बिहार का मशरूम पहाड़, दो दोस्तों की अनोखी कलाकारी, जिसे देखकर हैरान हो जाते हैं लोग
बाबा दशरथ मांझी की विरासत को दो दोस्तों ने छेनी-हथौड़ी से आगे बढ़ाया. वीरान पहाड़ पर लिख दिया नया इतिहास. गया से रत्नेश की रिपोर्ट

Published : May 23, 2026 at 8:28 PM IST
|Updated : May 24, 2026 at 1:48 PM IST
गयाजी: बिहार के गया की इसी पावन धरती पर कभी 'माउंटेन मैन' बाबा दशरथ मांझी ने अकेले अपने दम पर पहाड़ का सीना चीरकर इतिहास रचा था. ठीक उसी अदम्य साहस और जिद की विरासत को आगे बढ़ाते हुए गया के ही दो गरीब मजदूर दोस्तों ने अपने हाथों से वह कर दिखाया है, जिसे देखकर पूरी दुनिया दंग रह गई है.
छेनी-हथौड़ी से रचा एक नया इतिहास: इन दो जिगरी दोस्तों ने आधुनिक मशीनों को पीछे छोड़ते हुए सिर्फ अपनी साधारण छेनी और हथौड़ी के बल पर पहाड़ की एक बेहद विशाल और अदम्य चट्टान को तराश दिया है. उन्होंने अपनी दिन-रात की कड़ी तपस्या से इस कठोर पत्थर को एक बेहद खूबसूरत मशरूम का रूप दे दिया है, जो आज इतिहास बन चुका है.
'मशरूम पहाड़' के नाम से मशहूर: दोनों साधारण दोस्तों के इसी बेजोड़ हुनर और अटूट दोस्ती की बदौलत यह इलाका आज पूरे क्षेत्र में 'मशरूम पहाड़' के नाम से बेहद लोकप्रिय हो गया है. हाथों से गढ़ी गई दोस्ती की इस नायाब और जीवंत कलाकृति को साक्षात अपनी आँखों से देखने के लिए अब लोग यहाँ दूर-दराज से खिंचे चले आ रहे हैं.
राहगीर हो जाते हैं हैरान: दरअसल यह पूरी भावुक कर देने वाली कहानी गया जिला मुख्यालय से करीब 60 से 65 किलोमीटर की दूरी पर स्थित अतरी प्रखंड के छोटे से कचहरा गांव से जुड़ी हुई है. जेठियन-राजगीर मार्ग में अरई गांव के पास स्थित पहाड़ी के किनारे मशरूम के आकार की चट्टान है, जिसे देखकर राहगीर हैरान हो जाते हैं.
कचहरा गांव की बदल गई तकदीर: अतरी प्रखंड के अंतर्गत आने वाला यह कचहरा गांव पहले एक बिल्कुल अनजान और गुमनाम सा इलाका था, जिसकी अपनी कोई विशेष पहचान नहीं थी. लेकिन इन दोस्तों की बदौलत आज इस गांव की तकदीर बदल गई है.
पर्यटकों के लिए बना नया स्टॉप: सालों से घोर गुमनामी का दंश झेल रहे इस छोटे से गांव की आज इन दोनों दोस्तों की बदौलत पूरे क्षेत्र में एक बेहद खास और ऐतिहासिक पहचान बन चुकी है. आज यहां से गुजरने वाले दूर-दूर के लोग इस अनोखी कलाकृति और दोनों दोस्तों की मेहनत को नमन करने के लिए जरूर रुकते हैं.

शौकी और विनोद की जोड़ी: कचहरा गांव को यह नई पहचान दिलाने का पूरा श्रेय यहां के दो परम मित्रों को जाता है, जिन्होंने अपनी गरीबी को हुनर के आगे झुका दिया. कचहरा गांव के रहने वाले ये दो दोस्त शौकी राजवंशी और विनोद मांझी करीब एक दशक से अधिक समय पहले पहाड़ पर पत्थर तोड़ने का काम करते थे.
ठेकेदार के लिए पसीना बहाते थे दोनों: दरअसल पहले के समय में गया के इस पहाड़ी क्षेत्र में पत्थरों को तोड़ने के लिए बकायदा सरकारी या निजी पट्टा हुआ करता था, जिसके तहत ठेकेदारों द्वारा काम कराया जाता था. ये दोनों दोस्त भी पहले अपने ठेकेदार के अंतर्गत पहाड़ों की भीषण गर्मी और कड़ाके की ठंड में जाकर रोज़ पत्थर तोड़ने की हाड़-तोड़ मजदूरी करते थे.
