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'डिप्रेशन' में हिमाचल की आधी से ज्यादा युवा पीढ़ी! इतने फीसदी सुसाइडल थॉट्स के शिकार, सर्वे ने बढ़ाई अभिभावकों की चिंता

पीजीआई चंडीगढ़ के विशेषज्ञों ने शिमला, मंडी, धर्मशाला और सोलन के 11,000 बच्चों पर अध्ययन किया है. सर्वे में चौंकाने वाले खुलासे हुए हैं.

53 प्रतिशत में डिप्रेशन और 5 फीसदी बच्चों के मन में खुदकुशी के विचार
53 प्रतिशत में डिप्रेशन और 5 फीसदी बच्चों के मन में खुदकुशी के विचार (ETV Bharat)
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By ETV Bharat Himachal Pradesh Team

Published : May 2, 2026 at 9:19 PM IST

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Updated : May 3, 2026 at 7:48 AM IST

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शिमला: हिमाचल के जिला कांगड़ा की सान्या उम्र 16 वर्ष (11वीं की छात्रा) ने पिछले 6 महीनों से अपनी हॉबी (पेंटिंग) छोड़ दी. अब उसे रंग नहीं भाते. रंगों से खेलने वाली ये गुड़िया न जाने कब सोशल मीडिया के लाइक्स, शेयर, वर्चुअल और नकली दुनिया में खो गई. सोशल मीडिया उसकी दुनिया बन गई. उसने कमरे में खुद को बंद करना शुरू कर दिया, जब उसकी मां ने उसका फोन चेक किया, तो पाया कि वो अपनी फोटो खींचने के बाद उन्हें एडिट करने में घंटों बिताती थी. अब उसे कैनवस के रंग नहीं बल्कि सोशल मीडिया के रंग अच्छे लगने लगे थे. 'लाइक्स' कम आते, तो वह खाना नहीं खाती थी. सान्या 'बॉडी डिस्मोर्फिया' और 'डिजिटल वैलिडेशन' के जाल में फंस चुकी थी. उसे लगने लगा था कि उसकी असल पहचान उसके सोशल मीडिया फिल्टर तय करते हैं.

ये सिर्फ एक सान्या की कहानी नहीं है. ऐसी ही सान्या हिमाचल के कई घरों में है, जिन्हें सोशल मीडिया पर फेम या वैलिडेशन चाहिए. नतीजा आज हिमाचल के बच्चों का बच्चपन बंद कमरों में सिसकियों में बीत रहा है. हमारी आने वाली युवा पीढ़ी एक गहरे मानसिक द्वंद्व से जूझ रही है? राष्ट्रीय स्वास्थ्य मिशन (NHM) और पीजीआई चंडीगढ़ के एक हालिया और व्यापक अध्ययन में ये खुलासा हुआ है. ये पूरे प्रदेश के लिए अलार्मिंग और सजग होने वाली स्थिति है. अध्ययन के आंकड़े बताते हैं कि देवभूमि के किशोरों के मन में 'देवत्व' कम और 'अवसाद' (Depression) घर कर रहा है.

PGIMER चंडीगढ़ के डिपार्टमेंट ऑफ साइकियाट्री के वरिष्ठ प्रोफेसर डॉ. संदीप ग्रोवर और डॉ. सुभो चक्रवर्ती के मार्गदर्शन में हुए इस सर्वे का सैंपल साइज बहुत बड़ा था. ये सर्वे 11 हजार बच्चों पर किया गया. इसमें हिमाचल के चार जिलों शिमला, मंडी, धर्मशाला(कांगड़ा) और सोलन के 13 से 19 आयु वर्ग के बच्चों को शामिल किया गया. इसमें ये बात सामने आई कि हिमाचल के 53 प्रतिशत बच्चों में डिप्रेशन हावी हो रहा है और पांच प्रतिशत बच्चों के मन में सुसाइड के ख्याल आ रहे हैं.

हिमाचल के सर्वे में हुए खुलासे
हिमाचल के सर्वे में हुए खुलासे (ETV Bharat)

रील को रीयल समझने की गलती

सोशल मीडिया की दुनिया बच्चों को इतनी प्रभावित कर रही है कि वो इसे ही सच्च मान रहे हैं. रील की चमक, दमक और नकली चेहरों को रीयल मान रहे हैं. इस असर ये हो रहा है कि बच्चे आत्महत्या के विचार और खुद को नुकसान पहुंचाने तक के बारे में सोच रहे हैं. वो खुद को दूसरों के मुकाबले कमतर आंक रहे हैं. सोलन की एक 16 वर्षीय छात्रा ने काउंसलिंग के दौरान बताया कि सोशल मीडिया पर सहपाठियों की "परफेक्ट लाइफ" देखकर उसे खुद की जिंदगी बेकार लगने लगी. उसे लगा कि वो सुंदर नहीं है और उसका कोई भविष्य नहीं है. इस 'तुलना' ने उसे खुद को नुकसान पहुंचाने (Self-harm) की दहलीज पर खड़ा कर दिया.

