बिहार के इस गांव में भगवान बुद्ध के साथ खेली जाती है होली, 7वीं शताब्दी में स्थापित हुई थी 7.5 फुट ऊंची प्रतिमा
बिहार में भगवान बुद्ध के साथ होली खेली जाती है. 7.5 फुट ऊंची मूर्ति को 'बाबा भैरव' के नाम से जाना जाता है. स्पेशल रिपोर्ट..

Published : March 3, 2026 at 7:03 AM IST
- रिपोर्ट: मो. महमूद आलम
नालंदा: बिहार के नालंदा जिले में होली मनाने की एक अनूठी और अद्भुत परंपरा है, जिसके बारे में जानकर हर कोई हैरान रह जाता है. जिला मुख्यालय बिहार शरीफ से महज 10 किलोमीटर दूर स्थित तेतरावां गांव में लोग एक-दूसरे को रंग लगाने से पहले भगवान बुद्ध के साथ होली खेलते हैं. यह परंपरा सदियों से चली आ रही है. इस अनोखी परंपरा में आस्था, उल्लास और इतिहास का एक बेजोड़ संगम देखने को मिलता है. इस गांव के लोगों की दिनचर्या और हर शुभ कार्य भगवान बुद्ध के आशीर्वाद से ही शुरू होता है.
भगवान बुद्ध के साथ खेली जाती है होली: पावन पर्व होली पर यहां का नजारा बिल्कुल अलग होता है, जहां पूरा गांव एक साथ मिलकर पहले अपने आराध्य को गुलाल अर्पित करते हैं. उसके बाद ही गांव की गलियों में फाग और रंगों का उत्सव शुरू होता है. यह परंपरा सिर्फ एक त्योहार नहीं, बल्कि ग्रामीणों की गहरी आस्था का प्रतीक है.
तेतरावां गांव में स्थित है बुद्ध की विशाल प्रतिमा: तेतरावां गांव के भैरव बाबा मंदिर में भगवान बुद्ध की एक अत्यंत प्राचीन और विशाल प्रतिमा स्थापित है. काले पत्थर से बनी यह भव्य प्रतिमा लगभग साढ़े सात फीट ऊंची है और भूमि स्पर्श मुद्रा में विराजमान है. दिलचस्प बात यह है कि दुनिया भर में शांति के दूत माने जाने वाले भगवान बुद्ध को इस गांव के स्थानीय लोग 'बाबा भैरव' के रूप में पूजते हैं.

शुभ कार्य से पहले होती है पूजा: स्थानीय निवासी राजीव रंजन पांडे बताते हैं कि यहां भगवान बुद्ध और ग्रामीणों के बीच एक गहरा पारिवारिक रिश्ता है. गांव में कोई भी शुभ कार्य हो. चाहे वह शादी-ब्याह का निमंत्रण पत्र चढ़ाना हो या फिर लोक आस्था का महापर्व छठ, उसकी शुरुआत और समापन इसी प्रतिमा के समक्ष किया जाता है. ग्रामीणों का अटूट विश्वास है कि बाबा भैरव के दरबार में मांगी गई हर मन्नत निश्चित रूप से पूरी होती है.
होली के दिन का माहौल अलग: होली के दिन भगवान बुद्ध के साथ रंग खेलने से पहले एक विशेष और अनूठी प्रक्रिया अपनाई जाती है, जो इस प्रतिमा के संरक्षण का भी एक प्राचीन वैज्ञानिक तरीका है. सबसे पहले प्रतिमा की विधिवत रूप से साफ-सफाई की जाती है. इसके बाद काले पत्थर की इस बेशकीमती मूर्ति पर लगभग दो किलो मीठे रावे (सूजी) का लेप लगाकर उसे अच्छी तरह से रगड़ा जाता है.

रवे और घी से होती है सफाई: रवे से सफाई करने के बाद प्रतिमा पर करीब एक किलो शुद्ध देसी घी का लेप लगाया जाता है. रवे और देसी घी के इस अद्भुत मिश्रण से न सिर्फ प्रतिमा की गहराई से सफाई होती है बल्कि काले पत्थर की प्राकृतिक चमक और सुंदरता भी निखर कर सामने आ जाती है. यह लेप सदियों पुरानी इस धरोहर को मौसम की मार और रसायनों से बचाने में एक मजबूत ढाल का काम करता है.
