धनबाद में जहरीली गैस और भूधंसान के बीच फंसे परिवार, बेलगड़िया में जर्जर मकानों से लोग नाराज
केंदुआडीह में भूधंसान और जहरीली गैस का खतरा बना हुआ. लोग फिर भी बेलगड़िया शिफ्ट नहीं होना चाहते हैं. धनबाद से नरेंद्र निषाद की रिपोर्ट.

Published : August 22, 2026 at 12:51 PM IST
धनबाद: केंदुआडीह में भूधंसान और जहरीली गैस रिसाव का खतरा लगातार बना हुआ है. करीब नौ महीने पहले शुरू हुआ गैस रिसाव और इसके बाद सड़क धंसने की घटनाओं ने पूरे इलाके को बेहद संवेदनशील बना दिया है. ऐसे में प्रभावित परिवारों के पुनर्वास की कवायद तेज हुई है.
नया धौड़ा और राजपूत बस्ती के 170 परिवार बेलगड़िया टाउनशिप में शिफ्ट होने के लिए तैयार हुए हैं. हालांकि, पुनर्वास को लेकर सहमति बनने के बाद भी एक बड़ी अड़चन सामने आ गई है. परिवारों का कहना है कि बेलगड़िया में जिस आवास की पेशकश की जा रही है, वह जर्जर है और एकांत इलाके में है. लिहाजा लोग बेहतर आवास और बेहतर लोकेशन की मांग कर रहे हैं. दूसरी तरफ बीसीसीएल का कहना है कि केंदुआडीह बेहद खतरनाक क्षेत्र बन चुका है और लोगों को जल्द सुरक्षित स्थान पर ले जाना जरूरी है.
जमीन के नीचे छिपा खतरा
केंदुआडीह, जहां जमीन के नीचे छिपा खतरा कभी भी बड़े हादसे में बदल सकता है. ऊपर से सामान्य दिखने वाला यह इलाका अंदर ही अंदर कितनी बड़ी चुनौती से जूझ रहा है, इसका अंदाजा लगातार हो रही भूधंसान की घटनाओं से लगाया जा सकता है. इसी खतरे को देखते हुए अब प्रभावित परिवारों के पुनर्वास की प्रक्रिया आगे बढ़ रही है. नया धौड़ा और राजपूत बस्ती के कुल 170 परिवार बेलगड़िया टाउनशिप में शिफ्ट होने के लिए अपनी सहमति दे चुके हैं.
नया धौड़ा में करीब 197 परिवार रहते हैं, जबकि राजपूत बस्ती में प्रभावित परिवारों की संख्या करीब 309 बताई जा रही है. इन बस्तियों में एलटीएच और नन-एलटीएच, दोनों तरह के परिवार शामिल हैं. वहीं, कुछ लोग खुद को जमीन का रैयत बताते हैं. ऐसे दावेदारों की संख्या को लेकर अभी स्थिति पूरी तरह स्पष्ट नहीं है. बीसीसीएल के मुताबिक करीब 23 लोग खुद को रैयत होने का दावा कर रहे हैं.

परिवारों ने दी सहमति, लेकिन आवास को लेकर नाराजगी
पुनर्वास की प्रक्रिया में सबसे अहम बात यह है कि जिन 170 परिवारों ने बेलगड़िया जाने के लिए हामी भरी है, उनमें से कई परिवार बेलगड़िया टाउनशिप का दौरा भी कर चुके हैं. परिवारों को उम्मीद थी कि खतरे वाले इलाके से निकलकर उन्हें सुरक्षित और बेहतर आवास मिलेगा. लेकिन बेलगड़िया पहुंचने के बाद तस्वीर कुछ अलग नजर आई.
लोगों का आरोप है कि उन्हें जिन आवासों में बसाने की तैयारी की जा रही है, उनमें कई मकान जर्जर स्थिति में हैं. इसके अलावा आवासों की लोकेशन को लेकर भी परिवारों में नाराजगी है. उनका कहना है कि प्रस्तावित आवास एकांत इलाके में हैं, जहां रहने को लेकर वे सहज महसूस नहीं कर रहे हैं. यही वजह है कि अब पुनर्वास के लिए सहमति देने के बावजूद परिवार पूरी तरह संतुष्ट नहीं हैं.
उनकी मांग है कि उन्हें बेलगड़िया टाउनशिप में ही किसी बेहतर ब्लॉक या बेहतर स्थान पर आवास उपलब्ध कराया जाए. परिवारों का साफ कहना है कि वे सुरक्षित जगह पर जाना चाहते हैं, लेकिन इसका मतलब यह नहीं कि उन्हें जर्जर या असुविधाजनक आवास स्वीकार करना होगा.

दोहरी चुनौती में फंसे प्रभावित परिवार
यानी एक तरफ जमीन के नीचे का खतरा है तो दूसरी तरफ पुनर्वास के बाद मिलने वाले घरों को लेकर असमंजस. प्रभावित परिवारों की स्थिति भी आसान नहीं है. वर्षों से जिन घरों में रह रहे हैं, उन्हें छोड़ना उनके लिए भावनात्मक और सामाजिक रूप से भी बड़ा फैसला है. लेकिन मौजूदा परिस्थितियों में यहां रहना भी खतरे से खाली नहीं है.
