झारखंड में प्राथमिक शिक्षा की जमीनी हकीकत: मूलभूत सुविधाओं की कमी, शिक्षक संकट और ड्रॉपआउट की चुनौती
झारखंड में प्राथमिक शिक्षा की जमीनी हकीकत बेहद खराब है. मूलभूत सुविधाओं की कमी, शिक्षक संकट और ड्रॉपआउट बड़ी चुनौती है.

Published : January 8, 2026 at 1:24 PM IST
रिपोर्ट: रांची से चंदन, जामताड़ा से संजय तिवारी और सिमडेगा से मुकेश
रांची: झारखंड में प्राथमिक और माध्यमिक शिक्षा की स्थिति लंबे समय से नीतिगत दावों और जमीनी हकीकत के बीच फंसी हुई है. एक ओर सरकार ड्रॉपआउट दर में कमी और नामांकन में वृद्धि को बड़ी उपलब्धि के रूप में पेश कर रही है, वहीं दूसरी ओर राज्य के सुदूर और ग्रामीण इलाकों में मूलभूत सुविधाओं का अभाव शिक्षा व्यवस्था की सबसे बड़ी कमजोरी बनकर उभर रहा है. शौचालय, पेयजल, शिक्षक उपलब्धता और स्कूलों के रखरखाव जैसे मुद्दे अभी भी पूरी तरह हल नहीं हो पाए हैं.
झारखंड शिक्षा परियोजना परिषद के निदेशक शशि रंजन ने शिक्षा व्यवस्था से जुड़ी चुनौतियों पर खुलकर चर्चा करते हुए स्वीकार किया कि मूलभूत सुविधाओं की कमी ड्रॉपआउट की एक बड़ी वजह है. उन्होंने कहा कि शिक्षा विभाग के आंकड़ों के अनुसार राज्य के कई जिलों में स्कूलों में पेयजल और शौचालय संबंधी समस्याएं बनी हुई हैं. हालांकि, उनका यह भी कहना है कि इन समस्याओं पर नजर रखने और समाधान के लिए विभागीय स्तर पर लगातार टीमवर्क किया जा रहा है.
शशि रंजन के अनुसार, झारखंड में लगभग 35 हजार सरकारी स्कूल हैं और इन सभी में संतुलन बनाए रखना तथा नियमित रखरखाव करना एक बड़ी प्रशासनिक चुनौती है. इसके बावजूद विभाग निरंतर सुधार की दिशा में कार्य कर रहा है.
शिक्षक संकट और स्कूलों की संख्या
झारखंड में प्राथमिक स्कूलों की संख्या को लेकर विभिन्न वर्षों और रिपोर्टों में अंतर देखने को मिलता है. 2021-22 के आंकड़ों के अनुसार राज्य में लगभग 35 हजार 840 सरकारी स्कूल थे, जिनमें से करीब 93 प्रतिशत प्राथमिक विद्यालय हैं. मार्च 2025 में विधानसभा में शिक्षा मंत्री द्वारा दिए गए आधिकारिक बयान के अनुसार, राज्य के 7930 स्कूल ऐसे हैं जहां केवल एक ही शिक्षक पदस्थापित है. इन स्कूलों में भी अधिकांश प्राथमिक विद्यालय हैं.

एकल शिक्षक स्कूलों में गुणवत्ता प्रभावित
शिक्षा विशेषज्ञों का मानना है कि एकल शिक्षक वाले स्कूलों में शिक्षा की गुणवत्ता बुरी तरह प्रभावित होती है. एक शिक्षक को कई कक्षाओं और विषयों की जिम्मेदारी निभानी पड़ती है, जिससे बच्चों को व्यक्तिगत ध्यान नहीं मिल पाता. लंबे समय में यही स्थिति बच्चों की पढ़ाई छोड़ने और ड्रॉपआउट का कारण बन सकती है.
मूलभूत सुविधाओं की स्थिति
शिक्षा का अधिकार अधिनियम (RTE) के तहत स्कूलों में शौचालय, पेयजल, साफ-सफाई और सुरक्षित वातावरण अनिवार्य है. इसके बावजूद झारखंड के कई सरकारी स्कूलों में ये सुविधाएं या तो अधूरी हैं या फिर उपयोग के लायक नहीं बची हैं. उपलब्ध रिपोर्टों के अनुसार, राज्य के करीब 3158 सरकारी स्कूलों में शौचालय तो बनाए गए हैं, लेकिन पानी और नियमित देखरेख के अभाव में वे बेकार पड़े हैं. इन स्कूलों में न तो सफाई की नियमित व्यवस्था है और न ही जलापूर्ति की स्थायी व्यवस्था. इसका सीधा असर बच्चों की उपस्थिति, स्वास्थ्य और खासतौर पर लड़कियों की शिक्षा पर पड़ता है.