सर्वे में चौंकाने वाले आंकड़े

पीजीआई चंडीगढ़ के शोधकर्ताओं ने एक 'मानकीकृत मनोवैज्ञानिक प्रश्नावली' (Standardized Psychological Questionnaire) का उपयोग किया. इसमें सीधे तौर पर ये नहीं पूछा गया कि "क्या आप उदास हैं?", बल्कि उनके व्यवहार, नींद के पैटर्न, भविष्य के प्रति नजरिया और एकाग्रता से जुड़े सवाल पूछे गए. अध्ययन में पाया गया कि मानसिक समस्या से जूझ रहे 53 प्रतिशत बच्चों में 14% किशोर क्लिनिकल डिप्रेशन के शिकार हैं. 5% ने स्वीकार किया कि उनके मन में आत्महत्या के विचार (Suicidal Ideation) आते हैं. 14% किशोर एंग्जायटी और अन्य व्यवहार संबंधी विकारों से ग्रस्त हैं.

सर्वे में हुए ये खुलासे
सर्वे में हुए ये खुलासे (ETV Bharat)

साझा परिवारों का टूटने का नुकसान

भारत में नेशनल क्राइम रिकॉर्ड्स ब्यूरो (NCRB) के आंकड़े बताते हैं कि हर साल हजारों छात्र आत्महत्या करते हैं. 2022-23 के आंकड़ों के अनुसार, भारत में हर एक घंटे में एक छात्र आत्महत्या करता है. हिमाचल में यह दर राष्ट्रीय औसत के मुकाबले थोड़ी कम जरूर है, लेकिन 5% बच्चों में 'सुसाइडल टेंडेंसी' का होना खतरे की घंटी है. हिमाचल सरकार ने इस समस्या से लड़ने के लिए 103 नई दिशा केंद्र स्थापित किए हैं.

डॉ. अंजलि चौहान और स्वास्थ्य सचिव एम. सुधा के अनुसार, इन केंद्रों में अब किशोर खुद पहुंचकर अपनी समस्याएं साझा कर रहे हैं. यह 'हेल्प सीकिंग बिहेवियर' (मदद मांगने की आदत) एक बड़ा बदलाव है.

क्यों आ रहे हैं खुदकुशी के ख्याल?

डॉ. संदीप ग्रोवर के अनुसार, 'किशोर अवस्था में मस्तिष्क का 'प्रीफ्रंटल कॉर्टेक्स' (जो निर्णय लेता है) पूरी तरह विकसित नहीं होता, जबकि भावनाओं को नियंत्रित करने वाला हिस्सा बहुत सक्रिय होता है. आजकल के बच्चों को 'ना' सुनने की आदत नहीं है. छोटी सी असफलता भी उन्हें पहाड़ जैसी लगती है. इंटरनेट पर दूसरों की बनावटी खुशी देखकर बच्चे हीन भावना का शिकार हो रहे हैं. देर रात तक स्क्रीन के सामने रहने से 'मेलाटोनिन' हार्मोन का संतुलन बिगड़ रहा है, जिससे चिड़चिड़ापन और डिप्रेशन बढ़ता है.'

नाजुक कंधों पर उम्मीदों का बोझ

माता-पिता की उम्मीदों का बोझ भी नाजुक कंधों पर डाल दिया जाता है. मंडी के 17 साल के आयान की कहानी भी ऐसी ही है. JEE की तैयारी कर रहे छात्र आयान में अचानक 'पैनिक अटैक' के लक्षण दिखने लगे. पढ़ाई करते समय पसीना आने लगा, हाथ कांपना शुरू हुए और बेहोशी के दौरे पड़ने लगे. अब आयान ने अपने दिल के बोझ को डायरी में लिखना शुरू किया. परिवार डायरी पढ़कर सन रह गया. आयान डायरी में लिखता है "मैं एक फेलियर हूं, मेरे पिता का पैसा बर्बाद हो रहा है." इसके कारण आयान डिप्रेशन में चला गया. डॉ. सुभो चक्रवर्ती के अनुसार, ये 'एकेडमिक बर्नआउट' का मामला था. बच्चे का दिमाग लगातार सूचनाओं और प्रदर्शन के दबाव से इतना थक चुका था कि उसने काम करना बंद कर दिया.

