SPG या शॉपकीपर..कौन है पीएम मोदी को झालमुड़ी खिलाने वाला? 24 घंटे में ही बदल गई किस्मत
पश्चिम बंगाल के झारग्राम में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को झालमुड़ी खिलाने वाला कौन है? जिसकी 24 घंटे में ही बदल गई किस्मत. पढ़ें-

Published : April 22, 2026 at 7:45 PM IST
गया : कभी गरीबी और बेरोजगारी से जूझता बिहार का एक साधारण युवक, आज देशभर की सुर्खियों में है. वजह, उसकी मेहनत के साथ-साथ वह एक खास पल है, जब देश के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी खुद ग्राहक बनकर उसकी छोटी सी दुकान पर पहुंचे और उससे झालमुड़ी खाई. यह कहानी है गया जिले के मनमाधो गांव के विक्रम साव की, जिसकी जिंदगी एक दिन में नहीं बदली, बल्कि वर्षों के संघर्ष के बाद मिले एक मौके ने उसे इंटरनेशनल पहचान दिला दी.
कैसे एक मुलाकात ने बदल दी कहानी : पश्चिम बंगाल में चुनाव के बीच कोलकाता में एक सामान्य सा दिन था. लोगों की भीड़ थी, तभी एक दुकान पर पीएम मोदी झालमुड़ी खरीदने पहुंचते हैं. झालमुड़ी की दुकान पर पीएम मोदी का पहुंचना किसी फिल्मी सीन से कम नहीं था.
जब 'ग्राहक' बनकर आए प्रधानमंत्री : जब पीएम मोदी ने विक्रम साव की दुकान पर जाकर झालमुड़ी खाने की इच्छा जताई, तो वहां मौजूद हर व्यक्ति हैरान रह गया. झालमुड़ी दुकानदार विक्रम साव ने भी शायद सपने में नहीं सोचा होगा कि उसका ग्राहक देश का प्रधानमंत्री होगा.
विक्रम और पीएम के बीच वायरल डायलॉग : इस दौरान दोनों के बीच हल्की-फुल्की बातचीत भी हुई, जिसने इस घटना को और खास बना दिया. जब विक्रम ने पूछा कि- ''प्याज डालें, आप प्याज खाते हैं.." तो पीएम ने मुस्कुराते हुए कहा-''हां...प्याज खाते हैं, दिमाग नहीं खाते हैं.'' यह संवाद सोशल मीडिया पर तेजी से वायरल हो गया और देखते ही देखते विक्रम देशभर में चर्चा का विषय बन गया.
मनमाधो गांव में 'पर्व' जैसा माहौल : जैसे ही यह खबर बिहार के गया जिले के टनकुप्पा प्रखंड स्थित मनमाधो गांव पहुंची, वहां खुशी की लहर दौड़ गई. क्योंकि झालमुड़ी दुकानदार विक्रम साव गया के मनमाधो का रहने वाला था. इस वायरल वीडियो को देखकर गांव के लोग गर्व से भर उठे कि उनके गांव का एक साधारण युवक, प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के साथ दिखा और मोदी ने उससे झालमुड़ी खरीदी. गांव के लोग इस घटना से काफी गदगद हैं.

गांव में खुशी की लहर : गांव के बच्चे, बुजुर्ग और महिलाएं हर-कोई इस घटना को अपने तरीके से जी रहा है. कोई वीडियो बार-बार देख रहा है, तो कोई विक्रम के बचपन की बातें याद कर रहा है. ग्रामीणों का कहना है कि यह सिर्फ विक्रम की नहीं, बल्कि पूरे गांव की उपलब्धि है. माहौल ऐसा है जैसे गांव में कोई बड़ा त्योहार आ गया हो.
''प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के विक्रम की दुकान पर भुंजा खाने और इस क्रम में संवाद के बाद जो वीडियो सामने आ रहे हैं, उसके बाद मनमाधो गांव में काफी हर्ष का माहौल है. लोगों में काफी उत्साह है. हर कोई इसकी चर्चा कर रहा है. गांव ही नहीं, बल्कि पूरे देश में विक्रम की चर्चा हो रही है.''- रामजी यादव, ग्रामीण