सुदूर जिलों के प्राथमिक स्कूलों की हकीकत
झारखंड के जामताड़ा, खूंटी, सिमडेगा और लातेहार जैसे सुदूर और आदिवासी बहुल जिलों में प्राथमिक शिक्षा की जमीनी तस्वीर आज भी चिंताजनक बनी हुई है. इन क्षेत्रों में शौचालय और बाथरूम का निर्माण तो कराया गया है, लेकिन रखरखाव की कमी के कारण उनका उपयोग नहीं हो पा रहा है.
जामताड़ा में आदिवासी बहुल ग्रामीण क्षेत्रों में प्राथमिक विद्यालयों की हालत बेहाल
जामताड़ा के कई ग्रामीण प्राथमिक विद्यालयों में शौचालय भवन मौजूद हैं, लेकिन उनमें पानी की व्यवस्था नहीं है. स्थानीय के अनुसार, बच्चे आज भी शौचालय के लिए स्कूल परिसर से बाहर जाने को मजबूर हैं. इससे न केवल बच्चों की सुरक्षा पर सवाल खड़े होते हैं, बल्कि स्वच्छता और स्वास्थ्य संबंधी जोखिम भी बढ़ जाते हैं
आदिवासी बच्चों की शिक्षा का दयनीय हाल
जामताड़ा जिले के चलना पंचायत के बादडीह उत्क्रमित विद्यालय एक आदिवासी बहुल गांव का स्कूल है. कहने को तो यह आदिवासी बच्चों की पढ़ाई के लिए बना है, लेकिन यहां बुनियादी सुविधाओं का अभाव है. विद्यालय में शौचालय, चापाकल और पानी की टंकी तो बनाई गई हैं, लेकिन ये सिर्फ दिखावे के लिए हैं. सभी खराब पड़े हुए हैं और इनकी कोई सुध लेने वाला नहीं है. शौचालय, चापाकल और पानी की टंकी खराब होने के कारण बच्चों को शौच और पीने के पानी के लिए बाहर भटकना पड़ता है. इससे उन्हें काफी परेशानी होती है.

विद्यालय में शिक्षकों की भी कमी है. सिर्फ दो पारा टीचर के भरोसे स्कूल चल रहा है. इनमें से कभी-कभी एक अनुपस्थित रहता है या छुट्टी पर होता है. ऐसे में बच्चों की पढ़ाई कितनी प्रभावित होती होगी, यह आसानी से अनुमान लगाया जा सकता है.
शिक्षाविद् और नेता ने जताई नाराजगी
आदिवासी ग्रामीण इलाकों में शिक्षा व्यवस्था पर संथाली भाषा के शिक्षाविद् प्रोफेसर सुनील हांसदा ने गहरी चिंता जताई. उन्होंने कहा कि शिक्षा व्यवस्था चौपट है. सरकार ने ट्राइबल बच्चों की शिक्षा के लिए कुछ किया ही नहीं. ग्रामीण इलाकों में स्कूल एक या दो पारा टीचर के भरोसे चल रहे हैं. शिक्षा का स्तर निरंतर गिरता जा रहा है.

