-20 डिग्री और कई फीट बर्फ के बीच कैसे बांटी जाती है डाक, सोचकर ही ठंडा पड़ जाएगा शरीर
डाक बांटना किसी को भी आसान लग सकता है, लेकिन लाहौल स्पीति जैसे बर्फीले इलाकों में ये किसी जंग से कम नहीं हैं.

By ETV Bharat Himachal Pradesh Team
Published : February 18, 2026 at 7:27 PM IST
शिमला: सुबह के साढ़े नौ बजे हैं...बाहर तापमान माइनस 20 डिग्री के आसपास है. जिस्पा की घाटी मोटी बर्फ की चादर में ढकी है. हवा इतनी ठंडी है कि सांस लेते ही सीने में सुई-सी चुभती है, ऐसे में जब ज्यादातर लोग घरों में अंगीठी के पास सिमटे रहते हैं, तब एक छोटा-सा दरवाज़ा खुलता है जिस्पा ब्रांच पोस्ट ऑफिस का. 47 वर्षीय ब्रांच पोस्टमास्टर शेरब गैलछन ऊनी टोपी और मोटे दस्ताने पहने, दरवाज़े पर जमी बर्फ हटाते हैं. चाबी घुमाकर ताला खोलते हैं और भीतर प्रवेश करते हैं. लकड़ी की मेज़, रजिस्टर, मुहरें, चिट्ठियों के बंडल सब उनका इंतज़ार कर रहे होते हैं. ये कोई फिल्म का सीन नहीं है ये एक डाकिये की रोजाना की रूटनी है.
सड़क किनारे या मोहल्ले की गली के आखिर में या डाकघर के बाहर लगा लाल रंग का लेटर बॉक्स व्हाट्स एप और सोशल मीडिया के दौर में आज भी जिंदा है. उसकी चमक फीकी नहीं हुई है. आज ये लाल लेटर बॉक्स लोगों के घर घर में संदेशा और चिट्ठी पहुंचाने का काम करता है. डकिया इस लेटर बॉक्स को खोलता है और घर-घर जाकर चिट्ठी को उसके मालिक को सौंप देता है. काम बहुत आसान लगता है, लेकिन सोचिए कई फीट बर्फ के बीच माइनस डिग्री तापमान में ये काम कितना मुश्किल होता होगा. बर्फ की सफेद चादर हर तरफ बर्फ ही बर्फ ये कल्पना मात्र ही किसी को रोमांटिसाइज करती हो, लेकिन कुछ लोगों के लिए काफी थकाऊ और रोज का रूटीन है.
-20 डिग्री में करना होता है काम
हिमाचल का लाहौल स्पीति जिला. यहां के छोटे से कस्बे जिस्पा के ब्रांच पोस्ट ऑफिस में पोस्टमास्टर शेरब मुस्कुराते हुए कहते हैं '–20 में काम करने का मज़ा ही कुछ और होता है. मैं सेवा की भावना से ऐसे मौसम में काम करता हूं. इसी वजह से लोग विभाग पर भरोसा करते हैं.' करीब 30 वर्षों से, 1997 से लेकर आज तक, शेरब गैलछन इस दुर्गम इलाके में डाक विभाग की जिम्मेदारी निभा रहे हैं. अकेले ही पूरी ब्रांच चलाना, हर लक्ष्य पूरा करना, बैंकिंग सेवाएं संभालना, मनी ऑर्डर, पेंशन, पार्सल सब कुछ. उनका रास्ता कई फीट बर्फबारी भी नहीं रोक सकती, वो कई फीट बर्फीली पहाड़ियों से भी टक्कर लेते हुए डाक समय पर लोगों तक पहुंचाते हैं. इसे वो अपना कर्तव्य समझते हैं.
