Explainer: क्या नेपाल में डैम बनाकर बिहार को बाढ़ की आपदा से बचाया जा सकता है?
क्या बाढ़ की त्रासदी से बिहार को तभी मुक्ति मिलेगी, जब नेपाल में हाई डैम बनेंगे? मांग फिर शुरू हो गई है. रिपोर्ट- अविनाश कुमार

Published : August 27, 2026 at 8:51 PM IST
पटना: नेपाल के कारण बिहार में बाढ़ से तबाही होती है, यह तो सब को पता है लेकिन इसका स्थायी समाधान क्या है? जानकार कहते हैं कि इसके बचाव का एकमात्र उपाय नेपाल में उच्च स्तरीय डैम का निर्माण है. इसके बावजूद डैम निर्माण बिहार के लिए अब तक सपना बना हुआ है. पिछले 40 वर्षों में कोसी हाई डैम के लिए डीपीआर तक का निर्माण नहीं हो सका है, जबकि गंगा बाढ़ नियंत्रण परिषद ने 1986 में ही नेपाल में कोसी और उसकी सहायक नदियों के साथ बराह क्षेत्र में डैम बनाने की अनुशंसा की थी.
हाई डैम ही बाढ़ का स्थायी समाधान: कोसी पर हाई डैम के साथ-साथ गंगा बाढ़ नियंत्रण परिषद ने बागमती नदी पर नेपाल के नूनथर में जलाशय, गंडक नदी पर नेपाल में तीन डैम और कमला बलान पर नेपाल के चीसापानी (शीश पानी) में बहुउद्देशीय जलाशय निर्माण की भी अनुशंसा की थी. अभी हाल में मुख्यमंत्री सम्राट चौधरी और डिप्टी सीएम विजय कुमार चौधरी ने केंद्रीय वित्त मंत्री और विदेश मंत्री से मुलाकात की थी. डेढ़ महीने में डीपीआर बनाने का आश्वासन मिला है.
क्या बोले विभागीय मंत्री?: उपमुख्यमंत्री सह जल संसाधन मंत्री विजय कुमार चौधरी कहते हैं कि केंद्रीय वित्त मंत्री और विदेश मंत्री के साथ हम लोगों की बैठक हुई है. हाई डैम निर्माण को लेकर फिर से हम लोगों ने पहल की है. वित्त मंत्री ने आश्वासन दिया है कि जल्द ही डीपीआर निर्माण का कार्य पूरा होगा. उन्होंने कहा कि हमने केंद्र से ये भी कहा कि विराटनगर में जो संयुक्त परियोजना कार्यालय है, उसमें बिहार के जल संसाधन विभाग की भी टीम होनी चाहिए क्योंकि अब तक जितनी भी टीम म बनी, उसमें बिहार की भागीदारी नहीं रही है.
"बिहार हर साल बाढ़ से तबाह होता है. इसके स्थायी निदान के रूप में नेपाल से आने वाली नदियों पर उच्च स्तरीय डैम या जलाशय निर्माण की योजना है. नेपाल में ये डैम बनना है. इस संबंध में हमलोगों ने हाल में ही केंद्रीय वित्त मंत्री और विदेश मंत्री से मुलाकात की थी. इसको लेकर वित्त मंत्री ने बड़ा ही स्पष्ट निर्देश दिया है कि अगले एक-डेढ़ महीने में ये डीपीआर बनाने का काम केंद्र सरकार के जल शक्ति मंत्रालय द्वारा इसको पूरा कर लिया जाएगा."- विजय कुमार चौधरी, डिप्टी सीएम सह जल संसाधन मंत्री
विपक्ष का 'डबल इंजन' सरकार पर आरोप: डैम निर्माण को लेकर विपक्ष बिहार और केंद्र सरकार पर हमलावर है. मुख्य विपक्षी पार्टी आरजेडी के प्रवक्ता एजाज अहमद कहते हैं कि अब तो डबल इंजन की सरकार. इसके बावजूद क्यों नहीं डैम निर्माण को लेकर गंभीरता दिख रही है. उन्होंने कहा कि हर साल बाढ़ की वजह से होने वाली तबाही को रोकने के लिए केंद्र और राज्य को गंभारत दिखानी चाहिए. मोदी सरकार को इसके लिए बड़ी राशि जारी करनी चाहिए, पहले ही बहुत देर हो चुकी है.
"बाढ़ के स्थायी निदान के लिए भारत सरकार की ओर से बार-बार दावा किया जाता है कि डीपीआर तैयार करने के लिए सब कुछ तय हो चुके हैं. 2001 से ये बात चल रही है, जब अटल जी की सरकार थी तब से. 12 साल से केंद्र में ये सरकार है लेकिन लापरवाही के कारण कुछ नहीं हो रहा है. सरकार को नेपाल से वार्ता कर जल्द से जल्द राशि विमुक्त करे, केवल डीपीआर बनाने से कुछ नहीं होगा."- एजाज अहमद, प्रवक्ता, राष्ट्रीय जनता दल

