'गन' की जगह 'कलम' चुनकर युवाओं ने बदली किस्मत, अब बना बिहार का 'सरकारी नौकरी वाला गांव'
एक ऐसा गांव जो कभी नक्सलियों की महफूज जगह थी, लेकिन एक युवा के जज्बे ने पूरे गांव को 'सरकारी नौकरी वाला गांव' बना दिया...पढ़ें-

Published : December 20, 2025 at 8:05 PM IST
गया : बिहार के गया का एक ऐसा गांव जो बुनियादी सुविधाओं से कोसों दूर था. नक्सलियों की सुरक्षित पनाहगाह होने की वजह से यहां का विकास थम सा गया था. यहां जन्म लेने वाला युवा 'बंदूक' और 'कलम' में से 'बंदूक' को ही चुनने को मजबूर था. ऐसे विपरीत हालात में भी गांव के एक युवा ने सेना में नौकरी के लिए प्रयास किया. कठिन परिश्रम के चलते वह आर्मी में सलेक्ट भी हो गया. बस तभी से गांव के घर-घर में वह युवा लोगों की नजरों में 'आदर्श' बन गया और उसका संघर्ष एक 'नजीर' में बदल गया.
'गवर्नमेंट जॉब हब' बना देवजरा गांव : हम बात कर रहे हैं गया इमामगंज प्रखंड के देवजरा गांव की. ये एक ऐसा गांव था जो कभी नक्सलियों की गोद में बसता था, मजबूरी में ही सही लेकिन गांव के लोग नक्सलियों को एक वक्त का खाना जरूर देते थे. युवाओं के भविष्य के लिए नक्सली एक तरह सफेद कपड़े पर काले धब्बे की तरह थे. ऐसी परस्थिति में एक युवक नरेश प्रसाद ने अपने गांव से दुर्भाग्य के काले धब्बे को हटाने का जिम्मा उठाया. उसने विपरीत परस्थिति में सफलता प्राप्त की और एक बड़ा उदहारण पेश किया, जिससे प्रेरित होकर युवा पीढ़ी ने सफलता पाई. आज गांव में जितने घर नहीं हैं, उससे कहीं ज्यादा लोग सरकारी और बड़ी कंपनियों में नौकरी कर रहे हैं.
नक्सलगढ़ में ऐसे हुई नौकरी की शुरुआत : बात साल 2005 की है, गयाजी से लगभग 90 किलोमीटर दूरी पर स्थित है इमामगंज प्रखंड का देवजरा गांव. 2005 में गांव के एक युवक नरेश प्रसाद ने भारतीय फौज में नौकरी हासिल की थी. नरेश की नौकरी इसलिए भी खास है, क्योंकि तब उसके गांव में नक्सलियों का बड़ा प्रभाव था. खुद नरेश की आर्थिक स्थिति बेहद खराब थी. नरेश के एक रिश्तेदार निरंजन कुमार कहते हैं कि नरेश प्रसाद के माता-पिता बहुत गरीब थे, लेकिन नरेश प्रसाद के अंदर पढ़ाई लिखाई करने का बहुत ज्यादा जुनून था. कुछ करने की जिद ने उन्हें राह दिखाई.
''नरेश प्रसाद की शुरुआत ने इस गांव की तस्वीर बदली है. उनके बाद तो ऐसा लगा कि धीरे-धीरे हर युवा में नौकरी में जाने का जुनून सवार हो गया. एक समय ऐसा आ गया था कि कोई भी माता-पिता अपने बच्चों को घर पर रखना पसंद नहीं करते थे. सभी अपने बच्चों को कम से कम अनुमंडल मुख्यालय या जिला मुख्यालय में रखकर जरूर पढ़ाते थे. इसी वजह से धीरे-धीरे लोग सर्विस में आने लगे. मेरे गांव की एक खासियत यह भी है कि यहां के युवा सिर्फ सरकारी सेवा में ही नहीं हैं बल्कि दर्जनों ऐसे युवा हैं जो दूसरे राज्यों में निजी क्षेत्रों में अच्छी नौकरी करते हैं.''- सुदामा प्रसाद, गांव के बुजुर्ग

