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आदिवासी संस्कृति और लोककला की बुनियाद पर ही विकसित होगा बस्तर, जंगल और युवा इसकी ताकत- पद्मश्री पंडीराम मंडावी

बस्तर में नक्सलवाद समाप्ति के बाद विकास की क्या स्थिति है. पद्मश्री पंडीराम मंडावी ने इस पर क्या कहा. पेश है भूपेंद्र दुबे की रिपोर्ट

Padma Shri Pandiram Mandavi
बस्तर के विकास पर पद्मश्री पंडीराम मंडावी से बातचीत (ETV BHARAT)
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By ETV Bharat Chhattisgarh Team

Published : July 8, 2026 at 7:04 PM IST

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Updated : July 8, 2026 at 7:13 PM IST

12 Min Read
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रायपुर: 31 मार्च 2026 छत्तीसगढ़ से नक्सल समस्या समाप्त होने के बाद छत्तीसगढ़ में विकास किस तरह से चल रहा है. खास तौर पर नक्सल प्रभावित इलाकों की स्थिति क्या है. छत्तीसगढ़ की धरोहर और कभी घनघोर नक्सलवाद की चपेट में रहे नारायणपुर जिले से अपनी काष्ठ कला के जरिए पूरे विश्व में नाम कमाने वाले पद्मश्री पंडीराम मंडावी से ईटीवी भारत ने बात की है. पद्मश्री पंडीराम मंडावी ने ईटीवी भारत से बात करते हुए कहा कि बदलाव की बात शुरू हुई है लेकिन अभी बहुत कुछ करने की जरूरत है.

पद्मश्री पंडीराम मंडावी ने ईटीवी भारत से बात करते हुए कहा कि" जितने सालों तक छत्तीसगढ़ में नक्सलवाद रहा है. छत्तीसगढ़ की कला संस्कृति भी बंधक ही रही है. काम शुरू हुआ है लेकिन अभी बहुत कुछ करने की जरूरत है. सड़कों का विकास हुआ है. सड़क बनने की प्रक्रिया शुरू की गई है. सड़क बनाया भी जा रहा है लेकिन अभी इसमें वक्त लगेगा. बदलाव की जो बयार चली है वह निश्चित तौर पर एक नए छत्तीसगढ़ के निर्माण के लिए मजबूत भूमिका अदा करेगी, ऐसा मुझे विश्वास है. वक्त लगेगा और यह भी सही है कि जितने दिनों तक नक्सलवाद छत्तीसगढ़ की धरती पर रहा है. यहां की कला संस्कृति को नक्सलियों ने बंधक बनाकर रखा था. एक पूरी पीढ़ी अपने आदिवासी संस्कृति कला और परंपरा से बहुत ज्यादा वाकिफ नहीं हो पाई है"

पद्मश्री पंडीराम मंडावी ने बताया कैसे होगा बस्तर का विकास (ETV BHARAT)

सवाल: नक्सल समस्या को समाप्त होने के 100 दिन पूरे होने जा रहे हैं. कुछ बदलाव हुआ है आपको क्या महसूस हो रहा है ?

जवाब: मैं अबूझमाड़ में एक ट्रेनिंग सेंटर चल रह रहा हूं. गारपा में वहां कोई आता जाता नहीं था. नारायणपुर से गारपा तक बस का संचालन शुरू हो रहा है. मैं उसी बस से आना जाना भी शुरू किया हूं. वहां पहले कोई जाता ही नहीं था. लेकिन अब लोग जाना शुरू किए हैं. 1 जून को यहां मुख्यमंत्री आए थे उन्होंने कहा कि लोगों को आप कल की जानकारी दें ताकि आपकी विधा को आगे बढ़ाया जा सके. मैं वहां पर ट्रेनिंग सेंटर चला रहा हूं. वहां कोई जाता नहीं था लेकिन अब वहां आना-जाना शुरू हुआ है.

सवाल: युवाओं को सीखाने का काम शुरू हुआ है. उसके एक महीने हुए हैं. वक्त लगेगा लेकिन वह युवा जो इस पूरी विद्या जानकारी को सीख ही नहीं पाए उनके लिए क्या कहेंगे.