गरीबी ने रोकी पढ़ाई : विक्रम साव की कहानी सिर्फ इस एक घटना तक सीमित नहीं है. इसके पीछे संघर्ष का लंबा इतिहास है. विक्रम का परिवार आर्थिक रूप से कमजोर रहा. उनके पिता पहले से ही कोलकाता में झालमुड़ी बेचते थे. गांव में रोजगार के सीमित अवसर और बढ़ती जिम्मेदारियों के चलते विक्रम की पढ़ाई नौवीं कक्षा के बाद ही छूट गई.
10 साल पहले संभाला पिता का काम : कम उम्र में ही उसे यह समझ आ गया कि अब पढ़ाई से ज्यादा जरूरी है परिवार का सहारा बनना. यही कारण था कि करीब 10 साल पहले वह भी कोलकाता चला गया और अपने पिता के साथ झालमुड़ी का काम संभालने लगा.
In between four rallies across West Bengal on a packed Sunday, had some delicious Jhalmuri in Jhargram. pic.twitter.com/NEKLm5R0mE
— Narendra Modi (@narendramodi) April 19, 2026
''विक्रम के पिता उत्तम साव पहले से ही झालग्राम में झालमुड़ी बेचते थे. 10 साल पहले से विक्रम भी झालमुड़ी बेच रहा है. हमारे गांव में कोई रोजगार नहीं था. हम लोगों का पूरा परिवार गरीबी मुफलिसी में रहा है. गरीबी के कारण ही विक्रम साव की भी पढ़ाई छूट गई. नवमी तक ही वह पढ़ सका. अब झालमुड़ी बेचकर अपना भविष्य संवार रहा है.''- शंकर साव, विक्रम साव के चाचा
पुश्तैनी पेशा बना पहचान का जरिया : विक्रम का परिवार पीढ़ियों से झालमुड़ी बेचने का काम करता आया है. बिहार के कई परिवारों की तरह उनका भी जीवन इस छोटे व्यवसाय पर निर्भर रहा है. बंगाल को झालमुड़ी प्रेमियों की धरती कहा जाता है. यहां यह सिर्फ एक स्नैक नहीं, बल्कि संस्कृति का हिस्सा है.

बिक्रम बिहार से बंगाल कैसे पहुंचे? : इस सवाल का जवाब देते हुए गांव के बुजुर्ग रामजी यादव बताते हैं कि बंगाल झालमुड़ी का शौकीन है और यहां पर 75 फीसदी से ज्यादा लोग झालमुड़ी खाते हैं. इस बात को भुजा कारोबारी भी जानते हैं इसलिए उन्हें सटीक मंडी के रूप में बंगाल नजर आता है.
बेहतर कमाई की उम्मीद में बंगाल का रुख : यही वजह है कि बिहार के कई लोग बेहतर कमाई की उम्मीद में बंगाल का रुख करते हैं. विक्रम ने भी इसी परंपरा को आगे बढ़ाया और अपने मेहनत और व्यवहार से ग्राहकों का विश्वास जीता. शायद यही वजह रही कि उसकी दुकान पर हमेशा भीड़ रहती थी.
गांव वालों की नजर में 'हीरो' बन गया विक्रम : मनमाधो गांव में आज हर कोई विक्रम की चर्चा कर रहा है. उसके दोस्त बताते हैं कि वह बचपन से ही मेहनती और थोड़ा शरारती भी था. कभी आम तोड़ने जाना, कभी मछली पकड़ना—उसकी बचपन की यादें आज लोगों के चेहरों पर मुस्कान ला रही हैं.

''10 साल से विक्रम कोलकाता में रह रहा है और झालमुड़ी की दुकान संचालित कर रहा है. वह तीन बहनों में इकलौता भाई है. बहुत अच्छा लग रहा है कि उसकी दुकान में पीएम पहुंचे.''- पवन कुमार, विक्रम के दोस्त
परिवार के लिए गर्व का पल : विक्रम के चाचा और अन्य परिजन इस घटना को किसी चमत्कार से कम नहीं मानते. उनका कहना है कि एक गरीब परिवार के लिए यह किसी सपने के सच होने जैसा है. परिवार के लोग बताते हैं कि जब उन्होंने पहली बार टीवी और मोबाइल पर यह वीडियो देखा, तो उन्हें विश्वास ही नहीं हुआ. लेकिन जब पुष्टि हुई कि वह उनका ही बेटा है, तो खुशी का ठिकाना नहीं रहा.
बंगाल क्यों बनता है ऐसे कारोबारियों की मंजिल : ग्रामीणों के अनुसार, बंगाल में झालमुड़ी का बहुत बड़ा बाजार है. यहां के लोग इसे बड़े चाव से खाते हैं. यही वजह है कि बिहार और आसपास के इलाकों के लोग वहां जाकर इस व्यवसाय में जुड़ते हैं. यह एक ऐसा काम है जिसमें कम पूंजी लगती है, लेकिन मेहनत और व्यवहार से अच्छी कमाई की जा सकती है. विक्रम इसका जीता-जागता उदाहरण बन गया है.

