भीषण गर्मी झेलेंगे पौने चार अरब लोग... 2050 तक पारा 2 डिग्री बढ़ने का खतरा, ग्लोबल वार्मिंग की चपेट में होगी दुनिया की आधी आबादी
धरती के बढ़ते तापमान, क्लाइमेट चेंज को लेकर बड़ी चेतावनी, भारत-पाकिस्तान, इंडोनेशिया-नाइजीरिया जैसे देशों में हालात होंगे भयावह

Published : January 31, 2026 at 4:02 PM IST
|Updated : February 1, 2026 at 10:57 AM IST
हैदराबाद (नरेंद्र चौधरी) : धरती का बढ़ता तापमान, ग्लोबल वार्मिंग और इन सब के चलते जलवायु परिवर्तन समूची दुनिया के लिए गंभीर चिंता का विषय बना हुआ है. हाल ही में सामने आई ऑक्सफोर्ड यूनिवर्सिटी की एक स्टडी रिपोर्ट और ज्यादा चौंकाने व सतर्क करने वाली है.
रिपोर्ट बढ़ते ग्लोबल वार्मिंग के खतरों के प्रति आगाह करती है और कहती है कि अगर 2050 तक इसका स्तर 2 डिग्री सेल्सियस को पार कर गया तो विश्व को भयावह नतीजे भुगतने पड़ेंगे. तकरीबन 3.79 अरब आबादी को भयंकर गर्मी झेलनी पड़ेगी. यानी दुनिया की लगभग आधी जनसंख्या एक्सट्रीम हीट के हालात में गुजर-बसर करने को मजबूर होगी.
यही नहीं भारत, पाकिस्तान, बांग्लादेश, इंडोनेशिया, फिलीपींस, नाइजीरिया जैसे देशों में स्थिति और ज्यादा खराब होगी. दरअसल, ग्लोबल वार्मिंग को लेकर पेरिस एग्रीमेंट में तापमान का मानक 1.5 डिग्री सेल्सियस तय किया गया है. दुनिया की कोशिश ग्लोबल वार्मिंग के स्तर को इससे नीचे रखने की है, लेकिन मौजूदा परिस्थितियां बताती हैं कि धरती का बढ़ता तापमान इस लिमिट को पार जाएगा.
अगर धरती का तापमान 1.5 डिग्री से ज्यादा बढ़ता है तो 2050 से बहुत पहले ही गर्मी कोहराम मचा सकती है. साल 2025 में तापमान औसत से 0.28 डिग्री सेल्सियस ज्यादा रहा था. यह भी सबसे गर्म वर्षों में से एक था. वहीं, नेचर जर्नल में प्रकाशित एक रिपोर्ट भी इसी खतरे की ओर इशारा करती है. इसके अनुसार 'साल 2041–2070 तक भारत में हीट स्ट्रेस वाले दिनों की संख्या में इजाफा होगा.
भारत में साल दर साल कैसे बढ़ रहा तापमान?, साल 2026 में कितना सताएगी गर्मी, स्वास्थ्य समेत अन्य सेक्टरों पर क्या पड़ रहा असर?. ईटीवी भारत की इस Analysis में सिलसिलेवार तरीके से इन सभी सवालों के जवाब जानेंगे...
सबसे पहले ऑक्सफोर्ड यूनिवर्सिटी की स्टडी रिपोर्ट के बारे में जानेंगे
1-अगर ग्लोबल वार्मिंग का लेवल 2 डिग्री सेल्सियस तक बढ़ जाता है तो साल 2050 तक दुनिया की आधी आबादी (3 अरब 79 करोड़) भीषण गर्मी में जीने को मजबूर होगी. जलवायु वैज्ञानिकों के अनुसार यह काफी हद तक मुमकिन भी है.
2-स्टडी में दावा किया गया है कि जब दुनिया पेरिस एग्रीमेंट (जलवायु परिवर्तन से निपटने के लिए कानूनी अंतरराष्ट्रीय संधि) में तय 1.5°C तापमान के टारगेट को पार कर जाएगी तो गर्मी के असर जल्दी महसूस होने लगेंगे.
3-साल 2010 में दुनिया की 23% आबादी बहुत ज्यादा गर्मी में जी रही थी. जबकि अब स्थिति काफी खराब है. मौजूदा समय करीब 41% आबादी तपिश से परेशान है.
4-नाइजीरिया, साउथ सूडान, लाओस और ब्राजील में खतरनाक रूप से गर्म तापमान में सबसे ज्यादा बढ़ोतरी होगी. इंसानों पर इसका बुरी तरह असर होगा.
5-स्टडी के अनुसार बढ़ते तापमान का सबसे ज्यादा असर भारत, नाइजीरिया, इंडोनेशिया, बांग्लादेश, पाकिस्तान और फिलीपींस में होगा.
6-ऑस्ट्रिया और कनाडा में तापमान दोगुना हो जाएगा. इसके अलावा UK, स्वीडन, फिनलैंड में 150%, नॉर्वे में 200% और आयरलैंड में 230% तक गर्मी बढ़ जाएगी.

