नशे के खिलाफ पंजाब में ड्रग सेंसस, पर इन आंकड़ों का क्या करेगी मान सरकार ? विपक्ष का विरोध
सरकार का कहना है कि ये जनगणना नशे के खिलाफ बेहतर नीति बनाने को लेकर है. वरिंदर थिंड और कवलजीत कौर की रिपोर्ट.

Published : June 20, 2026 at 8:05 AM IST
चंडीगढ़/लुधियाना : क्या आपके परिवार का कोई सदस्य ड्रग्स की समस्या से जूझ रहा है या आपके इलाके में नशीले पदार्थों का सेवन एक बड़ी समस्या है ? पंजाब के सरकारी टीचर जसविंदर ऐसे ही सवालों की लिस्ट लेकर रोज सुबह सात बजे घर से निकलते हैं.
देशभर में हो रही जनगणना से अलग पंजाब के हजारों सरकारी कर्मचारी इन दिनों पहली बार एक ऐसी जनगणना कर रहे हैं, जिसके तहत राज्य में नशा करने वालों की गिनती हो रही है. इसे पंजाब की भगवंत मान सरकार ने ड्रग और सामाजिक आर्थिक जनगणना (Drug And Socio Econony Census) नाम दिया है.
जसविंदर का कहना है कि वह रोज करीब 8 से 10 घरों में ये जनगणना कर रहे हैं. औसत से 15 से 20 मिनट एक घर में लगता है और रोज करीब 4 घंटे का वक्त इसमें देते हैं. पंजाब में जिन भी सरकारी शिक्षकों की ड्यूटी इसमें लगी है, उन्हें 250 घरों का टारगेट दिया गया है.
पंजाब में नशीली दवाओं का दुरुपयोग समय-समय पर सरकारों के लिए सिरदर्द रहा है और यह समस्या खत्म होने का नाम नहीं ले रही है. पंजाब सरकार ने 2025 के बजट के दौरान घोषणा की थी कि राज्य में नशीली दवाओं से संबंधित एक सामाजिक और आर्थिक जनगणना की जाएगी.
साल 2025 में, पंजाब सरकार ने इसके लिए 150 करोड़ रुपये का बजट रखा था. 28 हजार कर्मचारी 65 लाख परिवारों के घर-घर जाकर सर्वे करेंगे. यह काम पूरे राज्य में 5 मई, 2026 से शुरू हो गया है. इसके लिए पंजाब के सरकारी और कॉन्ट्रैक्ट (संविदा) पर काम करने वाले शिक्षकों के साथ-साथ कंप्यूटर ऑपरेटरों को भी काम पर लगाया गया है. वे इन आंकड़ों को जुटा रहे हैं. इस जनगणना से पंजाब में नशीली दवाओं की लत के शिकार लोगों की संख्या का पता चलेगा.
पंजाब में क्यों पड़ी इस तरह की जनगणना की जरूरत?
"उड़ता पंजाब" का तमगा लिए राज्य की ये पहचान इस नशे के कारण ही हुई है. सामाजिक न्याय और अधिकारिता पर संसदीय स्थायी समिति की 51वीं रिपोर्ट (2022-23) के आंकड़ों के मुताबिक पंजाब में भांग, कोकीन, चरस और अन्य सिंथेटिक ड्रग्स करने वाले लोगों की तादाद 63 लाख से ज्यादा है.

अफसोस की बात ये है कि बच्चे भी नशे के जाल में फंसते जा रहे हैं. इसी रिपोर्ट के मुताबिक पंजाब में 10 से 17 साल की उम्र के करीब 6 लाख से ज्यादा बच्चे इन नशीले पदार्थों का इस्तेमाल कर रहे हैं. ये उस राज्य के हालात हैं जहां की आबादी 2011 की जनगणना के तहत 2.77 करोड़ थी. इस हिसाब से प्रदेश की 20 फीसद से ज्यादा आबादी नशे के जाल में फंसी हुई है. ये आंकड़े अपने आप में डराने वाले हैं.