जवाब: यह सब कुछ रुका हुआ था. कोई कुछ नहीं कर रहा था. वहां लोग कोई जा नहीं रहे थे तो उसे कौन सिखाता. उसकी जानकारी कौन देता है. उसे कौन बताता. अब वहां गाड़ी चल रही है. आवागमन चालू है. अधिकारी भी जा रहे हैं. कलेक्टर जा रहे हैं. सीओ जा रहे हैं. एसडीएम जा रहे हैं . अब काम धीरे-धीरे शुरू हो रहा है. रोड बनाना है, हॉस्पिटल बनना है, ऐसे तो छोटे-मोटे हॉस्पिटल थे लेकिन अब पुल और सड़क बनना शुरू हुआ है. अबूझमाड़ में, धीरे-धीरे बदलाव आएगा.

सवाल: आदिवासी संस्कृति की बहुत सारी चीजों को रोक दिया गया था. जो सांस्कृतिक विरासत है उसे पर भी एक प्रहार किया गया था क्या कहेंगे आप?

जवाब: पहले तो यह था लेकिन अब धीरे-धीरे यह बंद हो गया हमारे ही बीच के कई लोग जो लोग पढ़-लिख लिए हैं. उन लोगों को घोटुल प्रथा जो था उसको यह लोग रोकथाम किए थे कि घोटुल अच्छा नहीं है घोटुल नहीं जाना चाहिए घोटुल जाने से बच्चे लोग पढ़ते नहीं है ऐसा कुछ लोगों का कहना था. घोटुल को लेकर कई योजनाएं चल रही हैं. अभी हाल के दोनों में गृह मंत्री विजय शर्मा नारायणपुर आए थे और उन्होंने कहा कि नारायणपुर में और घोटुल को बनाना है. इस प्रथा को और आगे ले जाना है. घोटुल बहुत सारी जगह पर बोले थे लेकिन आज वर्तमान में, अबूझमाड़ में कुचल, गारपा, कोकामेटा और तोखे, चार घोटुल को वर्तमान में चालू करना है. इस पर काम चल रहा है.

सवाल: अगर हम आपके विद्या की बात करें जिसे आप भी कई स्तर तक ले गए इसकी कितनी संभावनाएं दिख रही है बस्तर में.

जवाब: कई लोग इस बात को तो समझते हैं कि इस कला को सीखने से कितना फायदा होगा. कितना आगे तक जाएंगे. कुछ लोग इस बात को नहीं जानते हैं. ऐसा काम करेंगे तो ₹100 मिलेगा ₹50 मिलेगा. सरकार से तो उसमें क्या होगा. दूसरा काम करेंगे तो 300 तो ₹400 मिलेंगे. ऐसा भी बोलने वाले हैं. रहा हमारे लकड़ी वाले काम को लेकर, इसे लेकर के मैंने कई लोगों से सुना हूं, देखा भी हूं मार्केट नहीं है. काष्ठ कला का बाजार नहीं है. बनाएंगे सीखेंग, लेकिन बेचेंगे कहां. यह भी एक बात आता है. इसलिए कई लोग नहीं सीखते हैं. बाजार को लेकर थोड़ा मुश्किल हो रहा है कि सीख करके क्या करेंगे इसका बाजार कहां मिलेगा.

सवाल: छत्तीसगढ़ की बस्तरिया संस्कृति और सभ्यता का चोली दामन का साथ है. घर बनाने से लेकर बहुत सारी जरूरत को इस कला से पूरा किया जाता था. अब यह परंपरा कहां जाएगी.

जवाब: कुछ लड़के और लड़कियां ऐसे सीखना शुरू कर दिए हैं. मेरा बेटा भी लोगों को सीखाता है. हालांकि सरकार की कोई योजना तो नहीं है लेकिन लोगों ने सीखना शुरू किया है।. मेरे वर्कशॉप में लोग आकर सीख रहे हैं जिला प्रशासन की तरफ से मैं अबूझमाड़ में सीखा रहा हूं. वहां भी कोशिश कर रहा हूं कि लोग आएं.

