देश में रिकॉर्ड तोड़ गर्मी और प्रदूषण क्यों: देश का बहुत बड़ा हिस्सा हरियालीयुक्त है. इसके बाद भी देश हर साल भीषण गर्मी और प्रदूषण को झेलता है. यानी साल दर साल देश का तापमान बढ़ता ही जा रहा है. इसकी वजह क्या है? दरअसल, सिर्फ बहुत सारे जंगल होने से ही कोई देश अपने-आप बहुत ज्यादा गर्मी और प्रदूषण से सुरक्षित नहीं हो जाता है.
जब इंसान, मौसम और शहरी विकास से जुड़े अलग-अलग कारण, जंगलों से मिलने वाली ठंडक के फायदों पर भारी पड़ जाते हैं, तो भयंकर लू और हवा की खराब क्वालिटी की समस्याएं होने लगती हैं. यह अभी देश के कई हिस्सों में देखने को मिल रही है, जहां तेजी से शहरीकरण हो रहा है.

तापमान बढ़ने की वजह क्या: यूनाइटेड स्टेट्स एनवायरनमेंटल प्रोटेक्शन एजेंसी (EPA) के मुताबिक, जलवायु परिवर्तन और ग्लोबल वार्मिंग ही इसके मुख्य गुनहगार हैं. तापमान बढ़ने का सबसे बड़ा कारण दुनिया के औसत तापमान में हो रही बढ़ोतरी है. यह बढ़ोतरी जीवाश्म ईंधन (जैसे कोयला, तेल) जलाने, औद्योगिक गतिविधियों, यातायात और बिजली बनाने से निकलने वाली ग्रीनहाउस गैसों की वजह से होती है.
जंगल का तापमान भी बढ़ रहा: जिन इलाकों में बहुत ज्यादा जंगल हैं, वहां भी गर्मी बढ़ रही है, क्योंकि हमारा वायुमंडल ही लगातार गर्म होता जा रहा है. इसके अलावा, शहरों और उद्योगों से निकलने वाला धुआं और गैसें वायुमंडल की गर्मी को और बढ़ा देती हैं, जिससे लू की गंभीरता और भी ज्यादा बढ़ जाती है.
बिल्डिंग्स, सड़कें गर्मी सोखकर रात में बाहर निकालतीं: अर्बन हीट आइलैंड इफेक्ट (शहरी गर्मी का प्रभाव) की वजह से, शहर और उनके आस-पास के गांवों और जंगलों के भी बड़े हिस्से काफी ज्यादा गर्म हो जाते हैं. ऐसा इसलिए होता है क्योंकि, कंक्रीट की इमारतें, डामर की सड़कें, कांच की बिल्डिंग्स दिन के समय गर्मी को सोख लेती हैं. फिर रात भर धीरे-धीरे उस गर्मी को बाहर निकालती हैं.
हरियाली का कम होना: हरियाली वाली जगहों (ग्रीन स्पेस) के कम होने से ठंडक देने वाले प्राकृतिक तरीके भी कमजोर पड़ जाते हैं. इसके साथ ही गाड़ियां, एयर कंडीशनिंग सिस्टम और औद्योगिक कामकाज से भी गर्मी पैदा होती है. भारत में, अर्बन हीट आइलैंड इफेक्ट का जबरदस्त असर दिल्ली, बेंगलुरु, मुंबई और हैदराबाद में साफ तौर पर देखा जा सकता है.
भीषण गर्मी के क्या हैं साइंटिफिक कारण: पिछले 40 सालों में अत्यधिक गर्मी का स्तर दोगुने से भी ज्यादा हो गया है. दक्षिणी कैलिफोर्निया में NASA की जेट प्रोपल्शन लैबोरेटरी के कॉलिन रेमंड का कहना है कि यह ट्रेंड आगे भी जारी रहने की उम्मीद है. रेमंड, अत्यधिक गर्मी और नमी पर 2020 में हुए एक अध्ययन के मुख्य लेखक हैं, जो 'Science Advances' में प्रकाशित हुआ था.
- ग्रीनहाउस गैसों में बढ़ोतरी: एक सदी से भी ज्यादा समय से, इंसान हर चीज को चलाने के लिए कोयला, गैस और तेल जैसे जीवाश्म ईंधनों का इस्तेमाल कर रहा है. इन गतिविधियों के साथ-साथ जमीन के इस्तेमाल में हुए बदलावों की वजह से वातावरण में ग्रीनहाउस गैसों की मात्रा बढ़ गई है. ग्रीनहाउस गैसें एक कंबल की तरह काम करती हैं, जो पृथ्वी के चारों ओर गर्मी को रोककर रखती हैं. इनकी मात्रा जितनी ज्यादा होती है, यह कंबल उतना ही मोटा होता जाता है, जिससे पृथ्वी का तापमान और भी ज्यादा बढ़ जाता है.
