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पोस्टर से इंस्टाग्राम तक पहुंचा DUSU चुनाव, 72 साल में बदला प्रचार का अंदाज

1954 में पहली बार हुआ था चुनाव, कभी दीवारों पर दिखते थे पोस्टर-पर्चे, अब रील्स और डिजिटल कैंपेन से छात्रों तक पहुंच रहे उम्मीदवार

DUSU चुनाव के लिए बदला प्रचार का अंदाज
DUSU चुनाव के लिए बदला प्रचार का अंदाज (ETV Bharat)
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By ETV Bharat Delhi Team

Published : September 2, 2026 at 9:30 PM IST

9 Min Read
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नई दिल्ली: दिल्ली विश्वविद्यालय छात्र संघ (DUSU) चुनाव सिर्फ अध्यक्ष, उपाध्यक्ष, सचिव और संयुक्त सचिव चुनने की प्रक्रिया नहीं है, बल्कि यह दिल्ली की छात्र राजनीति का सबसे बड़ा मंच भी माना जाता है. करीब सात दशक से अधिक लंबे चुनावी सफर में DUSU का प्रचार भी लगातार बदलता रहा है. 1954 में जब पहली बार चुनाव हुआ, तब प्रचार का सबसे बड़ा माध्यम छात्रों के बीच व्यक्तिगत संपर्क और बैठकों तक सीमित था. समय के साथ पोस्टर, पर्चे, नारे और जुलूस चुनावी प्रचार का हिस्सा बने. बाद में तकनीक के साथ EVM ने मतदान का तरीका बदला और अब सोशल मीडिया ने प्रचार की तस्वीर बदल दी है.

मुख्य चुनाव अधिकारी प्रोफेसर राज किशोर शर्मा ने बताया कि 18 सितंबर 2026 को होने वाले DUSU चुनाव में इस बदलाव की झलक साफ दिखाई दे रही है. विश्वविद्यालय ने इस बार प्रिंटेड पोस्टर, पर्चे, फ्लेक और दूसरी मुद्रित प्रचार सामग्री पर सख्ती की है. ऐसे में उम्मीदवारों और छात्र संगठनों ने इंस्टाग्राम रील्स, वीडियो, डिजिटल पोस्ट और सोशल मीडिया अभियानों को प्रचार का प्रमुख माध्यम बनाना शुरू कर दिया है. यानी जिस चुनाव में कभी कॉलेज की दीवारें प्रचार का सबसे बड़ा मैदान हुआ करती थीं, वहां अब मोबाइल की स्क्रीन भी उतनी ही अहम हो गई है.

DUSU चुनाव को लेकर चुनाव अधिकारी प्रोफेसर राज किशोर शर्मा का बयान (ETV Bharat)

1954 में शुरू हुई चुनावी परंपरा

DUSU की स्थापना 1949 में हुई थी और 1954 में पहली बार चुनाव कराए गए. दिल्ली विश्वविद्यालय प्रशासन के अनुसार, शुरुआती दौर में छात्र राजनीति का स्वरूप आज से काफी अलग था. उस समय बड़े छात्र संगठनों का मौजूदा रूप नहीं था और छात्र नेताओं का प्रचार मुख्य रूप से व्यक्तिगत संपर्क, बैठकों और छात्र समूहों के माध्यम से होता था. शुरुआती वर्षों में दिल्ली की मुख्यधारा की राजनीति का प्रभाव भी छात्र राजनीति पर दिखाई देता था. 1970 के दशक की शुरुआत तक कांग्रेस से जुड़े अलग-अलग गुट छात्र राजनीति में प्रभावशाली रहे. 1971 में NSUI के गठन और उसके बाद DUSU चुनाव में सक्रिय होने से छात्र राजनीति का स्वरूप बदला. आगे चलकर ABVP और NSUI के बीच मुकाबला DUSU चुनाव की पहचान बनता गया.

दीवारें बनीं चुनावी प्रचार का मैदान

समय के साथ DUSU चुनाव का प्रचार कैंपस की दीवारों तक पहुंच गया. उम्मीदवारों के नाम और नारे लिखे पोस्टर कॉलेजों के आसपास दिखाई देना आम बात बन गई. पोस्टर और पर्चे बांटना उम्मीदवारों की पहचान बनाने का अहम माध्यम था. चुनाव के दौरान कॉलेजों में छात्र नेताओं के समूह घूमते थे. उम्मीदवार छात्रों से व्यक्तिगत रूप से मिलते, उनकी समस्याएं सुनते और अपने मुद्दे बताते थे. बड़े-बड़े पोस्टर और वाहनों के काफिले चुनावी माहौल का हिस्सा बनने लगे. हालांकि, इसी प्रचार शैली को लेकर विश्वविद्यालय और अदालतों के स्तर पर समय-समय पर चिंता जताई जाती रही. सार्वजनिक संपत्ति के नुकसान, दीवारों पर पोस्टर लगाने और प्रचार में अत्यधिक खर्च को लेकर नियमों को सख्त किया गया.

