ग्राउंड रिपोर्ट: राष्ट्रपति के दत्तक पुत्र पंडो समाज के लोगों का जीवन कितना बदला
1952 में राष्ट्रपति ने पंडो समाज के लोगों को गोद लिया था. 73 साल में उनके जीवन में आए बदलाव की ग्राउंड रिपोर्ट.

By ETV Bharat Chhattisgarh Team
Published : November 12, 2025 at 5:36 PM IST
|Updated : November 12, 2025 at 6:07 PM IST
सरगुजा: पंडो समाज को देश के पहले राष्ट्रपति डॉ. राजेन्द्र प्रसाद ने साल 1952 में गोद लिया था. उसके बाद से पंडो समाज को राष्ट्रपति का दत्तक पुत्र माना जाता है. 73 सालों बाद अब पंडो समाज की स्थिति कैसी है? इस बात की पड़ताल करने ईटीवी भारत की टीम ग्राम पंडो नगर पहुंची. यह वही पंडो नगर है, जहां देश का दूसरा राष्ट्रपति भवन बना है.
पंडोनगर की कहानी: पंडोनगर की अंबिकापुर से दूरी करीब 12 किलोमीटर है. गांव तक पहुंचने के लिए पक्की सड़क है. बिजली, पानी, स्कूल जैसी तमाम सुविधाएं हैं. जंगल में बिना कपड़ों के रहने वाला समाज आज आधुनिक कपड़े पहने नजर आया. लोगों के हाथों में मोबाइल, बाइक और कार भी दिखाई दिए.
1952 में डॉ. राजेन्द्र प्रसाद यहां आये: पंडोनगर निवासी राजाराम पंडो कहते हैं कि दादा परदादा बताते थे कि हमारे समाज के लोग जंगल में रहते थे. 1952 में डॉ. राजेन्द्र प्रसाद यहां आये और सभी को पंडोनगर में बसाया. एक सड़क बनी. दोनों तरफ कॉलोनी बनाई गई. उस समय हमारे समाज के लोग कपड़े नहीं पहनते थे, लेकिन आज सभी सलीके से कपड़े पहनते हैं. अब तो गाड़ी, मोबाइल, घर में सभ सुविधाएं हैं.
बसाने के लिए 13 कालोनियां बनाई गई: समाज के प्रदेश कार्यवाहक अध्यक्ष उदय पंडो भी बताते हैं कि तत्कालीन राष्ट्रपति डॉ राजेन्द्र प्रसाद के निर्देश पर पंडो जाति के लोगों को यहां 13 अलग अलग कॉलोनियों में जंगल से लाकर बसाया गया. ये कपड़ा भी नहीं पहनते थे. बस एक छोटा सा कपड़ा लगाकर प्राइवेट पार्ट को ढंक लेते थे. इन सभी को कपड़ा उपलब्ध कराया गया.
शासन ने खेती के लिए जमीन और बैल दिए: उदय पंडो बताते हैं कि उस समय सिर्फ खेती का ही काम होता था तो सभी को नागर, गाय, बैल, बैलगाड़ी, कई तरह के बीज उपलब्ध कराये गये. हर परिवार को 10-10 एकड़ जमीन देकर, उसका पट्टा देने का निर्देश राष्ट्रपति ने दिया था. उन्होंने राष्ट्रपति के दत्तक पुत्र का दर्जा दिया था. इससे समाज में अच्छा बदलाव हुआ.
''शिक्षा से हासिल हुआ हक'': राजाराम पंडो कहते हैं कि हमारे समाज के लोग सरकारी नौकरी कर रहे हैं. एक बलरामपुर का लड़का मेकाहारा रायपुर से एमबीबीएस कर रहा है. कुछ बच्चे पीएससी की तैयारी कर रहे हैं. मेरी बेटी भी पीएससी की तैयारी कर रही है. कुछ लोग शिक्षा विभाग में काम कर रहे हैं, कुछ प्रधान पाठक हैं. पहले और अब में बहुत बदलाव हुआ है.
कई लोग पढ़ लिखकर डॉक्टर बने: पंडो समाज के लोगों ने धीरे धीरे पढ़ाई के महत्व को समझा. अब पंडो समाज के लोग डॉक्टर बन रहे हैं तो कई अन्य शासकीय पदों पर सेवा दे रहे हैं. हालांकि समाज के लोगों से बातचीत में समझ में आया कि आज भी कई बस्तियों में जागरूकता का अभाव है. शिक्षा और जागरूकता के अभाव में बहुत से लोग आज भी सुविधाओं से वंचित हैं.
