EXPLAINER: हिमाचल से IAS-IPS अफसरों की फौज क्यों कम करना चाहते हैं सुखविंदर सुक्खू, क्या सीएम के पास है पावर ?
सीएम सुक्खू हिमाचल में IAS-IPS अफसरों की संख्या कम करना चाहते हैं उनके मुताबिक इससे 200 करोड़ रुपये बचेंगे. रजनीश शर्मा की रिपोर्ट

By ETV Bharat Himachal Pradesh Team
Published : August 19, 2026 at 6:17 PM IST
शिमला: आर्थिक मोर्चे पर हिमाचल को संकट से निकालने के लिए सीएम सुखविंदर सिंह सुक्खू निरंतर कई उपायों पर काम कर रहे हैं. किशाऊ बांध परियोजना से लेकर करछम-वांगतू बिजली प्रोजेक्ट में रायल्टी आदि से कांग्रेस सरकार ने शाबासी भी बटोरी है. इस बीच सुखविंदर सुक्खू के एक बयान से इस समय पूरे सियासी गलियारे और अफसरशाही के बीच जोरदार चर्चा का दौर शुरू हो गया है. सीएम सुक्खू ने हाल ही में शिमला में बयान दिया कि राज्य सरकार को अफसरों की फौज की जरूरत नहीं है यानी सीएम सुक्खू का कहना था कि आईएएस, आईपीएस व आईएफएस अधिकारियों की संख्या राज्य में कम किए जाने की जरूरत है. यही नहीं, सीएम सुक्खू ने कहा कि प्रशासनिक अफसरों की संख्या कम करने से राज्य सरकार सालाना 200 करोड़ रुपए बचा लेगी. यहां इसी दो सौ करोड़ की बचत वाले बयान पर तरह-तरह की चर्चा शुरू हो गई है. सवाल है कि क्या मुख्यमंत्री इस कदम में आर्थिक तंगी झेल रहे प्रदेश पर आर्थिक बोझ कम करना चाहते हैं ? क्या सच में अफसरों का इतना बोझ सरकार पर पड़ता है ? क्या मुख्यमंत्री अफसरों का कैडर कम कर सकते हैं ? ETV भारत ने राज्य में चल रही प्रशासनिक सेवा अफसरों के कैडर को कम करने की चर्चा के बीच राज्य के कुछ पूर्व ब्यूरोक्रेट्स से चर्चा की.
मुख्यमंत्री ने क्या कहा ?
दरअसल बीते कुछ दिनों से मुख्यमंत्री सुखविंदर सिंह सुक्खू कई बार हिमाचल प्रदेश में अफसरों के कैडर पर कैंची चलाने की बात कर चुके हैं. हर राज्य की तरह हिमाचल प्रदेश को भी आईपीएस, आईएएस और आईएफएस अफसरों का कैडर मिलता है लेकिन मुख्यमंत्री के मुताबिक हिमाचल में अफसरों की फौज है जिसे कम करने की जरूरत है.