DUSU चुनाव को लेकर तैयारियां
DUSU चुनाव को लेकर तैयारियां (ETV Bharat)

2006 में EVM से बदला मतदान का तरीका

DUSU चुनाव में तकनीक का एक बड़ा बदलाव मतदान की प्रक्रिया में आया. 2006 में चुनाव के लिए EVM का इस्तेमाल शुरू हुआ. इससे मतदान और मतगणना की प्रक्रिया पहले की तुलना में अधिक तकनीकी हो गई. यानी एक तरफ चुनावी प्रचार पारंपरिक तरीकों से आगे बढ़ रहा था, तो दूसरी तरफ मतदान प्रक्रिया भी तकनीक से जुड़ रही थी. आज ईवीएम DUSU चुनाव का नियमित हिस्सा है और अब प्रचार भी तेजी से डिजिटल माध्यमों पर निर्भर हो रहा है.

इस बार दीवारों पर नहीं, डिजिटल स्क्रीन पर जोर

2026 के चुनाव में विश्वविद्यालय ने प्रचार को लेकर सख्त नियम लागू किए हैं. प्रिंटेड पोस्टर, पर्चे और अन्य मुद्रित सामग्री के इस्तेमाल पर रोक है. उम्मीदवार निर्धारित ‘Wall of Democracy’ पर ही हाथ से बने पोस्टर लगा सकते हैं. बड़े वाहनों, वाहन परेड, लाउडस्पीकर और प्रचार के लिए दूसरी निर्धारित गतिविधियों पर भी प्रतिबंध है. उम्मीदवार के चुनावी खर्च की अधिकतम सीमा 5,000 रुपये रखी गई है. प्रचार के दौरान उम्मीदवारों को विश्वविद्यालय के नियमों और लिंगदोह समिति की सिफारिशों का पालन करना होगा. इन पाबंदियों का सीधा असर प्रचार के तरीके पर पड़ा है. जहां पहले एक पोस्टर सैकड़ों छात्रों को नजर आता था, वहीं अब उम्मीदवार उसी संदेश को एक रील या डिजिटल पोस्ट के माध्यम से छात्रों तक पहुंचा रहे हैं.

DUSU चुनाव
DUSU चुनाव कैंपेन (ETV Bharat)

रील्स बनीं नए दौर की चुनावी पर्ची

इंस्टाग्राम रील्स और छोटे वीडियो इस चुनाव में प्रचार का नया हथियार बनकर सामने आए हैं. उम्मीदवार अपने मुद्दों को छोटे वीडियो में बता रहे हैं. छात्र संगठनों की सोशल मीडिया टीमें डिजिटल पोस्ट, वीडियो और दूसरे कंटेंट तैयार कर रही हैं. छात्रों के बीच भी मोबाइल और सोशल मीडिया के बढ़ते इस्तेमाल ने इस बदलाव को आसान बनाया है. एक वीडियो को एक साथ बड़ी संख्या में छात्र देख सकते हैं और उसे आगे साझा भी किया जा सकता है. इससे उम्मीदवारों को कैंपस के एक हिस्से तक सीमित रहने के बजाय व्यापक स्तर पर अपनी बात रखने का मौका मिल रहा है.

ABVP और NSUI ने बदली रणनीति

DUSU चुनाव में प्रमुख छात्र संगठन ABVP और NSUI दोनों डिजिटल माध्यमों के साथ जमीनी संपर्क पर भी जोर दे रहे हैं. ABVP ने ‘My DU, My Manifesto’ अभियान के जरिए छात्रों से सुझाव जुटाने की पहल की है. संगठन की ओर से कॉलेजों और विभागों में छात्रों से संपर्क कर उनके मुद्दों को समझने की कोशिश की जा रही है. इसके साथ ही सोशल मीडिया के जरिए इन मुद्दों को ज्यादा छात्रों तक पहुंचाया जा रहा है. NSUI ने ‘मेरा कैंपस, मेरा घोषणापत्र’ अभियान चलाया है. संगठन के मुताबिक, अभियान के दौरान करीब 6,000 से अधिक सुझाव मिले हैं. इन सुझावों को छात्र घोषणापत्र का हिस्सा बनाने की तैयारी है. NSUI DUSU प्रभारी अखिलेश यादव ने बताया कि NSUI सोशल मीडिया पर ‘Accountable DU’, ‘Accountable DUSU’ और ‘Students for Accountability’ जैसे अभियानों के जरिए भी छात्रों से जुड़ रहा है.