शासन की योजना से बदली तस्वीर: समाज के प्रदेश कार्यवाहक अध्यक्ष उदय पंडो बताते हैं कि हमारे समाज के लिए राज्य और केंद्र सरकार ने बहुत काम किया है. नौकरी और हर क्षेत्र में प्राथमिकता मिलती है. लेकिन जो मूल आधार था, उससे हम आज भी वंचित हैं. केंद्र की विशेष पिछड़ी जनजाति (PVTGs) की सूची में शामिल नहीं किया गया. हम राज्य की सूची में हैं. ये दस्तावेजी काम अधिकारी नहीं कर पाए, क्योंकि समाज में कोई जागरूक नहीं था.
राष्ट्रपति ने अपने हाथों से लगाए थे यहां पौधे: ग्रामीणों का प्रशासनिक लापरवाही का भी आरोप है. गांव वाले बताते हैं कि हर परिवार को दस एकड़ जमीन देने की घोषणा का भी काम प्रशासन नहीं कर सका है. करीमन राम पंडो बताते हैं, "यहां बस बोले कि सबको जमीन का पट्टा मिलेगा, लेकिन मिला नहीं. किसी किसी के पास पट्टा है, लेकिन कम है. 4 या 5 एकड़ का ही पट्टा है. किसी को भी दस एकड़ का पट्टा नहीं दिया गया. प्रशासन ने ही नौ एकड़ में चावल गोदाम बना दिया है. ये जमीन डॉक्टर राजेन्द्र प्रसाद दिए थे. यहां खैर का पेड़ भी राष्ट्रपति लगाये थे. जमीन कागजों में नहीं मिली और अब उस पर भी कब्जा हो रहा है.
समाज की मुख्यधारा से जुड़े: उदय ने बताया कि पंडो समाज के लोगों का जीवन वक्त के साथ बदला है. निश्चित रूप में जंगलों में अर्धनग्न रहने वाले लोग आज आधुनिक फैशन अपना चुके हैं. नौकरी कर रहे हैं. मोबाइल फोन और गाड़ियां चला रहे हैं. पूर्व राष्ट्रपति डॉ राजेन्द प्रसाद ने मुख्यधारा से जोड़कर इनके जीवन को बदलने में बड़ी भूमिका निभाई है, लेकिन राजेन्द्र बाबू का सपना आज भी अधूरा है. जो वादा उन्होंने अपने दत्तक पुत्रों से किया था, वो प्रशासन पूरा नहीं कर सका है. समाज के लोगों का आरोप है कि आज तक केंद्र की विशेष पिछड़ी जनजाति की सूची में पंडो जनजाति का नाम नहीं है और ना ही दस एकड़ जमीन के कागजात उनके नाम कभी हो पाए हैं.
उदय पंडो यह भी कहते हैं कि प्रशासनिक लापरवाही से हमारा नाम केंद्र की सूची में नहीं है. जमीन का पट्टा नहीं मिला है, जबकि आज जिसने बिहार, यूपी से आकर यहां जंगल काटकर कब्जा किया, उसको पट्टा मिल गया, लेकिन हम आज तक वंचित हैं.
कई जिलों में बसे हैं पंडो परिवार: समाज के प्रदेश कार्यवाहक अध्यक्ष उदय पंडो बताते हैं कि प्रदेश के 7 जिलों में है पंडो जनजाति के लोग रहते हैं. सरगुजा, बलरामपुर, सूरजपुर, कोरिया, एमसीबी, कोरबा, रायगढ़ और गौरेला-पेंड्रा-मरवाही में इस जनजाति के लोग निवास करते हैं. साल 2005 में जो सर्वे प्रशासन ने किया, उसमें पंडो लोगों की जनसंख्या 31 हजार बताई गई है, लेकिन आज ये बढ़कर करीब 70 से 80 हजार हो गई है.
सरगुजा आ रहीं हैं राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू: राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू 20 नवंबर को सरगुजा दौरे पर आ रही हैं. उदय पंडो कहते हैं कि हम बहुत खुश हैं कि सरगुजा में 73 साल बाद राष्टपति का दौरा होने वाला है. प्रशासन हमारी उनसे सौजन्य मुलाकात कराये ताकि हमारा उत्साह और बढ़ सके.
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