अद्भुत हिमाचल: डरावने मुखौटे, गालियां और देवनृत्य कर मनाया जाता है फागली उत्सव
देवता नारायण के सम्मान में मनाया जाता है फागली उत्सव. इस पर्व में अश्लील गालियों से भगाई जाती हैं बुरी शक्तियां.

By ETV Bharat Himachal Pradesh Team
Published : February 14, 2026 at 4:04 PM IST
कुल्लू: हिमाचल प्रदेश जहां अपनी खूबसूरती के लिए देश दुनिया में मशहूर हैं तो वही, प्रदेश की संस्कृति भी भी सैलानियों के लिए आकर्षण का केंद्र बनी हुई है. पहाड़ों के रीति रिवाज काफी अलग है और धार्मिक आस्था के साथ आज भी यह सभी रीति रिवाज ग्रामीणों के द्वारा निभाए जाते हैं. यहां हर त्यौहार देवी देवताओं से जुड़ा हुआ है और देवी देवताओं के सम्मान में ग्रामीण आज भी दशकों पुरानी परंपराओं का निर्वाह कर रहे हैं. ऐसा ही एक प्राचीन उत्सव इन दिनों जिला कुल्लू के उपमंडल बंजार के विभिन्न ग्रामीण इलाकों में मनाया जा रहा है. जिसे फागली उत्सव का नाम दिया गया है.
कुल्लू के बंजार में फागली उत्सव की धूम
बंजार के विभिन्न ग्रामीण इलाकों में इन दिनों फागली उत्सव मनाया जा रहा है. फागली उत्सव फाल्गुन मास की संक्रांति से शुरू होकर आगामी तीन दिनों तक मनाया जाता है और भगवान विष्णु नारायण की कृपा पाने के लिए ग्रामीणों के द्वारा विशेष प्रकार का नृत्य भी किया जाता है. इन दिनों उपमंडल बंजार के विभिन्न ग्रामीण इलाकों में फागली उत्सव की धूम मची हुई है.
फागली उत्सव में ग्रामीणों द्वारा विशेष लकड़ी के मुखौटे पहने जाते हैं जो काफी डरावने दिखते हैं. यह लकड़ी के मुखौटे देवताओं का आशीर्वाद माने जाते हैं और पहनने से पहले इनकी पूजा अर्चना की जाती हैं. इन्हें पहनने के बाद ग्रामीण विशेष नृत्य भी करते हैं. फागली उत्सव बंजार घाटी के विभिन्न गांवों में हर साल फाल्गुन संक्रांति के दौरान मनाया जाता है. वर्तमान में यह उत्सव 14 फरवरी तक मनाया जाएगा और इन सभी इलाकों में हर घर में मेहमानों को पारंपरिक पकवान भी परोसे जाएंगे.
देवता से अनुमति मिलने के बाद ग्रामीण करते हैं नृत्य
बंजार के ग्रामीण अजीत सिंह कहते हैं, "फागली उत्सव की खास बात यह है कि लकड़ी के बने हुए मुखौटे हर कोई आदमी नहीं पहन सकता है. इन्हें कुछ चयनित किए हुए लोगों द्वारा पहना जाता है और देवता की अनुमति मिलने के बाद ही ग्रामीणों के द्वारा मुखौटा नृत्य किया जाता है. मान्यता है कि इस मुखौटा नृत्य के माध्यम से गांव से बुरी शक्तियों को भगाया जाता है, जिससे पूरे साल भर गांव में सुख समृद्धि बनी रहती है. इसी कड़ी में बंजार घाटी के गांव पेखड़ी, नाहीं , तिंदर, डिंगचा, फरियाडी, शर्ची, बशीर और कलवारी एवं अन्य गांवों में आजकल फागली उत्सव की धूम मची हुई है."