इन लक्षणों को पहचानें
इन लक्षणों को पहचानें (ETV Bharat)

छोटी सी उम्र में उम्मीदों का बोझ नाजुक कंधों पर लादने के साथ असफल होने पर समाज, रिश्तेदारों के तानों की चिंता में बच्चे अवसाद का शिकार हो रहे हैं. सबसे बड़ा डर परीक्षा में असफलता का होता है. बच्चों के दिमाग को इस तरह ट्रेंड कर दिया जाता है कि वो प्रतियोगी परीक्षाओं को ही जीवन की असल परीक्षा मान लेते हैं और असफलताओं से डरने लगते हैं.

धर्मशाला के 12वीं के एक छात्र ने बताया कि उस पर मेडिकल प्रवेश परीक्षा निकालने का इतना दबाव है कि उसे रात में डरावने सपने आते हैं. उसे लगता है कि अगर वह फेल हुआ तो समाज और माता-पिता को क्या मुंह दिखाएगा.

अकेलेपन का शिकार बच्चे

नौकरीपेशा दंपत्तियों के बच्चों में डिप्रेशन का खतरा बढ़ा है. माता-पिता दोनों करियर की व्यस्तताओं और दफ्तर के तनाव में उलझे रहते हैं, तो जाने-अनजाने बच्चों के हिस्से का समय और ध्यान कम हो जाता है. बचपन में मिलने वाला भावनात्मक समर्थन बच्चे के मानसिक विकास की नींव होता है, लेकिन इसकी कमी से बच्चों में असुरक्षा और अकेलेपन की भावना घर कर जाती है.

मंडी के एक प्रतिष्ठित स्कूल के छात्र ने बताया कि उसके माता-पिता दोनों नौकरीपेशा हैं. घर आने पर उसके पास बात करने को कोई नहीं होता। उसने अकेलेपन से बचने के लिए नशे का सहारा लेना शुरू कर दिया था.

ऑनलाइन गेमिंग

ऑनलाइन गेमिंग की लत बच्चों को चिड़चिड़ा बना रही है. समाज और परिवार से छोटी सी उम्र में अलगाव पैदा कर रही है. गेमिंग की लत के कारण बच्चों में अनिंद्रा की समस्या, सही से खान पान पर ध्यान देना. चिड़चिड़ापन गुस्सा. दोस्तों परिवार के साथ झगड़ा करना सोशल मीडिया पर अंधेरे या अलविदा से जुड़े स्टेटस लगाना ये सब अवसाद के लक्षण हैं.

लक्षण नजर आने पर क्या करें
लक्षण नजर आने पर क्या करें (ETV Bharat)

शिमला का रोहन, 15 वर्ष (9वीं कक्षा) रोहन रात भर ऑनलाइन गेम खेलता और दिन में स्कूल में सो जाता, जब उसके पिता ने इंटरनेट कनेक्शन काटा, तो रोहन ने हिंसक होकर घर का सामान तोड़ दिया और अपनी कलाई काट ली. यह 'गेमिंग एडिक्शन' के साथ-साथ भावनात्मक अकेलेपन का मामला था. रोहन के लिए गेम में मिलने वाले 'वर्चुअल रिवॉर्ड्स' उसके माता-पिता के प्यार की कमी को पूरा कर रहे थे. डोपामाइन के इस चक्र ने उसे

क्या करें?

बच्चों में अगर अवसाद के लक्षण नजर आएं तो उसे हल्के में न लें. बच्चे को तुरंत डॉक्टर पर लेकर जाएं. उसे समय दें. बच्चे से बात करते समय उसे लेक्चर न दें, बस उसे बोलने दें. दिन में कम से कम 30 मिनट बिना मोबाइल के बच्चों के साथ बैठें. दूसरे बच्चों के साथ अपने बच्चे की तुलना करना बंद करें. हर बच्चा अलग है. अगर बच्चा परेशान है, तो उसे मनोचिकित्सक के पास ले जाने में हिचकें नहीं. यह पागलपन नहीं, मानसिक रोग है, जिसका इलाज संभव है. इसे टैबू न मानें. बच्चों पर गुस्सा करने और चिल्लाने की जगह आराम से पेश आए.

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Last Updated : May 3, 2026 at 7:48 AM IST