पंजाब सरकार की ओर से 1 मार्च 2025 को 'युद्ध नशे के विरुद्ध' शुरू किया गया था. पंजाब के डीजीपी गौरव यादव ने बताया कि साल 2025 में इस अभियान के तहत कुल 29,784 एफआईआर दर्ज की गई और कुल 39,867 गिरफ्तारियां हुई. इस दौरान रिकॉर्ड 2,021 किलो हेरोइन पकड़ा गया.
इसके अलावा 35,000 किलो पॉपी हस्क, 698 किलो अफीम, 26 किलो आईसीई, 55.78 लाख नशीली गोलियां समेत अन्य नशे बरामद किए गए. साथ ही बीते साल 16.81 करोड़ ड्रग मनी भी पंजाब पुलिस की ओर से जब्त की गई.
हर साल ड्रग ओवरडोज से हो रही मौतें
पंजाब सरकार नशीली दवाओं पर रोक लगाने के लिए 'नशीली दवाओं के खिलाफ जंग' (war against drugs) जैसा अभियान चला रही है. लेकिन एनसीआरबी का डेटा दिखाता है कि पंजाब में नशीली दवाओं के कारण बड़ी संख्या में मौतें हो रही हैं. देश में नशीली दवाओं से संबंधित मौतों के मामले में पंजाब दूसरे नंबर पर है.

एनसीआरबी के डेटा के मुताबिक, साल 2024 में पंजाब में ओवरडोज (जरूरत से ज्यादा मात्रा में नशीली दवा लेने) के कारण 106 लोगों की मौत हुई. इसी तरह, अगर पिछले सालों के डेटा की बात करें, तो 2023 में ऐसी 89 मौतें हुई थीं. 2022 में ड्रग ओवरडोज से 144 लोगों की मौत हुई थी, जबकि 2021 में यह आंकड़ा 78 था. चार सालों में पंजाब में ड्रग ओवरडोज के कारण कुल 417 मौतें हुई हैं.
इस जनगणना के बाद क्या?
प्रदेश भर में इस जनगणना के जरिये सरकार नशा करने वालों की संख्या के साथ उनसे जुड़ी अन्य जानकारियां इकट्ठा करना चाहती है. सरकार के मुताबिक इससे नशा करने वालों की पहचान होगी, साथ ही कौन से नशे ज्यादा प्रचलित हैं उनका भी पता लगेगा.
साल 2025 के बजट में इस अनोखे जनगणना प्रोग्राम की घोषणा करने वाले मुख्यमंत्री भगवंत मान भी कह चुके हैं कि इस तरह से आंकड़े इकट्ठा होने पर सरकार को नई नीति बनाने में मदद मिलेगी. इसी आधार पर नशा मुक्ति केंद्र बनाने के साथ-साथ ऐसे युवाओं के पुनर्वास का इंतजाम भी किया जाएगा.
स्वास्थ्य मंत्री डॉ. बलबीर सिंह ने बताया कि ये जनगणना नशे के खिलाफ बेहतर नीति बनाने को लेकर है. हमारी सरकार ने 'युद्ध नशे के विरुद्ध' कैंपेन शुरू किया था, जिसके तहत नशा करने वालों की पहचान की जा रही है. उनके खिलाफ कोई कानूनी कार्रवाई नहीं होगी. उन्हें नशा मुक्ति केंद्र ले जाया जा रहा है, उन्हें काम सिखाया जा रहा है. लेकिन नशा तस्करों के खिलाफ कड़ी कानूनी कार्रवाई हो रही है.
अधिकारी घर-घर जाकर क्या सवाल पूछ रहे हैं?