- जंगलों की कटाई: खेती करने या चरागाह बनाने के लिए या किसी और वजह से जंगलों को काटने से कार्बन का उत्सर्जन होता है. ऐसा इसलिए होता है क्योंकि जब पेड़ों को काटा जाता है, तो वे अपने अंदर जमा कार्बन को छोड़ देते हैं. हर साल लगभग 10 मिलियन हेक्टेयर जंगल नष्ट हो जाते हैं. करीब 15 अरब पेड़ों पर आरी चलती है. चूंकि जंगल कार्बन डाइऑक्साइड को सोख लेते हैं, इसलिए उन्हें नष्ट करने से वातावरण से उत्सर्जन को दूर रखने की प्रकृति की क्षमता भी सीमित हो जाती है. जंगलों की कटाई, खेती और जमीन के इस्तेमाल में हुए अन्य बदलावों के साथ मिलकर, दुनिया भर में होने वाले कुल ग्रीनहाउस गैस उत्सर्जन के लगभग एक-तिहाई हिस्से के लिए जिम्मेदार है.
- अर्बन हीट आईलैंड प्रभाव (Urban Heat Island Effect): यह एक ऐसी घटना है जिसमें कंक्रीट और डामर से बनी चीजें प्राकृतिक परिदृश्यों की तुलना में अधिक गर्मी सोखती हैं. शहरों के विकास और शहरीकरण के विस्तार के साथ यह प्रभाव और भी तीव्र हो जाता है, जिसके कारण शहरी क्षेत्र अपने आस-पास के ग्रामीण इलाकों की तुलना में काफी अधिक गर्म हो जाते हैं.
- बिजली उत्पादन: वैश्विक उत्सर्जन का एक बड़ा हिस्सा बिजली और गर्मी पैदा करने के लिए जीवाश्म ईंधन जलाने से आता है. अधिकांश बिजली आज भी कोयला, तेल या गैस जलाने से ही पैदा होती है. इस प्रक्रिया में कार्बन डाइऑक्साइड और नाइट्रस ऑक्साइड जैसी ग्रीनहाउस गैसें निकलती हैं, जो पृथ्वी को एक चादर की तरह ढक लेती हैं और सूरज की गर्मी को अपने अंदर समा लेती हैं. जो इस गर्मी को वापस अंतरिक्ष में भेजने नहीं देती हैं.
- परिवहन: अधिकांश कारें, ट्रक, जहाज और हवाई जहाज जीवाश्म ईंधन पर ही चलते हैं. इस वजह से परिवहन ग्रीनहाउस गैसों, विशेष रूप से कार्बन डाइऑक्साइड उत्सर्जन में प्रमुख रूप से शामिल है. सड़क पर चलने वाले वाहन उत्सर्जन का सबसे बड़ा हिस्सा पैदा करते हैं. क्योंकि उनके इंटरनल कंबशन इंजन में गैसोलीन जैसे पेट्रोलियम-आधारित उत्पाद जलते हैं. हालाँकि, जहाजों और हवाई जहाजों से होने वाला उत्सर्जन भी लगातार बढ़ता जा रहा है.
- विनिर्माण और उद्योग भी उत्सर्जन पैदा करते हैं: सीमेंट, लोहा, इस्पात, इलेक्ट्रॉनिक्स, प्लास्टिक, कपड़े और अन्य सामान बनाने के लिए जीवाश्म ईंधन जलाने से भी ग्रीन हाउस गैसों का उत्सर्जन होता है. खनन और अन्य औद्योगिक प्रक्रियाओं से भी गैसें निकलती हैं. निर्माण उद्योग भी इसमें पीछे नहीं है.
- खाद्य उत्पादन: फसलों को उगाने के लिए उर्वरकों, खाद का उत्पादन तथा उपयोग और खेती के उपकरणों या मछली पकड़ने वाली नावों को चलाने के लिए जीवाश्म ईंधन का उपयोग भी जलवायु परिवर्तन में एक प्रमुख योगदानकर्ता बना देते हैं. खाद्य पदार्थों की पैकेजिंग और उनके वितरण से भी ग्रीनहाउस गैसों का उत्सर्जन होता है.