"बड़ी संख्या में कागजी अफसरों की नहीं, ऐसे प्रशासन की जरूरत है जो योजनाओं को धरातल पर उतारे. हम राज्य में आईएएस अफसरों के पदों को 153 के कैडर में से 130 पद करने जा रहे हैं. आईएफएस के 118 में से 83 पद करने जा रहे हैं. वहीं, आईपीएस के 96 में से भी पद कम करेंगे. हमारी सरकार को अधिकारियों की फौज नहीं, योजनाओं को अमलीजामा पहनाने वाले अफसर चाहिए."- सुखविंदर सिंह सुक्खू, मुख्यमंत्री, हिमाचल प्रदेश
क्या हैं नियम, कैसे अलॉट होता कैडर?
यूनियन पब्लिक सर्विस कमीशन यानी UPSC हर साल अखिल भारतीय प्रशासनिक सेवाएं परीक्षा करवाता है. इसमें देश भर से युवा आईएएस, आईपीएस व आईएफएस आदि में चुने जाते हैं. किसको कौन से राज्य में सेवाएं करने का अवसर मिलेगा, इसके लिए स्पष्ट नियम हैं. यूपीएससी परीक्षा में टॉपर्स को उनकी रैंक के अनुसार राज्य मिलता है. इसके अलावा परीक्षा पास करने वाले की पसंद, किसी राज्य में खाली पदों की संख्या आदि पहलुओं पर भी विचार किया जाता है. आईएएस अफसरों को कार्मिक मंत्रालय, आईपीएस अफसरों के मामले को गृह मंत्रालय और आईएफएस अफसरों के मामले केंद्रीय वन एवं पर्यावरण मंत्रालय देखता है. किस राज्य को किस कैडर के कितने अफसर मिलेंगे, यही तीन मंत्रालय तय करते हैं. केंद्रीय कार्मिक मंत्रालय के नए नियमों में अब पुराने सिस्टम को खत्म करके कैडर्स को अल्फाबेटिकली चार ग्रुप्स में बांट दिया गया है. हिमाचल ग्रुप दो में गुजरात, हरियाणा, झारखंड, कर्नाटक, केरल व मध्य प्रदेश के साथ आता है. केंद्रीय कार्मिक मंत्रालय ने बहुत समझकर नियम बनाए हैं ताकि सभी राज्यों को मेधावी अफसर मिल सकें. ऐसा न हो कि अनेक अफसर चुनिंदा राज्यों को ही सर्विस के लिए चुनें. पहले जहां सिविल सर्विसेज के टॉप रैंकर्स अपनी पसंद के अनुसार राज्य चुन लेते थे, जिससे कुछ राज्यों को ही लगातार अच्छे रैंक वाले अफसर मिलते थे. नियमों में बदलाव होने से अब रोटेशन के कारण सभी राज्यों को अच्छी रैंक वाले अधिकारी मिलेंगे.

क्या है हिमाचल की स्थिति?
हिमाचल प्रदेश में कैडर स्ट्रेंथ को लेकर केंद्रीय कार्मिक मंत्रालय की ओर से जारी आंकड़ों के मुताबिक यहां आईएएस की कुल कैडर संख्या 153 है. आईपीएस की संख्या 96 और आईएफएस की संख्या 114 से 118 के बीच है. हिमाचल प्रदेश में इस समय डायरेक्ट रिक्रूट अफसरों की संख्या 83 है. बाकी अफसर राज्य सेवाओं से प्रमोट होकर बने हैं. हिमाचल प्रदेश में अक्सर मुख्य सचिव पद के लिए लॉबिंग होती है. कई बार सरकार सीनियरिटी को सुपरसीड कर जूनियर अफसरों को भी अपनी पसंद से मुख्य सचिव बनाती है.

मुख्यमंत्री के मुताबिक हिमाचल प्रदेश में जरूरत से ज्यादा अफसर हैं. इसलिये प्रतिनियुक्ति पर दिल्ली जाने वाले अफसरों को वो बिल्कुल नहीं रोकते क्योंकि प्रदेश में कई विभागों में अफसरों के पास काम नहीं है और उनका टैलेंट वेस्ट हो रहा है और अधिकारी खुद ये महसूस करने लगे हैं.
कुछ पद ऐसे हैं जहां आईएएस अफसर बैठे हैं लेकिन उनके पास काम नहीं है और उनका टैलेंट खराब होता है. इसलिये मैं डेप्युटेशन पर दिल्ली जाने वाले अफसरों को नहीं रोकता हूं. डेप्युटेशन को तुरंत स्वीकार करते हैं, जबकि पहले उनकी फाइलें यहां रोकी जाती थीं. हमें इतने अधिकारियों की जरूरत नहीं है. हमारे लिए 130 भी ज्यादा है. 100 या 110 के करीब अधिकारी हों. हम तो चाहते थे कि आईएएस का कैडर 130 से भी कम हो, लेकिन कुछ आईएएस की रिजेंटमेंट थी. ऐसे में अफसर कम करने से 200 करोड़ रुपए बचेंगे. - सुखविंदर सिंह सुक्खू, मुख्यमंत्री
अफसरों की सैलरी, पेंशन कौन देता है और इस पर कितना खर्च आता है ?
ये सवाल इसलिये क्योंकि वित्तीय संकट झेल रहे राज्य के मुख्यमंत्री ने अफसरों की फौज कम करने की बात के साथ 200 करोड़ रुपये बचाने की बात भी कही है. अफसरों की सैलरी से लेकर अन्य खर्चे राज्य सरकार वहन करती है लेकिन पेंशन के मामले में सिस्टम थोड़ा सा अलग है. दरअसल, जब कोई भारतीय प्रशासनिक सेवा का अफसर रिटायर होता है तो उसकी पेंशन का बोझ केंद्र पर आता है. यहां दो स्थितियां हैं. रिटायर होने पर अफसर के पास ऑप्शन होता है कि वो स्टेट ट्रेजरी से पेंशन लेना चाहता है या फिर डायरेक्ट सेंटर गवर्नमेंट से. यदि स्टेट ट्रेजरी से पेंशन लेता है तो उसे केंद्र रिंबर्स करता है और अगर सेंटर गवर्नमेंट से सीधे पेंशन ड्रॉ करने का ऑप्शन चुनता है तो फिर स्टेट का रोल ही खत्म हो जाता है.