विशालकाय चट्टान की चुनौती: पत्थर तोड़ने के दौरान एक दिन इन दोनों दोस्तों का सामना पहाड़ की एक बेहद विशाल और जिद्दी चट्टान से हुआ. ठेकेदार के द्वारा इन दोनों मजदूर दोस्तों शौकी राजवंशी और विनोद मांझी को इसी बड़े, मजबूत और अदम्य चट्टान को पूरी तरह तोड़कर हटाने का काम सौंपा गया था.
पत्थर से टकराई दोनों की जिद: वह विशाल चट्टान करीब 6 फीट से भी ज्यादा ऊंचा और चौड़ाई में भी इतना ही विशाल था, जो अपनी मजबूती के कारण साधारण प्रहारों से गिर नहीं रहा था. घाना, रड, छेनी और हथौड़ी के सहारे दोनों दोस्त दिन-रात इस विशाल चट्टान को तोड़ने के काम में अपनी पूरी शारीरिक ताकत से जुट गए थे.
मजदूरों के सीने में धड़का कलाकार: दोनों मूल रूप से पेट पालने वाले मजदूर जरूर थे, लेकिन सालों तक लगातार पत्थरों की कारीगरी करते-करते वे एक बेहद संवेदनशील कलाकार भी बन चुके थे. पत्थरों को रोज़ तोड़ने और उन्हें अलग-अलग कोणों से गढ़ने का काम करते रहने की वजह से यह अनूठी कलाकारी उनके भीतर अपने आप समा गई थी.

चट्टान को अमर बनाने का ख्याल: उस विशाल चट्टान की मजबूती और सुंदर प्राकृतिक बनावट को देखकर इन दो दोस्तों के मन में अचानक एक अनोखा और दिलचस्प ख्याल जागा. उन्होंने सोचा कि क्यों न इसे पूरी तरह नष्ट करने के बजाय एक ऐसा रूप दे दिया जाए, जो इसे खूबसूरत बना दे और पर्यटकों और आम लोगों को लुभाए.
मजदूरी के समय से निकाला वक्त: चट्टान को मशरूम का रूप देने का विचार जेहन में आते ही दोनों दोस्तों ने अपने दैनिक मजदूरी के काम में से रोज़ थोड़ा-थोड़ा समय चुराना शुरू कर दिया. वे अपनी रोज़ की मजदूरी पूरी करने के बाद बचे हुए समय में रोज इस विशाल पत्थर को अपनी छेनी से तराशते थे.
मेहनत से खिला पत्थरों पर मशरूम: इन दोनों दोस्तों के जेहन में इस विशाल चट्टान को एक खूबसूरत मशरूम के रूप में तराशने का सपना था, आखिरकार सालों की बेहद कठिन और निस्वार्थ मेहनत के बाद ऐसा ही हुआ और उन्होंने उस विशाल चट्टान को मशरूम की शक्ल में तराश दिया.
दोस्ती की अमिट छाप: यह स्थान अब इसलिए भी बेहद फेमस और खास हो रहा है क्योंकि यह पूरा पहाड़ी क्षेत्र ऐतिहासिक और पवित्र बौद्ध सर्किट से सीधे तौर पर जुड़ा हुआ है. बौद्ध सर्किट आने-जाने वाले देश-विदेश के तमाम श्रद्धालु और पर्यटक मुख्य रूप से अपनी यात्रा के दौरान इन्हीं रास्तों का उपयोग करते हैं.

पर्यटक होते हैं हैरान: इस मार्ग से गुजरने वाले विदेशी और स्थानीय पर्यटक एकबारगी इस अद्भुत मशरूम शेप वाले चट्टान को देखकर रास्ते में ही कौतूहलवश रुक जाते हैं. एक विशाल और कठोर चट्टान को इतने खूबसूरत रूप में मशरूम की शक्ल में पिरोया जा सकता है, यह सोचकर पर्यटकों को भारी आश्चर्य होता है.
