'सबरीमला मंदिर में महिलाओं के प्रवेश का विरोध करेगा देवस्वोम बोर्ड': केरल चुनाव से पहले का बड़ा फैसला
जानकारों का मानना है कि आगामी विधानसभा चुनावों में भक्तों की नाराजगी से बचने के लिए वामपंथी सरकार ने यह 'रणनीतिक सुधार' किया है.


Published : March 3, 2026 at 9:57 PM IST
|Updated : March 3, 2026 at 10:58 PM IST
तिरुवनंतपुरम: त्रावणकोर देवस्वोम बोर्ड ने सबरीमला मंदिर में रजस्वला आयु की महिलाओं के प्रवेश का औपचारिक रूप से विरोध करने का फैसला किया है. टीडीबी अध्यक्ष के. जयकुमार ने एक प्रेस कॉन्फ्रेंस में इसकी पुष्टि करते हुए कहा कि बोर्ड सुप्रीम कोर्ट को अपने इस बदले हुए रुख की आधिकारिक जानकारी देगा. यह कदम सुप्रीम कोर्ट के उस निर्देश के बाद आया है, जिसमें सभी पक्षों को 14 मार्च तक अपना रुख स्पष्ट करने को कहा गया था.
राज्य सरकार द्वारा अपने पिछले रुख में बदलाव की अटकलों पर विराम लगाते हुए, टीडीबी ने तय किया है कि वह निर्धारित तिथि पर एक नया हलफनामा दायर करेगा. बोर्ड का अब यह मानना है कि युवा महिलाओं के प्रवेश पर प्रतिबंध रहना चाहिए और मंदिर के रीति-रिवाजों से जुड़ा कोई भी अंतिम निर्णय पारंपरिक मुख्य पुजारियों और भक्त समुदाय के साथ व्यापक विचार-विमर्श के बाद ही लिया जाना चाहिए.
यह बोर्ड के 2018 और 2019 के कानूनी रुख से बिल्कुल अलग है, जब सुप्रीम कोर्ट के शुरुआती फैसले के बाद बोर्ड ने महिलाओं के प्रवेश का समर्थन करते हुए हलफनामा दायर किया था. उस पुराने कदम के कारण पूरे राज्य में बड़े पैमाने पर विरोध प्रदर्शन हुए थे और सत्ताधारी लेफ्ट डेमोक्रेटिक फ्रंट (LDF) को चुनावों में भारी नुकसान उठाना पड़ा था.
इससे पहले, 2007 में वी.एस. अच्युतानंदन सरकार और 2017 में पिनाराई विजयन की पहली सरकार के दौरान दायर हलफनामों में मौलिक अधिकारों और धार्मिक रीति-रिवाजों पर विद्वानों की राय के बीच संतुलन बनाने पर जोर दिया गया था. हालांकि, विस्तृत आंतरिक चर्चाओं के बाद, बोर्ड ने अब परंपराओं की रक्षा पर एक कड़ा और अडिग रुख अपना लिया है.
यद्यपि इस मामले में राज्य सरकार को अलग से हलफनामा दायर करने की आवश्यकता नहीं है, लेकिन टीडीबी (TDB) के इस कानूनी दांव को व्यापक रूप से सत्ताधारी माकपा (CPI-M) द्वारा समर्थित एक सोची-समझी राजनीतिक रणनीति के रूप में देखा जा रहा है. हाल ही में मंत्री वी.एन. वासावन और साजी चेरियन ने भी आस्था के मामलों की रक्षा करने की ओर झुकाव के संकेत दिए थे, जो पूर्व टीडीबी अध्यक्ष पी.एस. प्रशांत द्वारा व्यक्त की गई भावनाओं के समान ही है.
राजनीतिक विश्लेषक इस बड़े बदलाव को आगामी विधानसभा चुनावों से पहले वामपंथी सरकार द्वारा एक 'रणनीतिक सुधार' के रूप में देख रहे हैं. 2019 के लोकसभा चुनावों में मिली करारी हार की यादें अब भी पार्टी को सता रही हैं. उस वक्त दिवंगत सचिव कोडियेरी बालकृष्णन के नेतृत्व में पार्टी नेतृत्व को नाराज भक्तों को शांत करने के लिए एक बड़ा जनसंपर्क अभियान चलाना पड़ा था. अब माकपा सबरीमला मुद्दे के असर को पूरी तरह खत्म करने की इच्छुक है.
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