हिमाचल सरकार के पूर्व मुख्य सचिव वीसी फारका ने कहा कि, 'हर पांच साल बाद भारतीय प्रशासनिक सेवाओं के अफसरों का कैडर रिव्यू होता है. इन अफसरों की रिटायरमेंट पर पेंशन का खर्च केंद्र रिंबर्स करता है. राज्य में कभी भी पूरे प्रशासनिक अधिकारी नहीं होते. कुछ केंद्र की डेप्युटेशन पर भी होते हैं. रिटायर होने पर अफसरों के पास पेंशन ड्रॉ करने का ऑप्शन होता है. वे केंद्र से पेंशन ड्रॉ करने का ऑप्शन चुनते हैं और जितना भी डीए घोषित होता है, उन्हें हाथों-हाथ मिल जाता है. ऐसे में राज्य के पैसे की बचत वाला कॉन्सेप्ट पूरी तरह से ठीक नहीं है. अफसरों के खर्च में राज्य पर सैलरी, गाड़ी एवं अन्य छिटपुट खर्च है.'

पूर्व वित्त सचिव केआर भारती का कहना है कि, 'राज्य में सेवारत अफसरों का वेतन राज्य के खजाने से ही जाता है. अलबत्ता पेंशन का खर्च केंद्र की जिम्मेदारी है, क्योंकि रिटायर होने के बाद आईएएस आदि की पेंशन यदि राज्य के खजाने से जा रही है तो वो रिंबर्स होगी और अगर अफसर ने केंद्र का ऑप्शन चुना है तो फिर राज्य को कुछ करने की जरूरत ही नहीं है. वहीं, सेंट्रल डेप्युटेशन पर जाने वाले अधिकारी का वेतन केंद्र की जिम्मेदारी है.'

अफसरों के वेतन और गाड़ी पर कितना खर्च?
हिमाचल में यदि टोटल आईएएस अफसरों सहित आईपीएस व आईएफएस अफसरों का आंकड़ा देखा जाए तो कैडर स्ट्रेंथ के हिसाब से ये अधिकतम 367 बनते हैं. इनका औसत वेतन ढाई लाख लगाया जाए (क्योंकि नए अफसरों का वेतन अपेक्षाकृत कम होता है) तो ये आंकड़ा 9 करोड़ रुपए से कुछ अधिक बनता है. इसी तरह अगर पेंशन का हिसाब लगाया जाए तो राज्य में रिटायर प्रशासनिक अफसरों की पेंशन का खर्च ढाई करोड़ रुपए से अधिक नहीं है, लेकिन इसका बोझ राज्य के खजाने पर नहीं आता. यदि साल भर का प्रशासनिक अफसरों का वेतन जोड़ा जाए तो ये अधिकतम 120 करोड़ रुपए तक जाएगा. इसके अलावा गाड़ी व अन्य खर्च मिलाकर भी सीएम सुक्खू ने लगभग 200 करोड़ रुपए के आसपास का जो आंकड़ा बताया है, वो जस्टीफाई नहीं हो रहा. यदि सीएम इस स्ट्रेंथ को 275 अफसरों तक भी लाते हैं तो वेतन का खर्च पौने सात करोड़ रुपए महीना व सालाना 80 करोड़ रुपए होगा.

