दिव्यांगता के सामने हौसले बुलंद! अंतरराष्ट्रीय स्तर पर पहुंचे देवघर के पैरा एथलीट रोहित कुमार
देवघर के पैरा एथलीट रोहित कुमार मिसाल हैं. उन्होंने राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय स्तर पर शानदार प्रदर्शन किया है. हितेश कुमार चौधरी की रिपोर्ट.

Published : June 3, 2026 at 2:45 PM IST
|Updated : June 3, 2026 at 4:20 PM IST
देवघर: कहते हैं कि अगर इरादे मजबूत हो तो कोई भी मुश्किल मंजिल का रास्ता नहीं रोक सकती. इसी मजबूत इरादे की मिसाल हैं 'पैरा एथलीट रोहित कुमार'. देवघर के दिव्यांग खिलाड़ी पैरा एथलीट रोहित कुमार ने अपने हौसले और मेहनत के दम पर इस कहावत को सच साबित कर दिखाया है. पैरा एथलीट रोहित कुमार, अंतरराष्ट्रीय स्तर पर पहचान बना चुके हैं, कई बड़ी उपलब्धियां भी हासिल की हैं. लेकिन संसाधनों की कमी आज भी उनके सपनों के सामने सबसे बड़ी चुनौती बनी हुई है.
संघर्ष और साहस की मिसाल है पैरा एथलीट
देवघर के दर्शनिया मोड़ निवासी रोहित कुमार की कहानी संघर्ष, साहस और संकल्प की मिसाल है. शारीरिक दिव्यांगता के बावजूद उन्होंने कभी अपने सपनों को सीमित नहीं होने दिया और न ही मजबूरियों के आगे कभी झुके. पैरा एथलीट रोहित कुमार बचपन से ही दिव्यांग है. उनके शरीर का एक हिस्सा लकवाग्रस्त होने के कारण सामान्य रूप से काम नहीं करता है, जो किसी भी आम लोगों के लिए काफी मुश्किल है. लेकिन रोहित ने अपनी इसी कमजोरी को अपनी ताकत बना लिया.
अंतरराष्ट्रीय स्तर पर बनाई पहचान
कड़ी मेहनत और निरंतर अभ्यास के दम पर रोहित ने पैरा एथलेटिक्स में अपनी अलग पहचान बनाई. शॉट पुट प्रतियोगिताओं में उन्होंने राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय स्तर पर उत्कृष्ट प्रदर्शन किया है. झारखंड के चुनिंदा पैरा शॉट पुट खिलाड़ियों में शामिल रोहित आज अपनी प्रतिभा के बल पर राज्य का नाम रोशन कर चुके हैं. लेकिन अफसोस की बात है कि उपलब्धियों के बावजूद रोहित के सपनों की राह में संसाधनों की कमी एक बड़ी बाधा बनी हुई है.

बचपन में बोलने में भी होती थी दिक्कत
पैरा एथलीट रोहित का कहना है कि अन्य राज्यों के खिलाड़ियों को बेहतर प्रशिक्षण, आधुनिक सुविधाएं और विदेशों तक में ट्रेनिंग के अवसर मिलते हैं, जबकि झारखंड में प्रतिभाशाली खिलाड़ियों को अब भी पर्याप्त सहयोग नहीं मिल पा रहा है. रोहित ने बताया कि उनके साथ-साथ उनके माता-पिता और उनकी दोनों बहनों ने भी उन्हें हर तरह से मदद किया है. जिसकी वजह से वह आज पूरी दुनिया के सामने में इस हौसले के साथ खड़े हैं. बचपन में बोलने में दिक्कत होती थी लेकिन बहन और परिवार के सहयोग ने उन्हें आज इस काबिल बना दिया कि वह अपना कोई भी काम खुद कर सकते हैं.

आर्थिक संकट के चलते कई बार प्रशिक्षण छोड़ना पड़ा: परिजन
रोहित के माता-पिता बताते हैं कि बचपन में उनके बेटे की स्थिति काफी चुनौतीपूर्ण थी. सीमित आर्थिक संसाधनों के बावजूद उन्होंने इलाज और प्रशिक्षण के लिए हर संभव प्रयास किया. परिवार के सहयोग और रोहित की मेहनत का ही परिणाम है कि आज वह एक सफल पैरा एथलीट के रूप में पहचान बना चुके हैं.
परिवार का कहना है कि पैरा एथलेटिक्स के लिए आवश्यक आधुनिक उपकरण और प्रशिक्षण सुविधाएं काफी महंगी हैं. आर्थिक तंगी के कारण कई बार रोहित के प्रशिक्षण पर भी असर पड़ा है. कुछ समय के लिए उन्हें चंडीगढ़ के एक प्रशिक्षण केंद्र में भेजा गया था, लेकिन आर्थिक संकट के चलते प्रशिक्षण बीच में ही छोड़ना पड़ा.
मदद के नाम पर सिर्फ आश्वासन
बेहतर अवसरों की तलाश में रोहित और उनके परिवार ने राज्य के खेल मंत्री से भी मुलाकात की. लेकिन अब तक उन्हें केवल आश्वासन ही मिला है. वहीं, जिला ओलंपिक संघ और खेल विभाग ने भविष्य में हरसंभव सहयोग का भरोसा दिया है.
रोहित का सपना सिर्फ अपने लिए सफलता हासिल करना नहीं है, बल्कि वह समाज के उन लाखों दिव्यांग लोगों के लिए प्रेरणा बनना चाहते हैं, जो किसी न किसी वजह से अपने सपनों को अधूरा मान लेते हैं. उनका मानना है कि दिव्यांगता शरीर को सीमित कर सकती है, लेकिन मजबूत इच्छाशक्ति और दृढ़ संकल्प को कभी नहीं रोक सकती.
पैरा एथलीट रोहित कुमार की कहानी यह साबित करती है कि प्रतिभा और जुनून किसी शारीरिक बाधा के मोहताज नहीं होते. अगर सही अवसर, बेहतर संसाधन और मजबूत सहयोग मिले तो ऐसे खिलाड़ी देश और दुनिया के मंच पर नई ऊंचाइयों को छू सकते हैं.
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