बिहार में हो रही हवा में खेती, न मिट्टी, न पानी की जरूरत, जानें क्या है ये नई तकनीक?
बिहार के कृषि वैज्ञानिक हवा में खेती कर रहे हैं. एरोपोनिक्स और हाइड्रोपोनिक्स तकनीक से विदेशी सब्जियां उगायी जा रही. पढ़ें

Published : January 7, 2026 at 7:49 PM IST
रिपोर्ट: महमूद आलम
नालंदा: बिहार के इकलौते सेंटर ऑफ एक्सीलेंस फॉर वेजिटेबल (सीओई) नालंदा ज़िले के चंडी में स्थित है. यहां इजरायली तकनीक से सब्जी फसलों के उन्नत पौधे तैयार किए जा रहे हैं. इजरायली तकनीक से खेती का मतलब ड्रिप इरिगेशन, वर्टिकल फार्मिंग, स्मार्ट ग्रीन हाउस, जल संरक्षण है, क्योंकि यहां पानी की किल्लत रहती है. ऐसे में कंक्रीट और कम पानी में खेती की जाती है. नालंदा में भी पारंपरिक सब्जियों के साथ-साथ विदेशी सब्जियों की खेती एरोपोनिक्स और हाइड्रोपोनिक्स तरीके से हो रही है.
हवा में सब्जियों की खेती: नालंदा के कृषि वैज्ञानिक बिना मिट्टी और पानी के हवा में सब्जियों की खेती कर रहे हैं और यह तरीका कई सालों से सफल हो रहा है. अब तक आलू और टमाटर के साथ ही कई सब्जियों की खेती की जा चुकी है. हवा में खेती करने की पद्धति को एरोपोनिक तकनीक कहा जाता है.
क्या होता है एरोपोनिक तकनीक?: सीओई नालंदा में इस पद्धति से सब्जियों की उन्नत किस्म के पौधे तैयार किए जाते हैं. यह एक आधुनिक खेती का तरीका है, जहां मिट्टी के बिना, हवा में पौधों को उगाया जाता है. इसमें जड़ों के पोषक तत्वों से भरपूर पानी की धुंध का छिड़काव किया जाता है. इससे जैविक खेती आसान होती है और विदेशी सब्जियां भी इस पद्धति से उगायी जा सकती है. यह तकनीक हाइड्रोपोनिक्स का ही एक उन्नत रूप है, जिसमें जड़ों को हवा में लटकाकर पोषण दिए जाने का काम किया जाता है.

नालंदा के चंडी में विदेशी सब्जियों की फार्मिंग: अब नालंदा के सीओई में मिट्टी नहीं, बल्कि पानी में विदेशी पत्तेदार सब्जियों की खेती भी होने लगी है. यह संभव हो पाया है हाइड्रोपोनिक यूनिट से. यूनिट में तैयार लेट्यूस (सलाद पत्ता), पकचोई (पत्तेदार सब्जी) और बेसिल (तुलसी) की खेप पटना गया और राजगीर के साथ देश के नामचीन बड़े होटलों का जायका बढ़ा रही है. सब्जियों को बेचने के लिए टोकरी फ्रेस फूड एजेंसी के करार किया गया है. फरवरी तक सब्जियों की खेप पटना भेजी जाएगी.

सेंटर ऑफ एक्सीलेंस एग्रोनॉमिस्ट मनोज कुमार मिश्रा ने बताया कि सीओई में इंडो-इजरायल प्रोजेक्ट चलाया जा रहा है. इसके तहत एरोपोनिक्स और हाइड्रोपोनिक्स सिस्टम के तहत फार्मिंग की जाती है.हाइड्रोपोनिक्स के जरिए हम विदेशी सब्जियां उगा रहे हैं. विदेशी सब्जियों के बीज दिल्ली से मंगवाए जाते हैं.

"बीज से हम प्लांट तैयार करते हैं. 15-20 दिन में ट्रांसप्लांट के लिए पौधा तैयार हो जाता है. ट्रांसप्लांट के 30-35 दिन बाद पौधा रेड हो जाता है. बीज डालने से लेकर हार्वेस्टिंग तक का प्रोसेस 60 दिनों का होता है. इसका बिहार के पटना, गया, राजगीर में मार्केट हैं. हमने लेट्यूस, की दो वैराइटी लगायी है. कुल तीन पौधे हम लगा रहे हैं. स्वास्थ्य के लिए काफी फायदेमंद हैं. इस सेंटर में यह खेती तीन साल से हो रही है."-मनोज कुमार मिश्रा, कृषि वैज्ञानिक, सेंटर ऑफ एक्सीलेंस

उत्पाद की ब्रांडिंग: अच्छी बात यह कि यहां तैयार उत्पाद की ब्रांडिंग की जा रही है. ताकि, राजधानी के साथ ही देश की बड़ी मंडियों तक इसकी पहुंच हो सके. इससे आय का स्रोत बढ़ेगा. सीओई में करीब 1000 वर्ग मीटर में हाइड्रोपॉनिक यूनिट बनाई गई है. यहां तीन सालों से लेट्यूस, पकचोई और बेसिल की खेती की जा रही है.
नई तकनीक से मुनाफा: इस बार अब तक करीब 123 किलो पटना भेजी गई है. 50 रुपए प्रति किलो के हिसाब से करीब 50 किलो पकचोई तो 62 रुपए किलो की दर तीन किलो बेसिल की खेप राजधानी भेजी गई है. इससे सीओई को करीब 32 हजार 806 रुपए का मुनाफा हुआ है. राहत यह कि दूसरी खेप के लिए भी एजेंसी द्वारा ऑर्डर दे दिया गया है. जल्द ही पत्तेदार सब्जियां तैयार भेजी जाएगी. पिछली बार भी हाइड्रोपोनिक यूनिट में सब्जियों की खेती की गई थी.