बीसीसीएल का कहना है कि केंदुआडीह का इलाका बेहद खतरनाक हो चुका है. जमीन के नीचे आग, गैस और भूधंसान की स्थिति के कारण यहां रहने वाले लोगों की सुरक्षा हमेशा खतरे में बनी हुई है.
गैस रिसाव से शुरू हुई समस्या
3 दिसंबर 2025 को यहां जहरीली गैस का रिसाव शुरू हुआ था. घटना के बाद सिंफर, आईआईटी-आईएसएम और सीएमपीडीआईएल की टीमें मौके पर पहुंचीं. स्थिति को नियंत्रित करने के लिए जमीन के अंदर नाइट्रोजन की भराई की गई. साथ ही जमीन के भीतर पाइप डालकर गैस को ऊपर निकालने की प्रक्रिया भी शुरू की गई. यह काम युद्धस्तर पर चलाया गया. तकनीकी उपायों से गैस रिसाव को नियंत्रित करने में काफी हद तक सफलता भी मिली, लेकिन इलाके की संवेदनशीलता खत्म नहीं हुई. बल्कि इसके बाद की घटनाओं ने खतरे की गंभीरता को और सामने ला दिया.
सड़क धंसने की घटनाओं ने बढ़ाई चिंता
14 अप्रैल 2026 को धनबाद-रांची मुख्य मार्ग का एक हिस्सा केंदुआडीह के पास अचानक धंस गया. सड़क धंसने के बाद इस मार्ग पर आवागमन बंद कर दिया गया और लोगों के लिए वैकल्पिक रास्ते की व्यवस्था की गई. लेकिन खतरा यहीं नहीं रुका. 16 अप्रैल 2026 को उसी सड़क का हिस्सा और नीचे धंस गया. सड़क के लगातार धंसने की घटना ने साफ कर दिया कि जमीन के नीचे की स्थिति सामान्य नहीं है. जिस इलाके में कभी सड़क पर भारी वाहनों की आवाजाही होती थी, वहां अब लोगों की आवाजाही तक को लेकर खतरा बना हुआ है.
सवाल सिर्फ सड़क का नहीं है. सवाल उन परिवारों की सुरक्षा का है, जो अभी भी इस संवेदनशील क्षेत्र में रह रहे हैं. भूधंसान और गैस रिसाव वाले इलाके में रहने वाले लोगों के सामने दोहरी चुनौती है. एक तरफ उन्हें अपने घर और जमीन छोड़ने का डर है, तो दूसरी तरफ अगर वे यहीं रहते हैं तो हर वक्त किसी संभावित हादसे का खतरा बना रहता है. इसीलिए प्रशासन और बीसीसीएल की प्राथमिकता लोगों को सुरक्षित स्थान पर पहुंचाना है.
बीसीसीएल का रुख और बातचीत की तैयारी
बीसीसीएल पीबी एरिया के जीएम जयंत कुमार दास का कहना है कि पुनर्वास की दिशा में पहल लगातार जारी है. उनका कहना है कि केंदुआडीह का इलाका बेहद खतरनाक है और यहां रहने वाले लोगों की सुरक्षा को देखते हुए उन्हें जल्द से जल्द सुरक्षित स्थान पर शिफ्ट करना जरूरी है. जीएम के मुताबिक 170 परिवार बेलगड़िया में शिफ्ट होने के लिए राजी हुए हैं. ये परिवार बेलगड़िया टाउनशिप का दौरा भी कर चुके हैं. हालांकि, परिवारों की ओर से आवास और लोकेशन को लेकर जो मांग रखी जा रही है, उस पर प्रबंधन बातचीत के लिए तैयार है. बीसीसीएल का कहना है कि लोगों की समस्याओं को सुना जाएगा और बैठकर समाधान निकालने का प्रयास किया जाएगा.
रैयतों के दावे भी संवेदनशील मुद्दा
इस पूरी पुनर्वास प्रक्रिया में सबसे संवेदनशील मुद्दा है रैयतों का दावा. केंदुआडीह में कुछ लोग खुद को जमीन का रैयत बताते हैं और पुनर्वास तथा मुआवजे को लेकर अपने अधिकार की मांग कर रहे हैं. बीसीसीएल के मुताबिक करीब 23 लोग खुद को रैयत होने का दावा कर रहे हैं. हालांकि, इनके दावे की वास्तविकता और जमीन पर अधिकार से जुड़े दस्तावेजों की जांच अभी बाकी है.
बीसीसीएल प्रबंधन का कहना है कि रैयतों के दावों को नजरअंदाज नहीं किया जाएगा. संबंधित लोगों से बातचीत की जाएगी और उनके दस्तावेजों की जांच होगी. जरूरत पड़ने पर जिला प्रशासन की भी मदद ली जाएगी. इसके लिए बीसीसीएल की एक टीम काम कर रही है. यानी पुनर्वास की राह में सिर्फ मकान उपलब्ध कराना ही चुनौती नहीं है.