DUSU चुनाव कैंपेन का बदला अंदाज
DUSU चुनाव कैंपेन का बदला अंदाज (ETV Bharat)

ABVP ने 13 संभावित प्रत्याशियों के साथ शुरू किया प्री-कैंपेन

चुनाव से पहले अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद (ABVP) ने अपने 13 संभावित प्रत्याशियों की सूची जारी कर दी है. संगठन के मुताबिक, ये संभावित उम्मीदवार दिल्ली विश्वविद्यालय के अलग-अलग परिसरों में जाकर छात्रों से सीधे संवाद करेंगे. ABVP के घोषित संभावित प्रत्याशियों में आलोक अत्री, आयुषी शर्मा, ईशु मौर्य, कृष्ण यादव, लक्ष्य राज सिंह, नितिन तंवर, प्रियांशु महामना, रिया छावड़ी, रिया मलिक, सनी डेढ़ा, तान्या मावी, वरुण यादव और यश डबास शामिल हैं. ABVP दिल्ली प्रदेश मंत्री सार्थक शर्मा ने कहा कि करीब एक सप्ताह तक चलने वाले इस प्री-कैंपेन के दौरान उम्मीदवार छात्रों की समस्याएं, अपेक्षाएं और सुझाव जानेंगे. इन सुझावों को आगामी घोषणापत्र में शामिल करने की योजना है.

हाथ से लिखे पर्चों की भी वापसी

डिजिटल प्रचार बढ़ने के बावजूद पूरी तरह से पुराने तरीके खत्म नहीं हुए हैं. प्रिंटेड पर्चों पर रोक के बाद हाथ से लिखे छोटे कार्ड और नाम-पर्चियां फिर दिखाई देने लगी हैं. यानी DUSU का चुनाव इस बार दो दौर के बीच खड़ा दिखाई दे रहा है. एक तरफ हाथ से लिखे पोस्टर और व्यक्तिगत संपर्क हैं, तो दूसरी तरफ रील्स और डिजिटल कैंपेन. हालिया प्रचार में दोनों तरीके साथ-साथ दिखाई दे रहे हैं.

आमने-सामने से स्क्रीन-टू-स्क्रीन प्रचार

DUSU चुनाव का मूल तरीका हालांकि अभी भी नहीं बदला है. उम्मीदवारों को छात्रों के बीच जाना पड़ रहा है, उनकी समस्याएं सुननी पड़ रही हैं और कॉलेज स्तर पर संगठन की पकड़ मजबूत करनी पड़ रही है. लेकिन अब उस जमीनी संपर्क को सोशल मीडिया की पहुंच से जोड़ा जा रहा है. पहले छात्र किसी उम्मीदवार का नाम कॉलेज की दीवार पर लगे पोस्टर से देखते थे. अब वही उम्मीदवार मोबाइल स्क्रीन पर रील के जरिए दिखाई दे रहा है. पहले नारे और संदेश पर्चे के जरिए छात्रों तक पहुंचते थे, अब वही संदेश कुछ सेकंड के वीडियो में सामने आ जाता है.

क्या डिजिटल प्रचार बदलेगा DUSU चुनाव

DUSU चुनाव के प्रचार में आया यह बदलाव सिर्फ माध्यम बदलने तक सीमित नहीं है. यह छात्र राजनीति के बदलते तरीके को भी दिखाता है. 1954 के व्यक्तिगत संपर्क से शुरू हुआ सफर पोस्टर-पर्चे, जुलूस और EVM से होते हुए अब Instagram और डिजिटल कैंपेन तक पहुंच गया है. इस बार सख्त प्रचार नियमों के बीच उम्मीदवारों को कम समय में ज्यादा छात्रों तक अपनी बात पहुंचाने की चुनौती है. ऐसे में सोशल मीडिया उनके लिए बड़ा अवसर भी है और चुनौती भी. अब देखना यह होगा कि 18 सितंबर को जब छात्र मतदान केंद्रों तक पहुंचेंगे, तब उनकी पसंद पर कैंपस में हुई आमने-सामने की बातचीत ज्यादा असर डालती है या मोबाइल स्क्रीन पर दिखाई गई चुनावी मुहिम.

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