तापमान और नमी मेनटेन करना जरूरी: वहीं, सेंटर ऑफ एक्सीलेंस के एग्रोनॉमिस्ट मनोज कुमार मिश्रा ने ईटीवी से बताया कि इस फसल के लिए दिन का तापमान 24 से 28 डिग्री सेल्सियस और रात का 18 से 22 डिग्री सेल्सियस उपयुक्त होता है. नमी 50 से 60 प्रतिशत रहनी चाहिए. यह तीसरे वर्ष की फसल है, जो करीब एक महीने में तैयार हो जाती है. एक पौधे का औसत वजन 250 से 350 ग्राम तक होता है. एक पौधे के 8 रुपए खर्च होता है.
सवा लाख रुपए तक की आमदनी: यह फसल हाइड्रोपोनिक सिस्टम के जरिए पानी में उगाई जाती है, जिसकी मांग पटना और दिल्ली के पांच सितारा होटलों में है. बाजार में इसका भाव 70 से 80 रुपए प्रति किलो तक मिलता है. एक सीजन में करीब दो से ढाई हजार किलो उत्पादन होता है, जिससे लगभग सवा लाख रुपए की आमदनी हो जाती है. पौधे की नर्सरी दिल्ली से मंगाई जाती है. बीच लाकर यहां ट्रांसप्लांट किया जाता है, जिसमें 15 से 20 दिन का समय लगता है. इसके बाद मुख्य खेत में रोपाई की जाती है.

हाइड्रोपोनिक यूनिट में तीन वैरायटी: सीओई के प्रभारी रोहिताश्वर कुमार और प्रखंड उद्यान पदाधिकारी पवन कुमार पंकज कहते हैं कि हाइड्रोपोनिक यूनिट में तीन वैरायटी के पौधे लगाये गये हैं. खास यह कि पौधे 20 से 25 दिनों में तैयार हो जाते हैं. बेसिल व पकचोई मल्टी क्रॉप फसल है.
"ढाई से तीन सप्ताह के अंतराल पर इसकी कटाई की जाती है. जबकि, लेट्यूस सिंगल क्रॉप है. इसकी एक बार कटाई की जाती है. पत्तेदार सब्जियां सलाद बनाने में काम आती हैं. स्वास्थ्य के लिए इसे काफी बेहतर माना जाता है."- रोहिताश्वर कुमार,सीओई के प्रभारी

इस विधि में मिट्टी की जरूरत नहीं पड़ती है. पानी में बालू या कंकड़ डालकर पौधे लगाए जाते हैं. पौधों को पोषक तत्व देने के लिए विशेष तरह का घोल का इस्तेमाल होता है. वह भी काफी कम मात्रा में, घोल में नाइट्रोजन, फास्फोरस, पोटाश, मैग्नीशियम, कैल्शियम, सल्फर, जिंक, आयरन को एक खास अनुपात में मिलाया जाता है.
हवा में रहने के कारण बीमारियों की संभावना कम: ऑक्सीजन को पंपिंग मशीन के जरिए पौधे की जड़ों तक पहुंचाया जाता है. फसलों का मिट्टी और जमीन से संपर्क नहीं होने के कारण इनमें बीमारियां कम लगती हैं. इस तकनीक से उगाई गईं सब्जियां और पौधे अधिक पौष्टिक होते हैं.

हाइड्रोपॉनिक यूनिट में बिना मिट्टी के पत्तेदार सब्जियां तैयार की जाती हैं. इसबार तीन वेरायटी की सब्जियों की खेती की जा रही है. पटना की एजेंसी से सब्जियों को बेचने के लिए करार हुआ है. पौधे तैयार हो जाते हैं तो एजेंसी के कर्मी खुद यहां से सब्जियां ले जाते हैं. इससे सीओई को आय का श्रोत मिला है.
सेंटर ऑफ एक्सीलेंस फॉर वेजिटेबल: सेंटर ऑफ एक्सीलेंस फॉर वेजिटेबल भारत सरकार और इजराइल के सहयोग से स्थापित केंद्र है, जो किसानों के उन्नत, वैज्ञानिक और आधुनिक सब्जियों की खेती की तकनीक की ट्रेनिंग देता है, ताकि इससे उच्च गुणवत्ता वाली, रोग मुक्त सब्जियां उगा सकें. इसका मकसद किसानों की आय को बढ़ाना भी है और देश को कृषि के क्षेत्र में आत्मनिर्भर बनाने का तरीका है.
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