ये पेड़ है बेस्ट नेचुरल Air Purifier, धुंआ-प्रदूषण से लड़ने में सबसे ज्यादा कारगर, वैज्ञानिकों के शोध में हुआ खुलासा
हिमाचल प्रदेश विश्वविद्यालयों के वैज्ञानिकों ने प्रदूषण से लड़ने वाले पेड़ों पर किया रिसर्च. अध्ययन में ये पेड़ निकला प्रदूषण का सबसे बड़ा दुश्मन.

By ETV Bharat Himachal Pradesh Team
Published : November 8, 2025 at 5:41 PM IST
|Updated : November 8, 2025 at 5:52 PM IST
शिमला: आज के आधुनिक दौर में देश-दुनिया के लिए सबसे बड़ी चुनौती प्रदूषण है. गाड़ियों और कल-कारखाने से निकलने वाले धुएं और हवाओं में मौजूद हानिकारक तत्वों से निपटना सबसे बड़ी मुश्किल है. देश की राजधानी दिल्ली हो या फिर कोई भी बड़ा या छोटा शहर आज वहां शुद्ध हवा मिलना मुश्किल है. हर जगह प्रदूषण से लोगों का दम घुट रहा है. ऐसे में हिमाचल प्रदेश यूनिवर्सिटी (HPU) के पर्यावरण विभाग के वैज्ञानिकों द्वारा किए गए अध्ययन में एक बड़ा खुलासा हुआ है, जिससे प्रदूषण से निपटने के लिए एक नई उम्मीद जगी है. HPU के वैज्ञानिकों द्वारा पेड़ों पर किए रिसर्च में पता चला है कि साल वृक्ष (Shorea robusta) प्रदूषण से निपटने के लिए सबसे अच्छा एयर प्यूरीफायर है.

हिमाचल प्रदेश की सड़कों पर अब ‘साल वृक्ष’ प्रदूषण से लड़ने में एक नया हथियार बन सकता है. हिमाचल प्रदेश विश्वविद्यालय (HPU) के पर्यावरण विज्ञान विभाग के वैज्ञानिकों ने एक अनोखा अध्ययन किया है, जिसमें यह खुलासा हुआ है कि साल का पेड़ (Shorea robusta) गाड़ियों से निकलने वाले धूल, धुएं और प्रदूषक तत्वों को सबसे अधिक अवशोषित करता है. यह अध्ययन बताता है कि यह पेड़ न केवल हवा को शुद्ध करता है, बल्कि वाहनों के प्रदूषण के खिलाफ एक प्राकृतिक ढाल की तरह काम करता है.

किसने किया यह शोध?
यह अध्ययन हिमाचल प्रदेश विश्वविद्यालय (HPU), शिमला के पर्यावरण विज्ञान विभाग द्वारा किया गया है. इस शोध में तीन प्रमुख वैज्ञानिकों ने भाग लिया. जिसमें एचपीयू की एनवायरमेंट साइंस की असिस्टेंट प्रोफेसर डॉ. कल्याणी सुप्रिया, रिसर्च स्कॉलर रिया चौहान और डॉ. वाईएस परमार बागवानी एवं वानिकी विश्वविद्यालय, नौणी के डॉ. आरके अग्रवाल शामिल रहें. इन वैज्ञानिकों ने कई महीनों तक फील्ड सर्वे कर यह पता लगाया कि कौन सा पेड़ हिमाचल की सड़कों पर बढ़ते प्रदूषण को सबसे ज्यादा रोक सकता है.

कहां और कब हुआ यह अध्ययन?
यह शोध दिसंबर 2023 से जून 2024 के बीच किया गया. टीम ने इस अध्ययन के लिए हिमाचल प्रदेश में नाहन से पांवटा साहिब के बीच NH-07 राष्ट्रीय राजमार्ग को चुना. यह करीब 40 किलोमीटर लंबा क्षेत्र है, जहां गाड़ियों की आवाजाही बहुत अधिक रहती है. वैज्ञानिकों ने सड़क के दोनों किनारों से पौधों की पत्तियां तीन अलग-अलग दूरियों से लीं. जिसमें सड़क से 5 मीटर के भीतर, 5 से 10 मीटर की दूरी पर और 10 मीटर से अधिक दूर स्थित पेड़ों से पत्तियां ली. इस तरीके से उन्होंने यह जांचा कि सड़क के कितने पास मौजूद पेड़ ज्यादा प्रदूषण झेलते हैं और कौन-से पौधे इस प्रदूषण को सबसे बेहतर तरीके से सहते हैं.