लंबे समय से हाई डैम की मांग: बिहार में बाढ़ की समस्या से स्थाई निदान कोसी में हाई डैम बनाने से होगा यह मांग भी होती रही है और इस पर चर्चा भी होती रही है. 2004 में ही यह तय हो गया था कि नेपाल के बराह क्षेत्र में 5 किलोमीटर अपस्ट्रीम त्रिवेणी में डैम बनेगा. नेपाल और भारत के बीच उच्च स्तरीय बैठक में डैम बनाने पर सहमति बनी थी. सर्वे के लिए नेपाल में तीन जगह कार्यालय भी खुल गए लेकिन उसके बाद कोई प्रगति नहीं हो पाई.
नेपाली पीएम से मिले थे नीतीश: बिहार के तत्कालीन मुख्यमंत्री नीतीश कुमार ने केंद्र से इस बारे में कई बार गुहार लगाई. कई पत्र भी भेजे लेकिन उसके बाद भी केंद्र की तरफ से कोई पहल नहीं हुई. नीतीश कुमार नेपाल भी गए थे. उस समय नेपाल के तत्कालीन प्रधानमंत्री ने कहा था कि जल्द सर्वे करवाएंगे लेकिन उसके बाद कुछ हुआ नहीं और तब से डैम बनाने का मामला खटाई में पड़ा हुआ है.
अंग्रेज शासन काल में भी हुई थी चर्चा: विशेषज्ञ इंजीनियर सुनील चौधरी का कहना है कि कोसी नदी की त्रासदी सैकड़ों वर्षों से बिहार के लोग झेल रहे हैं. इसलिए कोसी नदी को 'बिहार का शोक' कहा जाता है. ब्रिटिश काल में भी कोसी की तबाही को रोकने पर अध्ययन करने का फैसला लिया गया था. ब्रिटिश इंडिया के मेजर जनरल रिनल ने 1779 में कोसी को लेकर पहली बार सर्वे किया और कोसी को बांधने की आवश्यकता बताई थी.

इसके बाद जेम्स फर्ग्यूसन ने 1863 में और एएफ सीलिंग ने भी कोसी बाढ़ का फील्ड सर्वे किया था. उन्होंने भी डैम बनाने का विकल्प सुझाया था लेकिन कोई भी निर्णय नहीं हो पाया. 1869-70 में कोसी में आई भीषण बाढ़ के बाद कोसी को बांधने का निर्णय लिया गया और तटबंध बनाने का फैसला हुआ. ब्रिटिश इंडिया शासन के वरीय अधिकारियों ने नेपाल राज से सुनसरी और सप्तरी में डैम बनाने का समझौता किया लेकिन 1891 में आई बाढ़ के कारण यह प्रोजेक्ट सफल नहीं हो पाया. 27 फरवरी 1897 में नेपाल ने बराह क्षेत्र में डैम बनाने पर अपनी समिति दे दी.
उसके बाद विभिन्न स्तरों पर कोसी के बाढ़ पर लगातार अध्ययन होता रहा. 1994 में अमेरिकी एजेंसी ने कोसी को लेकर व्यापक स्तर पर अध्ययन किया और चुरिया रेंज में डैम बनाने का सुझाव दिया. जनवरी 1946 में कोसी को लेकर राय बहादुर अयोध्या नाथ खोसला की अध्यक्षता में एक कमीशन का गठन किया गया. खोसला कमिश्नर ने बराह क्षेत्र के 1.60 किलोमीटर अपस्ट्रीम में डैम बनाने की अनुशंसा की.

