अब डायबिटीज के मरीजों को नहीं खोने पड़ेंगे पैर, AI तकनीक बनी जीवनरक्षक
StrideAid ने डिजिटल पॉइंट-ऑफ-केयर नाम की AI आधारित स्क्रीनिंग मशीन तैयार की है.इस मशीन से 20 मिनट में पैरों की पूरी जांच हो जाती है.

Published : January 11, 2026 at 3:36 PM IST
नई दिल्ली: दुनिया में हर 20 सेकंड में किसी न किसी व्यक्ति का हाथ या पैर डायबिटीज की वजह से काटना पड़ता है. भारत में स्थिति और भी गंभीर है, क्योंकि यहां डायबिटीज के मरीजों की संख्या दुनिया में सबसे ज्यादा है. देश में हर साल एक लाख से ज्यादा लोगों के पैर या टांग डायबिटिक फुट की वजह से काटने पड़ते हैं.
सबसे चौंकाने वाली बात यह है कि डॉक्टरों और मेडिकल रिसर्च के मुताबिक करीब 80 प्रतिशत amputations समय रहते जांच और सही इलाज से रोके जा सकते हैं, लेकिन जानकारी और समय पर जांच की कमी के कारण यह संभव नहीं हो पाता.
डायबिटिक फुट: जानलेवा लेकिन सबसे ज्यादा नजरअंदाज
डायबिटीज से होने वाली पैर की बीमारी सिर्फ चलने-फिरने की परेशानी नहीं है, बल्कि यह जान के लिए भी बड़ा खतरा बन सकती है. डॉक्टरों के अनुसार, जिन मरीजों का घुटने के ऊपर या नीचे से पैर काटा जाता है, उनमें से करीब 70 प्रतिशत की मौत पांच साल के भीतर हो जाती है.

StrideAid के फाउंडर और ऑर्थोपेडिक विशेषज्ञ डॉ. पवन बेलेहल्ली कहते हैं, डायबिटिक फुट को लोग बहुत हल्के में लेते हैं, लेकिन यह एक जानलेवा समस्या है. एक बार बड़ा अम्प्यूटेशन हो जाए, तो मरीज की जिंदगी और परिवार दोनों बुरी तरह प्रभावित हो जाते हैं. इलाज का खर्च भी बहुत भारी होता है. एक डायबिटिक फुट अल्सर के इलाज में औसतन ₹1.5 लाख तक का खर्च आता है, जो कई परिवारों के लिए सालों की कमाई के बराबर होता है.
पैरों की जांच क्यों नहीं हो पाती?
डायबिटीज के मरीज आमतौर पर आंखों, किडनी और दिल की नियमित जांच कराते हैं, लेकिन पैरों की जांच को गंभीरता से नहीं लेते. नतीजा यह है कि देश में सिर्फ 3.5 प्रतिशत डायबिटिक मरीजों की ही सही तरीके से फुट स्क्रीनिंग हो पाती है.
इस पर डॉ. पवन बेलेहल्ली बताते हैं, अक्सर मरीज पैरों में छोटे कट, छाले या घाव को मामूली समझ लेते हैं. वे पास के डॉक्टर या मेडिकल स्टोर से दवा ले लेते हैं, लेकिन सही जांच नहीं होती. जब तक मरीज बड़े अस्पताल पहुंचता है, तब तक काफी देर हो चुकी होती है.
भारत में बनी AI तकनीक से जगी नई उम्मीद
इस गंभीर समस्या से निपटने के लिए भारत में ही विकसित की गई एक AI तकनीक अब उम्मीद की किरण बनकर सामने आई है. StrideAid ने डिजिटल पॉइंट-ऑफ-केयर (D-PoC) नाम की AI आधारित स्क्रीनिंग मशीन तैयार की है. इस मशीन से सिर्फ 20 मिनट में पैरों की पूरी जांच हो जाती है. इसमें पैरों की गर्मी, दबाव, नसों की स्थिति और खून के बहाव की जांच की जाती है. इसके बाद AI सिस्टम खुद बता देता है कि मरीज कम खतरे, मध्यम खतरे या ज्यादा खतरे की श्रेणी में है.
डॉ. बेलेहल्ली कहते हैं, हमने AI और IoT तकनीक को जोड़कर ऐसा सिस्टम बनाया है, जिससे बीमारी को बहुत शुरुआती स्तर पर ही पकड़ लिया जाता है. हमारा मकसद पैर बचाना है, amputations नहीं करना.

इलाज से पहले रोकथाम पर जोर
इस तकनीक का मकसद इलाज से ज्यादा बीमारी होने से पहले रोकथाम करना है. जांच के आधार पर मरीजों को खास तरह की चप्पल और जूते दिए जाते हैं, जिससे पैरों पर दबाव कम पड़े और घाव बनने से पहले ही बचाव हो जाए. डॉ. बेलेहल्ली बताते हैं, अक्सर लोग तब आते हैं जब घाव बन चुका होता है. हमारी कोशिश है कि घाव बनने से पहले ही खतरा पहचान लिया जाए.
जागरूकता के लिए AI असिस्टेंट
कंपनी ने StrideGPT नाम का एक AI असिस्टेंट भी तैयार किया है, जो मरीजों को आसान भाषा में बताता है कि रिपोर्ट का क्या मतलब है, क्या सावधानी रखनी चाहिए और क्या नहीं. यह टूल हिंदी, अंग्रेज़ी और कन्नड़ भाषा में काम करता है.
जमीनी स्तर पर दिख रहा असर
जहां-जहां यह तकनीक और जागरूकता अभियान शुरू हुए हैं, वहां 6 महीनों के भीतर amputations में 35 से 40 प्रतिशत तक कमी देखी गई है. कर्नाटक के कई सरकारी अस्पतालों और जिलों में डिजिटल फुट क्लीनिक शुरू किए जा चुके हैं.

डॉक्टरों का साफ कहना है कि अगर प्राइमरी हेल्थ सेंटर स्तर पर पैरों की नियमित जांच शुरू हो जाए, तो भारत में डायबिटीज की वजह से होने वाले ज्यादातर अंग कटने के मामलों को रोका जा सकता है. भारत में बनी AI तकनीक इस दिशा में एक बड़ी और मजबूत उम्मीद बनकर सामने आई है.
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