संघर्ष से नरेश ने बनाई राह : नरेश माता-पिता के इकलौते संतान थे, इस कारण घर की आर्थिक स्थिति को सुधारने में सहयोग करने की भी उनपर जिम्मेदारी थी. वह उस समय पैसे की कमी के कारण रात में मजदूरी के लिए खेत में हल जोतते थे. निरंजन कुमार कहते हैं कि आप उनकी आर्थिक स्थिति को इस तरह समझ सकते हैं कि उनके पास इतने भी पैसे नहीं होते थे कि वह बस से गयाजी शहर में शिक्षा से संबंधित कार्यों के लिए जाते, जरूरत पड़ने पर वो साइकिल से गया शहर जाते थे. जब 2005 में वह मिलिट्री दौड़ में गए थे तब भी वो साइकिल से ही गए थे. उनकी नौकरी के बाद ही गांव में बदलाव आया है, वो यहां के युवाओं के लिए उदाहरण बने हैं.
बिहार का सरकारी नौकरी वाला गांव : नरेश प्रसाद की सफलता से गांव के दूसरे युवक प्रभावित हुए, जिसके परिणाम स्वरूप गांव की किस्मत चमक गई, नरेश प्रसाद की मेहनत की कहानी ने गांव के लोगों को ऐसे झिंझोड़ा की लोग नक्सलियों के प्रभाव की परवाह किए बिना सफलता और सरकारी नौकरी के लिए संघर्ष शुरू कर दिया. वर्तमान में यहां के युवा पुलिस, रेलवे, शिक्षक, आर्मी, बैंकिंग और अन्य सरकारी सेक्टर में हैं. यहां के युवा मल्टी नेशनल कंपनियों में भी बड़े पद पर कार्यरत हैं, जिनकी तनख्वाह अच्छी खासी है.

''अब हमारे गांव की पहचान नक्सल प्रभावित होने से नहीं, बल्कि गवर्नमेंट विलेज के रूप में होती है. इस गांव के युवाओं को सरकारी नौकरी पाना आसान नहीं था, लेकिन माता-पिता के संघर्ष और युवाओं की कड़ी मेहनत से सफलता हासिल हुई है. गांव प्रखंड मुख्यालय से भी काफी अंदर और पिछड़े क्षेत्र में होने के बावजूद यहां के युवा का जज्बा जनून रुका नहीं है. दर्जनों छात्र अभी से सरकारी सेवा में जाने के लिए तैयारी कर रहे हैं.''- कमलेश प्रसाद, बिहार पुलिस में सब इंस्पेक्टर अमित कुमार के पिता, देवजरा गांव
लक्ष्य अभी अधूरा है : कमलेश प्रसाद कहते हैं कि बिहार में अभी वैकेंसी हर साल विभिन्न विभागों के लिए निकल रही है. यहां के एक-दो युवा उस हर वैकेंसी में सफल हो रहे हैं. लक्ष्य है कि अभी जितने छात्र-छात्राएं इंटर पास कर ग्रेजुएशन में हैं, वह सरकारी सेवा में जाएं. उसके लिए यहां का हर वो व्यक्ति जो सरकारी सेवा में चला गया है, वो ऐसे छात्रों को तैयारी में मदद कर रहा है, उन्हें परीक्षा के लिए मार्गदर्शन देता है कि किस तरह उन्हें तैयारी करनी है. कितनी देर पढ़ना है और किन किन चीजों पर उनका फोकस होना जरूरी है.

''गांव में सरकारी नौकरी-शुदा लोगों की भरमार है, एक खास बात ये है कि यहां के बच्चों को उन पर माता-पिता अपनी मर्जी नहीं थोपते. बच्चों की इच्छा के अनुरूप उनको गाइड करते हैं, अगर वो डॉक्टर-इंजीनियरिंग की पढ़ाई करना चाहते हैं तो उसके लिए भी भरपूर सहयोग किया जाता है.''- कमलेश प्रसाद, बिहार पुलिस में सब इंस्पेक्टर अमित कुमार के पिता, देवजरा गांव
IAS-IPS निकालने की तमन्ना : गांव के बगीचा वाली जगह पर बैठे कई बुजुर्गों ने एक सुर में कहा कि बस अब तो यही इच्छा है कि गांव का कोई युवा UPSC जरूर पास करे. यहां का युवा आईपीएस और आईएएस बने, इसके लिए छात्रों को प्रेरित भी किया जा रहा है. ऐसे छात्रों को सरकारी नौकरी वाले व्यक्ति मदद भी करते हैं. यहां जो आर्थिक रूप से कमजोर हैं उनकी मदद भी होती है, हालांकि अब ऐसा घर एक दो ही होंगे, लेकिन फिर भी सभी तरह से एक दूसरे की मदद करने का भाव है.