सुनसान पहाड़ी अब हमेशा गुलजार: जो स्थान पहले कभी पूरी तरह से सुनसान, डरावना और वीरान पड़ा रहता था, वह आज इन दोनों दोस्तों की बदौलत हमेशा लोगों की चहल-पहल से गुलजार रहने लगा है. अब तो यहां सुबह और शाम के वक्त इस अनोखी कलाकृति को निहारने और शांति महसूस करने के लिए आम लोगों की भारी भीड़ लगी रहती है.
बढ़ रही है रौनक: इस मशरूम रूपी चट्टान को दीदार के लिए कोई सपरिवार यहां पहुंचता है, तो देश-विदेश से आने वाले पर्यटकों का आना भी लगातार यहां जारी रहता है. इसके अलावा स्थानीय ग्रामीण रोजाना ही घूमते-फिरते आराम से सुकून के पल बिताने यहां तक चले आते हैं.
युवाओं का पसंदीदा सेल्फी प्वाइंट: छेनी-हथौड़ी से तराशा गया मशरूम का यह शेप अब इस पूरे इलाके में युवाओं और राहगीरों के लिए एक बेहद शानदार और पसंदीदा सेल्फी प्वाइंट बन चुका है. इस मशरूम शेप वाले डिजाइन के कारण यहां छोटी-मोटी वीडियो शूटिंग और एलबम की शूटिंग करने के लिए भी स्थानीय कलाकार आने लगे हैं.
रील्स का लगा है तांता: यहां सोशल मीडिया के लिए रील्स बनाने वाले डिजिटल क्रिएटर्स की भी भारी भीड़ लगती है. राजगीर पहाड़ी के सीने में यह मशरूम जैसा शेप चट्टान को काटकर बनाया गया है, इसलिए लोग पहाड़ के नजारे के साथ इसका आनंद लेना नहीं भूलते.
राहगीर भी लेते हैं आनंद: चट्टान का बना यह मशरूम देखने में इतना ज्यादा सुंदर और आकर्षक लगता है कि इस मार्ग से गुजरने वाले अनजान राहगीर भी यहां रुकना बिल्कुल नहीं भूलते. कलाकारी का यह बेजोड़ नमूना हर किसी को ठहरने और उन दोस्तों के हुनर को सम्मान देने के लिए मजबूर कर देता है.
दोस्ती का साया: जिस स्थान पर इन दोनों दोस्तों ने यह कलाकृति बनाई है, ठीक वहीं पहले से एक बहुत ही विशाल और प्राचीन बरगद का पेड़ मौजूद है. इस विशाल बरगद की ठंडी, घनी छांव और हाथों से गढ़े गए इस मशरूम का खूबसूरत नजारा यहां आने वाले हर इंसान के मन को पूरी तरह मोह लेता है.

ग्रामीणों ने की सफाई: लोगों के यहां लगातार और बड़ी संख्या में पहुंचने के बीच स्थानीय ग्रामीणों ने भी आगे बढ़कर अपनी सामाजिक जिम्मेदारी को बहुत बखूबी निभाया है. स्थानीय लोगों ने मिलकर इस स्थल के आसपास उगी जंगली और कंटीली झाड़ियों को पूरी तरह साफ कर इस रास्ते को पहले से काफी बेहतर बनाया है.
पर्यटकों की राह बनाने में जुटे ग्रामीण: कचहरा गांव के लोगों द्वारा की गई इस बेहतरीन साफ-सफाई का मुख्य उद्देश्य यही है कि यहां आने वाले देश-विदेशी मेहमानों को किसी प्रकार की मुश्किलें न हों. इस सुनसान जगह को अब ग्रामीणों ने पर्यटकों के बैठने और घूमने के लिए पूरी तरह सुरक्षित और अनुकूल बना दिया है.
कलाकार का अटूट आत्मविश्वास:अपनी अधूरी शिक्षा और कला के प्रति अपने अटूट जुनून को बयां करते हुए इस बेजोड़ कला के निर्माता विनोद मांझी गर्व से भावुक होकर कहते हैं कि मैं भले ही केवल नौंवी पास हूं, पर पत्थरों को आकार देने की यह बेहतरीन कलाकारी हमें भी आती है.