नशीली दवाओं से जुड़ी जनगणना के लिए कुल 26 सवाल पूछे जा रहे हैं, जिनका जवाब परिवार को सर्वे करने वाले की मदद से देना है. इनमें नाम, पता, परिवार के सदस्य, जाति, धर्म, घर का मुखिया कौन है, परिवार कहां का रहने वाला है, जैसी जानकारी शामिल हैं. सारी जानकारियां गुप्त रखी जाएंगी.

ऐसे सवाल पूछे जाएंगे... जैसे, किस तरह के नशे का इस्तेमाल होता है ? नशे की समस्या कितनी बड़ी है ? इलाके में नशीली दवाएं कहां से आती हैं ? गांव से सरकारी नशा मुक्ति केंद्र कितनी दूर है ? मुख्यमंत्री द्वारा शुरू किए गए अभियान के बारे में क्या राय है ? क्या नशाखोरी रोकने में मदद मिली है या नहीं ? ये सभी सवाल सर्वे का हिस्सा हैं.
इसके अलावा, पढ़े-लिखे परिवार के सदस्यों की जानकारी, विदेश गए परिवार के सदस्यों की जानकारी, परिवार पर कर्ज की जानकारी, इलाज कहां होता है (निजी या सरकारी), घर में कितनी और किस तरह की गाड़ियां हैं, ये सभी सवाल भी सर्वे का हिस्सा हैं.
इस जनगणना में क्या परेशानियां आ रही हैं?
डेमोक्रेटिक टीचर फ्रंट के पदाधिकारी दलजीत सिंह बताते हैं कि ड्रग जनगणना करने में काफी मुश्किलों का सामना करना पड़ रहा है. कई लोग खुलकर ये नहीं बताते कि घर में कौन नशा करता है.
डेमोक्रेटिक टीचर फ्रंट के जनरल सेक्रेटरी रुपिंदर पाल सिंह भी बताते हैं कि, शिक्षकों का काम पढ़ाना होना चाहिए लेकिन उन्हें इस ड्रग सेंसस में लगाया गया है. गांव से लेकर शहर तक कई परिवार ऐसे हैं जहां टीचर फॉर्म लेकर पहुंचते हैं तो कई परिवार इस बात पर बात नहीं करते कि उनके परिवार में कौन नशा करता है और किस तरह का नशा करता है. लोग बात करने में डरते हैं, खासकर नशा करने वाला क्यों बताएगा कि वो नशा करता है और कौन सा नशा करता है. इस तरह के कार्यक्रम के लिए काउंसलिंग की जरूरत है.
इस मामले पर सियासत भी हो रही है. कांग्रेस विधायक सुखपाल खैरा के मुताबिक "सरकार 26 तरह के सवाल पूछ रही है, लेकिन परिवार में बैठा कोई व्यक्ति कैसे और क्यों बता सकता है कि कोई ड्रग्स लेता है या नहीं, और अगर लेता है तो कौन सी ड्रग्स लेता है.
पंजाब के फुलवाल गांव में नशे के खिलाफ कमेटी बनाकर पंचायत को नशा मुक्त बनाने की पहल करने वाले समाजसेवी और पंच नवजिंदर सिंह सेखों भी मानते हैं कि इस तरह की जनगणना करवाने का फैसला अच्छा है, इससे इलाज मिलने में भी मदद मिलेगी. लेकिन सरकार की पहल के साथ-साथ परिवारों की सहमति जरूरी है.
अगर परिवार मानेंगे ही नहीं कि उनके परिवार का कोई सदस्य नशा करता है तो इस तरह के कदम कामयाब नहीं होंगे. क्योंकि कुछ वक्त बाद उस परिवार और खासकर नशा लेने वाले शख्स के लिए मुश्किलें बढ़ जाएंगी. इसलिये परिवारों को आगे आना होगा.