भारत की आजादी के बाद जवाहरलाल नेहरू ने भी गंभीर पहल की. केंद्र सरकार ने इंजीनियर एसपी प्रसाद की अध्यक्षता में नए सिरे से कमीशन का गठन किया. इस कमीशन ने भी 25.91 मीटर ऊंचा डैम बनाने की अनुशंसा की, जो 25 अप्रैल 1954 को कोसी समझौते के साथ समाप्त हो गया. समझौते के बाद भारत में कोसी बराज का निर्माण किया गया. 1958 से इसका निर्माण शुरू किया गया और 1965 को पूरा हुआ.
सप्तकोशी पर डैम की आवश्यकता लगातार महसूस की जा रही थी. इसके बाद गंगा बाढ़ नियंत्रण परिषद ने 1986 में बराह क्षेत्र में डैम बनाने की अनुशंसा की थी. 2004 अगस्त में जब संयुक्त परियोजना कार्यालय विराटनगर में खुला, उस समय अनुसंधान और डीपीआर तैयार करने के लिए भारत सरकार ने 30 करोड़ रुपये की राशि भी स्वीकृत की थी और 30 महीने का समय भी तय किया था.

जानकार कहते हैं कि फरवरी 2007 तक काम पूरा कर लेना था लेकिन नेपाल में कानून-व्यवस्था की बिगड़ी स्थिति के कारण काम आगे नहीं बढ़ पाया. इसके अलावे इस परियोजना में कमला जलाशय योजना और बागमती योजना के अध्ययन का कार्य भी संयुक्त परियोजना कार्यालय से जोड़ दिया गया. इसके बाद 2013 तक डीपीआर तैयार करने का लक्ष्य रखा गया और इसके लिए भारत सरकार ने राशि बढ़ाकर 30 करोड़ से 88 करोड़ कर दिया लेकिन इसके बावजूद अब तक काम पूरा नहीं हुआ.
डैम से क्या लाभ होगा?: विशेषज्ञों के अनुसार हाई डैम के निर्माण से भारत और नेपाल दोनों को लाभ मिलेगा. डैम निर्माण से बिहार और नेपाल के बड़े हिस्से को बाढ़ से राहत मिलेगी. बिजली की जरूरत भी पूरी होगी, इस परियोजना से 5500 मेगावाट बिजली उत्पादन होने का अनुमान लगाया गया. बिहार में 10 लाख हेक्टेयर में सिंचाई की सुविधा भी मिलेगी. नेपाल में भी 5 लाख हेक्टेयर में सिंचाई के लिए पानी पहुंचेगा.

हाई डैम की मुख्य बातें: हाई डैम को लेकर अब तक जो अनुशंसा होती रही है, उसमें सप्तकोशी नदी पर बराह क्षेत्र में 269 मीटर ऊंचा बांध बनेगा. सप्तकोशी नदी पर कुरुले के पास 49 मीटर ऊंचा बांध का निर्माण और कोसी नदी पर बतरा में बराज का निर्माण होगा. इसके अलावे सप्तकोशी नदी पर डायवर्सन टनल और उत्तर कोसी और नेपाल पूरा क्षेत्र में नहर का निर्माण होना है.