एक तरफ प्रभावित परिवारों की सुरक्षा है, दूसरी तरफ उनके रहने की सुविधा का सवाल है. इसके साथ ही रैयतों के दावों की जांच और मुआवजे से जुड़ी प्रक्रिया भी एक अहम विषय है. अगर सभी पक्षों के बीच सहमति बनती है, तो प्रभावित परिवारों को खतरे वाले इलाके से बाहर निकालना आसान हो सकता है. लेकिन अगर आवास की गुणवत्ता, लोकेशन और रैयतों के दावों जैसे मुद्दों पर सहमति नहीं बनी, तो पुनर्वास की प्रक्रिया आगे बढ़ने में और वक्त लग सकता है.
घर छोड़ने में झिझक के पीछे की वजह
सबसे बड़ा सवाल यही है कि आखिर लोग खतरे को जानते हुए भी अपना घर छोड़ने को पूरी तरह तैयार क्यों नहीं हैं? इसका जवाब सिर्फ भावनाओं में नहीं है. लोगों के लिए घर सिर्फ चार दीवारें नहीं हैं. उनकी रोजमर्रा की जिंदगी, रोजगार, बच्चों की पढ़ाई, सामाजिक रिश्ते और जमीन से जुड़ी पहचान इसी इलाके से जुड़ी है. ऐसे में पुनर्वास के लिए सिर्फ यह कहना काफी नहीं होगा कि इलाका खतरनाक है और लोगों को यहां से जाना चाहिए. जरूरी यह भी है कि जिस जगह उन्हें बसाया जा रहा है, वहां उन्हें सम्मानजनक और सुरक्षित जीवन की गारंटी मिले.
प्रभावित परिवारों की मांग भी इसी दिशा में है. वे बेलगड़िया जाने से पूरी तरह इनकार नहीं कर रहे हैं. बल्कि 170 परिवारों ने शिफ्टिंग के लिए सहमति भी दी है. लेकिन उनकी शर्त है कि उन्हें बेहतर आवास दिया जाए. परिवारों का कहना है कि अगर उन्हें खतरे से निकालकर सुरक्षित जगह पर बसाया जा रहा है, तो वहां रहने लायक बेहतर घर और सुविधाएं भी मिलनी चाहिए. यही वजह है कि अब गेंद बीसीसीएल के पाले में है. प्रबंधन के सामने चुनौती है कि वह परिवारों की मांगों और अपनी पुनर्वास योजना के बीच ऐसा रास्ता निकाले, जिससे लोग संतुष्ट भी हों और उन्हें जल्द से जल्द खतरे वाले क्षेत्र से बाहर भी निकाला जा सके.
समय की महत्ता और आगे की राह
केंदुआडीह की मौजूदा स्थिति को देखते हुए समय बेहद महत्वपूर्ण है. 3 दिसंबर 2025 को गैस रिसाव से शुरू हुई यह समस्या अब सड़क धंसने और जमीन की अस्थिरता तक पहुंच चुकी है. 14 अप्रैल और 16 अप्रैल 2026 की सड़क धंसने की घटनाओं ने खतरे को और गंभीर बना दिया. इसके बावजूद प्रभावित इलाके में अभी भी परिवार रह रहे हैं. ऐसे में सवाल यह नहीं है कि पुनर्वास कब होगा. सवाल यह है कि पुनर्वास कितनी जल्दी और कितनी सुरक्षित तरीके से होगा.
केंदुआडीह में जमीन के नीचे का खतरा लगातार बना हुआ है. जहरीली गैस रिसाव के बाद सड़क धंसने की घटनाओं ने इलाके की संवेदनशीलता को और बढ़ा दिया है. अब बीसीसीएल प्रभावित परिवारों को बेलगड़िया टाउनशिप में बसाने की तैयारी में है. 170 परिवारों ने शिफ्टिंग के लिए सहमति भी दी है, लेकिन पुनर्वास के रास्ते में आवास की गुणवत्ता और लोकेशन बड़ा मुद्दा बनकर सामने आया है. परिवारों की मांग है कि उन्हें जर्जर और एकांत मकानों के बजाय बेहतर स्थान पर बसाया जाए. दूसरी ओर प्रबंधन का कहना है कि लोगों की मांगों पर बातचीत होगी और रैयतों के दावों की भी दस्तावेजों के आधार पर जांच की जाएगी. अब देखना होगा कि सुरक्षा और पुनर्वास के बीच यह संतुलन कितनी जल्दी बनता है.
केंदुआडीह में खतरा टला नहीं है. पुनर्वास की प्रक्रिया शुरू जरूर हुई है, लेकिन मंजिल अभी बाकी है. लोगों को सुरक्षित स्थान पर बसाने के साथ-साथ उन्हें बेहतर आवास और उनके अधिकारों का समाधान देना ही इस पूरी प्रक्रिया की सबसे बड़ी चुनौती है.
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