Exclusive : जुड़वा भाई जेईई एडवांस्ड टॉपर, अब साथ पढ़ने के लिए एक IIT Bombay छोड़ मद्रास को चुनेगा
आईआईटी बॉम्बे की सीएस ब्रांच मिल रही है, लेकिन महारूफ भाई के साथ पढ़ने के लिए आईआईटी मद्रास चुन रहे हैं. मनीष गौतम की रिपोर्ट...

Published : June 2, 2026 at 8:16 PM IST
कोटा: ओडिशा से कोटा आकर तीन साल से पढ़ रहे जुड़वा भाई महारूफ व मसरूर भी जेईई एडवांस्ड टॉपर रहे हैं. एक भाई का 32 ऑल इंडिया रैंक है तो दूसरे की 169 बनी है. पढ़ाई की शुरुआत से लेकर अब तक दोनों साथ पढ़ते आ रहे थे, लेकिन अब एक साथ पढ़ना मुश्किल होता. रैंक में अंतर के चलते संभव नहीं था.
ऐसे में एक भाई ने दूसरे के लिए सैक्रिफाइस किया है. जहां पर देश में सभी टॉपर्स आईआईटी बॉम्बे में पढ़ना चाहते हैं, लेकिन महारूफ, जिसके 32 ऑल इंडिया रैंक है और आसानी से उन्हें आईआईटी बॉम्बे की कंप्यूटर साइंस सीट मिल जाती, लेकिन अपने भाई मसरूर के लिए त्याग करते हुए आईआईटी मद्रास को चुनना पसंद किया है. जहां पर दोनों भाइयों का कंप्यूटर साइंस में एडमिशन हो जाएगा.
महारूफ का कहना है कि मुझे आईआईटी बॉम्बे की सीएस ब्रांच मिल रही है, लेकिन मैं अपने भाई के साथ ही पढ़ना चाहता हूं. इसलिए आईआईटी मद्रास में कंप्यूटर साइंस की सीट लेना चाह रहा हूं. मसरूफ ने भावुक होते हुए कहा कि मुझे काफी अच्छा लग रहा है कि भाई का सपोर्ट मिल रहा है. दोनों का आपस में सपोर्ट है, हम एक दूसरे को चाहते हैं. इसीलिए एक साथ पढ़ना चाह रहे हैं. अब मद्रास आईआईटी कंप्यूटर साइंस में बीटेक करेंगे. पेरेंट्स का कहना है कि दोनों भाई एक दूसरे की मदद कर रहे हैं, यह हमारे लिए गर्व का क्षण है. यह भाइचारा हमेशा बना रहे. भाई ऊपर है और करियर को नीचे माना है. ऐसा देखकर कोई भी पेरेंट्स गर्व महसूस ही करेगा.
मां ने छोड़ दी थी जॉब : महारूफ के जेईई एडवांस्ड में 32 रैंक आई है, जबकि जेईई मेन में 44 रैंक है. वहीं, दसवीं में 95.20 व 12वीं में 98.6 प्रतिशत अंक है. मसरूर की जेईई एडवांस्ड में 169 रैंक आई है, जबकि जेईई मेन में 58 रैंक है. वहीं, दसवीं में 97.6 व 12वीं में 94.6 प्रतिशत अंक है. दोनों के पिता डॉ. मंसूर अहमद खान एमडी मेडिसिन हैं. वह आईआईटी भुवनेश्वर की डिस्पेंसरी के इंचार्ज हैं, जबकि मां डॉ. जीनत बेगम एमएस गायनेकोलॉजी हैं. ओडिशा पावर ट्रांसमिशन कॉरपोरेशन लिमिटेड के अस्पताल में सरकारी चिकित्सक थीं, लेकिन बच्चों को कोटा पढ़ने के चलते जॉब छोड़कर आ गई थीं. कोटा आने का लक्ष्य भी बच्चों की पढ़ाई पूरी होने के साथ सफल हुआ है.

दोनों का एक रूटीन, एक दूसरे के डाउट भी करते थे सॉल्व : महारूफ का कहना है कि कोटा में काफी सपोर्टिव एनवायरनमेंट रहा है. भाई भी मुझे काफी सपोर्ट कर रहा था. टीचर्स गाइड करते थे, उनको हम फॉलो करते थे. दोनों भाई का सुबह से लेकर शाम तक का एक पूरा रूटीन था, जिसको भी फॉलो करते थे. कोचिंग में 5 घंटे पढ़ाई होती थी. उसके बाद करीब एक घंटा डाउट क्लियर भी करते थे.
इसके बाद 6 घंटे में घर पर अलग-अलग टुकड़ों में सेल्फ स्टडी करते थे. वहीं, रीक्रिएशन या फिर मूड फ्रेश करने के लिए साथ में 1 घंटे बैडमिंटन खेलते थे. कुछ देर फोन चलाते थे, जिसमें भी स्टडी मैटेरियल से संबंधित काम ही होता था. दैनिक दिनचर्या में भी उनके करीब 3 घंटा खर्च हो जाता था. वहीं, 7 घंटे की नींद पूरी लेते थे.