बर्फाले रास्तों में डाक का बस्ता उठाकर चल रहे डाकिये
लाहौल स्पीति में जब बर्फ गिरती है तो हाथ पांव सुन्न हो जाते हैं. खून जम जाता है, लेकिन डाक सेवा नहीं रुकती. हंसा गांव की शिरिंग डोलमा कहती हैं कि हमारे गांव में ढाई फिट बर्फ गिरी है, लेकिन गांव में पेंशन, चिट्ठी और दूसरी डाक सेवाएं चल रही हैं. ये कहानी सिर्फ एक पोस्टमास्टर की नहीं है. यह कहानी है उस जज़्बे की, जो लाहौल और स्पीति की बर्फीली वादियों में भी गर्माहट बनकर जलता है. यह कहानी है उन डाक कर्मियों की, जो महीनों तक जमी सड़कों, फिसलन भरी पगडंडियों और जमा देने वाली हवाओं के बीच भी लोगों तक उम्मीद पहुंचाते हैं. शेरब के साथ इसी घाटी में 55 वर्षीय समतेन डोलकर 1997 से रंगरीक में सेवा दे रही हैं, और 19 साल की युवा डाकिया शगुन नेगी बर्फीले रास्तों पर अपने कंधों पर डाक का बस्ता उठाकर चल रही हैं.

बर्फबारी में भी नहीं रुकती डाक सेवा
जब भारी हिमपात के कारण मशीनों के पहिए थम जाते हैं, तब भी खाकी बैग कंधे पर टांगे कुछ लोग बर्फ को चीरते हुए आगे बढ़ते हैं. ये भारतीय डाक विभाग के प्रहरी हैं, जिनके लिए उनकी 'ड्यूटी' एक इबादत की तरह है. चाहे बर्फीला तूफान हो या बर्फ का पहाड़ ये डाकघर के दरवाजे पर बिना रुके हुए पहुंचाते हैं. किसी का आधार कार्ड, पेंशन, एग्जाम का एडमिट कार्ड घर पहुंचाना हो या किसी को नौकरी का ज्वाइनिंग लैटर देना हो ये डाकिया ही हम तक पहुंचाता है.
आसान नहीं है लाहौल में डाक बांटना
डाक बांटना किसी को भी आसान लग सकता है. शहरों में डाकिया साइकिल पर घंटी बजाते हुए आता है और गेट से आवाज लगाकर चिट्टी अंदर फेंक कर चला जाता है, लेकिन लाहौल स्पीति में ऐसा नहीं होता. यहां एक चिट्ठी पहुंचाना किसी जंग से कम नहीं है. कई किलोमीटर की चढ़ाई पैदल चढ़नी पड़ती है. कई बार बर्फीले तूफान में भी बिना रुके और बिना थके काम जारी रखना पड़ता है. कई फीट बर्फ में रास्ते भी गायब हो जाते हैं. ढलानों पर पैर फिसलने के कारण मौत भी हो सकती है, लेकिन इसके बाद भी डाक सेवा नहीं रुकती.
समतेन डोलकर: 29 वर्षों सालों से जमी बर्फ पर सेवा की इबारत
स्पीति घाटी का रंगरीक गांव. सर्दियों में यहां घर की दहलीज लांघना भी किसी जंग को जीतने जैसा है. इसी गांव की गलियों में पिछले 29 सालों से एक परिचित चेहरा नजर आता है 55 वर्षीय समतेन डोलकर का वर्ष 1997 की बात है, जब समतेन ने डाक विभाग में कदम रखा था. उस दौर में न हाथ में मोबाइल था, न गांवों तक इंटरनेट की तरंगें पहुंचती थीं. चिट्ठी ही इकलौता जरिया थी अपनों का हाल जानने का और सुनाने का. समतेन याद करती हैं, 'जब मैंने शुरुआत की, तो लोग हैरान थे. वो पूछते थे कि क्या एक महिला इस हाड़ कंपाने वाली ठंड में और इन खतरनाक रास्तों पर डाक बांट पाएगी?'. समतेन को लेकर जो भी लोगों के सवाल थे जल्दी ही कच्ची बर्फ की तरह पिघल गए. 29 सालों से बिना रुके डाक बांट रही हैं. मौसम चाहे कैसा भी हो. बर्फाली तूफान हो धूप हो समतेन रोज डाक उठाती हैं और पगडंडियों, बर्फ के जमे हुए रास्तों पर घर घर डाक बांटती हैं. समेतन कहती हैं 'कई बार जब बर्फीला तूफान आता है तो घर से किसी को साथ ले जाना पड़ता है, वो आगे चलकर डंडे से रास्ता चेक करता है. सर्दियों में बर्फ के बीच घुटनों तक जूतों या बोरी, कपड़े से टांगों को कवर करना पड़ता है, ताकि बर्फ अंदर न घुसे.'