40 घर से 100 सरकारी नौकरी : इमामगंज प्रखंड के देवजरा गांव में 40 घर हैं, इन घरों के सभी परिवारों में कम से कम एक व्यक्ति सरकारी सेवा में जरूर है. गांव के लोगों के अनुसार पिछले 10 सालों में सब से अधिक लोग सरकारी नौकरी में आए हैं. 2022 में ही अमित कुमार बिहार पुलिस में दरोगा बने थे. 2024 में कई युवा शिक्षक बने. 2025 के बिहार पुलिस में पंचायत का एक युवक सब इंस्पेक्टर बना है. इस तरह कई और युवा हैं जो हाल के सालों में नौकरी में आए.
पहले सिर्फ एक-दो ही टीचर थे: पिछले 12 सालों में गांव में 30 से अधिक लोगों ने सरकारी नौकरी प्राप्त की है. हाल के 5 वर्षों में यानी के बिहार में नीतीश कुमार की सरकार ने जिस तरह से बड़े पैमाने पर वैकेंसी निकली थी, उस में 25 से 30 लोगों ने नौकरी हासिल की. यहां के युवा जो इंटर पास कर चुके हैं, वो अभी से सरकारी नौकरी की तैयारी में हैं. वैसे तो गांव में सरकारी नौकरी की शुरुआत 2005 से पहले से हुई थी, लेकिन वह पांच छ की ही संख्या थी, जो मास्टर साहब यानी 'शिक्षक' बने थे. हालांकि बाद में बड़े स्तर पर सरकारी नौकरी प्राप्त करने का लक्ष्य और रुझान साल 2005 के बाद नरेश प्रसाद की नौकरी से शुरू हुई थी.

नक्सलियों के घर में कलम की जोर आजमाइश : गांव के 70 वर्षीय बुजुर्ग कहते हैं कि हमारे गांव में बदलाव तब शुरू हुआ जब इस क्षेत्र में नक्सली दीमक की तरह फैल चुके थे. गरीबी के कारण क्षेत्र के युवक नक्सलियों के झांसे में आकर उनकी ओर खिंचे चले जा रहे थे. यह वह क्षेत्र था जो नक्सलियों की सुरक्षित जगह मानी जाती थी.
''यहां से दो युवा, दो अलग-अलग रास्तों पर चले. एक 'नरेश प्रसाद' हैं जिन्होंने गांव के लिए मान सम्मान बढ़ाने के साथ युवाओं के लिए अपनी सफलता का लक्ष्य प्राप्त कर उदाहरण सेट किया. नरेश प्रसाद ने बताया कि कलम ही किस्मत बदल सकती है. शिक्षा और सही रास्ते पर चलकर ही गरीबी से निकाल कर खुशहाली की ओर बढ़ा जा सकता है, जबकि गांव एक दूसरा युवक जिसने नक्सली संगठन को अपनाया था, आज उसका कोई नाम लेने वाला नहीं.''- देवजरा गांव के बुजुर्ग

मुख्यधारा से भटका विकास यादव : इस गांव के युवाओं की सफलता इसलिए भी महत्वपूर्ण है क्योंकि इसी गांव से 1995 के बाद एक युवा ने नक्सली संगठन को अपना माना था. उसने अपने हाथों में कलम की जगह हथियार थामा. गांव के एक व्यक्ति अपनी पहचान जाहिर नहीं करने की शर्त पर कहते हैं कि गांव का ही एक युवक विकास यादव नक्सली बना. वो आज भी नक्सली है. शुरुआती दौर में विकास ने कई बार यहां के युवाओं को गुमराह करने का प्रयास किया लेकिन वो अपने मकसद में सफल नहीं हो सका, क्योंकि ना सिर्फ यहां के गार्जियन सजग रहे बल्कि युवाओं ने भी नक्सली विचारधारा को नकार दिया.
''यहां के युवाओं के लिए विकास यादव जैसे व्यक्ति रोल मॉडल नहीं हो सकते. यहां के रोल मॉडल नरेश प्रसाद जैसे व्यक्ति हैं, जिन्होंने गरीबी में मुश्किलों से पले-बढ़े लेकिन वो मुख्यधारा से नहीं भटके. मां-बाप पढ़े लिखे नहीं थे फिर भी गांव के ऐसे युवा शिक्षित हुए, उनके बेटे खुद सरकारी सेवा में हैं. एक माता-पिता के लिए इससे बड़ी खुशी क्या होगी उसके बच्चों की सफलता से उनकी पहचान हो रही है.''- विनोद कुमार, देवजरा गांव