सफेद रंग की चादर ओढ़ाई जाती है प्रतिमा पर: घी और रवे के लेप से चमकने के बाद भगवान बुद्ध की प्रतिमा का भव्य शृंगार किया जाता है. आम दिनों में पूरे साल इस प्रतिमा पर लाल रंग की चादर चढ़ाई जाती है लेकिन होली के खास मौके पर भगवान को सफेद रंग की चादर ओढ़ाई जाती है. इसके पीछे का कारण यह है कि जब ग्रामीण भगवान को रंग और गुलाल अर्पित करें तो सफेद चादर पर वे सभी रंग पूरी तरह से खिल उठें. सफेद चादर ओढ़ाने के बाद पूरा गांव पूरे भक्ति भाव से भगवान को रंग और अबीर लगाता है.
बाबा भैरव से प्रार्थना करते हैं ग्रामीण: दिन भर रंगों का यह खुशनुमा खेल चलता है और शाम ढलते ही मंदिर प्रांगण में भजन-कीर्तन और फगुआ गीतों की महफिल सजती है. ग्रामीण बाबा भैरव से प्रार्थना करते हैं कि आने वाला पूरा साल उनके गांव के लिए सुख, शांति और समृद्धि से भरा रहे. इस भव्य प्रतिमा और तेतरावां गांव का इतिहास बेहद गौरवशाली रहा है, जो मध्यकालीन भारत के पाल वंश से मजबूती से जुड़ा हुआ है.
"वैसे तो यह महात्मा बुद्ध की प्रतिमा है लेकिन स्थानीय लोग बाबा भैरव के नाम से पूजा-अर्चना करते हैं. गांव की परंपरा है कि हर शुभ काम इनकी पूजा कर से ही शुरू करते हैं. होली के दिन विशेष कर सफेद कलर का चादर चढ़ाते हैं ताकि रंग खिल जाए. सब लोग यहां आकर होली खेलते हैं."- राजीव रंजन पांडे, ग्रामीण
पाल वंश के शासनकाल में मूर्ति स्थापित: इतिहासकारों के अनुसार, 750 ईस्वी में राजा गोपाल पाल ने पाल वंश की स्थापना की थी. इस वंश के दूसरे महान शासक धर्मपाल ने विश्वविख्यात नालंदा विश्वविद्यालय को पुनर्जीवित करने का ऐतिहासिक काम किया था. इसके रखरखाव के लिए 200 गांवों को दान में दिया था. पाल काल में बौद्ध धर्म का काफी विस्तार हुआ. उसी दौरान इस अद्भुत प्रतिमा का निर्माण भी हुआ.

नालंदा विश्वविद्यालय के स्वर्ण काल के दौरान इसी तेतरावां गांव में मूर्ति कला की विशेष पढ़ाई और प्रशिक्षण दिया जाता था. यानी यह गांव सिर्फ एक रिहायशी इलाका नहीं, बल्कि प्राचीन काल में मूर्तिकारों की एक शानदार नर्सरी और कला का एक प्रमुख केंद्र हुआ करता था.
भूमि स्पर्श मुद्रा में प्रतिमा: भूमि स्पर्श मुद्रा में काले पत्थर की इतनी विशाल प्रतिमा दुनिया भर में अत्यंत दुर्लभ मानी जाती है. साल 1992-93 में यहां विदेशी विद्वानों और पुरातत्वविदों की एक महत्वपूर्ण बैठक आयोजित की गई थी. उस बैठक में विशेषज्ञों ने यह माना था कि शायद ही पूरी दुनिया में कहीं और भगवान बुद्ध की बैठी हुई (आसन) मुद्रा में इतनी बड़ी और भव्य प्रतिमा मौजूद हो.
बुद्ध की 7.5 फुट ऊंची मूर्ति: हालांकि, चीन और जापान जैसे बौद्ध बाहुल्य देशों में भगवान बुद्ध की विशाल प्रतिमाएं देखने को मिलती हैं लेकिन एक ही काले पत्थर को तराश कर बनाई गई 7.5 फीट की यह प्रतिमा भारतीय मूर्तिकला का एक अद्वितीय उदाहरण है. जो भी विद्वान पाली साहित्य पढ़ते हैं या पुरातत्व विभाग से जुड़े हैं, वे तेतरावां की इस ऐतिहासिक धरोहर और इसके महत्व से भली-भांति परिचित हैं. इसका जिक्र कई ऐतिहासिक और बौद्ध दस्तावेजों में भी प्रमुखता से मिलता है.
सीएम ने किया था ऐलान: इस ऐतिहासिक धरोहर को पर्यटन के नक्शे पर उभारने की कई कोशिशें भी हुईं लेकिन वे परवान नहीं चढ़ सकीं. साल 2013 में बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार खुद इस गांव में पहुंचे थे और भैरव बाबा (भगवान बुद्ध) परिसर का जायजा लिया था. मुख्यमंत्री ने इसके ऐतिहासिक और सांस्कृतिक महत्व को देखते हुए इसे एक पर्यटन स्थल के रूप में विकसित करने की बड़ी घोषणा की थी.