बुजुर्गों की मुस्कान मिटा देती हैं थकान
सर्दियों में लाहौल स्पीति में तापमान माइनस में होता है. यहां से मुंह से निकली सांस भी सेकेंड में जम जाती है और पैरों के नीचे की बर्फ कांच की तरह फिसलती है. कई बार बर्फ कमर तक होती है ऐसे में खुद अपना रास्ता बनाना पड़ता है. चिट्ठियों का नुकसान न हो इसका भी ख्याल रखना पड़ता है. भावुक होकर समतेन कहती हैं, 'जब मैं किसी बुजुर्ग के घर पहुंचती हूं और उनके हाथ में उनकी पेंशन या मनीऑर्डर थमाती हूं, तो उनके चेहरे की वो झुर्रियों वाली मुस्कान मेरी सारी थकान और ठंड को सोख लेती है. उस वक्त लगता है कि मेरा ये सफर सफल हो गया.' समते के लिए डाक का वो थैला सिर्फ कागज का बोझ नहीं, बल्कि जिम्मेदारी और लोगों का इंतजार है.
19 साल की उम्र, फौलादी इरादे और कंधों पर जिम्मेदारी
जहां आज के दौर में युवा पीढ़ी रील और सोशल मीडिया की चकाचौंध में खोई रहती है, वहीं शगुन नेगी लाहौल-स्पीति की उन दुर्गम पगडंडियों पर अपने भविष्य और सेवा की राह तलाश रही हैं. शगुन इस इलाके की सबसे युवा महिला डाकिया हैं, उनकी उम्र 19 साल है, देखने में शगुन की उम्र कम लग सकती है, लेकिन वो समझदार किसी तजुर्बेकार फौजी जैसी. शगुन बताती हैं, 'सर्दियों में यहां हर कदम पर मौत का डर होता है. फिसलन ऐसी कि एक पैर चूका नहीं कि गहरी खाई सामने होती है. कभी-कभी डर लगता है कि क्या मैं घर लौट पाऊंगी? पर फिर किसी बीमार बुजुर्ग की दवाइयां या किसी बच्चे के एडमिशन का लेटर याद आता है, और डर गायब हो जाता है. इरादा और भी मजबूत हो जाता है. ये इरादा ड्यूटी पूरी करने में मदद करता है.'
सपनों और फर्ज का तालमेल
शगुन सिर्फ एक डाकिया नहीं हैं, वो एक बेटी और एक छात्रा भी हैं. 12वीं के बाद वे डिस्टेंस लर्निंग से अपनी ग्रेजुएशन पूरी कर रही हैं. उनके पिता बस कंडक्टर हैं, और शगुन अपनी इस नौकरी से परिवार का सहारा बन रही हैं. वो कहती हैं, 'शुरुआत में अकेले इन वीरान रास्तों पर चलने में घबराहट होती थी, लेकिन अब ये रास्ते मेरे दोस्त बन गए हैं. डाक देना सिर्फ एक सरकारी काम नहीं है, डाक के साथ हम प्यार, भरोसा भी पहुंचाते हैं, जब हम डाक लोगों के घर पहुंचाते हैं लोगों का हमे खूब प्यार, तारीफ मिलती है. कई बार खाना खाने का भी समय नहीं मिलता.' आज शगुन को देखकर गांव की दूसरी बेटियां भी ये सपना देखने लगी हैं कि वो भी मुश्किलों को मात दे सकती हैं.