शिक्षा विभाग के पदाधिकारियों का जवाब
इस मामले में जिला शिक्षा अधीक्षक (डीएसई) और जिला शिक्षा पदाधिकारी से संपर्क करने की कोशिश की गई, लेकिन दोनों उपलब्ध नहीं हुए. जिला शिक्षा अधीक्षक से बार-बार संपर्क के बावजूद उन्होंने समय नहीं दिया और बात करने से बचते रहे. अंततः शिक्षा विभाग के एडीपीओ से संपर्क पर उन्होंने कहा कि चलना गांव के बादडीह स्कूल की व्यवस्था की जांच कराई जाएगी और समस्याओं का निराकरण एक सप्ताह में कर दिया जाएगा. सभी ट्राइबल स्कूलों की जांच कर समस्याओं का निदान करने का आश्वासन दिया.
खूंटी जिला
खूंटी के सुदूर ग्रामीण इलाकों में बने कई स्कूल बाथरूम जर्जर अवस्था में पहुंच चुके हैं. कहीं दरवाजे टूटे हुए हैं तो कहीं गंदगी के कारण उपयोग असंभव हो गया है. स्थानीय सामाजिक कार्यकर्ताओं का कहना है कि किशोरावस्था की छात्राओं की उपस्थिति पर इसका सीधा असर पड़ता है, क्योंकि वे असुविधा के कारण स्कूल आने से कतराने लगती हैं.
सिमडेगा में जर्जर भवनों में पढ़ने को मजबूर बच्चे, कभी भी हो सकता है बड़ा हादसा
सिमडेगा जिले के पहाड़ी और दूरदराज इलाकों में स्थिति और भी गंभीर है. यहां कई प्राथमिक स्कूलों में शौचालय वर्षों से बंद पड़े हैं. पानी की अनुपलब्धता और सफाई न होने के कारण छात्र खुले में जाने को विवश हैं. बानो प्रखंड अंतर्गत बिंतुका पंचायत क्षेत्र के कमलाबेड़ा, हल्दीबेड़ा और सिकरोम स्थित सरकारी विद्यालयों की स्थिति अत्यंत दयनीय हो चुकी है. इसके बावजूद छोटे-छोटे बच्चे इन विद्यालयों में पढ़ने को मजबूर हैं. उत्क्रमित प्राथमिक मध्य विद्यालय कमलाबेड़ा, उत्क्रमित प्राथमिक विद्यालय हल्दीबेड़ा और प्राथमिक विद्यालय सिकरोम के बच्चे जान जोखिम में डालकर जर्जर भवनों में पढ़ाई करने को विवश हैं.

जर्जर भवनों की बदहाल स्थिति
इन विद्यालयों में छतों से लोहे की छड़ें झूल रही हैं, फर्श पूरी तरह टूट चुका है और दीवारों में कई जगहों पर गहरी दरारें पड़ गई हैं. कमलाबेड़ा विद्यालय में बारिश के दिनों में कक्षा के दौरान छत से पानी टपकने पर बच्चों की सुरक्षा के लिए छत के नीचे प्लास्टिक का तिरपाल लगाया गया है, ताकि पढ़ाई में कोई व्यवधान न हो. वहीं, सिकरोम विद्यालय की हालत इतनी खराब है कि शिक्षक बच्चों को अपने घर में बैठाकर पढ़ाने को मजबूर हैं. अभिभावकों में बच्चों की सुरक्षा को लेकर गहरी चिंता बनी हुई है.
शिक्षकों ने जताई चिंता, दुर्घटना की आशंका
विद्यालयों के प्रधानाचार्य विजय जोजो, आनंद मसीह एवं जेमन मड़की ने बताया कि जर्जर भवन की मरम्मत और नए भवन के निर्माण की मांग को लेकर प्रखंड शिक्षा पदाधिकारी कार्यालय में दो बार लिखित आवेदन दिया गया है, लेकिन अब तक कोई ठोस कार्रवाई नहीं हुई. उन्होंने कहा कि शिक्षक और छात्र दोनों असुरक्षित माहौल में पढ़ाई करने को मजबूर हैं और किसी भी समय बड़ी दुर्घटना से इनकार नहीं किया जा सकता.