तापमान में बढ़ोतरी से कई देशों में मचेगा हाहाकार : स्टडी के अनुसार ऑस्ट्रिया, कनाडा, स्वीडन आदि देशों में मौजूदा से थोड़ा भी तापमान बढ़ेगा तो वहा हाहाकर मच सकता है. इसके पीछे का कारण यह है कि इन देशों का इंफ्रास्ट्रक्चर ज्यादातर ठंडे माहौल के लिए ही हैं. जिन देशों के पास गर्मी को मैनेज करने के लिए ज्यादा साधन, क्षमता और पैसा है उनकी तुलना में कम क्षमता वाले देशों में काफी नुकसान हो सकता है.
अगले 5 सालों में करनी होगी खास तैयारी : ऑक्सफोर्ड यूनिवर्सिटी की स्टडी रिपोर्ट में इंजीनियरिंग साइंस के एसोसिएट प्रोफेसर डॉ. जीसस लिजाना ने बढ़ते तापमान से निपटने के लिए खास तैयारी करने की बात कही है. उनका कहना है कि कूलिंग और हीटिंग की डिमांड में ज्यादातर बदलाव 1.5 डिग्री सेल्सियस की लिमिट तक पहुंचने से पहले होते हैं.
ऐसे में अनुकूलन उपाय करने की जरूरत है. कई घरों में अगले 5 वर्षों में एसी लगवाने की जरूरत पड़ सकती है. उनका दावा है कि अगर हम ग्लोबल वार्मिंग के 2.0 लेवल पर पहुंचते हैं तो उसके बाद भी तापमान बढ़ता रहेगा.
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नेचर जर्नल में प्रकाशित रिपोर्ट पर भी करिए गौर : नेचर जर्नल में प्रकाशित रिपोर्ट के अनुसार भारत में साल 1971–2000 की तुलना में वर्ष 2041–2070 तक हर साल हीट स्ट्रेस के दिनों की संख्या बढ़ेगी. यह 50 दिनों से ज्यादा भी हो सकती है. बढ़ते तापमान और उमस इंसानों के लिए खतरनाक स्थिति पैदा करेंगे.
मीडिया रिपोर्ट के अनुसार स्टडी में शामिल आईआईटी रुड़की के डिपार्टमेंट ऑफ हाइड्रोलॉजी के वैज्ञानिक डॉक्टर अंकित अग्रवाल का मानना है कि लोगों को असहनीय गर्मी की सामना करना पड़ेगा. ग्लोबल वार्मिंग इफेक्ट के कारण दिल्ली, सियोल, टोक्यो, बीजिंग, कराची, ढाका, मनीला और जकार्ता जैसे शहरों में रहने वाले लोग भीषण गर्मी से परेशान रहेंगे.

एशिया-प्रशांत डिजास्टर रिपोर्ट 2025 के मुताबिक अगले कुछ वर्षों में शहरी इलाकों में तापमान 7 डिग्री तक बढ़ने की संभावना है. ज्यादा गर्मी की वजह से लोगों के कार्य करने की क्षमता प्रभावित होगी. बच्चे और बुजुर्गों पर गर्मी का ज्यादा असर दिखाई देगा. अमीर लोग और ठंडी जगहों पर रहने वाले लोग गर्मी से कम प्रभावित होंगे.
दुनिया के लिए साल 2024 रहा सबसे ज्यादा गर्म : 1901 के बाद दुनिया के लिए साल 2024 सबसे ज्यादा गर्म साल था. यह 1991-2020 के औसत से करीब 0.65 डिग्री सेल्सियस अधिक था. इसी तरह 4 अलग-अलग अन्य वर्षों में भी लोगों को ज्यादा गर्मी का सामना करना पड़ा. उस दौरान साल 2009 में तापमान 0.40 डिग्री सेल्सियस था.
जबकि साल 2010 में .39 डिग्री सेल्सियस, साल 2016 में 0.54 डिग्री सेल्सियस जबकि वर्ष 2017 में .38 डिग्री सेल्सियस था. साल 2015 से लेकर 2024 तक को अब तक का सबसे गर्म दशक माना गया.

