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इतिहास सिर्फ पराजय की कहानी नहीं, भारत के आत्मविश्वास की पहचान है: सुधांशु त्रिवेदी

JNU में छत्रपति शिवाजी महाराज पर राष्ट्रीय सेमिनार, राज्यसभा सांसद बोले- अतीत से प्रेरणा लेकर वर्तमान को मजबूत करने की जरूरत

राज्यसभा सांसद डॉ. सुधांशु त्रिवेदी
राज्यसभा सांसद डॉ. सुधांशु त्रिवेदी (ETV Bharat)
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By ETV Bharat Delhi Team

Published : September 2, 2026 at 9:21 PM IST

4 Min Read
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नई दिल्ली: भारतीय इतिहास को केवल हार और गुलामी की घटनाओं के नजरिए से देखने के बजाय उसके संघर्ष, स्वाभिमान और सांस्कृतिक निरंतरता को भी समझने की जरूरत है. भारत ने लंबे दौर की चुनौतियों के बावजूद अपनी पहचान और संस्कृति को बचाए रखा है. छत्रपति शिवाजी महाराज का जीवन इसी आत्मविश्वास और संघर्ष की बड़ी मिसाल है. यह बात राज्यसभा सांसद डॉ. सुधांशु त्रिवेदी ने जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय (JNU) में आयोजित राष्ट्रीय सेमिनार के उद्घाटन सत्र में कही.

JNU में छत्रपति शिवाजी महाराज के जीवन और विरासत पर दो दिवसीय राष्ट्रीय सेमिनार का आयोजन किया गया. कार्यक्रम का विषय 'Life and Legacy of Chhatrapati Shivaji Maharaj: Jayishnu Saviour of Sahishnu Bharat' रखा गया. इसका आयोजन JNU ने शिवाजी रायगढ़ स्मारक मंडल और महाराष्ट्र सरकार के सांस्कृतिक कार्य विभाग के 'महा संस्कृति' के सहयोग से किया.

शिवाजी महाराज का जीवन संघर्ष और स्वराज की प्रेरणा

मुख्य अतिथि सुधांशु त्रिवेदी ने कहा कि छत्रपति शिवाजी महाराज का जीवन केवल एक राजा के रूप में उनकी उपलब्धियों तक सीमित नहीं है. उनके संघर्ष में स्वराज, नेतृत्व, संगठन और अपनी सांस्कृतिक पहचान के प्रति आत्मविश्वास का विचार दिखाई देता है. उन्होंने 'हिंदवी स्वराज' की अवधारणा का उल्लेख करते हुए कहा कि शिवाजी महाराज ने अपने समय की परिस्थितियों में एक ऐसी शासन व्यवस्था की कल्पना की, जिसमें स्थानीय समाज और उसकी पहचान को महत्व मिले. यही कारण है कि शिवाजी महाराज का जीवन आज भी युवाओं और समाज के लिए प्रेरणा का स्रोत है.

भारतीय इतिहास को नए नजरिए से देखने की जरूरत

सुधांशु त्रिवेदी ने कहा कि इतिहास को केवल यह बताने तक सीमित नहीं किया जाना चाहिए कि भारत ने किन-किन चुनौतियों और पराजयों का सामना किया. इतिहास का दूसरा पक्ष यह भी है कि कठिन परिस्थितियों के बावजूद भारतीय समाज ने अपनी सभ्यता और सांस्कृतिक पहचान को कैसे बनाए रखा. उन्होंने कहा कि भारत के अतीत में ऐसे अनेक उदाहरण हैं, जो बताते हैं कि यहां की सभ्यता बदलावों के बीच भी लगातार आगे बढ़ती रही. शिवाजी महाराज इसी ऐतिहासिक निरंतरता और प्रतिरोध की एक महत्वपूर्ण कड़ी हैं.

भारत को सिर्फ विकसित नहीं, विश्वमित्र बनना है:

राज्यसभा सांसद ने भारत के भविष्य को लेकर भी अपनी बात रखी. उन्होंने कहा कि देश का लक्ष्य केवल विकसित राष्ट्र बनना नहीं होना चाहिए. भारत को दुनिया के साथ सहयोग और सद्भाव की भावना के साथ आगे बढ़ते हुए 'विश्वमित्र' की भूमिका निभानी चाहिए. उन्होंने भारतीय सभ्यता की उस सोच का उल्लेख किया, जिसमें विकास को केवल आर्थिक उपलब्धियों से नहीं बल्कि समाज और दुनिया के व्यापक हित से जोड़कर देखा जाता है.

JNU के बदलाव की त्रिवेदी ने की सराहना:

अपने संबोधन में सुधांशु त्रिवेदी ने JNU के बदलते माहौल की भी चर्चा की. उन्होंने कुलपति प्रो. शांतिश्री धूलिपुड़ी पंडित के नेतृत्व की सराहना करते हुए कहा कि विश्वविद्यालय की छवि और गतिविधियों में बदलाव देखने को मिल रहा है. उन्होंने कहा कि JNU अब अकादमिक और सकारात्मक गतिविधियों के कारण भी चर्चा में है. विश्वविद्यालयों की भूमिका केवल डिग्री देने तक सीमित नहीं होनी चाहिए, बल्कि उन्हें देश के इतिहास, संस्कृति और भविष्य से जुड़े विषयों पर गंभीर विमर्श का मंच भी बनना चाहिए.

भारत को समझने के लिए सभ्यता की निरंतरता समझना जरूरी

सुधांशु त्रिवेदी ने कहा कि भारत को केवल आधुनिक राष्ट्र के तौर पर देखने से इसकी पूरी तस्वीर सामने नहीं आती. भारत एक ऐसी सभ्यता है, जिसने अलग-अलग दौर में कई बदलाव देखे हैं, लेकिन उसकी सांस्कृतिक निरंतरता बनी रही. उन्होंने कहा कि अतीत पर गर्व करने का अर्थ यह नहीं है कि वर्तमान की चुनौतियों को नजरअंदाज किया जाए. बल्कि इतिहास से प्रेरणा लेकर वर्तमान की जिम्मेदारियों को बेहतर तरीके से निभाना चाहिए.

युवाओं से इतिहास को समझने की अपील:

सुधांशु त्रिवेदी ने युवाओं से इतिहास को केवल परीक्षा या किताबों का विषय मानकर पढ़ने के बजाय उसके पीछे के विचार और परिस्थितियों को समझने की अपील की. उन्होंने कहा कि इतिहास से समाज को अपनी गलतियों के साथ-साथ अपनी ताकतों को पहचानने का अवसर भी मिलता है. उन्होंने छत्रपति शिवाजी महाराज के जीवन से नेतृत्व, संगठन और कठिन परिस्थितियों में निर्णय लेने की सीख लेने पर जोर दिया.

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