389 चिताएं जला चुका है ये शख्स, हर बार मुर्दे से मांगते हैं माफी
पांवटा साहिब के हेमंत शर्मा ने 389 लावारिस शवों सम्मानजनक विदाई दी है. उन्होंने अपने सेवा भाव से लावारिस शब्द को छोटा कर दिया.

By ETV Bharat Himachal Pradesh Team
Published : February 18, 2026 at 7:28 PM IST
सिरमौर: कुछ लोगों को मरने के बाद भी अपनो का साथ नसीब नहीं होता. इनके मृत शरीर का नाम लावारिस लाश के तौर पर दर्ज होता है. ये लाशें सम्मानजनक विदाई और अपनों के इंतजार में मुर्दाघरों में सड़ांध मार रही होती है. इन्हें इंतजार होता है कि कोई परिवार का सदस्य आएगा और इनका अंतिम संस्कार करेगा, लेकिन अफसोस इनका कोई अपना अंतिम यात्रा में नहीं आता.
जब कंधा देने वाला कोई नहीं होता और चिता के सामने खड़ा होने वाला कोई नहीं होता, तब एक आदमी चुपचाप आगे बढ़ता है. वो न रिश्तेदार है, न परिचित. फिर भी कंधा देता है. मुखाग्नि देता है. हरिद्वार गंगा में अस्थि विसर्जन करने तक पूरी प्रक्रिया खुद बिना किसी परिचय और जान पहचान के निभाता है. जिला सिरमौर में पांवटा साहिब निवासी हेमंत शर्मा पिछले 12 वर्षों में लावारिस लाशों का संस्कार कर रहे हैं. अब तक वो 389 लावािस लाशों का संस्कार चुके हैं. उन्होंने अपने सेवा भाव से लावारिस शब्द को छोटा कर दिया.

एक अधूरा संस्कार जिसने दिशा बदल दी
हेमंत को लावारिस लाशों का अंतिम संस्कार करने का ख्याल क्यों और कैसे आया. इसके बारे में हेमंत बताते हैं कि 'साल 2014 में श्मशान घाट पर एक दृश्य देखा, जिसे देखकर भीतर तक हिल गया. एक लावारिस शव की चिता तो जल चुकी थी, लेकिन उसकी अस्थियां वहीं पड़ी थीं, न उठाने वाला कोई था, न विदा करने वाला. उस अधूरे अंतिम संस्कार को पूरा किया और मुझे लगा कि अधूरा संस्कार केवल प्रक्रिया का अधूरापन नहीं, बल्कि सम्मान की कमी है. उसी क्षण मैंने तय किया कि जहां तक संभव होगा, कोई भी मृतक अधूरी विदाई का इंतजार नहीं करेगा.'

389 बार निभाया आखिरी फर्ज
आज हेमंत शर्मा 'सरल संस्कार एंड वेलफेयर सोसाइटी' के माध्यम से 10 सदस्यीय टीम के साथ यह जिम्मेदारी निभा रहे हैं. सूचना मिलते ही वो अस्पताल या घटनास्थल पहुंचते हैं. लकड़ी, सामग्री और विधि-विधान की व्यवस्था करते हैं. चिता सजाते हैं. मुखाग्नि देते हैं और अस्थि विसर्जन तक पूरी प्रक्रिया पूरी करते हैं. कोई नियमित सरकारी मदद नहीं मिलती. अधिकतर खर्च वो स्वयं उठाते हैं. ये उनके लिए सेवा से बढ़कर दायित्व है. एक इंसान की दूसरे इंसान के प्रति अंतिम जिम्मेदारी.
हर बार चिता से मांगते हैं माफी
हेमंत शर्मा कहते हैं कि मरने वाला हमारा अपना नहीं था, लेकिन हम उसे अपनाते हैं, ताकि वो अंतिम विदाई सम्मान से ले सके. चिता के सामने खड़े होकर अग्नि देने से पहले मन ही मन एक ही बात कहते हैं, 'अगर हम आपको अपनापन न दे सके, तो क्षमा करना.' यह केवल एक वाक्य नहीं है. यह एक स्वीकार्यता है कि उस स्थान पर किसी अपने को खड़ा होना चाहिए था, लेकिन जब कोई नहीं होता, तब हम उस स्थान को भरते हैं.

