GEN Z के लिए डिजिटल डिटॉक्स के फायदे बेशुमार, माइंड होगा क्लियर, नींद आएगी बेहतर, पीजीआई की रिसर्च से हुआ साबित
डिजिटल डिटॉक्स से युवाओं की मानसिक सेहत और नींद पर क्या असर पड़ता है, इसे लेकर पीजीआई के शोध में चौंकाने वाले नतीजे आए हैं.

Published : September 2, 2026 at 5:24 PM IST
|Updated : September 2, 2026 at 5:36 PM IST
चंडीगढ़ : मोबाइल और सोशल मीडिया से कुछ समय की दूरी युवाओं की मानसिक सेहत और नींद पर सकारात्मक असर डाल सकती है. अगस्त 2026 में अनाल्स ऑफ न्यूरो साइंसेज जर्नल में प्रकाशित इस शोध में पाया गया है कि चार सप्ताह के डिजिटल डिटॉक्स कार्यक्रम के बाद विश्वविद्यालय के छात्रों में डिप्रेशन, चिंता, तनाव और सोशल मीडिया से जुड़ा फोमो (कुछ छूट जाने का डर) कम हुआ है. वहीं, नींद की गुणवत्ता और माइंडफुलनेस में भी सुधार दर्ज किया गया है. इस शोध से जुड़े अहम पहलुओं को देखते हुए ईटीवी भारत ने पीजीआई के क्लीनिकल साइकोलॉजी डिपार्टमेंट के असिस्टेंट प्रोफेसर डॉ. किरण कुमार सोनी के साथ खास बातचीत की है.
200 विद्यार्थियों पर हुई रिसर्च : ये अध्ययन पीजीआईएमईआर, चंडीगढ़ के कृष्ण कुमार और पारुल यूनिवर्सिटी, वडोदरा के विजेंद्र नाथ पाठक ने किया है. शोध में वडोदरा जिले के 18 से 21 वर्ष की उम्र के 200 अंडरग्रेजुएट और पोस्टग्रेजुएट विद्यार्थियों को शामिल किया गया. इन्हें 100-100 छात्रों के दो समूहों में बांटा गया. एक समूह को चार सप्ताह का डिजिटल डिटॉक्स कार्यक्रम कराया गया, जबकि दूसरे समूह को नियंत्रण समूह के रूप में रखा गया.
डिजिटल डिटॉक्स के लिए प्रेरित किया गया : डॉ. किरण कुमार ने बताया कि डिजिटल डिटॉक्स के दौरान छात्रों को स्क्रीन टाइम कम करने, सोशल मीडिया से ब्रेक लेने और गैर-जरूरी नोटिफिकेशन बंद रखने के लिए प्रेरित किया गया. इसके साथ ही उन्हें मोबाइल के बजाय पैदल चलने, किताब पढ़ने, खेलकूद, खाना बनाने, पेंटिंग और परिवार के साथ समय बिताने जैसी गतिविधियों में शामिल होने की सलाह दी गई. हर सप्ताह 40 से 45 मिनट की आमने-सामने बैठक भी हुई.

डिप्रेशन, चिंता, तनाव घटा : अध्ययन में चार सप्ताह बाद डिप्रेशन का औसत स्कोर 18.20 से घटकर 14.12 रह गया. चिंता का स्कोर 18.07 से 14.11 और तनाव का स्कोर 21.11 से घटकर 17.09 हो गया. फोमो का स्तर भी 3.45 से कम होकर 2.59 दर्ज किया गया. नींद में भी सुधार देखने को मिला. स्लीप-क्वालिटी स्कोर 10.58 से 8.16 हो गया. इस पैमाने पर कम स्कोर बेहतर नींद को दर्शाता है. वहीं, माइंडफुलनेस का स्तर 3.33 से बढ़कर 4.24 हो गया.
सोशल मीडिया का इस्तेमाल भी अहम : शोध में मानसिक स्वास्थ्य संबंधी बीमारी का इलाज करा रहे छात्रों को शामिल नहीं किया गया था. इसलिए डिजिटल डिटॉक्स को डिप्रेशन या चिंता जैसी मानसिक स्वास्थ्य समस्याओं के इलाज का विकल्प नहीं माना जा सकता. डॉ किरण कुमार ने सुझाव दिया कि विश्वविद्यालयों में स्क्रीन-फ्री समय, डिजिटल वेलनेस को लेकर जागरूकता और खेलकूद, शारीरिक गतिविधियों तथा आमने-सामने संवाद के लिए अधिक अवसर उपलब्ध कराए जा सकते हैं.