प्रखंड शिक्षा अधिकारी का जवाब
प्रखंड शिक्षा पदाधिकारी अरुण कुमार पांडेय ने बताया कि प्रखंड के कई विद्यालयों के भवन जर्जर हो चुके हैं. इसकी जानकारी जिला और राज्य स्तर पर दी जा चुकी है. विद्यालयों की मरम्मत एवं नए भवन निर्माण के लिए भवन निर्माण विभाग को सूची उपलब्ध करा दी गई है. उन्होंने कहा कि सर्व शिक्षा अभियान के तहत पिछले कई वर्षों से राशि उपलब्ध नहीं हुई है. सरकार से राशि मिलते ही जर्जर भवनों की मरम्मत तथा नए भवन निर्माण का कार्य कराया जाएगा.
लातेहार जिला
लातेहार के सुदूर गांवों में संचालित प्राथमिक विद्यालयों में भी यही समस्या देखने को मिलती है. बाथरूम तो बने हैं, लेकिन न तो उनकी नियमित सफाई होती है और न ही जलापूर्ति सुनिश्चित है. शिक्षक बताते हैं कि छोटे बच्चों के लिए यह स्थिति बेहद असुविधाजनक है और यही कारण है कि कई बच्चे अनियमित हो जाते हैं. इन जिलों के उदाहरण यह स्पष्ट करते हैं कि इन्फ्रास्ट्रक्चर निर्माण के बाद रखरखाव और निगरानी की व्यवस्था कमजोर है, जिसका असर सीधे शिक्षा व्यवस्था पर पड़ रहा है.
सरकारी खर्च और जवाबदेही पर सवाल
सरकार द्वारा शिक्षा ढांचे पर करोड़ों रुपये खर्च किए गए हैं, लेकिन जब बुनियादी सुविधाएं उपयोग लायक नहीं रहतीं, तो योजनाओं की प्रभावशीलता पर सवाल उठना स्वाभाविक है. विशेषज्ञों का मानना है कि केवल भवन निर्माण पर ध्यान देने के बजाय मेंटेनेंस, स्थानीय स्तर पर जिम्मेदारी तय करने और नियमित निरीक्षण की व्यवस्था मजबूत करनी होगी.
हालांकि विभागीय अधिकारियों का तर्क है कि इतने बड़े पैमाने पर स्कूलों का संचालन करना आसान नहीं है, फिर भी निगरानी तंत्र को और प्रभावी बनाने की जरूरत है. ड्रॉपआउट दर में कमी के दावे सरकार के लिए राहत की बात यह है कि हालिया वर्षों में ड्रॉपआउट दर में उल्लेखनीय कमी दर्ज की गई है. 2024-25 की रिपोर्ट के अनुसार, माध्यमिक स्तर पर ड्रॉपआउट दर घटकर लगभग 3.5 प्रतिशत रह गई है, जबकि 2022-23 में यह 14 प्रतिशत से अधिक थी.
(Unified District Information System for Education Plus) UDISE+ और शिक्षा मंत्रालय की रिपोर्टों के मुताबिक, प्राथमिक और उच्च प्राथमिक स्तर पर भी ड्रॉपआउट दर में गिरावट आई है.
सरकारी आंकड़ों के अनुसार, 83 प्रतिशत से अधिक ड्रॉपआउट बच्चों को दोबारा शिक्षा की मुख्यधारा से जोड़ा गया है. माध्यमिक स्तर पर सकल नामांकन अनुपात (GER) 62 प्रतिशत से बढ़कर 73 प्रतिशत हो गया है.
अब भी बनी हुई हैं चुनौतियां
हालांकि ये आंकड़े सकारात्मक संकेत देते हैं, लेकिन चुनौतियां पूरी तरह खत्म नहीं हुई हैं. सितंबर 2023 तक लगभग 86,000 बच्चे ऐसे थे जो स्कूल से बाहर थे. 2024-25 में इनकी संख्या में कमी आई है, लेकिन अब भी हजारों बच्चे शिक्षा व्यवस्था से बाहर हैं. इसके अलावा, राज्य में लगभग 107 स्कूल ऐसे हैं जहां शून्य नामांकन दर्ज किया गया है, जो सिस्टम की गंभीर खामियों को दर्शाता है. देवघर जैसे कुछ जिलों में ड्रॉपआउट बच्चों की संख्या अपेक्षाकृत अधिक पाई गई है, हालांकि वहां भी पुनः नामांकन अभियान चलाए जा रहे हैं.
झारखंड की शिक्षा व्यवस्था आज दो विरोधाभासी तस्वीरें पेश करती है. एक ओर सरकारी आंकड़े ड्रॉपआउट दर में कमी और नामांकन में वृद्धि की कहानी कहते हैं, तो दूसरी ओर सुदूर ग्रामीण इलाकों की जमीनी हकीकत मूलभूत सुविधाओं, शिक्षक संकट और रखरखाव की कमी को उजागर करती है. अधिकारियों और शिक्षा के क्षेत्र में काम कर रहे हैं संस्थाओं का यह स्वीकार करना कि बुनियादी सुविधाएं ड्रॉपआउट की वजह बनती हैं, इस बात का संकेत है कि समस्या को सरकार भी समझती है.
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