'हेमंत और उनकी टीम का सहयोग सराहनीय'
लावारिस लाश का अंतिम संस्कार करने के लिए पुलिस भी हेमंत की मदद लेती है. इस संबंध में एसपी सिरमौर एनएस नेगी ने भी हेमंत शर्मा की पहल की सराहना की है. उन्होंने कहा कि 'लावारिस शवों के सम्मानजनक अंतिम संस्कार में हेमंत और उनकी टीम का सहयोग सराहनीय है. पुलिस और समाज के बीच ऐसे प्रयास विश्वास को मजबूत करते हैं. किसी भी व्यक्ति को मृत्यु के बाद सम्मान मिलना चाहिए. हेमंत जैसे लोग समाज में संवेदनशीलता की मिसाल पेश कर रहे हैं. पुलिस विभाग ऐसे सकारात्मक सामाजिक प्रयासों का समर्थन करता है.'
परिवार से मिलती है ताकत
शादी के दस दिन बाद जब पहली बार उन्हें श्मशान जाना पड़ा, मां यशोदा देवी ने इसे उनका 'प्रथम कर्तव्य' कहा. पत्नी दीपिका शर्मा ने हर परिस्थिति में साथ दिया. अब छह वर्ष की बेटी आदित्री भी समझने लगी है कि उसके पिता 'सेवा' के लिए जाते हैं. फोन बजता है तो वह पूछती है, 'पापा, फिर सेवा पर जा रहे हो. वो भी साथ चलने की जिद करती है.' हेमंत कहते हैं कि उसी सवाल में हमें आगे बढ़ने की ताकत मिलती है.
जरूरतमंदों की करते हैं मदद
हेमंत शर्मा अपना मार्ट चलाते हैं. वो सिर्फ शवों का संस्कार ही नहीं करते जरुरतमंदों की मदद भी करते हैं. उनके पास मरीजों के लिए अस्पताल वाले बेड की सुविधा है. घर पर इलाज करवा रहे गरीब या जरूरतमंद परिवारों को ये बेड निशुल्क उपलब्ध करवाते हैं. इसके अलावा ऑक्सीजन सिलेंडर भी घर पर उपलब्ध करवाते हैं. इसके अलावा हेमंत अब तक 100 लोगों को व्हील चेयर दे चुकें हैं. जरूरतमंद के इलाज में मदद करते हैं.