गर्मी से 7 साल में 5 हजार से अधिक लोगों की मौत : भीषण गर्मी स्वास्थ्य के लिए कई मायने में काफी खतरनाक मानी गई है. गर्मी ज्यादा बढ़ने पर अस्पतालों में लोगों की भीड़ इलाज के लिए पहुंचने लगती है. कई लोगों की जान भी चली जाती है. साल 2018 से लेकर 2024 तक 7 साल के अंदर गर्मी से करीब 5 हजार 335 लोगों की मौत हो चुकी है.
देश में गर्मी तोड़ चुकी है 120 साल का रिकॉर्ड : साल 2020–2025 के सरकारी डेटा (IMD, MoES, NCRB) के अनुसार भारत रिकॉर्डतोड़ गर्मी का सामना कर रहा है. साल 2022 के मार्च महीने में भीषण गर्मी पड़ी थी. करीब 120 साल से भी अधिक समय के बाद इतनी गर्मी पड़ी थी. आने वाले वर्षों में हालात और बिगड़ सकते हैं.

भारत में क्यों बढ़ती जा रही गर्मी? : इंडस्ट्री, ट्रांसपोर्ट, कंस्ट्रक्शन और पेड़ों की कटाई ने वातावरण में CO₂, मीथेन और नाइट्रस ऑक्साइड को बढ़ा दिया है. इससे 1880 से ग्लोबल वार्मिंग लगभग 1.1°C बढ़ी है. भारत में हीटवेव पर एल नीनो इवेंट्स और अटलांटिक महासागर की सतह के तापमान में गड़बड़ी का असर होता है. एल नीनो वर्ष में अक्सर लंबी, ज्यादा गर्म और ज्यादा फैली हुई हीटवेव देखी जाती है. जबकि ला नीना सालों में कोल्ड वेव एक्टिविटी कम हो जाती है.
एल नीनो वर्ष में उष्णकटिबंधीय प्रशांत महासागर में समुद्र की सतह का तापमान सामान्य से काफी गर्म हो जाता है. यह 2 से 7 साल में एक बार होने वाली प्राकृतिक घटना है. इसी तरह ला नीना वर्ष में मध्य और पूर्वी भूमध्यरेखीय प्रशांत महासागर में समुद्र की सतह का तापमान सामान्य से काफी कम (ठंडा) हो जाता है.
भारत में दोगुने हो गए हीटवेव के दिन : भारत में साल 1981–2010 के दौरान करीब 8 से 10 दिन ही हेटवेव के होते थे. अब ये पहले की संख्या में लगभग दोगुने हो गए हैं. उत्तर-पश्चिम भारत (राजस्थान, पंजाब, हरियाणा, दिल्ली) में लगातार सबसे ज्यादा हीटवेव के दिन दर्ज किए जाते हैं. इसी तरह पूर्वी राज्यों (ओडिशा, झारखंड, पश्चिम बंगाल) में हाल के सालों में हीटवेव की शुरुआत पहले ही हो गई.

देश के 2 बड़े हीटवेव जोन कौन? : भीषण गर्मी में वैसे तो कई जगहों पर लोगों को हीटवेव का सामना करना पड़ता है, लेकिन इसके बावजूद देश में कुछ ऐसे भी स्थान हैं, जहां बड़े हीटवेव जोन हैं. IMD ने ऐसे 2 बड़े हीट वेव जोन की पहचान की है. इनमें से पहला उत्तर-पश्चिमी और मध्य भारत है.
इसे कोर हीट वेव जोन भी कहा जाता है. यानि यहां सबसे अधिक हीटवेव का कहर रहता है. दूसरे नंबर पर पूर्वी तटीय राज्य ओडिशा और आंध्र प्रदेश शामिल हैं. यहां भी हीटवेव की सबसे ज्यादा फ्रीक्वेंसी और गंभीरता दर्ज की जाती है.
साल 2026 में कितना रहेगा तापमान? : ECCC के ग्लोबल तापमान पूर्वानुमान के अनुसार साल 2026 अब तक रिकॉर्ड किए गए 4 सबसे गर्म सालों में से एक रह सकता है. यह साल 2023 और 2025 के बराबर होगा. जबकि साल 2024 के करीब होगा. ECCC के कैनेडियन सेंटर फॉर क्लाइमेट मॉडलिंग एंड एनालिसिस (CCCma) का अनुमान है कि 2026 में ग्लोबल एवरेज तापमान साल 1850 से लेकर 1900 से ज्यादा रहेगा.

