हिमाचल में सर्दियों की शुरुआत में खिले बसंत के फूल, बदलता मौसम या खतरे की घंटी?
ग्लोबल वार्मिंग का असर हिमाचल में दिखने लगा है. मौसम में बदलाव होने से समय से पहले फल-फूल खिल रहे हैं.

By ETV Bharat Himachal Pradesh Team
Published : November 7, 2025 at 6:41 PM IST
शिमला: हिमाचल प्रदेश में मौसम का संतुलन लगातार बिगड़ रहा है. इस बार सर्दियों की शुरुआत यानी नवंबर में ही बसंत के फूल खिलने लगे हैं, जो अपने तय मौसम से करीब दो महीने पहले हैं. राज्य के कई हिस्सों में सेब, पाजे (चेरी रूटस्टॉक) के पेड़ों में भी फूल आ गए हैं, जबकि सामान्यतः ये फरवरी से अप्रैल के बीच खिलते हैं. यह असामान्य दृश्य न सिर्फ देखने वालों को चौंका रहा है, बल्कि वैज्ञानिकों और बागवानी विशेषज्ञों के लिए एक गंभीर चेतावनी बनकर उभरा है कि ग्लोबल वार्मिंग अब हिमालयी पारिस्थितिकी तंत्र को सीधे प्रभावित कर रही है.
समय से पहले खिलीं फसलें
हिमाचल प्रदेश के मध्य और ऊपरी इलाके जैसे शिमला, कुल्लू, मंडी, सोलन और सिरमौर में यह बदलाव प्रमुखता से देखा गया है.


समय से पहले आ गए सेब के फूल
स्थानीय बागवानों का कहना है, 'यह बदलाव पिछले तीन–चार वर्षों में लगातार देखने को मिल रहा है. शिमला के बागानों में आया यह बदलाव सबसे अधिक चिंताजनक है. थानाधार के बागवान संतोष वर्मा ने बताया, 'उनके गाला किस्म (Gala variety) के सेब के पेड़ों में नवंबर में ही फूल आ गए हैं. यह पहली बार है जब पतझड़ के बीच फूल खिले हैं. आमतौर पर हमारे बगीचे में अप्रैल में फूल आते हैं, लेकिन इस बार मौसम ने पूरा चक्र बिगाड़ दिया. आसपास के इलाकों कोटखाई, रोहड़ू और मशोबरा में भी यही स्थिति है. कई जगहों पर पाजे के पेड़ों में भी जनवरी से पहले ही कलियां आ गई हैं, जबकि सामान्य रूप से इन्हें फरवरी–मार्च में ग्राफ्टिंग (चेरी की कलम) के लिए तैयार किया जाता है'.
मौसम विशेषज्ञ ने बताया यह ‘फॉल्स स्प्रिंग’ है
मौसम विज्ञान केंद्र के वरिष्ठ वैज्ञानिक डॉ. संदीप शर्मा ने बताया, 'पहले नवंबर-दिसंबर में बर्फबारी होती थी, लेकिन पिछले 2 से 3 सालों से यह फरवरी-मार्च में हो रही है. तापमान का यह असामान्य बदलाव पौधों के जैविक चक्र (Biological Cycle) को बाधित कर रहा है. इस साल अक्टूबर-नवंबर में औसत तापमान सामान्य से 2-3 डिग्री अधिक रहा है. इससे पौधों को ‘झूठा बसंत’ (False Spring) महसूस हुआ और वे समय से पहले ही खिल उठे'.
'इन दिनों में ऐसे फूल केवल निचले और अपेक्षाकृत गर्म इलाकों में दिखते थे, लेकिन अब ठंडे इलाकों में भी पाजे के पौधों में फूल आने लगे हैं. यह जलवायु परिवर्तन का सीधा संकेत है और चिंताजनक स्थिति है':- डॉ. जितेंद्र चौहान, विभागाध्यक्ष (HOD), फल विज्ञान विभाग, डॉ. वाई.एस. परमार विश्वविद्यालय, नौणी
फलों के जैविक चक्र पर असर
- असंतुलन: अत्यधिक वर्षा के कारण मिट्टी में लंबे समय तक नमी बनी रही.
- बायोलॉजिकल भ्रम: जब अचानक तापमान बढ़ा, तो पौधों की जड़ों के नीचे की मिट्टी ठंडी और नम रही, लेकिन ऊपर की सतह पर गर्मी बढ़ गई. इस असंतुलन से पौधों का बायोलॉजिकल सिस्टम भ्रमित हो गया'.
- परिणाम: इसी कारण कई बागानों में ‘प्री-मैच्योर लीफ फॉल’ यानी समय से पहले पत्ते झड़ने की समस्या भी देखी गई.
- पारिस्थितिक संतुलन पर सीधा असर: जलवायु परिवर्तन केवल फसलों तक सीमित नहीं है. इससे पारिस्थितिक संतुलन भी प्रभावित हो रहा है.