ड्रग जनगणना में लगे सरकारी टीचर जसविंदर सिंह बताते हैं कि कई परिवार इस तरह की जनगणना से बिल्कुल अनजान हैं. हम कई परिवारों में जाकर आर्थिक और सामाजिक जनगणना के नाम से ही बात करते हैं, क्योंकि ड्रग का नाम सुनकर कई परिवार हिचकते हैं. कई युवा ऐसे भी मिलते हैं जिन्हें देखकर साफ जाहिर होता है वो नशा करते हैं लेकिन परिवार के सामने वो इस बात से इनकार करते हैं.
अब अभियान से जुड़ेगा ई-रिक्शा
नशीली दवाओं के खिलाफ शुरू किए गए अभियान के तहत, पंजाब के स्वास्थ्य मंत्री ने कहा, "हम नशा करने वाले युवाओं का इलाज करवा रहे हैं. गांवों में कमेटियां बनाई गई हैं. नशा करने वालों को जेल की बजाय नशा मुक्ति केंद्र भेजा जा रहा है. विधायक गांवों तक पहुंच रहे हैं. लोगों की पहचान गुप्त रखने के लिए हमने ई-रिक्शा अभियान शुरू किया है, जिसमें एक ई-रिक्शा गांव-गांव और मोहल्ले में जाता है, जिसमें मुख्यमंत्री का रिकॉर्डिड संदेश सुनाया जाता है और उसमें एक बॉक्स रखा होता है, जिसमें लोग अपनी पर्ची डालकर नशीली दवाओं के बारे में जानकारी, शिकायत या सुझाव दे सकते हैं.
इन पर्चियों को पढ़ा जाता है और उस पर रिस्पॉन्स या एक्शन होता है. इस तरह के कदम को अच्छा समर्थन मिल रहा है. इसे पहले पायलट प्रोजेक्ट के रूप में शुरू किया गया था. अब इसे सभी 117 विधानसभाओं में शुरू किया जाएगा. हम लोगों से अपील करेंगे कि वे हमें ज्यादा से ज्यादा उन लोगों के बारे में जानकारी दें, जो नशीली दवाएं बेच रहे हैं या नशा कर रहे हैं. हम जानकारी देने वाले की पहचान पूरी तरह से गुप्त रखेंगे. हम चाहते हैं कि गांवों में ज़्यादा से ज़्यादा नशा मुक्ति केंद्र खुले और नशीली दवाएं बेचने वालों के खिलाफ कार्रवाई हो."
"पंजाब सरकार नशीली दवाओं के दुरुपयोग को रोकने के लिए 'नशे के खिलाफ जंग' अभियान चला रही है, जिसे लोगों का अच्छा समर्थन मिल रहा है. इसके साथ ही, नशीली दवाओं से जुड़ा एक सर्वे (सेंसस) भी किया जा रहा है, जिससे पता चलेगा कि गांवों में लोग किस तरह के नशे का इस्तेमाल कर रहे हैं, और वे इसे कैसे और कहां से हासिल करते हैं. इससे भविष्य की नीतियां बनाने में बहुत मदद मिलेगी, साथ ही युवाओं को नशा मुक्ति केंद्रों तक भेजने में भी सहायता मिलेगी." - हरदीप सिंह मुंडियां, कैबिनेट मंत्री
5 मई से ड्रग सेंसर शुरू हुआ
पंजाब सरकार द्वारा किए जा रहे ड्रग्स से जुड़े सामाजिक-आर्थिक सर्वे के लिए ट्रेनिंग सेशन पूरे हो चुके हैं. लुधियाना के एडिशनल डिप्टी कमिश्नर अमित बांबी ने जानकारी देते हुए बताया कि "यह सर्वे औपचारिक रूप से 5 मई से शुरू हो गया है. इस दौरान, हर सर्वे करने वाला व्यक्ति (एन्यूमरेटर) लगभग 250 घरों को कवर करेगा. सरकार एन्यूमरेटर को प्रति घर 250 रुपये का मानदेय देगी, और इसकी निगरानी के लिए सुपरवाइजर भी नियुक्त किए गए हैं ताकि यह सर्वे पूरी ईमानदारी और लगन से किया जा सके."