साल वृक्ष बना ‘प्रदूषण रोधी चैंपियन’
अध्ययन के दौरान टीम ने चार आमतौर पर मिलने वाले पेड़ों का विश्लेषण किया. जिसमें साल वृक्ष (Shorea robusta), नीलगिरी (Eucalyptus), फिकस (Ficus religiosa) और मलोटस पेड़ शामिल थे. इन सभी की प्रदूषण सहन क्षमता (APTI) और सामान्य प्रदर्शन सूचकांक (API) के आधार पर तुलना की गई. जिसमें पता चला कि साल वृक्ष ने सबसे अधिक प्रदूषण सोखा और हवा को शुद्ध करने में बाकी सभी पेड़ों को पीछे छोड़ दिया. नीलगिरी का प्रदर्शन मध्यम पाया गया, जबकि फिकस और मलोटस पेड़ प्रदूषण सहन करने में कमजोर साबित हुए.

डॉ. कल्याणी सुप्रिया का क्या कहना है?
इस शोध की प्रमुख वैज्ञानिक डॉ. कल्याणी सुप्रिया बताती हैं, 'यह पहली बार हुआ है कि हिमाचल में स्थानीय स्तर पर किसी पेड़ की प्रदूषण अवशोषण क्षमता को वैज्ञानिक रूप से मापा गया है. हमारे अध्ययन से यह स्पष्ट है कि साल का पेड़ न केवल प्रदूषण को झेलने की क्षमता रखता है, बल्कि NH-07 जैसे औद्योगिक ट्रैफिक वाले क्षेत्रों की मिट्टी और जलवायु में बहुत अच्छे से पनपता भी है. इसलिए सड़कों और हाईवे किनारे साल वृक्ष की ‘ग्रीन बेल्ट’ बनाना प्रदूषण नियंत्रण का बेहतरीन कदम हो सकता है'.

क्या बनाता है साल वृक्ष को इतना खास?
साल का पेड़ भारत के सबसे पुराने और मजबूत पेड़ों में से एक है. इसे 'वनों का प्रहरी' कहा जाता है. क्योंकि यह सैकड़ों साल तक जीवित रह सकता है और पर्यावरणीय बदलावों को सहने की क्षमता रखता है. यह पेड़ गर्मियों में अधिकतम तापमान 40-45°C तक का तापमान सहन कर सकता है. जबकि ठंड के मौसम में 5°C तक तापमान में रह सकता है, लेकिन यह निम्नतम तापमान के साथ उचित वृद्धि के लिए उपयुक्त नहीं होता. साल को मैदानी इलाकों में उगाया जा सकता है, बशर्ते जल निकासी वाली हल्की दोमट मिट्टी हो और क्षेत्र में वार्षिक वर्षा लगभग 1000-3000 मिमी होती हो. वहीं, वैज्ञानिक दृष्टि से यह प्रदूषण के खिलाफ इतना असरदार क्यों है, इसके पीछे कई कारण हैं.

मोटी और चमड़े जैसी पत्तियां: साल की पत्तियां मोटी और वैक्स जैसी होती हैं. यह हवा में मौजूद धूल, कार्बन और सूक्ष्म कणों को अपनी सतह पर रोक लेती हैं.
क्लोरोफिल की उच्च मात्रा: इसमें क्लोरोफिल की मात्रा अन्य पेड़ों से अधिक होती है, जो इसे गाड़ियों के धुएं में मौजूद हानिकारक गैसों (जैसे कार्बन मोनोऑक्साइड, सल्फर डाइऑक्साइड) को सहने की ताकत देती है.
घना छत्रक (Canopy): साल का पेड़ बहुत घना होता है. इसका चौड़ा छत्रक एक ‘प्राकृतिक फिल्टर’ की तरह काम करता है, जो हवा में मौजूद प्रदूषक तत्वों को रोकता है.
लंबी उम्र और कम रखरखाव: यह पेड़ 100 साल तक जीवित रह सकता है और इसे बार-बार पानी या देखभाल की जरूरत नहीं पड़ती. यह खासतौर पर पहाड़ी इलाकों के लिए उपयुक्त माना जाता है.