शेरब गैलछन 20 डिग्री का 'हॉटस्पॉट'
जिस्पा के ब्रांच पोस्टमास्टर शेरब गैलछन (49 वर्ष) पिछले 30 सालों से इस सेवा में हैं. 1997 से विभाग को अपनी सेवाएं दे रहे शेरब उस इलाके में तैनात हैं जहां सर्दियों में जनजीवन पूरी तरह ठहर जाता है, लेकिन शेरब का दफ्तर कभी नहीं ठहरता. वो बड़े गर्व से कहते हैं, '-20 डिग्री में जब बाहर पानी जम जाता है, तब दफ्तर की कुर्सी पर बैठकर लोगों की सेवा करने का मजा ही कुछ और है. डाक लेने के लिए हैड ऑफिस केलंग जाना पड़ता है. इसके बाद 25 किलोमीटर का सफर कर वापस जिस्पा आते हैं.' मेरा मानना है कि सेवा की भावना जितनी गर्म होगी, बाहर की ठंड उतनी ही कम लगेगी.' शेरब अकेले ही पूरी ब्रांच का जिम्मा संभालते हैं, चाहे बैंकिंग ट्रांजेक्शन हो या डिजिटल इंडिया के तहत आधार से जुड़े काम, शेरब सुनिश्चित करते हैं कि घाटी का कोई भी व्यक्ति तकनीक और सुविधाओं से पीछे न रह जाए.
इस कठिन सेवा के पीछे केवल इन कर्मियों की मेहनत ही नहीं, बल्कि विभाग का कुशल प्रबंधन भी है. उच्चाधिकारी इन कर्मचारियों के जज्बे को सलाम करते हैं. सतीश कुमार, हेड पोस्टमास्टर (तांदी) कहते हैं, 'लाहौल-स्पीति में डाक सेवा चलाना किसी युद्ध स्तर के ऑपरेशन जैसा है. तांदी जैसे संवेदनशील और दुर्गम केंद्रों पर हमारे कर्मचारी केवल डाकिये नहीं, बल्कि लोगों के लाइफलाइन हैं, जब भारी बर्फबारी में इंटरनेट की लाइनें कट जाती हैं, तब ये कर्मचारी मैन्युअल तरीके से रिकॉर्ड रखते हैं और सुनिश्चित करते हैं कि किसी की पेंशन या जरूरी कागजात रुकने न पाएं. शेरब गैलछन और समतेन जैसे कर्मचारी विभाग की रीढ़ की हड्डी हैं.'

'सेवा परमो धर्म:'
रामपुर पोस्ट ऑफिस से पूरे क्षेत्र की कमान संभालने वाले अधीक्षक जोगिंदर सिंह चौधरी बताते हैं,'हमारा विभाग 'सेवा परमो धर्म:' के सिद्धांत पर चलता है. लाहौल-स्पीति जैसे 'हार्ड एरिया' में ड्यूटी करना शारीरिक और मानसिक रूप से बहुत चुनौतीपूर्ण है. हम समय-समय पर अपने कर्मचारियों की हौसला-अफजाई करते हैं. शगुन नेगी जैसी युवा बच्चियों का इस क्षेत्र में आना हमारे लिए गौरव की बात है. हमारा लक्ष्य है कि 'लास्ट माइल कनेक्टिविटी' यानी आखिरी घर तक सरकारी सुविधाएं पहुंचें, और इसमें हमारे ये हिमवीर पूरी तरह सफल रहे हैं. इन विषम परिस्थितियों में भी हमारा 'बिजनेस टारगेट' पूरा करना इनकी कर्तव्यनिष्ठा का प्रमाण है.'
लाहौल-स्पीति की ये कहानियां हमें याद दिलाती हैं कि तकनीक कितनी भी आगे बढ़ जाए, मानवीय संवेदनाओं और शारीरिक श्रम का कोई विकल्प नहीं है, जब डिजिटल इंडिया के सिग्नल पहाड़ों की ऊंचाई पर दम तोड़ देते हैं, तब शेरब गैलछन का रजिस्टर और समतेन डोलकर, शगुन जैसे हिमवीरों के कदम ही असली 'कनेक्टिविटी' बनते हैं.
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