फागली उत्सव के लिए ग्रामीणों के द्वारा एक सप्ताह पहले ही तैयारी शुरू की जाती है. फागली उत्सव के दिन सभी लोग गांव के एक मैदान में एकत्र होते हैं और देवता विष्णु नारायण का आशीर्वाद लिया जाता है. उसके बाद घास के बने हुए चोलु (विशेष प्रकार की घास से तैयार किए गए कपड़े) और लकड़ी के मुखौटे पहन कर यह नृत्य शुरू किया जाता है.
पर्यटकों को लुभा रहा मुखौटा नृत्य
जिला कुल्लू के उपमंडल बंजार ग्रेट हिमालयन नेशनल पार्क और ट्राउट मछली के लिए मशहूर हैं. ऐसे में उपमंडल बंजार की तीर्थन घाटी पर्यटकों के लिए एक पसंदीदा स्थल बन गया है. इन दिनों घाटी में सैलानी भी घूमने आ रहे हैं और सैलानी भी मुखौटा नृत्य देखने के लिए पहुंच रहे हैं. सैलानियों लिए फागली उत्सव और मुखौटा नृत्य काफी लुभा रहा है. यहां पर दूर दराज पहाड़ी क्षेत्र में बसे छोटे-छोटे सुंदर गांव, यहां की नदियां नाले और झरने, चारों ओर से ऊंचे पहाड़ों, जंगलों और बर्फ से ढकी ऊंची पर्वतशृंखलाएं इस घाटी की सुंदरता को चार चांद लगती हैं. प्राकृतिक सौंदर्य के साथ-साथ पर्यटकों को यहां की प्राचीनतम संस्कृति भी खूब भा रही है. ऐसे में शनिवार 14 फरवरी को इस तीन दिवसीय फागली उत्सव का समापन हो जाएगा.

बंजार में चल रहे तीन दिवसीय फागली उत्सव में घाटी के स्थानीय लोगों के अलावा बाहरी राज्यों मध्य प्रदेश, कोलकाता, उत्तर प्रदेश, जयपुर और अन्य राज्यों से भी पर्यटक यहां पहुंच रहे हैं. सैलानी देवताओं को समर्पित फागली उत्सव देखने का खूब लुत्फ उठा रहे हैं. सैलानी इस प्राचीन मुखौटा नृत्य को देख कर रोमांचित हो उठे और इसकी फोटो व वीडियो को अपने कैमरा में कैद कर रहे हैं.
देवता के मैदान में भव्य नाटी का आयोजन
बंजार के ग्रामीण अजीत सिंह का कहना है कि, "फागली के पहले दिन छोटी फागली मनाई जाती है, जिसमें एक सीमित क्षेत्र तक ही नृत्य एवं परिक्रमा की जाती है. दूसरे दिन बड़ी फागली का आयोजन होता है, जिसमें मुखौटे पहने हुए ग्रामीण जिन्हें मंडयाले कहा जाता है वो गांव के हर घर में प्रवेश करके सुख समृद्धि का आशिर्वाद देते हैं. इस दिन पूरे गांव में एक विशेष व्यंजन चिलड़ू बनाया जाता है और शाम के समय देवता के मैदान में भव्य नाटी का आयोजन होता है, जिसमें स्त्री और पुरुष साथ-साथ नृत्य करते हैं."
कुछ स्थानों पर स्त्रियों को नृत्य देखना वर्जित
स्थानीय निवासी किशन ठाकुर ने बताया कि, "इस तीन दिवसीय फागली उत्सव में परिवार के कुछ चयनित पुरुष सदस्य अपने अपने मुंह में विशेष किस्म के प्राचीनतम मुखौटे लगाते हैं और तीन दिन तक हर घर एवं गांव की परिक्रमा गाजे बाजे के साथ करते हैं. अंतिम दिन देव पूजा अर्चना के पश्चात देवता के गुर के माध्यम से राक्षसी प्रवृत्ति प्रेत आत्माओं को गांव से बाहर दूर भगाने की परंपरा निभाई जाती है. इस उत्सव में कुछ स्थानों पर स्त्रियों को नृत्य देखना वर्जित होता है. क्योंकि इसमें अश्लील गीतों के साथ गालियां देकर अश्लील हरकतें भी की जाती है. ऐसा इसलिए किया जाता है ताकि क्षेत्र में घूम रही बुरी शक्तियां दूर भाग सके."