हाईवे किनारे साल के पेड़ क्यों जरूरी हैं?
हिमाचल प्रदेश जैसे राज्यों में हर दिन वाहनों की संख्या बढ़ रही है. इनसे निकलने वाला धुआं (मुख्यतः PM2.5 और PM10 कण) न केवल हवा को दूषित करता है, बल्कि लोगों के फेफड़ों और दिल पर बुरा असर डालता है. राजमार्गों के किनारे यदि साल के पेड़ लगाए जाएं, तो वे न सिर्फ प्रदूषण को कम करेंगे. बल्कि सड़क किनारे की मिट्टी को भी स्थिर रखेंगे. विशेषज्ञों का कहना है कि साल वृक्षों की हरित पट्टी (Green Belt) बनने से सड़क किनारे की हवा साफ रहेगी, धूल का उड़ना कम होगा, तापमान में संतुलन आएगा और सड़क की सुंदरता भी बढ़ेगी.

टीम ने अपनी रिपोर्ट में साफ लिखा है कि वन विभाग, राजमार्ग प्राधिकरण और पर्यावरण नीति बनाने वाली संस्थाओं को साल वृक्ष के रोपण को प्राथमिकता देनी चाहिए. रिपोर्ट में यह भी कहा गया है कि 'हर नए राजमार्ग प्रोजेक्ट या सड़क चौड़ीकरण के साथ, दोनों ओर साल वृक्षों की हरित पट्टी बनाई जाए. यह दीर्घकालिक निवेश है, जो आने वाले वर्षों में हिमाचल की हवा को शुद्ध रखने में मदद करेगा'.
कहां-कहां उग सकता है साल का पेड़?
साल का पेड़ हर जगह नहीं पनपता. इसे गर्म और आर्द्र जलवायु की जरूरत होती है. यह पेड़ 1500 मीटर तक की ऊंचाई पर अच्छे से बढ़ता है. इसलिए हिमाचल के निचले और मध्य पर्वतीय क्षेत्र इसके लिए उपयुक्त हैं.

भारत में यह प्राकृतिक रूप से इन राज्यों में पाया जाता है.
- हिमाचल प्रदेश
- उत्तराखंड
- उत्तर प्रदेश (तराई क्षेत्र)
- झारखंड
- ओडिशा
- मध्य प्रदेश
- छत्तीसगढ़
- पश्चिम बंगाल
हिमाचल में इसे खासकर सोलन, सिरमौर, बिलासपुर, हमीरपुर और कांगड़ा जिलों में सफलतापूर्वक उगाया जा सकता है. पेड़ केवल ऑक्सीजन नहीं देते, बल्कि ये ‘प्राकृतिक एयर प्यूरीफायर’ भी हैं. पेड़ों की पत्तियां, तना और जड़ें हवा में मौजूद हानिकारक तत्वों को अवशोषित कर उन्हें कम हानिकारक बनाती हैं. भारत में बढ़ते शहरीकरण और ट्रैफिक के बीच, यदि हर शहर में ‘ग्रीन बफर जोन’ बनाया जाए तो वायु प्रदूषण के स्तर को 30-40% तक घटाया जा सकता है. साल वृक्ष इस दिशा में एक प्रभावी कदम हो सकता है. क्योंकि इसकी प्रदूषण से लड़ने की क्षमता वैज्ञानिक रूप से साबित हो चुकी है.

नाहन–पांवटा साहिब क्षेत्र में रहने वाले लोगों ने इस अध्ययन का स्वागत किया है. उनका कहना है कि गर्मियों में जब ट्रक और बसों का धुआं पूरे इलाके में फैलता है, तो सांस लेना मुश्किल हो जाता है. यदि सड़कों के किनारे साल के घने पेड़ लगे तो हवा ताजी रहेगी और तापमान में भी कमी आएगी.
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