क्या सिर्फ ड्रग सेंसस काफी है ?
पंजाब सरकार की इस पहल पर विपक्षी सवाल भी उठा रहे हैं, लेकिन पेशे से वकील और एंटी ड्रग कैंपन के साथ चाइल्ड लेबर के खिलाफ झंडा बुलंद करने वाले जितेंद्र मलिक कहते हैं कि पंजाब में नशे के फैलते जाल को देखते हुए सरकार का ये कदम साहसिक है, लेकिन ये भी समझना होगा कि सिर्फ आंकड़े जुटाना समाधान नहीं, बल्कि समाधान तक पहुंचने का रास्ता दिखाते हैं.
मलिक का कहना है कि, अगर ईमानदारी और वैज्ञानिक तरीके से जनगणना हो, जिसमें प्रचलित नशों के प्रकार, सबसे संवेदनशील इलाकों, आयु और समाज के विभिन्न वर्गों की जानकारी जुटाई जाए, तो ये जानकारी सरकार को अधिक प्रभावी नीति बनाने में मदद करेगी.
जितेंद्र मलिक इस बात की भी पैरवी करते हैं कि इस तरह के आंकड़े जुटाने की प्रक्रिया पूरी तरह से गोपनीय, पारदर्शी और निष्पक्ष होनी चाहिए. लोगों को सामाजिक बदनामी और कानूनी कार्रवाई का डर सही जानकारी देने में हिचक हो सकती है. इसलिये लोगों के बीच विश्वास पैदा करना होगा कि ये पहल किसी को सजा देने के लिए नहीं, बल्कि नशे के चंगुल से बाहर निकालने के लिए है.
जितेंद्र मलिक का कहना है कि, नशे पर नकेल कसने के लिए सिर्फ जनगणना काफी नहीं है. बहुआयामी और दीर्घकालिक प्रयास जरूरी हैं. नशे की सप्लाई चेन तोड़ने से लेकर ड्रग माफिया के खिलाफ कठोर एक्शन भी जरूरी है. दूसरी तरफ नशा मुक्ति केंद्रों की संख्या बढ़ाने के साथ-साथ उनकी गुणवत्ता में सुधार और पुनर्वास की मजबूत व्यवस्था करनी होगी. इसके अलावा युवाओं के लिए रोजगार और खेल के अवसर बढ़ाने होंगे.
इस लड़ाई में सरकार के साथ-साथ समाज, परिवार शिक्षण संस्थानों और धार्मिक सामाजिक संगठनों को भी जिम्मेदारी निभानी होगी क्योंकि नशा केवल कानून व्यवस्था का विषय नहीं है. ये सामाजिक, आर्थिक और मानसिक स्वास्थ्य से भी जुड़ा है.
दूसरे राज्यों के लिए सीख
पंजाब की पहचान नशे के फैलते जाल के कारण धूमिल हुई है, लेकिन नशे का ये जाल दूसरे राज्यों के युवाओं को भी फांस रहा है. ऐसे में पंजाब की स्थिति और मौजूदा ड्रग जनगणना तक पहुंचना दूसरे राज्यों के लिए भी सीख है. जितेंद्र मलिक के मुताबिक राज्य की वास्तविक स्थिति जानने के लिए ड्रग जनगणना करवाई जा सकती है ताकि नशे की वास्तविक स्थिति पता लगाकर ठोस और बेहतर नीतियां बन सके. लेकिन उससे पहले नशे के सौदागरों के खिलाफ ठोस कार्रवाई और युवाओं को मुख्यधारा से जोड़ने के लिए कार्यक्रम चलाने होंगे.