डॉ. वाईएस परमार बागवानी एवं वानिकी विश्वविद्यालय, नौणी के असिस्टेंट प्रोफेसर डॉ. प्रमोद वर्मा ने बताया, 'जलवायु परिवर्तन केवल फसलों तक सीमित नहीं है. इससे पारिस्थितिक संतुलन भी प्रभावित हो रहा है. समय से पहले फूल आने से परागण (Pollination) का प्राकृतिक समय बिगड़ जाता है. मधुमक्खियां, तितलियां और पराग वाहक कीट सही समय पर सक्रिय नहीं होते, जिससे फलों में रूपांतरण (Fruit Setting) बाधित होता है. इससे उत्पादन घटता है और पौधों की जीवन प्रक्रिया पर दीर्घकालिक असर पड़ता है. पहले हिमाचल में नवंबर-दिसंबर में बर्फबारी आम बात थी. अब यह जनवरी के अंत या फरवरी में खिसक गई है. इस बदलाव के कारण पौधों को ‘चिलिंग आवर’ (ठंडे घंटे) कम मिल रहे हैं, जो फलदार पौधों के लिए बेहद जरूरी होते हैं'.

बागवानी क्षेत्र में बढ़ती चिंता: ऊपर खिसकती 'सेब बेल्ट'
डॉ. वाईएस परमार बागवानी एवं वानिकी विश्वविद्यालय, नौणी के कुलपति डॉ. राजेश्वर चंदेल कहते हैं, 'तापमान में असमान्य वृद्धि, अनियमित वर्षा और ‘समर प्रूनिंग’ (गर्मी में पौधों की कटाई) के कारण भी पौधों की जैविक प्रक्रिया बिगड़ रही है. पेड़ भ्रमित हो रहे हैं और मौसम को सही ढंग से पहचान नहीं पा रहे'.
वहीं, थानाधार क्षेत्र के बागवान मनोज माक्टा ने बताया, 'पिछले दो दशकों में सेब की उत्पादकता में लगभग 11% की कमी आई है. यह स्पष्ट संकेत है कि हिमाचल की बागवानी का पारंपरिक चक्र बदल रहा है'.
भविष्य में संभावित असर
यदि यही स्थिति जारी रही तो इसके गंभीर परिणाम हो सकते हैं.
- कमजोर उत्पादन: सेब की पारंपरिक किस्में जैसे रॉयल, रेड डिलीशियस का उत्पाद कमजोर पड़ेगा.
- परागण का संकट: परागण का संतुलन बिगड़ने से फलों का उत्पादन घटेगा.
- आर्थिक खतरा: हिमाचल की सेब का अर्थव्यवस्था में सालाना हजारों करोड़ का योगदान है, जो खतरे में पड़ सकती है.

विशेषज्ञों के सुझाव
डॉ. जितेंद्र चौहान, विभागाध्यक्ष (HOD), फल विज्ञान विभाग, डॉ. वाई.एस. परमार विश्वविद्यालय, नौणी का कहना है कि किसानों को अब जलवायु-अनुकूल प्रबंधन तकनीकें अपनानी होंगी.

- वैज्ञानिक पद्धति: पौधों की समर प्रूनिंग और सिंचाई के पैटर्न को वैज्ञानिक तरीके से तय करना होगा.
- मल्चिंग: नमी और तापमान संतुलन के लिए मल्चिंग (Mulching) जैसी तकनीकों को बढ़ाना होगा.
- नई किस्में: ऐसी किस्में विकसित करनी होंगी जो उच्च तापमान और कम चिलिंग आवर में भी अनुकूल रहें.
- जलवायु अनुकूल बागवानी: बागवानी को अब केवल उत्पादन नहीं, बल्कि जलवायु अनुकूलन (Climate Adaptation) के दृष्टिकोण से देखना होगा.
हम क्या गलत कर रहे हैं?
विशेषज्ञों का कहना है कि यह संकट मानव निर्मित है, पिछले कुछ दशकों में हमने अंधाधुंध निर्माण और पेड़ों की कटाई से स्थानीय जलवायु को बदला, रासायनिक उर्वरकों से मिट्टी की संरचना बिगाड़ी और कंक्रीट के फैलाव से मिट्टी की ऊष्मा (Soil Heat Balance) को असंतुलित किया. इन सभी कारणों ने मिलकर हिमाचल के पर्वतीय इलाकों की संवेदनशील पारिस्थितिकी को कमजोर कर दिया है.

समय से पहले खिलते फूलों के पीछे छिपा खतरा
पहली नजर में सर्दियों में खिले बसंती फूल खूबसूरत लग सकते हैं, लेकिन यह प्रकृति की गंभीर चेतावनी है. ग्लोबल वार्मिंग अब केवल दूर का खतरा नहीं, बल्कि हिमाचल की घाटियों और बागानों तक पहुंच चुकी हैं. अगर समय रहते ठोस कदम नहीं उठाए गए, तो आने वाले दशक में न सिर्फ सेब उत्पादन, बल्कि हिमाचल की पूरी बागवानी संस्कृति खतरे में पड़ सकती है.
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