"हम कम पढ़े-लिखे ज़रूर हैं, किंतु भगवान की दी हुई अनोखी प्रतिभा हमारे पास भी मौजूद है. पहाड़ का सीना चीरने वाले महान बाबा दशरथ मांझी ही हमारे सबसे बड़े प्रेरणा स्रोत हैं, जिन्हें देखकर हमने यह जिद ठानी थी." - विनोद मांझी, मशरूम पहाड़ के निर्माता
माउंटेन मैन की तरह देखा सपना: बाबा दशरथ मांझी के नक्शेकदम पर चलने वाले कलाकार विनोद मांझी के दिल में अपने हुनर को लेकर एक बहुत ही पवित्र और बड़ा सपना छुपा है. विनोद मांझी बड़े गर्व से कहते हैं कि बाबा दशरथ मांझी को पर्वत पुरुष कहा जाता है और हम भी चाहते हैं कि बाबा दशरथ मांझी की तरह पूरी दुनिया में नाम कमाएं।

बाबा के हौसले ने दिखाई राह: गया की इसी धरती पर जन्मे माउंटेन मैन के अदम्य साहस को याद करते हुए विनोद मांझी का सीना अपने पूर्वज की याद में गर्व से चौड़ा हो जाता है. विनोद मांझी आगे कहते हैं कि बाबा ने छेनी-हथौड़ी से पहाड़ को तोड़कर रास्ता बना दिया था, तो हम लोगों के भी मन में विचार आया कि हम क्यों नहीं कुछ कर सकते.
दुनिया छोड़ गया जिगरी दोस्त: अपनी इस अमर कलाकृति की शुरुआत की कहानी को याद करते हुए विनोद मांझी के शब्द बेहद भावुक हो जाते हैं. आंखे अपने परम मित्र की याद में नम हो जाती हैं. विनोद मांझी बड़े ही दुखी और टूटे हुए मन से बताते हैं कि आज हमारा वह प्यारा दोस्त शौकी राजवंशी हमारे साथ इस दुनिया में जीवित नहीं रहा.
10 साल पहले टूट गई दो जोड़ी: इस मशरूम पहाड़ को अपने खून-पसीने से सींचने वाले साथी शौकी राजवंशी का साथ विनोद से बहुत पहले ही हमेशा-हमेशा के लिए छूट गया था. विनोद बताते हैं कि करीब 10 साल पहले ही मेरे जिगरी दोस्त शौकी की अचानक मौत हो गई थी और मैं अकेला रह गया.
दोस्त की यादों को बनाया अमर: भले ही शौकी आज इस दुनिया में नहीं है, लेकिन विनोद ने अपनी दोस्ती और उनके योगदान को इस मशरूम पत्थर के रूप में हमेशा के लिए अमर कर दिया है.
"शौकी दुनिया में नहीं है, पर उसने भी इसमें काफी मेहनत की और उसका बहुत बड़ा योगदान रहा, जिसे मैं कभी नहीं भूल सकता." - विनोद मांझी, मशरूम पहाड़ के निर्माता
15 वर्ष पुराना है दोस्तों का इतिहास: बंजर पहाड़ी के बीच इतनी सुंदर कलाकृति बनाने का विचार पूरी तरह से इन दोनों साधारण और गरीब मजदूरों की अपनी खुद की कल्पना थी. विनोद मांझी के अनुसार करीब 15 वर्ष पहले हम दोनों दोस्तों ने मिलकर इस विशाल चट्टान को काटकर यह अनोखा मशरूम शेप का आकार दिया था.
"इस चट्टान की बनावट को देखकर हम दोनों दोस्तों को यह आइडिया आया था कि क्यों न इसे ऐसा खूबसूरत आकार दिया जाए कि लोग देखते रह जाएं." -विनोद मांझी, मशरूम पहाड़ के निर्माता
आई थीं भारी मुश्किलें: विनोद बताते हैं कि शुरुआती दिनों में जब वे ठेकेदार के काम पर इस पहाड़ पर आए, तो यह एक बहुत ही बड़ा और टेढ़ा-मेढ़ा चट्टान था, जिसे काटना नामुमकिन लग रहा था. इस भारी चट्टान को साधारण औजारों से तोड़ने में दोनों दोस्तों को बहुत ज्यादा मुश्किल आ रही थी और वह पत्थर टस से मस नहीं हो रहा था.