नशे के खिलाफ जन आंदोलन खड़ा करते हुए सरकारी प्रयासों के साथ सामाजिक जागरण भी जरूरी है और उसके लिए नीतियों के साथ-साथ नीयत भी चाहिए. नशा मुक्ति केंद्र चलाने वाले डॉ. इंदरजीत ढींगरा ने कहा कि "नशा पंजाबियों के लिए एक बड़ी समस्या बन गई है. 20 से 30 साल पहले, लोग पोस्ता और अफीम के आदी हुआ करते थे.
उनमें भी ज्यादातर बुजुर्ग या अधेड़ उम्र के लोग होते थे. लेकिन अब हालात बदल गए हैं. न सिर्फ युवा बल्कि नाबालिग भी सिंथेटिक ड्रग्स की चपेट में आ रहे हैं. लड़कियां भी नशा कर रही हैं, जिससे पीलिया और एचआईवी जैसी बीमारियां फैल रही हैं, क्योंकि सभी एक ही सिरिंज से नशा करते हैं."
डॉ. इंदरजीत ढींगरा ने कहा, "अगर हम ड्रग्स पर रोक लगाना चाहते हैं, तो हमें ज़्यादा से ज़्यादा नशा मुक्ति केंद्र खोलने होंगे और बच्चों से बात करके उन्हें मानसिक रूप से तैयार करना होगा। युवाओं की काउंसलिंग करनी होगी ताकि उन्हें नशे की दलदल से बाहर निकाला जा सके.
"ड्रग सेंसस से सरकार को डेटा और जमीनी हकीकत का पता चलेगा, लेकिन सवाल यह है कि नशा करने वालों का डेटा नशा मुक्ति केंद्रों के पास भी मौजूद है; ज़रूरत इस बात पर काम करने की है कि जो लोग पहले से ही नशे की लत का शिकार हैं, उन्हें इस दलदल से कैसे बाहर निकाला जाए."
विपक्ष का विरोध
हालांकि, ड्रग्स के खिलाफ अभियान को लेकर अलग-अलग विपक्षी पार्टियां सवाल उठा रही हैं. कांग्रेस विधायक सुखपाल खैरा ने कहा है कि "सरकार 26 तरह के सवाल पूछ रही है. परिवार में बैठा कोई व्यक्ति कैसे बता सकता है कि कोई ड्रग्स लेता है या नहीं, और अगर लेता है तो कौन सी ड्रग्स लेता है. हमें लगता है कि सरकार डेटा इकट्ठा कर रही है. यह सारा डेटा इकट्ठा करके चुनाव के दौरान एजेंसियों को दिया जाएगा, जबकि यह सर्वे सरकारी खर्च पर किया जा रहा है."
कांग्रेस सांसद सुखजिंदर सिंह रंधावा ने ड्रग सेंसस को लेकर पंजाब सरकार पर सवाल उठाए हैं. रंधावा ने कहा कि "भगवंत मान सरकार शराब को ड्रग्स की लिस्ट में शामिल नहीं कर रही है. पंजाब में हजारों माताओं और बेटियों की आंखों में आंसू हैं, उन पर कौन ध्यान देगा.
सरकार ने पंजाब में दावा किया था कि पंजाब को नशा मुक्त बनाया जाएगा, लेकिन शिक्षकों से कहा जा रहा है कि 'नो ड्रग' सेक्शन में शराब का जिक्र करें. पंजाब के मुख्यमंत्री के लिए शराब 'पावर वॉटर' है, लेकिन पंजाब के लोगों के लिए यह एक ऐसा नशा है जो घरों को बर्बाद कर रहा है."
बीजेपी के वरिष्ठ नेता तरुण चुघ ने कहा कि "पंजाब में ड्रग्स को लेकर जो सर्वे किया जा रहा है, वह पंजाब पुलिस, एसटीएफ और कानून लागू करने वाली एजेंसियों को करना चाहिए था, न कि शिक्षकों को यह सर्वे करने की ज़िम्मेदारी सौंपी जानी चाहिए थी."
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