बिहार में यहां गन्ना बिकता है तो बजती है शहनाई, ईख की फसल से तय होती है बेटियों की शादी
एक ऐसा गांव जहां की संपन्नता गन्ने की खेती पर निर्भर है, फिर चाहे बेटी की शादी हो या पढ़ाई सबका भार इसी पर है-

Published : February 20, 2026 at 6:57 PM IST
गया : बिहार के गया का बैजू धाम लकड़ाही के किसानों का साल भर का इंतजार खत्म हुआ. उनके चेहरे खिले हैं. क्योंकि उन्होंने ईख की फसल जो लगाई थी, वह अच्छी हुई है. इस सालाना फसल का लंबे समय तक इंतजार करने के बाद अब किसान ईख की कटाई और गुड़ बनाने में जुट गए हैं. उनकी मेहनत इन दिनों बढ़ी हुई है, क्योंकि उन्हें ईख की कमाई से अपनी बिटिया की शादी जो करनी है. यहां ईख की अच्छी फसल का मतलब है घर में शहनाई बजना, बच्चों की पढ़ाई का खर्च निकलना और साल भर की आर्थिक चिंताओं का दूर होना.
ईख बिकेगी तो तय होगी शादी की तारीख : गांव के बुजुर्ग बताते हैं कि यहां एक पुरानी कहावत है कि- 'जब गन्ना बिकेगा तभी शादी की तारीख तय होगी.' सैकड़ों किसान अपनी बेटियों की शादी के लिए ईख की खेती पर निर्भर रहते हैं. यदि फसल अच्छी हो जाए तो खुशी दोगुनी होती है, लेकिन यदि मौसम या बीमारी से फसल खराब हो जाए तो शादी तक टालनी पड़ जाती है. इस साल सैकड़ों एकड़ में लगी फसल अच्छी हुई है और इसी कारण गांव में उत्साह का माहौल है.
60 साल की उम्र में भी खेत में जुटे सुरेश : 60 वर्षीय किसान सुरेश यादव सुबह से ही ईख काटने में लगे हैं. सिर पर बंधी गमछा और हाथों में दरांती लिए वे तेजी से गन्ने काटते हैं. वे बताते हैं कि पिछले साल माघ में कई कट्ठे में ईख लगाई थी. अब फसल तैयार है और वैशाख में बेटी की शादी करनी है. वे कहते हैं कि ईख बेचने के साथ-साथ गुड़ भी बनाते हैं ताकि कमाई बढ़ सके. लाखों की आमदनी की उम्मीद है और इस बार बिटिया की शादी बिना रुकावट के होगी.

''इस बार अच्छी फसल हुई है. कई काम निपटाने हैं, जिसमें अपनी बेटी की भी शादी का काम है. ईख की फसल काटकर उसे बेचना है और बेचकर पैसे जमा कर रहा हूं. ईख से गुड़ भी बना लेता हूं. लाखों की कमाई हो जाएगी. बिटिया की शादी में कोई दिक्कत नहीं होगी.''- सुरेश यादव, गन्ना किसान
एक बीघा की फसल से साल भर की योजना : दीनानाथ यादव बताते हैं कि ईख की खेती माघ में रोपी जाती है और पूरे 12 महीने बाद माघ-फाल्गुन में कटाई शुरू होती है. उन्होंने एक बीघा में खेती की है और इस बार उपज अच्छी है. वे कहते हैं कि ईख नकदी फसल है और इसी से घर का सालाना बजट बनता है. बेटी की शादी, बेटे-बेटी की पढ़ाई, घर का खर्च और खेती की तैयारी सब इसी आमदनी से तय होती है. यदि फसल खराब हो जाए तो पूरे साल की योजना प्रभावित हो जाती है.

''गन्ने की कटाई कर हम लोग साल भर का इंतजाम कर लेते हैं. हमें अपनी बेटी की शादी करनी है. घर में शहनाई तभी बाजेगी, जब ईख बेचकर पैसे जुटाएंगे. इसी को लेकर हम लोग ईख की कटाई में जुटे हुए हैं.''- दीनानाथ यादव, गन्ना किसान
पुश्त दर पुश्त चल रही ईख की परंपरा : बैजू धाम लकड़ाही गांव को ईख वाला गांव भी कहा जाता है. यहां पांचवीं, छठी और सातवीं पीढ़ी तक के किसान ईख की खेती कर रहे हैं. ग्रामीण बताते हैं कि 400 से 500 सालों से यहां यह परंपरा जारी है. सैकड़ों किसान आज भी सैकड़ों एकड़ में ईख लगाते हैं. धान और गेहूं की तुलना में ईख ज्यादा आमदनी देती है और नकद पैसा तुरंत उपलब्ध कराती है.

गन्ना भी बिकता है, गुड़ भी बनता है : गांव में जगह-जगह पेराई मशीनें लगी हैं. ईख का रस निकालकर बड़े चूल्हों पर उबाला जाता है और शुद्ध गुड़ तैयार किया जाता है. किसानों के अनुसार यदि सही मेहनत की जाए तो एक कट्ठा में कम से कम 10 हजार रुपये की बचत संभव है. एक एकड़ में तीन से चार लाख रुपये तक की आमदनी हो सकती है. इस समय शुद्ध गुड़ 150 रुपये प्रति किलो तक बिक रहा है.

देश-विदेश जाती है गन्ने की मिठास : किसान बिट्टू कुमार बताते हैं कि उन्होंने 8 से 10 बीघा में ईख लगाई है. इस बार लाखों की कमाई का अनुमान है. यहां तैयार होने वाला गुड़ यूपी, बंगाल और नेपाल तक जाता है. व्यापारी दूर-दूर से खरीदारी करने आते हैं. गन्ने की कमाई से जमीन खरीदी गई है और घर में शादी विवाह जैसे शुभ कार्य पूरे हुए हैं.

''ईख की खेती से ही हम लोग जीवित है. हम लोग पलायन नहीं करते हैं. क्योंकि हमारे पास एक दो माह का नहीं बल्कि सालाना रोजगार है. हमारे यहां 100 से अधिक एकड़ में ईख की खेती सैंकड़ों किसान कर रहे हैं.''- बिट्टू कुमार, गन्ना किसान
सालाना रोजगार से नहीं होता पलायन : ग्रामीणों का कहना है कि ईख की खेती ने गांव में पलायन को काफी हद तक रोका है. यह सालाना फसल है और कम मेहनत में बेहतर आमदनी देती है. एक बार रोपाई के बाद तीन चार बार सिंचाई और देखरेख की जरूरत होती है. बाकी समय किसान अन्य काम भी कर लेते हैं.

चीनी मिल बंद होने से बदला परिदृश्य : कभी गया जिले के गुरारू में चीनी मिल थी, जिससे आसपास के किसान सीधे गन्ना बेचते थे. लेकिन मिल बंद होने के बाद किसानों को निजी स्तर पर गुड़ निर्माण और व्यापार पर निर्भर रहना पड़ा. हालांकि सरकार की ओर से फिर से चीनी मिल खोलने की चर्चा से किसानों में उम्मीद जगी है.

ईख की मिठास से बदलती तकदीर : बैजू धाम लकड़ाही में ईख सिर्फ खेती नहीं, बल्कि जीवन का आधार है. साल भर के इंतजार और मेहनत के बाद जब फसल कटती है तो उसी कमाई से बेटी की शादी, बेटे की पढ़ाई और घर की खुशहाली तय होती है. इस बार अच्छी फसल ने गांव में नई उम्मीद और नई मिठास घोल दी है.
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