मरीजों की भी करते हैं मदद
पांवटा साहिब के मुख्य बाजार में रहने वाले हेमंत नाम के युवक ने बताया कि मेरे पिता पैरालाइज्ड हैं उन्हें आखिरी स्टेज का कैंसर है. घर पर बेड की जरूरत थी. हमने हेमंत शर्मा से संपर्क किया उन्होंने हमें निशुल्क बेड उपलब्ध करवा दिया. पांवटा साहिब के वार्ड नंबर 11 में रहने वाले ज्ञान चंद ने बताया हमारे मरीज का घर पर इलाज चल रहा है घर पर बेड की जरूरत थी, इसलिए हमने हेमंत शर्मा से संपर्क किया और उन्होंने तत्काल हमें ये उपबल्ध करवा दिया.
ऑक्सीजन सिलेंडर पांवटा साहिब की सीमा पर उत्तराखंड में आने वाले कुल्हल में नेपाली मूल की महिला मंजूला देवी ने बताया कि 'मेरे पति राम बहादुर की कई बीमारियों से जूझ रहे हैं. पति को ऑक्सीजन सिलेंडर चाहिए था. हमारे पास इतने पैसे नहीं थी. हमें किसी ने हेमंत शर्मा के बारे में बताया और फिर उनसे संपर्क किया. उन्होंने हमें ऑक्सीजन सिलेंडर उपबल्ध करवा दिया.'
क्या कभी मन डगमगाया
समाज सेवा और 389 अंतिम संस्कार कोई छोटा आंकड़ा नहीं है. भावनात्मक थकान भी होती है, लेकिन हेमंत कहते हैं कि जब एक बार इसे अपना कर्तव्य मान लिया, तो पीछे हटने का सवाल ही नहीं उठा. यह हमारे लिए काम नहीं है, दायित्व है और दायित्व से मुंह मोड़ना उन्हें स्वीकार नहीं.
कुछ दृश्य जो आज भी पीछा करते हैं
389 अंतिम संस्कारों के दौरान कई ऐसे पल आए, जो आज भी उनकी स्मृतियों में जिंदा हैं. हेमंत शर्मा कहते हैं कि 'एक गर्भवती महिला का शव आज भी नजर आता है. वो दृश्य लंबे समय तक बेचैन करता रहा. 5 अगस्त 2021 को गोंदपुर में मजदूरी करने आए बिहार के एक परिवार की महिला की अचानक हृदयाघात से मृत्यु हो गई. चार साल का बच्चा अपनी मां के अंतिम संस्कार के दौरान वहीं खड़ा था. उसकी आंखों के सामने उसकी मां को मुखाग्नि दी गई. वो दिन सिर्फ एक और संस्कार नहीं था, वह एक ऐसा क्षण था, जिसने भीतर तक हिला दिया.'
'लावारिस' हादसा या सोच की कमी
हेमंत मानते हैं कि हर लावारिस शव के पीछे केवल परिस्थितियां नहीं होतीं. कहीं न कहीं हमारी सोच भी जिम्मेदार होती है. गरीबी, दूरी, मजदूरी ये हालात हो सकते हैं कि किसी शव का अंतिम संस्कार करने कोई पहुंचा ही नहीं, लेकिन सवाल यह है कि क्या हम किसी को 'लावारिस' कहकर अपनी जिम्मेदारी से मुक्त हो सकते हैं. वो कहते हैं कि अगर कोई बच्चा बिगड़ भी जाए, तो क्या हम उसे लावारिस छोड़ देते हैं? नहीं, हम उसे संभालने की कोशिश करते हैं. फिर मौत के बाद किसी इंसान को पूरी तरह बेसहारा छोड़ देना कैसे सही हो सकता है. उनके लिए टलावारिस' शब्द सही नहीं है, बल्कि यह एक सामाजिक असहजता है.

'ये सामाजिक सेवा नहीं, नैतिक हस्तक्षेप'
वरिष्ठ पत्रकार एवं स्थानीय निवासी सुखविंदर सुक्खू कहते हैं 'हेमंत शर्मा का कार्य केवल सामाजिक सेवा नहीं, बल्कि एक नैतिक हस्तक्षेप है. किसी समाज की संवेदनशीलता का असली पैमाना ये है कि वो अपने कमजोर और बेसहारा लोगों के साथ कैसा व्यवहार करता है. हेमंत ने हर बार यह साबित किया है कि इंसानियत अभी जिंदा है. यह काम प्रचार से नहीं, भीतर की पीड़ा और जिम्मेदारी से निकलता है. ऐसे प्रयासों को केवल सराहना तक सीमित नहीं रखना चाहिए, बल्कि समाज को भी आगे आकर ऐसी पहलों को मजबूती देनी चाहिए.'
क्या हर चिता के साथ संवेदनाएं भी जलती हैं
अंतिम संस्कार करना कोई आसान नहीं है. चिंता के सामने मनुष्य अपने से संवाद करता है. ये किसी भी तरह हो सकता है. अपने बारे, मरने वाले के बारे में भी हो सकता है. इस पर हेमंत शर्मा कहते हैं कि '389 चिताओं के सामने खड़े होकर कभी-कभी मन में भी सवाल उठते हैं कि आज इनके अपने कहां हैं. लगता है कि कई बार सिर्फ एक शरीर नहीं जलता बल्कि समाज की संवेदनाओं की कमी भी सामने आती है. परिस्थितियां जो भी रही हों, अंतिम विदाई सम्मान के साथ होनी चाहिए, यह तो हम तय कर सकते हैं.'
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