पूर्व आईएएस और अब भाजपा विधायक जेआर कटवाल का कहना है कि 'राज्य में सेवाएं दे रहे आईएएस व अन्य कैडर के अफसरों का वेतन राज्य के ही खजाने से जाता है. अफसर की स्ट्रेंथ कम करने से क्या होगा, क्या वो दफ्तर और उसका तामझाम (ड्राइवर, गाड़ी आदि) भी नहीं रहेगा? दफ्तर तो फिर भी रहेगा और खर्च भी होगा.'
हिमाचल में IAS कैडर
- हिमाचल में टोटल आईएएस कैडर 153 का है.
- इस समय 127 आईएएस नियुक्त हैं.
- राज्य प्रशासनिक सेवाएं के आईएएस में प्रोमोट अफसरों की संख्या 44 है.
- सीधी भर्ती से आईएएस के पदों की स्वीकृत संख्या कैडर स्ट्रेंथ के अनुसार 107 है.
- इसमें से केवल 83 पद ही भरे हुए हैं.
(राज्य के लिए मंजूर कुल कैडर संख्या और सेवारत अफसरों का आंकड़ा देखना जरूरी है. कुछ अफसर केंद्रीय प्रति नियुक्ति पर होते हैं. कुछ अफसर ट्रेनिंग पर जाते हैं. कुछ स्टडी लीव व अन्य अवकाश पर.)
अफसर कम करने के फायदे-नुकसान?
सीएम सुक्खू के अनुसार, खजाने पर सैलरी का वित्तीय बोझ कम होगा. इसके अलावा एक आईएएस अधिकारियों के साथ गाड़ी के अलावा जो तामझाम होता है वो कम होगा. वे राज्य के अफसरों की संख्या आईएएस को लेकर अधिकतम 100 चाहते हैं. ऐसे में एक अफसर के पास एक से अधिक विभागों का काम होगा. कुछ डिपार्टमेंट ऐसे होते हैं, जिनमें काम न के बराबर होता है. जैसे स्टेशनरी एंड प्रिंटिंग, रिड्रेसल ऑफ पब्लिक ग्रिविएंसिज आदि. कुछ विभाग ऐसे हैं, जिनमें भारी काम होता है. जैसे शिक्षा विभाग, स्वास्थ्य विभाग, वित्त विभाग, कार्मिक विभाग व लोक निर्माण विभाग. यहां एक विभाग को संभालने के लिए एक से अधिक प्रधान सचिव, सचिव स्तर के अफसर लगते हैं. ऐसे में अंदेशा है कि सरकारी विभागों का काम प्रभावित हो जाए.