गांव में चपरासी से अधिकारी तक : देवजरा गांव में चपरासी से लेकर अधिकारी तक के पद पर लोग बहाल हैं, बिहार पुलिस में सब इंस्पेक्टर से लेकर बीपीएससी शिक्षक, रेलवे में जेई से लेकर ग्रुप बी, ग्रुप डी में होने से गांव की पहचान ही अलग है. नक्सल प्रभावित होने के बावजूद यहां के लोगों ने शिक्षा को महत्व दिया, जिसके नतीजे में वह आज नौकरी पाकर सफल हैं. इस गांव की दूसरे जगहों के लोग मिसाल देते हैं. देवजरा गांव की आर्थिक स्थिति भी बदल गई है, कच्चे मकान पुख्ता हो गए हैं, हालांकि नौकरी वाले गांव में माता-पिता खेती-बाड़ी और मजदूरी करते हैं, वो अपने कामों से पीछे नहीं हटे हैं.
सबसे अधिक रेलवे जॉब में गांव के युवा : गांव में अगर देखा जाए तो कई सेक्टर में यहां के युवा कार्यरत है. कृष्ण वल्लभ प्रसाद के घर में 4 लोग सरकारी नौकरी में हैं. इन में मिथलेश कुमार, उनकी पत्नी और भाई की पत्नी भी सरकारी नौकरी में है. इसी तरह सुरेंद्र प्रसाद के दो पुत्र टिंकल कुमार और बिट्टू कुमार रेलवे में हैं. विनोद प्रसाद के दो पुत्र शशि रंजन कुमार और पवन कुमार भी रेलवे में हैं.
जॉब हब बना देवजरा गांव : बृजेश प्रसाद के पुत्र रणधीर कुमार भी रेलवे में हैं. इसी तरह शिवकुमार प्रसाद के पुत्र सुबोध कुमार भारतीय फौज में हैं. हरिप्रसाद के पुत्र सुनील प्रसाद रेलवे में हैं. इसी तरह अतुल कुमार, अनुज कुमार, सुजीत कुमार, रंजीत रंजन, संजीव रंजन रेलवे में हैं, जबकि मिथलेश कुमार शिक्षक, भरत प्रजाति शिक्षक हैं. इसी तरह कुंदन कुमार डीआरडीओ में कार्यरत हैं, उनके अलावा मुन्ना कुमार, अजय कुमार, राकेश शर्मा, मुकेश यादव, धर्मेंद्र यादव, कुसुम कुमार, सुखनंदन प्रजापति, राकेश कुमार, गोपाल यादव, समेत कई लोग सरकारी सेवा में हैं.
''मेरा बेटा सब इंस्पेक्टर है. 2022 में उसकी नौकरी हुई थी. बेटे ने परीक्षा में बिहार में दूसरा रैंक प्राप्त किया था, लेकिन हम खेती मजदूरी करते हैं. मेरे पूर्वज भी खेती मजदूरी करते थे, हमने सोचा कि हम तो खेती मजदूरी करते हैं, मेरे बच्चे ऐसा नहीं करें बल्कि वह अच्छी नौकरी प्राप्त कर अच्छा जीवन गुजारें. बड़ी कठिनाइयों से अपने बेटे को पढ़ाया है. जिस समय उसको पढ़ाने का समय था, उस समय इस क्षेत्र में नक्सलियों का काफी प्रभाव था. हमारे गांव में नक्सली आते थे हमें मजबूरी में उनके लिए खाना इकट्ठा करके देना पड़ता था.''- कमलेश प्रसाद, दारोगा बेटे के पिता
सरकारी नौकरी में बेटियों का भी दमखम : वैसे इस गांव सिर्फ बेटे ही सरकारी नौकरी में नहीं हैं बल्कि यहां की बेटियां भी सरकारी नौकरी में हैं. निशु कुमारी डॉक्टर हैं. आरती कुमारी शिक्षिका हैं. प्रियंका कुमारी और अर्चना कुमारी हेडमास्टर हैं, बबिता कुमारी शिक्षिका हैं. गांव के लोगों के अनुसार बहु-बेटी मिला कर 10 महिलाएं सरकारी सेवा में हैं. यहां कुछ लोग सरकारी सेवा से रिटायर भी हो चुके हैं. जैसे हरि प्रसाद शिक्षक, कृष्ण वल्लभ प्रसाद शिक्षक, कालेश्वर प्रजापति शिक्षक आदि हैं जो अब रिटायर हो चुके हैं. ये सब 2005 से पहले नौकरी में आए थे.
'भूखे रहे लेकिन पढ़ाने में कमी नहीं की' : सुनीता देवी कहती हैं कि वो पुलिस अफसर की मां हैं. वो आज भी खेत में जा कर काम करती हैं. ''हमने बेटे को खेती बाड़ी करके ही पढ़ाया है, इसलिए वो उस समय को नहीं भूली हैं. एक समय ऐसा था जब घर में खाने के लिए अनाज जमा करने के लिए सोचना पड़ता था. तब खेती भी अच्छी नहीं होती थी. आज खेती भी अच्छी होने लगी है.''
देवजरा गांव के युवाओं ने बता दिया कि विसम हालात में भी अपनी मेहनत के बूते लक्ष्य को प्राप्त किया जा सकता है. बस विघ्न-बाधाओं से हार नहीं मानना चाहिए, सही दिशा में की गई कड़ी मेहनत खुद ही मंजिल तक पहुंचा देगी. यही देवजरा गांव के युवाओं के विकास का मूल-मंत्र है.
ये भी पढ़ें-