कैसा कंपटीशन था आपस में ? : महारूफ का कहना है कि काफी हेल्दी कंपटीशन दोनों में था. एक दूसरे के वीक टॉपिक व डाउट को क्लियर करते थे, ताकि दोनों मजबूत हो जाए. अगर डाउट बच जाते तो टीचर से पूछ लेते थे. हालांकि, ज्यादा टीचर से पूछने की भी जरूरत नहीं पड़ी. हम आपस में ही सॉल्यूशन निकाल लेते थे. टेस्ट में कम मार्क्स आने पर भी हम आपस में सपोर्ट करते थे. एक दूसरे को कभी कमजोरी महसूस नहीं होने दिया. एक साथ ही हम आगे बढ़े हैं. खुद का भी डेडिकेशन था कि अच्छा ही करना है. इसी वजह से अच्छा रिजल्ट हमारा रहा है.
लक्ष्य: सिविल सर्विसेज की तरफ जाना : पेरेंट्स डॉक्टर थे, तो आप इधर क्यों आए हैं. इस सवाल के जवाब में दोनों भाइयों का कहना है कि हमारा नवीं में इंटरेस्ट मैथमेटिक्स में था. इसलिए आईआईटी व इंजीनियरिंग की तरफ झुकाव था. पिता ने पूछा तो कह दिया कि आईआईटी क्रैक करना है और कोटा से ही पढ़ाई करनी है. मसरूर का कहना है कि आईआईटी मद्रास से दोनों कंप्यूटर साइंस में बीटेक करेंगे और उसके बाद हमारा लक्ष्य सिविल सर्विसेज की तरफ होगा. इसके अलावा इंडियन इंस्टिट्यूट ऑफ मैनेजमेंट (आईआईएम) से पढ़ाई का सोच रखा है. जिसमें ज्यादा अवसर मिलेंगे, हम वह करेंगे. प्राथमिकता सिविल सर्विसेज रहेगी, लेकिन आईआईएम में भी हमें अवसर मिला तो उधर भी चले जाएंगे.

मां को मिले पूरा क्रेडिट : बच्चों की सफलता में क्रेडिट के सवाल पर पिता डॉ. मंसूर अहमद खान का कहना है कि दोनों भाइयों को शुरुआत से ही मैथमेटिक्स में इंटरेस्ट था. उन्होंने कक्षा 9 में पेरेंट्स के सामने क्लियर किया कि वह आईआईटी की तरफ ही जाना चाहते हैं. पैरेंट्स ने थोड़ा सा समझाया, लेकिन जब वह नहीं माने तो उन्होंने बच्चों की बात मानना सही समझा. उन्हें इंजीनियरिंग एंट्रेंस के लिए कोटा भेजा और साथ में बच्चों को पढ़ाने डॉ. जीनत कोटा आ गई थीं. मेरी पत्नी डॉ. जीनत बेगम को ही ज्यादा क्रेडिट मिलना चाहिए, क्योंकि मुझे छुट्टी नहीं मिलती थी. दो महीने में 7 दिन के लिए कोटा आता था, लेकिन डॉ. जीनत ने ही दोनों को सपोर्ट किया और अकेले ही किया है.
कोटा की पढ़ाई और फैकल्टी को बताया नंबर वन : डॉ. जीनत बेगम का कहना है कि मेरा रोल बच्चों की हेल्थ का ध्यान रखना और मेंटल सपोर्ट का था. पढ़ाई बच्चे स्वयं ही कर लेते थे. डाउट से लेकर सब कुछ टीचर्स ही सॉल्व करते थे. इसके अलावा उनकी फूड हैबिट्स का ध्यान रखती थी. बच्चों का पढ़ाई के दौरान अप डाउन आता रहता है, उन्हें समझाती थी कि सभी बच्चों से प्रभावित होते हैं. डिप्रैस होने की जगह पॉजिटिव होकर गलती में सुधार करें. अगले एग्जाम में बेहतर प्रदर्शन करें.
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कोटा की नंबर वन पढ़ाई है, यहां वातावरण काफी अच्छा है. देशभर से पढ़ाई के लिए बेस्ट बच्चे यहां पर आ रहे हैं. अच्छे बच्चों का संग यहां पर रहने को मिलता है, उन्हीं को देखकर लगता है कि और भी अच्छा किया जाए. यहां पढ़ाई का सिस्टम काफी स्ट्रांग और अच्छा है. टीचर कभी ना नहीं करते हैं. स्टडी मैटेरियल भी काफी हाईलेवल है और टीचर्स भी यहां पर इंडिया के बेस्ट टीचर हैं.
कोटा को लेकर सब कुछ गलत सुना था : डॉ. मंसूर अहमद खान का कहना है कि कोटा को लेकर जो हमने सुना था, वह बिल्कुल गलत सुना था. हमें लगता है कि कोटा और यहां का सिस्टम बेस्ट है. मैं यहां नहीं रहता था, लेकिन एकेडमिक्स और नॉन एकेडमिक सब सपोर्ट कोटा में मिल रहा था. कोटा के काफी आभारी हैं, क्योंकि यहां पर दोनों बच्चे मां के साथ रहे है. इसीलिए सब कुछ उन्हें सपोर्ट मिलता रहा.
दादा की तरह बनेंगे इंजीनियर : दोनों को मेडिकल की पढ़ाई के लिए प्रेशर के सवाल पर डॉ. खान का कहना है कि मैंने कहा था कि मेडिकल की तरफ आप दोनों आ जाओ, लेकिन इनका इंक्लिनेशन इंजीनियरिंग की तरफ था. इसलिए यह नहीं आए. हमने भी सोच लिया कि ये जहां पर एक्सेल कर सकते हैं, वहीं करने दिया जाए. उनके पिता मुजम्मिल अहमद खान ने भारत के नंबर एक संस्थान आईआईएससी बेंगलुरु से बीटेक मैटेरियल्स इंजीनियरिंग में की थी. ऐसे में मैंने सोचा पिता इंजीनियर थे तो मैं डॉक्टर बना. अब मेरे बच्चे इंजीनियर बन जाएंगे. दोनों बच्चों को दादा ने भी कहा था कि आप बिल्कुल फ्री हैं. अपनी मर्जी हो, वो पढ़ाई कीजिए.