सवाल: नक्सल समस्या समाप्ति के बाद जो उत्साह लोगों के भीतर आना चाहिए .वह नहीं दिख रहा है. क्या कहेंगे आप ?

जवाब: अब काम शुरू हुआ है और लोग आना भी शुरू किए हैं. कई ऐसे गांव है जहां के लोग अब सीखने के लिए तैयार हो रहे हैं. लोगों के भीतर इस बात का उत्साह धीरे-धीरे पैदा हो रहा है क्योंकि कुछ गांव से हमें भी इसकी सूचना आई है कि वहां के लोग आने के लिए उत्सुक हैं और वहां के लोग सीखना भी चाहते हैं, तो शुरुआत हुई है धीरे-धीरे इसके परिणाम आ भी सकते हैं.

सवाल: बस्तर की परंपरागत कला कहां रहेगी. उसकी कला संस्कृति का क्या होगा ?

जवाब: अगर बाजार नहीं रहेगा कि जब बाजार ही नहीं रहेगा तो पूरी कला संस्कृति ही खत्म होगी. 50 सालों तक कला संस्कृति को नक्सलियों ने आगे बढ़ने नहीं दिया. इसलिए बहुत पीछे चला गया. आगे लाने के लिए नए-नए लड़कों को सीखाना पड़ेगा. यही एक रास्ता है उनको सीखने से तभी यह काम होगा.

सवाल: बस्तर में व्यवस्था सुधार के लिए कितना समय लगेगा ?

जवाब: मैं 68 साल का हो गया हूं. मैं कभी अबूझमाड़ गया ही नहीं. पहली बार मैं अबूझमाड़ गया हूं. अब वहां पर सड़क बन रही हैं. आने-जाने का आवागमन का साधन भी विकसित किया जा रहा है. सड़क की भी व्यवस्था दी जा रही है और धीरे-धीरे उसके इंतजाम किए जा रहे हैं. विकास का काम धीरे-धीरे आगे बढ़ रहा है. कहीं सड़क पर मुरूम है, कहीं पर डामर हो गया है, कहीं पर पुलिया का निर्माण बाकी है. उसे पर भी काम चल रहा है मुझे लगता है कि 1 साल में सभी काम पूरे हो जाएंगे मोबाइल के टावर को लेकर के तेजी से काम हुआ है. वहां पर कई निजी नेटवर्क प्रोवाइडर्स हैं. उनका नेटवर्क पकड़ रहा हैं . जो युवा है उनके समय में भी थोड़ा सा अंतर है. दिन में खेत में काम करते हैं देर रात तक काम करते हैं, सीखते हैं, थोड़ा दिन में होने से काम में तेजी आएगी लेकिन अभी लोग इसे सीखना शुरू किए हैं.

सवाल: बस्तर की अधिकांश आबादी जंगल पर आधारित है. जिस तरह का उत्पादन जंगलों से हो रहा है. क्या इससे उनकी आर्थिक स्थिति मजबूत होगी ?

जवाब: जंगल में तेंदु है, महुआ है, जिससे लोगों की कमाई होती है. जिधर जंगल है वहां पर कमाई का जरिया है. अब उसे मैं देख रहा हूं कि वहां पर यह चीज मिल रही हैं. लोगों की कमाई का जरिया भी बढ़ रहा है. सरकार को चाहिए कि यह ध्यान रखें कि जंगल रहे, जंगल बचना चाहिए, जंगल रहेगा तभी हम लोगों को जो मिलना चाहिए वह मिलता है जो आदिवासियों की कमाई का जरिया बनता है. जंगल रहेगा तो सब मिलेगा, अगर जंगल खत्म होगा तो कहां से मिलेगा. कोई पेड़ नहीं होगा तो कुछ नहीं मिलेगा. जंगल बचाना जरूरी है. जंगल बचेगा तभी जिंदगी बचेगी.