घास से बने कपड़े और लकड़ी के मुखौटे पहन कर नृत्य
हिमालय नीति अभियान के संयोजक गुमान सिंह ने बताया कि, "पूरे बंजार क्षेत्र में कुछ इलाकों में ही फागली उत्सव मनाया जाता है, जिसमें घास से बने कपड़े और लकड़ी के मुखौटे पहन कर नृत्य किया जाता है. जिन-जिन इलाकों में भगवान विष्णु नारायण के मंदिर हैं. सिर्फ वहीं पर फागली उत्सव मनाया जाता है. बाकी इलाकों में फाल्गुन मास की पहली संक्रांति को देवता स्वर्ग लोक से वापस लौटते हैं और लोगों के द्वारा नृत्य का भी आयोजन किया जाता है. देवता स्वर्ग प्रवास में हुई सभी घटनाओं का ब्यौरा देते हैं और आगामी समय में फसल और क्षेत्र की रक्षा का भी भक्तों को वचन देते हैं."
विष्णु नारायण के निर्देशों का पालन
पुजारी नवीन शर्मा ने बताया कि, "मान्यता है कि पुराने दौर में यहां राक्षसी शक्तियों का काफी आतंक था. ऐसे में देवता विष्णु नारायण के द्वारा इन सभी बुरी शक्तियों को यहां से भगाया गया और स्थानीय लोगों ने डरावने मुखौटे पहन कर विष्णु नारायण के द्वारा दिए गए निर्देशों का पालन किया था. ऐसे में आज भी इस परंपरा का निर्वाह किया जा रहा है. ग्रामीणों के द्वारा तीन दिन तक मुखौटे पहन कर पूरे इलाके की परिक्रमा की जाती है और देव नृत्य के साथ बुरी शक्तियों को इलाके से दूर भगाया जाता है. आज भी ग्रामीण इस परंपरा का निर्वहन कर रहे हैं."

तीर्थन घाटी घूमने आए मध्य प्रदेश के सैलानी मनोज तिवारी ने कहा कि, "हम लोग यहां पर अपने दोस्तों के साथ घूमने आए हैं. हमने मुखौटा डांस के बारे में पहले भी सोशल मीडिया में देखा था. अब वह यहां पर फागली उत्सव को अपने दोस्तों के साथ मना रहे हैं और स्थानीय लोग भी उनकी खूब आवभगत कर रहे हैं. मुखौटा पहनकर डांस करने की इस परंपरा को वह पहली बार देख रहे हैं."
सैलानी उठा रहे फागली उत्सव का आनंद
जयपुर से आए सैलानी राकेश मीणा ने बताया कि, "तीर्थन घाटी में जिस होमस्टे में हम लोग ठहरे हुए हैं. वहां से पास में ही फागली उत्सव मनाया जा रहा रहा है. हम लोग गांव में लोगों के साथ फागली उत्सव का आनंद ले रहे हैं. यहां ग्रामीणों के द्वारा पारंपरिक पकवान भी खाने को दिए गए, जिससे यहां के स्थानीय पकवानों के बारे में भी जानकारी मिली है. यहां देवी-देवताओं के प्रति लोगों की अगाध श्रद्धा है और आज भी घाटी के लोग पुरानी परंपराओं का पालन कर रहे हैं."

राक्षसी प्रवृत्ति को गांव से बाहर दूर भगाने की परंपरा
स्थानीय निवासी विक्रम कहते हैं, "फागली उत्सव में परिवार के कुछ चयनित पुरुष सदस्य अपने अपने मुंह में विशेष प्रकार के प्राचीनतम मुखौटे लगाते हैं और तीन दिन तक हर घर एवं गांव की परिक्रमा गाजे बाजे के साथ करते हैं. अंतिम दिन देव पूजा अर्चना के बाद देवता के गुर के माध्यम से राक्षसी प्रवृत्ति प्रेत आत्माओं को गांव से बाहर दूर भगाने की परंपरा निभाई जाती है. इस उत्सव में कुछ जगहों पर स्त्रियों को नृत्य देखना वर्जित होता है. क्योंकि इसमें अश्लील गीतों के साथ गालियां देकर अश्लील हरकतें भी की जाती हैं."
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