- भवनों को ऊर्जा प्रदान करना: विश्व स्तर पर, आवासीय और व्यावसायिक भवन कुल बिजली का लगभग 60 प्रतिशत हिस्सा अकेले ही उपभोग कर लेते हैं. चूंकि ये भवन हीटिंग (गर्मी) और कूलिंग (ठंडक) के लिए लगातार कोयला, तेल और प्राकृतिक गैस पर निर्भर रहते हैं, इसलिए इनसे भारी मात्रा में ग्रीनहाउस गैसों का उत्सर्जन होता है. इसमें हीटिंग और कूलिंग के उपकरण, घरेलू उपकरणों तथा कनेक्टेड डिवाइसेस (इंटरनेट से जुड़े उपकरणों) के लिए बिजली की बढ़ी हुई खपत शामिल है. हाल के वर्षों में ये उपकरण कार्बन डाइऑक्साइड उत्सर्जन में वृद्धि करने में अहम भूमिका निभा रहे हैं.
भारत के 32% क्षेत्र में हरियाली: खाद्य और कृषि संगठन (FAO) की ओर से जारी GFRA 2025 के अनुसार, दुनिया का कुल वन क्षेत्र लगभग 4.14 अरब हेक्टेयर है, जो कुल भूमि क्षेत्र का लगभग 32% है. इसका मतलब है कि प्रति व्यक्ति लगभग 0.5 हेक्टेयर वन क्षेत्र उपलब्ध है. वैश्विक स्तर पर, भारत का वन क्षेत्र लगभग 72.7 मिलियन हेक्टेयर है, जो दुनिया के कुल वन क्षेत्र का लगभग 2% है.
भारत के किस राज्य में सबसे ज्यादा पेड़: सबसे ज्यादा वन क्षेत्रफल के हिसाब से शीर्ष तीन राज्य मध्य प्रदेश (77,073 वर्ग किमी), उसके बाद अरुणाचल प्रदेश (65,882 वर्ग किमी) और छत्तीसगढ़ (55,812 वर्ग किमी) हैं. हरियाणा में कुल वन क्षेत्र 1,559 वर्ग किलोमीटर है, जो राज्य के भौगोलिक क्षेत्रफल (44,212 वर्ग किलोमीटर) का 3.53% है. अन्य राज्यों (केंद्र शासित प्रदेशों को छोड़कर) की तुलना में हरियाणा राज्य में वन क्षेत्र का प्रतिशत सबसे कम है. भारत में 106 राष्ट्रीय उद्यान, 573 वन्यजीव अभयारण्य, 115 संरक्षण आरक्षित क्षेत्र और 220 सामुदायिक आरक्षित क्षेत्र हैं, जो विविध प्रकार के पेड़-पौधों और जीव-जंतुओं की रक्षा करते हैं.
गर्मी से कितने लोगों की मौत हुई: गृह मंत्रालय (MHA) के अधीन राष्ट्रीय अपराध रिकॉर्ड ब्यूरो (NCRB) से प्राप्त आंकड़ों के अनुसार 2018 से 2024 के दौरान गर्मी/लू लगने से 6,434 लोगों की मौत हुई. इसमें सबसे ज्यादा 1,832 मौतें 2024 में हुईं. 2019 में भी मौतों का आंकड़ा एक हजार के पार रहा.
पेड़ ऑक्सीजन कैसे बनाते, प्रदूषण कैसे रोकते हैं: जलवायु परिवर्तन से निपटने के लिए धरती के सबसे शक्तिशाली साधनों में से एक जंगल ही हैं. प्रकाश संश्लेषण (Photosynthesis) की प्रक्रिया से पेड़ वातावरण से गर्मी बढ़ाने वाली कार्बन डाइऑक्साइड को सोख लेते हैं और ऑक्सीजन छोड़ते हैं. कार्बन प्रदूषण को पेड़, जड़ों और मिट्टी में जमा करके, गर्मी रोकने वाली गैसों को कम करते हैं और धरती के तापमान को नियंत्रित रखते हैं. पिछले एक दशक में ही, जंगलों, पौधों और मिट्टी ने कुल कार्बन उत्सर्जन का लगभग 30 प्रतिशत हिस्सा सोख लिया.
भारत में हर साल कितने पेड़ काटे जा रहे: सरकारी रिकॉर्ड के अनुसार, वनों के शुद्ध नुकसान की वार्षिक दर 10.7 मिलियन हेक्टेयर (1990–2000) से घटकर 4.12 मिलियन हेक्टेयर (2015–2025) हो गई है. Global Forest Watch के अनुसार: भारत में पेड़ों की हरियाली में कमी 2001 से 2025 के बीच, 2.4 मिलियन हेक्टेयर रही. यानी 384 करोड़ पेड़, जो 2000 में हरियाली वाले क्षेत्र का 7.0% है. इससे 1.4 कार्बन डाईऑक्साइड का उत्सर्जन हुआ.
