दीवार पर लगा पेंट बताएगा प्रदूषण का लेवल, धनबाद के दो बाल वैज्ञानिकों का कमाल, जानें कैसे करता है काम
धनबाद की दो स्कूली छात्राओं ने एक ऐसा पेंट बनाया है जो हवा में बढ़ते और घटते प्रदूषण के स्तर का पता लगा सकता है.

Published : January 11, 2026 at 6:07 PM IST
नरेंद्र निषाद की रिपोर्ट
धनबाद: लोगों को अक्सर पता नहीं होता कि वे जो हवा सांस ले रहे हैं, वह कितनी शुद्ध है. प्रदूषित हवा हमारे शरीर में गंभीर बीमारियां पैदा करती है. हमारे लिए यह जानना बहुत जरूरी है कि हमारे आस-पास की हवा साफ है या नहीं. यह पता लगाने के लिए हमें महंगी मशीनें लगाने की जरूरत नहीं है. कोयलांचल के दो बाल वैज्ञानिकों ने एक ऐसा पेंट बनाया है जो सिर्फ दीवार पर लगाने से ही हवा में प्रदूषण का पता लगा सकता है.
पर्यावरण को बचाने और हवा को पहचानने के लिए ये सार्थक पहल धनबाद के दो बाल वैज्ञानिक स्वरा और अव्या ने की है. डिगवाडीह की इन दोनों छात्राओं ने एक ऐसी नायाब चीज बनाई है. जिससे कम खर्च में हवा में फैले प्रदूषण को आसानी से पहचाना जा सकता है. छात्रों ने इसका नाम रखा है - बायोसिग्नल पेंट.
डिगवाडीह डीनोबिली स्कूल की छठी क्लास की छात्रा स्वरा और अव्या ने यह बायोसिग्नल पेंट बनाया है. इस पेंट को दीवार पर लगाने से हवा में प्रदूषण के बढ़ते और घटते स्तर के बारे में आसानी से जानकारी मिलती है. प्रदूषण का स्तर बढ़ने पर पेंट का रंग बदल जाता है. दीवार पर लगा पेंट शुरू में बैंगनी रंग का होता है, लेकिन हवा में कार्बन डाइऑक्साइड की मात्रा बढ़ने पर यह हरा हो जाता है. इसी तरह, जब हवा में कार्बन डाइऑक्साइड की मात्रा कम होती है, तो पेंट वापस अपने बैंगनी रंग में आ जाता है.
कैसे करता है बायोसिग्नल पेंट काम?
छात्रा स्वरा एस. राव ने बताया कि बायोसिग्नल पेंट प्रदूषण का स्तर बढ़ने पर रंग बदलता है. यह लाल पत्तागोभी(रेड कैबैज) के जूस और जिलेटिन पाउडर से बना है. एंथोसायनिन, एक कलर केमिकल है जो pH सेंसिटिव होता है. कार्बन डाइऑक्साइड की मात्रा बढ़ने पर यह बैंगनी से हरा हो जाता है. कार्बन डाइऑक्साइड की मात्रा कम होने के बाद यह अपने मूल बैंगनी रंग में लौट आता है.

स्वरा ने बताया कि माइनिंग एरिया में कोयला खनन के दौरान पूरा आस-पास का इलाका धूल के कणों से प्रदूषित हो चुका है. ऐसे एरिया में सांस लेना भी मुश्किल हो जाता है. जब उन्होंने इस स्थिति को देखा तभी उन्हें यह आइडिया आया. स्वरा ने बताया कि उनके पिता एक वैज्ञानिक हैं, और उनकी मदद से वह इसे बनाने में कामयाब हुईं.

इको-फ्रेंडली है बायोसिग्नल पेंट
छात्रा अव्या साहू ने बताया कि बायोसिग्नल पेंट इको-फ्रेंडली है. यह लाल पत्तागोभी (रेड कैबैज)के जूस और जिलेटिन पाउडर से बना है. अव्या ने बताया कि लाल पत्तागोभी pH सेंसिटिव होती है. इसमें एंथोसायनिन होता है, जो इस बात पर निर्भर करता है कि घोल या सॉल्यूशन एसिडिक है या क्षारीय. उसके अनुसार रंग बदलता है. इसके कारण यह काफी अच्छा प्राकृतिक pH सूचक (indicator) का काम करता है.

अव्या ने कहा कि जब भी आस-पास के वातावरण में कार्बन डाइऑक्साइड या किसी अन्य हानिकारक गैस की मात्रा बढ़ती है, तो रंग में परिवर्तन होता है. इसे बनाना काफी आसान है. रेड कैबैज को उबालकर उसका जूस निकालना है. पेंट बनाने के लिए जूस में जिलेटिन पाउडर मिलाना है. फिर पेंट को कागज पर लगाकर कुछ देर सूखने के लिए छोड़ देना है.
माता-पिता और शिक्षक गौरवान्वित
डिनोबिली स्कूल के प्रिंसिपल फादर सुशील सुमन ने कहा कि यह उनके लिए बहुत गर्व की बात है कि स्कूल की लड़कियों ने यह उपलब्धि हासिल की है. बच्चों ने स्कूल का नाम रोशन किया है. बायोसिग्नल पेंट लोगों के लिए बहुत फायदेमंद है. लोग इसका इस्तेमाल अपने आस-पास के प्रदूषण के लेवल का पता लगाने और फिर खुद को प्रदूषण से बचाने के लिए कदम उठाने में कर सकते हैं. स्टूडेंट्स की क्लास टीचर मिधा रानी ने कहा कि उन्हें बहुत गर्व महसूस हो रहा है. जब बच्चे कुछ अच्छा करते हैं, तो हमारा सिर और भी ऊंचा हो जाता है.

स्वरा के पिता डॉ. संतोष राव और अव्या की मां आरती साहू दोनों CIMFR में साइंटिस्ट हैं. डॉ. संतोष ने कहा कि बच्चे पर्यावरण के लिए कुछ करना चाहते थे. उन्होंने सलाह मांगी, जिसके बाद उन्हें यह जानकारी दी गई. बायोसिग्नल पेंट पॉल्यूशन डिटेक्टर की तरह काम करता है.
अव्या की मां आरती साहू ने कहा कि बच्चों द्वारा बनाया गया बायोसिग्नल पेंट समाज के लिए बहुत अच्छा है. विज्ञान के फायदे सभी तक पहुंचने चाहिए. कोई भी बायोसिग्नल पेंट का इस्तेमाल करके प्रदूषण के बारे में जानकारी हासिल कर सकता है और खुद को बचा सकता है.

माइनिंग एरिया में फैले प्रदूषण ने आव्या और स्वरा को इतना प्ररित किया कि उन्होंने समाज को नई दिशा देने के लिए एक पेंट का इजाद किया है. इन नन्हें वैज्ञानिकों को और प्रोत्साहित किया जाए तो आने वाले समय में ये हमारे पर्यावरण के लिए जरूर कुछ खास कर पाएंगे. उनके माता-पिता और शिक्षकों को भी उनसे यही उम्मीद है.
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