साल 2026 में साल 2023 और 2025 की ही तरह तापमान रहेगा. ये वर्ल्ड मेटियोरोलॉजिकल ऑर्गनाइजेशन (WMO) के अनुसार अब तक के रिकॉर्ड में दूसरे और तीसरे सबसे गर्म साल हैं. इस साल (2026) क्लाइमेट चेंज से मौसम काफी खराब रहने की उम्मीद है. साइंटिस्ट इसे लेकर चेतावनी भी दे रहे हैं.
क्लाइमेट मॉडल तेजी से यह अनुमान लगा रहे हैं कि यह साल पिछले साल जितना ही या उससे भी ज्यादा विनाशकारी साबित हो सकता है. ऐसे में मौसम की आपदाओं और क्लाइमेट चेंज के असर से बचाव के लिए खास तरह की तैयारी की जरूरत पड़ सकती है.
गर्मी बढ़ने पर सेहत पर क्या पड़ता है असर? : बहुत ज्यादा गर्मी शरीर पर कई तरह से अपना असर डालती है. इससे डिहाइड्रेशन, हीट एग्जॉशन (शरीर में पानी-नमक की अत्यधिक कमी), हीट स्ट्रोक (शरीर का तापमान तेजी से बढ़ जाना), कार्डियोवैस्कुलर स्ट्रेन (हृदय और रक्त वाहिकाओं पर पड़ने वाला अत्यधिक दबाव) और न्यूरोलॉजिकल प्रॉब्लम (मस्तिष्क, रीढ़ की हड्डी और नसों को प्रभावित करने वाले विकार) हो सकती हैं.
पहले से जिन लोगों को बीमारियां हैं, उन्हें हीटवेव से ज्यादा खतरा रहता है. बच्चों-बुजुर्गों को काफी समस्याओं का सामना करना पड़ सकता है. गर्मी में शरीर सभी अंगों को सही तरीके से संचालित करने के लिए खुद से ही ठंडा करने के लिए जोर डालता है. इससे दिल और किडनी पर भी दबाव पड़ता है. ऐसे में बहुत ज्यादा गर्मी से दिल, मस्तिष्क, श्वास और डायबिटीज रोगियों के लिए रिस्क काफी बढ़ जाता है.
क्या है हीट स्ट्रेन, क्या हैं इसके लक्षण? : हीट स्ट्रेन (Heat Strain) की स्थिति में शरीर पर भीषण गर्मी में ज्यादा शरीरिक दबाव पड़ता है. ऐसी कंडीशन में शरीर के अंदर का तापमान बढ़ जाता है, पसीने के जरिए गर्मी को बाहर निकालने की क्षमता कम हो जाती है. हीट स्ट्रेन में बहुत प्यास लगती है, चक्कर आते हैं, मांसपेशियों में ऐंठन होती है. गर्मी ज्यादा होने से कार्य करने की क्षमता कम हो जाती है. रोजी-रोटी के मौके भी कम हो जाते हैं. हृदय (Cardio) और फेफड़ों (Pulmonary) की कार्य क्षमता कम हो जाती है.