सोशल मीडिया ने बढ़ाई पहचान : इस पूरी घटना में सोशल मीडिया की भूमिका भी अहम रही. जैसे ही वीडियो वायरल हुआ, देशभर के लोग विक्रम के बारे में जानने लगे. कई लोग उसकी तारीफ कर रहे हैं, तो कई उसकी किस्मत की चर्चा कर रहे हैं. कुछ लोग इसे 'मेहनत और किस्मत का मेल' बता रहे हैं.
'पैसे नहीं, आशीर्वाद समझकर रख लिया' : घटना के दौरान एक और बात जिसने लोगों का ध्यान खींचा, वह थी विक्रम का व्यवहार. जब पीएम मोदी ने झालमुड़ी खाने के बाद पैसे देने चाहे, तो विक्रम ने मना कर दिया. लेकिन प्रधानमंत्री ने आग्रह करते हुए पैसे दिए. इस पर गांव के लोग कहते हैं कि यह सिर्फ पैसे नहीं, बल्कि आशीर्वाद है, जिसे विक्रम ने स्वीकार किया.
''वह पैसे नहीं ले रहा था. किंतु फिर आशीर्वाद समझकर रख लिया. विक्रम साव बचपन में नटखट भी था. वह कभी मछली मारने तो कभी ईमली तोड़ने, तो कभी आम तोड़ने चला जाता था. हालांकि व्यवहार में वह पूरी तरह सादगी अपनाता था. वह पढ़ने में भी काफी मेधावी छात्र था. किंतु गरीबों के कारण उसकी पढ़ाई छूट गई.''- अनिल कुमार, ग्रामीण, मनमाधो गांव

गांव के विकास की उम्मीद भी जगी : इस घटना के बाद मनमाधो गांव के लोग अब विकास की उम्मीद भी कर रहे हैं. ग्रामीणों का कहना है कि अगर सरकार का ध्यान इस गांव की ओर जाए, तो यहां की स्थिति बेहतर हो सकती है. सड़क, शिक्षा और रोजगार जैसी सुविधाओं की जरूरत यहां लंबे समय से महसूस की जा रही है.
संघर्ष से सफलता तक का संदेश : विक्रम साव की कहानी सिर्फ एक वायरल वीडियो नहीं है, बल्कि यह उन लाखों युवाओं के लिए प्रेरणा है जो छोटे काम को छोटा समझते हैं. यह कहानी बताती है कि कोई भी काम छोटा नहीं होता और मेहनत करने वाला व्यक्ति कभी भी पहचान पा सकता है—बस एक मौके की जरूरत होती है.
किस्मत और मेहनत का संगम : मनमाधो गांव का यह साधारण युवक आज एक मिसाल बन गया है. उसकी कहानी में संघर्ष है, सादगी है और सबसे बड़ी बात—सम्मान है अपने काम के प्रति. प्रधानमंत्री का उसकी दुकान पर जाना एक संयोग हो सकता है, लेकिन वहां तक पहुंचने के पीछे विक्रम की मेहनत और धैर्य का बड़ा योगदान है.

ममता ने विक्रम साव पर क्या कहा था? : ममता बनर्जी ने वीडियो वायरल होने के बाद आरोप लगाया था कि नरेन्द्र मोदी ने SPG वाले से झालमुड़ी बनवाकर खाई. लेकिन, उनके आरोप निराधार निकले क्योंकि विक्रम साव 9 वीं तक ही पढ़े और पिछले कई साल से वो गया से कोलकाता आकार अपने पुश्तैनी काम को कर रहे हैं. ऐसे में यह वीडियो चुनावी कैंपेन का हिस्सा हो सकता है लेकिन दुकान संचालक विक्रम का काम ही झालमुड़ी बेचकर परिवार चलाने का है.
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