बिहार के वो 5 गांव, जहां नहीं मनायी जाती होली, 54 साल से 'चूल्हा' जलना है मना
बिहार के नालंदा में ऐसे पांच गांव हैं, जहां होली नहीं मनायी जाती है. इसके पीछे का क्या कारण है पढ़ें.

Published : March 3, 2026 at 1:47 PM IST
रिपोर्ट: महमूद आलम
नालंदा: जहां फागुन के रंग में पूरा देश डूबा होता है, वहीं बिहार के नालंदा में पांच गांव ऐसे हैं, जहां सन्नाटा ही 'उत्सव' है. इन गावों में न रंग उड़ते हैं, न गुलाल और न ही पकवानों की खुशबू आती है. पिछले 54 सालों से यहां होली का मतलब 'हुड़दंग' नहीं बल्कि 'भक्ति और उपवास' है. आइए जानते हैं कौन से वो पांच गांव हैं, जहां रंगों से दूर लोग अध्यात्म में सरावोर रहते हैं.
इन पांच गावों में नहीं मनायी जाती होली: नालंदा जिले के 5 गांवों में होली मनाने की परंपरा काफी अलग है. यहां होली के दिन ग्रामीण रंग, गुलाल से नहीं खेलते और न ही हुड़दंग करते हैं, बल्कि भक्ति में लीन रहते हैं. मुख्यालय बिहार शरीफ से सटे पांच गांव पतुआना, बासवन बिगहा, ढीबरापर, नकटपुरा और डेढ़धारा में होली का स्वरूप बिल्कुल अलग और आध्यात्मिक है. लगभग 54 सालों से ये गांव भक्ति और संयम की अनूठी परंपरा निभा रहे हैं.
नहीं गाए जाते फगुआ के गीत: जहां होली में पूरे देश में रंगों की धूम रहती है, वहीं नालंदा के इन गांवों में सुबह से ही वातावरण भक्तिमय हो जाता है. फगुआ के गीतों की जगह भजन-कीर्तन का दौर चलता है. ग्रामीण हरे राम, हरे कृष्णा की धुन पर भक्ति से लबरेज रहते हैं. महिलाएं, पुरुष, बच्चे और बुजुर्ग सभी कीर्तन में शामिल होकर भगवान के नाम का जाप करते हैं. पूरे दिन गांवों में अनुशासन और शांति का अद्भुत संगम देखने को मिलता है.

54 साल से नहीं जलता चूल्हा: होलिका दहन की शाम से ही लोग अखंड कीर्तन की तैयारी में जुट जाते हैं. 24 घंटे का अखंड कीर्तन शुरू हो जाता है. यह कीर्तन बिना रुके लगातार होली के दिन तक चलता रहता है है. अनुष्ठान शुरू होने से पहले ही घरों में मीठा भोजन और पकवान ग्रामीण तैयार कर लेते हैं. कीर्तन खत्म होने तक चूल्हा जलाना मना होता है. अधिकांश लोग इस दिन नमक का सेवन भी नहीं करते हैं. शरीर और मन दोनों को सात्विक बनना, इसके पीछे का कारण माना जाता है. ग्रामीणों का मानना है कि संयम ही सच्ची होली है. मन का विकार दूर करना और भक्ति का रंग चढ़ाना ही, असली होली है.

"नकटपुरा में संत बाबा ने कहा था कि गाली-गलौज मत करो अखंड करो, तभी से हमलोग होली मनाते हैं. चूल्हा भी नहीं जलता है. हमलोग भगवान का भजन करते हैं."- सीमा देवी, ग्रामीण

इस कारण से नहीं मनायी जाती होली: ग्रामीणों के अनुसार, पांच दशक पहले होली के अवसर पर इन गांवों में लोग नशे में अक्सर विवाद और मारपीट किया करते थे. इसके कारण त्योहार का उल्लास कई बार तनाव में बदल जाता था. इसी बीच गांव में एक सिद्ध पुरुष संत बाबा ने ग्रामीणों को ईश्वर भक्ति का मार्ग दिखाया. उनके सुझाव पर होली के दिन अखंड कीर्तन की परंपरा शुरू कर दी गई. धीरे-धीरे इस आध्यात्मिक पहल ने गांवों का वातावरण बदल दिया और आपसी सौहार्द की स्थिति स्थापित हो गयी.

"संत बाबा मूल रूप से इमादपुर के निवासी थे. सांसारिक जीवन से विरक्त होकर उन्होंने कम उम्र में ही घर त्याग दिया और पतुआना के बाद राजाकुआं के खंधे में रहकर तपस्या की. 2 अक्टूबर 2000 को उनका देहांत हो गया. आज उनके आश्रम और समाधि स्थल पर भव्य मंदिर बना हुआ है, जहां होली के दिन विशेष पूजा-अर्चना होती है. संत बाबा की कृपा से ही गांवों में शांति और सद्भाव कायम है."-विलास यादव, ग्रामीण

होली के दूसरे दिन उल्लास: ग्रामीणों का कहना है कि इस परंपरा के बाद से होली के दिन भक्ति और संयम का माहौल रहता है, लेकिन कीर्तन समाप्त होने के अगले दिन बसिऔरा ग्रामीण परंपरागत तरीके से रंगों की होली खेलते हैं. इस तरह यहां होली दो रूपों में मनाई जाती है. पहले दिन आध्यात्मिक साधना और दूसरे दिन उल्लास से होली मनाया जाता है.

पूरे समाज को शांति और भाईचारे का संदेश: इन पांच गांवों की यह परंपरा आज के समय में एक संदेश देती है कि त्योहार केवल बाहरी रंगों का नहीं, बल्कि आत्मशुद्धि और सामाजिक सौहार्द का भी प्रतीक है. यहां होली का असली रंग भक्ति, संयम और एकता में नजर आता है.
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