2008 में कोसी ने कुसहा में अपनी धारा बदल दी, जिससे नदी का तटबंध टूट गया. इसके बाद नेपाल के साथ उत्तर बिहार में भारी तबाही मची. 2008 के बाद से कोसी बराज के विकल्प की भी चर्चा होने लगी. भारत और नेपाल दोनों ने ही कई बार डैम को लेकर कई बार गंभीरता दिखाई है लेकिन इतने प्रयास के बाद भी अब तक डीपीआर भी नहीं बना है.
क्या कहते हैं विशेषज्ञ?: कोसी इलाके और बाढ़ पर काम करने वाले एएन सिन्हा शोध संस्थान के पूर्व निदेशक प्रोफेसर डीएम दिवाकर का कहना है कि कोसी त्रासदी से बचने के लिए नेपाल और भारत दोनों को गंभीरता दिखानी होगी. उन्होंने कहा कि हाई डैम का निर्माण अंतरराष्ट्रीय मामला है. डैम निर्माण से भारत और नेपाल दोनों को लाभ मिलेगा, इसलिए जरूरी है कि भारत और नेपाल दोनों के विशेषज्ञ इसका अध्ययन करें और दुनिया में जो भी सबसे सर्वश्रेष्ठ उपाय है, उस पर काम करें.
"भारत में तो कई जगह बांध बने हुए हैं और लोग उससे भी परेशान हैं. जहां बांध नहीं है, वहां बांध के निर्माण की मांग भी होती है लेकिन हाई डैम का निर्माण अंतरराष्ट्रीय मामला है. ऐसे में भारत सरकार को इस पर गंभीरत से कदम उठाना चाहिए. नेपाल के साथ मिलकर अगर इस डैम का निर्माण करवा लिया जाता है तो बहुत फायदा होगा. कोसी इलाके को बाढ़ से स्थायी राहत तो मिलेगी ही, सिंचाई और बिजली का भी उत्पादन हो पाएगा."- प्रो. डीएम दिवाकर, पूर्व निदेशक, एएन सिन्हा शोध संस्थान
डैम निर्माण पर होगी बड़ी राशि खर्च: राजनीतिक विशेषज्ञ प्रिय रंजन भारती का कहना है कि हाई डैम का निर्माण अंतरराष्ट्रीय मामला तो है ही, साथ ही नेपाल इलाके में हाई डैम के निर्माण में बड़ी राशि खर्च होगी. यही वजह है कि बात आगे नहीं बढ़ पा रही है. वे कहते हैं कि पिछले साल विधानसभा चुनाव के दौरान पीएम मोदी ने कोसी और मिथिलांचल के लोगों को बाढ़ से राहत का भरोसा दिलाया था. इसलिए ये माना जा रहा है कि आने वाले दिनों में इस पर केंद्र जरूर कुछ न कुछ करेगा.
"विधानसभा चुनाव के समय प्रधानमंत्री ने बिहार में बाढ़ से उपाय का भरोसा दिलाया है. खासकर मिथिला और कोसी के इलाके लोग के लोगों ने झोली भरकर बीजेपी को वोट दिया है. ऐसे में अब यह उम्मीद जरूर की जानी चाहिए कि अगले चुनाव से पहले हाई डैम निर्माण को लेकर कोई बड़ी पहल जरूर होगी. डैम पर काफी राशि खर्च होगी, इसलिए इसके लिए अबतक बहुत ठोस पहल नहीं हो पाई है."- प्रिय रंजन भारती, राजनीतिक विशेषज्ञ
नेपाल में ही बन सकता है डैम: जानकार बताते हैं कि अधिकांश नदियां नेपाल के हिस्से से निकलकर बिहार में आती हैं. इसलिए नेपाल के हिस्से में ही डैम का निर्माण बाढ़ की समस्या का समाधान है. डैम बनाने में हो रहे विलंब का एक बड़ा कारण नेपाल में राजनीतिक उथल-पुथल भी रहा है लेकिन इसके बावजूद सार्थक प्रयास के तहत 2004 में ही संयुक्त परियोजना कार्यालय और इसके संलग्न कार्यालय को स्थापित किया गया था.

विराटनगर में संयुक्त परियोजना कार्यालय, जबकि दो प्रमंडल कार्यालय घरान और जनकपुर में स्थापित किया गया था. वहीं संपर्क कार्यालय काठमांडू में था. अवर प्रमंडल कार्यालय विराटनगर, लहान कुरुले और लहान में स्थापित किए गए थे. सप्तकोशी नदी ही बिहार में कोसी बन जाती है और इससे नेपाल के बड़े हिस्से में भी तबाही मचती है. इसलिए नेपाल की तरफ से भी प्रयास हुए लेकिन भारत और नेपाल का जो प्रयास हुआ है, अभी तक सार्थक परिणाम तक नहीं पहुंचा है.
कोसी की बाढ़ से करोड़ों की बर्बादी: कोसी की बाढ़ से हर साल बिहार में हजारों-करोड़ों का नुकसान होता है. जान-माल की भी क्षति होती है. 2008 में आई बाढ़ में हुए नुकसान को लेकर बिहार सरकार ने केंद्र से 148000 करोड़ की मांग की थी. इसी तरह 2016 में 4112 करोड़, 2017 में 7636 करोड़, 2019 में 4300 करोड़, 2020 में 3328 करोड़, 2024 में 3638 करोड़ और 2025 में 3600 करोड़ की डिमांड की गई थी. राज्य सरकार हर साल बाढ़ से बचाव और राहत कार्य पर हजारों करोड़ की राशि खर्च करती है.
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