अफसरों की कमी से विकास कार्य प्रभावित हो सकते हैं. एक उदाहरण पूर्व की जयराम ठाकुर के नेतृत्व वाली भाजपा सरकार के समय का लेते हैं. उस समय हिमाचल की आईएएस की कैडर स्ट्रेंथ 143 के करीब थी. उसमें से तीस पद खाली थे. फिर 26 अफसर सेंट्रल डेप्युटेशन पर चले गए. उस समय एक अफसर के पास कई विभाग थे. इस समय हिमाचल सरकार का हाल देखें तो शिक्षा विभाग के सचिव आईएएस राकेश कंवर के पास कुल छह विभाग हैं. उन्हें न केवल शिक्षा का भार संभालना पड़ता है बल्कि वे उर्जा मामले व गैर परंपरागत उर्जा सोर्स को भी देखते हैं. कला-संस्कृति विभाग आदि अलग से हैं. वित्त विभाग के प्रधान सचिव देवेश कुमार के पास पशुपालन विभाग, अर्थ व सांख्यिकी, प्लानिंग व लोक निर्माण विभाग का जिम्मा भी है. आईएएस अधिकारी अमरजीत सिंह के पास गृह विभाग, हाउसिंग, टीसीपी व यूडी डिपार्टमेंट हैं. यही हाल अन्य अफसरों का है.
पूर्व सीएस वीसी फारका का कहना है कि 'कैडर की संख्या कम करने से राज्य प्रशासनिक सेवाओं के अफसरों के प्रमोशन के चांस प्रभावित होंगे. ये अफसर भी प्रमोट होकर आईएएस, आईपीएस कैडर तक पहुंचते है. अफसरों की संख्या कम करने पर इन अफसरों का क्या होगा ? हिमाचल प्रदेश प्रशासनिक सेवाएं अधिकारी यानी एचएएस व पुलिस के अधिकारी प्रमोट होकर किस पद पर जाएंगे यदि स्ट्रेंथ ही कम हो गई.'
विपक्ष के निशाने पर सीएम सुक्खू
पूर्व मुख्यमंत्री और नेता प्रतिपक्ष जयराम ठाकुर मानते हैं कि राज्य में आर्थिक संंकट है लेकिन सीएम सुक्खू के अफसरों के कैडर कम करने वाली बात पर तंज कसते हुए कहा कि 'मौजूदा कांग्रेस सरकार भी गजब है. यूपीएससी से क्वालिफाई नए अफसरों को लेने से सरकार इनकार कर रही है. अधिकारियों से तौबा करने वाले सीएम ने अपने आसपास कैबिनेट रैंक वाले लोगों की भीड़ रखी है. कुछ अफसरों को एक्सटेंशन दिया जा रहा है और नए अधिकारियों को लेने से इनकार किया जा रहा है'. सुखविंदर सुक्खू ने अपने चहतों को कुर्सियां बांटी, सीपीएस लगाए और फिर उनके लिए सुप्रीम कोर्ट तक वकीलों पर करोड़ों खर्च किए. उन्हें चाहिए कि अफसरों की संख्या की बजाय अपने मित्रों के खर्च घटाएं और कटौती की शुरुआत पहले खुद से करें'

भाजपा प्रवक्ता राकेश जम्वाल का कहना है कि 'सुक्खू सरकार का कैडर स्ट्रेंथ कम करने का ऐलान जनता की आंखों में धूल झोंकने जैसा है. ये नाखून कटाकर शहीद होने जैसा है. सरकार ये बताए कि स्ट्रेंथ कम करने से उसके पास 200 करोड़ की बचत का कौन सा फार्मूला या गणित है?'
क्या मुख्यमंत्री ऐसा कर सकते हैं ?
पूर्व मुख्यमंत्री जयराम ठाकुर ने इस पूरे मामले में राज्य के अधिकार क्षेत्र पर सवाल उठाया है. अब सवाल है कि क्या मुख्यमंत्री राज्य में आईपीएस-आईएएस अफसरों के कैडर पर कैंची चला सकते हैं.
पूर्व वित्त सचिव केआर भारती के मुताबिक 'वैसे अफसरों की संख्या कम करना पेचीदा मामला है. केंद्र प्रशासनिक अफसरों का कैडर रिव्यू करता है. राज्य सरकार केंद्र के समक्ष अपनी बात रख सकती है.
पूर्व सीएस वीसी फारका बताते हैं कि 'कैडर रिव्यू सेंटर करता है. सीएम अपने राज्य के हिसाब से केंद्र से आग्रह कर सकते हैं. इसके लिए केंद्र और राज्य के बीच सामान्य पत्राचार होता है. लेकिन आखिरी फैसला केंद्रीय कार्मिक मंत्रालय का होता है. वैसे भी कभी तय कैडर स्ट्रेंथ के हिसाब से हिमाचल में पूरे अफसर नहीं रहे. हर समय सेंट्रल डेपुटेशन पर अफसर जाते रहते हैं.
वरिष्ठ पत्रकार नवनीत शर्मा का कहना है कि 'सुनने में ये बेशक भला लगे कि अफसरों की कमी की जाएगी और खजाने का पैसा बचाया जाएगा, लेकिन व्यवहारिक रूप से इसे धरातल पर उतारने में समय लगेगा. फिर ये देखना होगा कि इस फैसले से कहीं विभागों का काम अफसरों की कमी के कारण प्रभावित न हो. साथ ही इस कदम से दूरगामी परिणाम भी देखने होंगे.
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