जंगल से ही नहीं, समंदर से भी मिलती हैं सांसें: एक खास बात और, अभी तक हम यह समझते रहे हैं कि इंसानों के लिए जरूरी ऑक्सीजन जंगलों निर्माण से आती है. लेकिन, ऐसा नहीं है. दुनिया की 50% से अधिक ऑक्सीजन जंगलों से नहीं, बल्कि समुद्र में मौजूद छोटे जलीय पौधों और काई (Phytoplankton) से बनती है. इसलिए इंसानी जीवन के लिए पेड़ और समंदर दोनों का साफ रहना समान रूप से आवश्यक है.
सांस लेने और हवा को शुद्ध रखने के लिए कितने पेड़ों की जरूरत: पेड़ केवल ऑक्सीजन ही नहीं देते, बल्कि इंसान द्वारा छोड़ी गई कार्बन डाइऑक्साइड और वाहनों व फैक्ट्रियों से निकलने वाले प्रदूषण को भी सोखते हैं. देश में बढ़ते शहरीकरण, गाड़ियों और प्रदूषण को देखते हुए पर्यावरण विशेषज्ञों का मानना है कि सांस लेने के साथ-साथ हवा को शुद्ध रखने के लिए प्रति व्यक्ति कम से कम 80 से 100 पेड़ चाहिए. इसके लिए देश को 11,000 करोड़ से अधिक पेड़ों की आवश्यकता होगी. इसी संतुलन को साधने के लिए सरकार बड़े स्तर पर पौधरोपण अभियान चला रही है, जिसके तहत करोड़ों नए पौधे लगाए जा रहे हैं.
भारत में हर साल कितने पेड़ लगाए जा रहे: प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की ओर से शुरू किया गया एक पेड़ मां के नाम अभियान, दुनिया के सबसे बड़े जन-केंद्रित पर्यावरण आंदोलनों में से एक बनकर उभरा है. 24 दिसंबर, 2025 तक 262.4 करोड़ पौधे लगाए जा चुके हैं. इस अभियान ने भावनात्मक, सांस्कृतिक और पारिस्थितिक मूल्यों को आपस में जोड़ा है. पौधरोपण गतिविधियों को डिजिटल रूप से ट्रैक भी किया जा रहा है. कुल वन क्षेत्र के मामले में भारत वैश्विक स्तर पर 9वें स्थान पर रहा (FAO–GFRA 2025), और वार्षिक वन वृद्धि के मामले में दुनिया भर में तीसरे स्थान पर है. 2013 से अब तक वन और वृक्ष आवरण में कुल 4.83% की वृद्धि हुई है.
Global average temperatures are likely to continue at or near record levels in the next 5 years, with global temperatures predicted to reach about 1.3°C to 1.9°C above the 1850–1900 average, according to a new @WMO and @metoffice report.
— World Meteorological Organization (@WMO) May 28, 2026
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WMO की चेतावनी, गर्मी तोड़ देगी सारे रिकॉर्ड: विश्व मौसम विज्ञान संगठन (WMO) की ताजा रिपोर्ट में आगाह किया गया है कि दुनिया, गर्मी के एक खतरनाक दौर की ओर बढ़ रही है. अगले 5 साल में वैश्विक तापमान रिकॉर्ड स्तर पर या फिर उसके नजदीक तक पहुंच जाएगा. यूएन एजेंसी की इस रिपोर्ट को ब्रिटेन के मौसम विज्ञान विभाग द्वारा तैयार किया गया है, जिसमें पिछले 5 साल के जलवायु का आकलन और अगले 5 वर्षों में तापमान व बारिश-बर्फबारी के रुझानों का अनुमान लगाया गया है.
वैश्विक तापमान 1.9 डिग्री सेल्सियस तक जा सकता है: अध्ययन के अनुसार, 2026 से 2030 के बीच कम से कम एक वर्ष के दौरान औसत वैश्विक तापमान, 1.5 डिग्री सेल्सियस की वृद्धि की सीमा को पार कर सकता है. वार्षिक वैश्विक तापमान, 1850-1900 की तुलना में 1.3 डिग्री सेल्सियस से 1.9 डिग्री सेल्सियस अधिक रहने की सम्भावना है. बता दें कि, पेरिस जलवायु परिवर्तन समझौते के अन्तर्गत, 1.5 डिग्री सेल्सियस तापमान वृद्धि की यह सीमा अहम है, और लम्बे समय तक इस सीमा से अधिक बढ़ोत्तरी की स्थिति में चरम मौसम घटनाओं, खाद्य असुरक्षा, विस्थापन और पारिस्थितिकी तंत्रों के ढहने का जोखिम बढ़ेगा.
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