डिजिटल डिटॉक्स ने की मदद : शोध के अनुसार जरूरत से ज्यादा डिजिटल मीडिया का इस्तेमाल चिंता, अवसाद, तनाव और खराब नींद की गुणवत्ता से जुड़ा पाया गया. वहीं, डिजिटल डिटॉक्स आधारित हस्तक्षेप के बाद प्रतिभागियों की मनोवैज्ञानिक स्थिति में सुधार के संकेत सामने आए यानी स्क्रीन से दूरी ने युवाओं को नींद और सुकून की ओर लौटने में मदद की. शोध में ज्यादा डिजिटल उपयोग के साथ भावनात्मक तनाव और खराब नींद की स्थिति देखी गई. अधिक डिजिटल मीडिया इस्तेमाल का संबंध ज्यादा चिंता, अवसाद और तनाव से भी पाया गया
युवाओं के सामने चुनौती : आज युवाओं के सामने चुनौती केवल स्क्रीन टाइम नहीं बल्कि डिजिटल ओवरलोड भी है. क्लास या काम के बीच नोटिफिकेशन, खाली समय में सोशल मीडिया, मनोरंजन के लिए वीडियो और रात में बिस्तर पर स्क्रीन देखने से दिमाग लगातार नई सूचनाएं हासिल करता रहता है. इंस्टाग्राम रील्स, शॉर्ट वीडियो, ऑनलाइन चैट, गेमिंग और सोशल मीडिया युवाओं की दिनचर्या का बड़ा हिस्सा बन चुके हैं. ऐसे में डिजिटल डिटॉक्स की जरूरत महसूस की जा रही है.

डिजिटल डिटॉक्स क्या है? : डिजिटल डिटाॅक्स का मतलब है कि कुछ समय के लिए मोबाइल, सोशल मीडिया या गैजेट्स से दूरी बनाना. जानबूझकर जब आप स्मार्टफोन, कंप्यूटर और सोशल मीडिया से दूर हो जाते हैं तो इसे डिजिटल डिटाॅक्स कहते हैं. डिजिटल डिटॉक्स से जीवन में कई अहम बदलाव आ सकते हैं.
डिजिटल डिटॉक्स का मतलब फोन छोड़ना नहीं : डिजिटल डिटॉक्स का मतलब मोबाइल, इंटरनेट या सोशल मीडिया को हमेशा के लिए छोड़ देना नहीं है. इसका उद्देश्य डिजिटल उपकरणों के साथ संतुलित रिश्ता बनाना है. बेवजह स्क्रॉलिंग कम करना, गैरजरूरी नोटिफिकेशन बंद करना, सोने से पहले स्क्रीन से दूरी बनाना और दिन में कुछ समय डिजिटल उपकरणों से पूरी तरह अलग रहना इसका हिस्सा है. डिजिटल डिटॉक्स का मतलब फोन से भागना नहीं बल्कि फोन को जिंदगी चलाने से रोकना है.
डिजिटल डिटॉक्स कैसे करें : सुबह की शुरुआत नोटिफिकेशन के बजाय अपनी दिनचर्या से करें. खाना खाते, पढ़ाई करते या परिवार के साथ समय बिताते वक्त मोबाइल अलग रखें. बिस्तर पर स्क्रॉलिंग करने के बजाय स्क्रीन से दूरी बनाएं. सोशल मीडिया के लिए निश्चित समय निर्धारित करें. दोस्तों परिवार से आमने-सामने बातचीत, खेल, टहलना और अन्य गतिविधियों को दिनचर्या में शामिल करें.
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