डेब्ट ट्रैप में फंसा हिमाचल, लोन लिमिट 10 हजार करोड़ रुपए, मूलधन व ब्याज चुकाने को चाहिए 13 हजार करोड़, कैसे होगा विकास?
आरडीजी खत्म होने से हिमाचल सरकार के खजाने पर भारी चोट लगी है.

By ETV Bharat Himachal Pradesh Team
Published : February 8, 2026 at 4:58 PM IST
|Updated : February 8, 2026 at 5:26 PM IST
शिमला: छोटा पहाड़ी राज्य हिमाचल प्रदेश डेब्ट ट्रैप में फंस गया है. आलम ये है कि लिए गए कर्ज की मूल रकम व उस पर लगने वाले ब्याज को चुकाने के लिए भी पर्याप्त पैसा नहीं है. रविवार (8 फरवरी) को सीएम सुखविंदर सिंह सुक्खू सहित सरकार के सभी प्रतिनिधियों के समक्ष वित्त विभाग की प्रेजेंटेशन में आर्थिक मोर्चे पर कई कड़वी बातें सामने आई. खासकर कर्ज के मोर्चे पर स्थिति बहुत गंभीर है. हालांकि भारत के नियंत्रक महालेखा परीक्षक यानी कैग डेढ़ दशक से ये चेता रहा था कि हिमाचल को कर्ज के मोर्चे पर गंभीरता से काम करने की जरूरत है.
अब सोलहवें फाइनेंस कमीशन की रिपोर्ट में हिमाचल सहित अन्य कुछ राज्यों की रेवेन्यू डेफिसिट ग्रांट (आरडीजी) खत्म कर दी है. इससे हिमाचल सरकार के खजाने पर भारी चोट लगी है. वित्त विभाग के सचिव देवेश कुमार ने सरकार के समक्ष प्रस्तुत आंकड़ों में कर्ज को लेकर चिंताजनक स्थिति से अवगत करवाया है. हिमाचल पर एक लाख करोड़ रुपए के कर्ज का बोझ होने वाला है. हालांकि, प्रेजेंटेशन में कुल कर्ज का आंकड़ा नहीं बताया गया, लेकिन कर्ज की लिमिट व मूलधन के साथ ब्याज चुकाने के लिए जो रकम चाहिए, उस पर चर्चा जरूर हुई.
हिमाचल की वित्तीय स्थिति की यदि बात की जाए तो राज्य का अपना सालाना रेवेन्यू यानी राजस्व 18000 करोड़ रुपए है. यानी औसतन डेढ़ हजार करोड़ रुपए महीने का है. यानी राज्य के संसाधनों से सालाना 18 हजार करोड़ रुपए राजस्व जुटता है. इसके अलावा केंद्रीय करों में हिस्सेदारी के तौर पर 13950 करोड़ रुपए सालाना आएंगे. यदि वेतन, पेंशन व अन्य खर्चों की बात की जाए तो हिमाचल का खर्च 48,000 करोड़ रुपए है. अगले वित्तीय वर्ष में सरकार को लिए गए कर्ज के ब्याज व मूल धन को चुकाने के लिए 13 हजार करोड़ रुपए चाहिए.
वहीं, कर्ज लेने की लिमिट सिर्फ 10 हजार करोड़ रुपए है. अगले वित्तीय वर्ष में कर्ज व ब्याज चुकाने के लिए 13 हजार करोड़ चाहिए. अब लोन को चुकाने के लिए मार्केट से कर्ज लेकर भी बात नहीं बन रही और तीन हजार करोड़ रुपए अपने बजट से चुकाने होंगे. राज्य को कमिटिड लायबिलिटी जैसे सामाजिक सुरक्षा पेंशन, सब्सिडी आदि हैं. अगले साल के पूरे हिसाब की बात करें तो 13910 करोड़ रुपए केंद्रीय करों में हिस्सेदारी से आएंगे. कुल 18 हजार करोड़ रुपए राज्य के अपने रेवेन्यू से आएंगे. 10 हजार करोड़ रुपए लोन ले सकेंगे. ये सब कुल मिलाकर 42 हजार करोड़ रुपए होंगे. वहीं, खर्च 48 हजार करोड़ रुपए होगा. ये जो गैप है, इसे आरडीजी के माध्यम से भरा जाता रहा है और अब ये व्यवस्था खत्म हो गई है. ऐसे में विकास कार्यों के लिए पैसे नहीं बचेंगे.
सोलहवें फाइनेंस कमीशन ने लोन लेने की लिमिट भी स्टेट की जीडीपी की तीन फीसदी ही रखी है. उस पर ओपीएस लागू होने के बाद 1800 करोड़ की कटौती लोन लिमिट को लेकर भी हुई है. वित्त सचिव ने कहा कि जीएसटी लागू होने के बाद भी हिमाचल को नुकसान हुआ है. जीएसटी से पहले राज्य सरकार वैट लगाती थी. उससे खजाने को राहत मिलती थी. राज्य के खुद के रेवेन्यू सीमित हो गए और खर्च बढ़ गए हैं.
वहीं, सीएम सुखविंदर सिंह सुक्खू का कहना है कि, "हिमाचल को अपने हक की लड़ाई लड़नी है. हिमाचल की धरती पर बने बिजली प्रोजेक्ट्स जिन्हें स्थापित हुए चालीस साल हो गए, उन्हें राज्य को वापस किया जाना चाहिए. साथ ही बीबीएमबी के एरियर का 4500 करोड़ भी सुप्रीम कोर्ट के साफ आदेश के बाद नहीं मिला है. इसके अलावा शानन प्रोजेक्ट की लीज खत्म हुए एक साल से अधिक हो रहा है, वो भी हिमाचल को वापस नहीं मिल रहा. हिमाचल के वन देश के फेफड़े हैं, यहां के पानी से देश को सुख मिलता है, लेकिन अपनी ही धरती यानी हिमाचल को लाभ नहीं हो रहा है."
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