क्या है हीट स्ट्रेस?, लक्षणों के बारे में जानिए : हीट स्ट्रेस का मतलब है शरीर में गर्मी का जमा होना. यह तब होता है जब शरीर वातावरण से जो गर्मी सोखता है, उसे खत्म नहीं कर पाता है. मतलब यह शरीर की क्षमता से ज्यादा होती है. हीट स्ट्रेस आम तौर पर कई वजहों से होता है. मसलन नमी, फिजिकल एक्टिविटी और कम पानी पीना आदि.
हीट स्ट्रेस होने पर शरीर का तापमान बढ़ जाता है. दिल तेजी से धड़कने लगता है. सांस तेज हो जाती है. बहुत ज्यादा पसीना आने लगता है. जी मिचलाता है. यह दिल की बीमारी, डायबिटीज, मेंटल हेल्थ, अस्थमा जैसी अंदरूनी बीमारियों को बढ़ा सकता है. हीट स्ट्रेस तब होता है जब इंसानों और जानवरों के शरीर का तापमान 37°C से ज़्यादा हो जाता है. गंभीर मामलों में यह तापमान 40°C से ज्यादा हो जाता है.
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गर्मी से बचने के लिए क्या करें? : भीषण गर्मी में बाहर निकलने से बचें. अगर निकलना जरूरी ही है तो शरीर को कपड़ों से ढंककर रखें. गर्मी लगने पर तत्काल शरीर को ठंडा करने का इंतजाम होना चाहिए. शरीर में पानी या तरल पदार्थों की उपलब्धता को बनाए रखना चाहिए. गर्मी में ज्यादा मेहनत न करना भी एक तरीका हो सकता है. शरीर में किसी तरह की दिक्कत होने पर तत्काल चिकित्सक की सलाह जरूर लें.
कितने तापमान पर सही से काम करते हैं शरीर के अंग? : एक स्वस्थ इंसान का शरीर अंदर की लगभग 37 डिग्री सेल्सियस तापमान पर अच्छा काम करता है. हालांकि नॉर्मल रेंज अक्सर 36.1 डिग्री सेल्सियस से 37.2 डिग्री सेल्सियस के बीच मानी जाती है. मस्तिष्क के मध्य भाग में स्थित हाइपोथैलेमस इसे नियंत्रित करता है. जिससे कोशिकाओं में होने वाली आवश्यक रासायनिक प्रतिक्रियाएं और एंजाइम फंक्शन सही से होती रहे.
अब जानते हैं खेती-पशुपालन-डेयरी पर गर्मी का प्रभाव : बढ़ती गर्मी का अलग-अलग सेक्टरों जैसे खेती, पशुपालन और डेयरी पर काफी असर पड़ता है. बढ़ती गर्मी पर्यावरणीय मुद्दे के अलावा एक आर्थिक चुनौती भी है. भारत में ज्यादा गर्मी से फसलों की पैदावार में गिरावट देखी जा रही है. पशु कम दूध देने लगते हैं. अब क्षेत्र वाइज गर्मी से होने वाले नुकसान को विस्तार से समझते हैं...
हीटवेव से कम हुई फसलों की पैदावार : गर्मी में ज्यादा तापमान से फसल चक्र छोटा हो जाता है. अनाज की पैदावार कम होती है. इनकी गुणवत्ता भी प्रभावित होती है. साल 2024 में ऐसा देखने को मिला था. उस दौरान मार्च-अप्रैल में हीटवेव ने फसलों की पैदावार को प्रभावित किया था. बिहार समेत पूर्वी राज्यों में बढ़ते तापमान ने धान की रोपाई में रुकावट डाली थी. गर्मी में फसलों को सिंचाई की ज्यादा जरूरत होती है. गर्मी से गेहूं की पैदावार भी प्रभावित होती है.
पशुओं की भी हो रही मौत, कम दे रहे दूध : दिल्ली के थिंक टैंक काउंसिल ऑन एनर्जी, एनवायरनमेंट एंड वॉटर (CEEW) ने 20 जनवरी को 'बदलते क्लाइमेट में मवेशी और समुदाय' नाम की रिपोर्ट पब्लिश की. इसमें 15 राज्यों के 7,300 से ज्यादा मवेशी पालने वाले परिवारों पर सर्वे किया गया. इन परिवारों ने गाय, भैंस, बैल और सांड पाल रखे हैं. सर्वे में यह पता चला कि क्लाइमेट चेंज (जलवायु परिवर्तन) मवेशियों को नुकसान पहुंचा रहा है.

40% से ज्यादा मवेशी पालने वालों के अनुसार भीषण गर्मी जानवरों की प्रोडक्टिविटी को कम कर रहा है. जानवरों का विकास कम होता है, वे दूध कम देते हैं. उनके लिए चारे का उत्पादन भी कम होता है. ये हालात तब हैं जब भारत का डेयरी सेक्टर देश की GDP में लगभग 5% का योगदान देता है.
इससे करीब 800 लाख से अधिक किसानों को मजबूती मिलती है. नेशनल डेयरी डेवलपमेंट बोर्ड की एनुअल रिपोर्ट (2023-2024) के अनुसार साल 2019 तक देश में दूध का प्रोडक्शन 1880 लाख टन था. बढ़ती गर्मी के कारण साल 2014-15 और 2023-24 के बीच दूध प्रोडक्शन में 63.56% की बढ़ोतरी के बावजूद यह सतत विकास के लिए खतरा बना रहा.
आर्थिक नुकसान भी करती है भीषण गर्मी : भीषण गर्मी के कारण आर्थिक नुकसान भी उठाना पड़ता है. फसलों की पैदावार कम होने से किसानों की आमदनी कम होती है. अनाज और दूध की सप्लाई में कमी से खाने-पीने की चीजें महंगी हो जाती हैं. इससे रसोई का बजट बिगड़ जाता है. ये पूरे देश के लिए आर्थिक अस्थिरता पैदा करते हैं.
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