सीएम की घोषणा के कुछ वर्षों बाद यहां निर्माण कार्य भी शुरू हुआ. परिसर की घेराबंदी के लिए बाउंड्री वॉल बनाई गई. पर्यटकों की सुविधा के लिए चार दुकानें, एक प्रतीक्षालय (बैठकी), फ्रेश रूम और गार्ड रूम का निर्माण किया गया. उस समय ग्रामीणों में एक भारी उम्मीद जगी थी कि अब उनका गांव अंतरराष्ट्रीय पर्यटन के नक्शे पर चमकेगा और गांव में रोजगार व विकास के नए रास्ते खुलेंगे.
10 साल बाद भी काम नहीं बढ़ा: हालांकि विडंबना देखिए कि मुख्यमंत्री की सकारात्मक पहल के बावजूद पिछले 10 वर्षों से यहां पर्यटन स्थल के विकास का सारा काम पूरी तरह से ठप पड़ा है. लाखों रुपये की लागत से बने ढांचे अब धीरे-धीरे खंडहर में तब्दील हो रहे हैं. यह ऐतिहासिक परिसर धीरे-धीरे अतिक्रमणकारियों का सुरक्षित अड्डा बन गया. प्रशासनिक उपेक्षा और देखरेख के अभाव में यहां असामाजिक तत्वों का जमावड़ा होने लगा.
उदासीनता के कारण स्थल का विकास नहीं: हालत यह हो गई कि परिसर में लगाए गए कीमती दरवाजे और मुख्य गेट तक चोरी हो गए. जो जगह विदेशी पर्यटकों के आकर्षण का शानदार केंद्र बननी चाहिए थी, वह बर्बादी की कगार पर पहुंच गई. स्थानीय लोगों का कहना है कि सरकार और प्रशासन की घोर उदासीनता के कारण इस जगह का वह विकास नहीं हो पाया, जिसकी यह असल में हकदार थी. इसी उपेक्षा के कारण अब पर्यटकों का आना भी काफी कम हो गया है.
जब सरकारी तंत्र ने मुंह मोड़ लिया, तो अपनी इस अनमोल धरोहर को बचाने के लिए तेतरावां गांव के लोगों ने खुद मोर्चा संभाला. गांव के युवाओं और बुजुर्गों ने मिलकर 'गौतम बुद्ध विकास समिति' नाम से एक सात सदस्यीय कमेटी का गठन किया है. हालांकि यह कमेटी अभी रजिस्टर्ड नहीं है लेकिन इसका जज्बा पूरी तरह से पक्का और नेक है. इस समिति के माध्यम से गांव के छोटे बच्चों से लेकर बड़े-बुजुर्ग तक हर कोई इस परिसर को बचाने के लिए 'श्रमदान' करता है.
ग्रामीणों ने खुद से की पहल: ग्रामीण खुद झाड़ू लगाते हैं, परिसर की सफाई करते हैं और अपनी जेब से पैसे चंदा करके इस जगह का रखरखाव कर रहे हैं. राजीव रंजन कहते हैं कि स्थानीय स्तर पर हम जो कर सकते हैं, वह पूरी ईमानदारी से कर रहे हैं क्योंकि इस प्रतिमा और इस स्थान से पूरे गांव की गहरी भावनात्मक और धार्मिक आस्था मजबूती से जुड़ी हुई है.
विदेशों से भी आते हैं श्रद्धालु: अपनी कड़ी मेहनत से इस स्थल को बचाने में जुटे ग्रामीण अब सरकार से गुहार लगा रहे हैं कि इस बहुप्रतीक्षित प्रोजेक्ट को दोबारा जिंदा किया जाए. राजीव रंजन पांडे कहते हैं भले ही यहां सरकारी सुविधाएं न हों, फिर भी इस प्रतिमा की ख्याति सुनकर पिछले छह महीने में थाईलैंड, वियतनाम, जापान और चीन जैसे देशों से 100 से अधिक विदेशी पर्यटक यहां दर्शन करने आ चुके हैं.
सरकार से की मांग: हालांकि पर्यटक यहां आकर जब बुनियादी सुविधाओं का घोर अभाव देखते हैं तो काफी निराश होते हैं और इसकी सख्त शिकायत भी करते हैं. ग्रामीणों की पुरजोर मांग है कि सरकार अपने 10 साल पुराने वादे को जल्द याद करे और इसे मुख्यधारा के पर्यटन सर्किट से जोड़े. ग्रामीणों का मानना है कि अगर तेतरावां को राजगीर और नालंदा खंडहर की तर्ज पर विकसित किया जाए तो यह गांव विश्व पटल पर बिहार का मान और भी अधिक बढ़ा सकता है.
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