कई औजारों की जुगलबंदी: इस कठिन और असंभव से दिखने वाले लक्ष्य को हासिल करने के लिए दोनों दोस्तों ने रोजाना अपने काम के बाद विशेष प्रयास किया. दोनों ने छेनी, हथौड़ी, घाना और रड के सहारे प्रतिदिन घंटों अतिरिक्त मेहनत की और तब जाकर यह अद्भुत मशरूम शेप पूरी तरह तैयार हुआ.
ऊपरी हिस्से को तराशना रहा मुश्किल: चट्टान के निचले हिस्से को गोल करने के साथ-साथ उसके सबसे मुख्य भाग यानी छतरी को खूबसूरत बनाना उनके जीवन की सबसे कठिन परीक्षा थी. मशरूम के ऊपरी हिस्से को भी बिल्कुल असली मशरूम जैसा सटीक और गोल आकार देने में दोनों को दिन-रात बेहद भारी अतिरिक्त मेहनत करनी पड़ी थी.
साथ से सफलता ने चूमे कदम: इस असंभव से दिखने वाले भगीरथ प्रयास को दोनों दोस्तों ने अपनी बेजोड़ कलात्मक जुगलबंदी और आपसी एकता के दम पर अंततः मुमकिन कर दिखाया. दोनों ने बिना थके हमेशा मिलजुल कर एक साथ इस पत्थर पर काम किया और अंततः वे इस चट्टान को मशरूम शेप में दुनिया के सामने लाने में सफल रहे.
इस चमत्कार को सैल्यूट: इस मार्ग से नियमित रूप से गुजरने वाले राहगीर और पर्यटक भी इस कला को साक्षात देखकर अपनी गहरी संवेदनाएं और प्रतिक्रिया देने से खुद को रोक नहीं पाते. राजगीर की ओर से आ रहे राहगीर सुधीर कुमार बताते हैं कि वे पिछले 15 साल से इस अद्भुत कलाकृति को खड़े देख रहे हैं.हर यात्रा में रुककर सैल्यूट करते हैं.
"हम जब भी किसी काम से निकलते हैं या गया की ओर जाते हैं, तो यहां पर जरूर रुकते हैं, क्योंकि इसका स्वरूप देखते ही बनता है."- सुधीर कुमार, यात्री
गांव का गौरव: कचहरा गांव के ही एक अन्य युवा स्थानीय निवासी ने इस मशरूम पहाड़ के लंबे इतिहास और अपने गांव के इस गौरवशाली क्षण पर अपनी यादों को साझा किया. हम 15 साल से इसे देख रहे हैं, यह बहुत अच्छा और खूबसूरत है.
शाम ढलते ही उमड़ती है भीड़: इस खूबसूरत जगह पर सूरज डूबते ही लोगों की चहल-पहल और प्रकृति का आनंद लेने वालों का आगमन बहुत ज्यादा बढ़ जाता है. स्थानीय निवासी आकाश कुमार बताते हैं कि यह कलाकृति अब काफी मशहूर हो गई है और यहां विशेष रूप से शाम के समय काफी भारी भीड़ हो जाती है. महिला, पुरुष और बच्चों का तांता लग जाता है.
"कचहरा के ही लोगों ने यह बनाया है और यह अनोखा रूप दिया है, जिससे हमें अपने गांव पर बहुत गर्व होता है. हमें भी अच्छा लगता है कि यहाँ हमारे गांव के आसपास लोग आने लगे हैं और रुकने लगे हैं."- आकाश कुमार, स्थानीय युवक
सरकार से आस: इस जगह की लगातार बढ़ती लोकप्रियता और प्रतिदिन जुटने वाली भारी भीड़ को देखते हुए अब ग्रामीण और पर्यटक प्रशासन के सामने अपनी मांग रख रहे हैं. ग्रामीण कहते हैं कि इस ऐतिहासिक स्थान का अब राजकीय स्तर पर विकास होना चाहिए.
पर्यटन स्थल बनने की है काबिलियत: यह पूरा इलाका प्राकृतिक रूप से बेहद समृद्ध, शांत और राजगीर की खूबसूरत तथा ऐतिहासिक पहाड़ियों के बिल्कुल पास स्थित है. इस कारण यदि प्रशासन थोड़ा ध्यान दे, तो ऐतिहासिक बौद्ध सर्किट के पास स्थित इस क्षेत्र को पर्यटकों के लिए एक बेहतरीन और मनमोहन स्थल के रूप में विकसित किया जा सकता है.
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