सवाल: पर्यटन की कितनी संभावनाएं हैं, आप कैसे देखते हैं ?

जवाब: पर्यटन की बहुत सारी संभावनाएं हैं, लेकिन वहां पर इंफ्रास्ट्रक्चर को विकसित करना होगा. सड़क और दूसरी व्यवस्थाएं देनी होंगी. लोगों के रुकने की व्यवस्था देनी होगी, तभी वहां पर और ज्यादा तेजी से काम हो पाएगा. अभी होम स्टे जैसा कुछ बोल तो रहे हैं. आप उसे बनाएं. कोई आएगा तो उधर रहेगा. देसी खाने का कुछ बनाने का काम हो तो आमदनी का एक स्रोत बनेगा.

सवाल: युवाओं को जोड़ने के लिए क्या किया जाना चाहिए?

जवाब: जो जवान लड़के हैं, वह भागम भाग में दौड़ रहे हैं. धीरे से कुछ होगा, उसमें ध्यान नहीं दे रहे हैं. होम स्टे को लेकर के जो चर्चा हुई, उसमें किसी युवा ने हां नहीं कहा. सभी लोग चुपचाप बैठे रहे. किसी ने कुछ नहीं कहा. अगर हां कहते तो उससे कमाई का जरिया बनता है. देसी खाने के लिए लोग बहुत दूर से आते हैं. जो बाहर थक जाते हैं, वह देसी खाना खाने के लिए आते हैं. चाहे पत्तल में हो, चाहे जिस भी तरीके से हो लेकिन देसी खाने की चर्चा होनी चाहिए.

मैं इटली गया था और वहां पर मैंने देसी खाने की चर्चा की. मैंने लोगों को बताया कि मैं पत्ते पर मीट बनाता हूं. विदेश में उन लोगों ने पत्ते का इंतजाम किया. हालांकि बस्तर जैसा पत्ता वहां नहीं मिला लेकिन उसके बाद भी जैसे तैसे करके उन लोगों ने इंतजाम किया और मैंने मीट बनाया. वहां के मंत्री भी उस खाने को खाने के लिए आए थे. जब मैं इटली से वापस आया तो इटली से 60 से 70 लोग आए. कोंडागांव में वह सभी लोग रुके थे. मैं नारायणपुर से कोंडागांव उनके लिए चिकन बनाकर के ले गया और वह लोग इतना खुश हुए कि उसकी बहुत तारीफ की. अभी जो बस्तर की कला है, उसे सिखाया जा सकता है. उसमें ज्यादा मसाला तो लगता नहीं है, लेकिन उसकी जो विधा है, उसे उन लोगों को बताया जा सकता है.

सवाल: जो घोटुल बना रहे हैं, उसमें क्या-क्या बदलाव किया जा सकता है?

जवाब: घोटुल में व्यवस्था दी जा सकती है. इसे लेकर कलेक्टर को योजना दी जा सकती है. वहां पर भी वॉटरफॉल है, पर्यटन की संभावनाएं हैं. लोग वहां आ सकते हैं तो इसकी प्रबल संभावना है कि इसमें कुछ बेहतर किया जा सकता है.

सवाल: नक्सलियों का समर्थन करने के लिए जिन लोगों को जेल में बंद रखा गया है, उसके लिए सरकार को क्या करना चाहिए ?

जवाब: वैसे लोगों को जेल से छोड़ देना चाहिए, जो अभी जेल में बंद हैं. उनको मुख्य धारा में जुड़ना चाहिए. उनको जेल से छोड़ देना चाहिए. उनके रोजगार की व्यवस्था की जाए. कोई पढ़ा लिखा है तो छोटी-मोटी नौकरी दी जाए. अगर खेती कर रहा है तो खेती के लिए उनके लिए कुछ इंतजाम किया जाए. हमारा बस्तर अच्छा बने, लोगों को रोजगार मिले. प्रेम भी आगे बढ़े और हमारा घोटुल भी बने और वही प्रेम बस्तर को आगे ले जाए.

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Last Updated : July 8, 2026 at 7:13 PM IST