इतिहास के पन्नों में दर्ज होने जा रहा 86 साल पुराना दिल्ली रेस क्लब! खाली कराने की प्रक्रिया हुई शुरू, देखें ग्राउंड रिपोर्ट
केंद्र सरकार ने ऐतिहासिक दिल्ली रेस क्लब की 53 एकड़ से अधिक जमीन का कब्जा अपने हाथों में ले लिया. रिपोर्टर राहुल चौहान की रिपोर्ट

Published : August 30, 2026 at 2:47 PM IST
नई दिल्ली: दिल्ली रेस क्लब को खाली कराने के मामले में हाई कोर्ट से राहत न मिलने के बाद अब इसको खाली कराने की प्रक्रिया शुरू हो गई है. एल एंड डीओ विभाग ने 27 अगस्त को अपने पक्ष में फैसला आने के बाद ही रेस क्लब को खाली कराने के लिए डिमोलिशन की कार्रवाई की है. कार्रवाई के दौरान दिल्ली दिल्ली रेस क्लब की बाउंड्री बाल को तोड़ दिया गया. साथ ही रेस क्लब में बने घोड़ों के अस्तबल को भी तोड़कर खाली करा लिया गया है.
रेस क्लब की ओर से दी जगह पर ढाबा चला रहे सनोज कुमार ने बताया कि,
हमें पांच सितंबर तक समय खाली करने के लिए दिया गया है. अगर खाली नहीं किया तो बुलडोजर से तोड़ने की बात कही गई है. उन्होंने बताया कि हम लंबे समय से यहां ढाबा चला रहे हैं तो थोड़ा और समय दिया जाना चाहिए था. पांच दिन का समय कम है. कई वर्कर यहां पर काम करते हैं और काफी सामान है, उसको हटाने के लिए समय चाहिए.
दिल्ली रेस क्लब को खाली कराने की प्रक्रिया
दिल्ली रेस क्लब के मुख्य गेट पर बैठे लालचंद ने बताया कि अभी एक सप्ताह का टाइम यहां से सामान हटाने के लिए दे दिया गया है. रेस क्लब के लोगों ने काफी सामान होने की बात कहते हुए खाली करने लिए और समय मांगा था. यहां 400 घोड़े थे, उनमें से अब सिर्फ 50 घोड़े रह गए हैं. बाकी घोड़े धीरे धीरे करके बेच दिए हैं, क्योंकि इसको खाली कराने का मामला कई महीने से चल रहा था. इसलिए घोड़ों को हटाने का काम पहले ही शुरू कर दिया था.
बता दें कि अंग्रेजों के जमाने में वर्ष 1940 में शुरू किया गया दिल्ली रेस क्लब अब इतिहास के पन्नों में दर्ज होने जा रहा है. 86 साल पुराना क्लब अब खाली होने के साथ ही बंद हो जाएगा और इसकी जमीन केंद्र सरकार अपने कब्जे में ले लेगी और फिर यहां नए प्रोजेक्ट लाने की तैयारी होगी. बता दें कि रेस क्लब प्रधानमंत्री आवास के अपोजिट में स्थित है.

मस्जिद कैंप, बीआर कैंप और डीआईडी कैंप को 5 अक्तूबर तक करना है खाली
बता दें कि दिल्ली रेस क्लब के पीछे स्थित झुग्गी बीआर कैंप और बराबर में स्थित मस्जिद कैंप और थोड़ी दूर पर स्थित झुग्गी डीआईडी कैंप को भी खाली करने के लिए अब दिल्ली हाई कोर्ट से 5 अक्टूबर तक का समय मिला है. मस्जिद कैंप की ओर से दाखिल याचिका कर्ताओं में शामिल शाइस्ता खान ने बताया कि अब हम तीनों कैंप के लोग मिलकर के सुप्रीम कोर्ट जाने का रुख कर रहे हैं. हाई कोर्ट से हमें यह लास्ट समय दिया गया है.
कांग्रेस प्रदेश अध्यक्ष से मिला मदद का आश्वासन

उन्होंने बताया कि हम खाली करने के लिए पहले भी मना नहीं कर रहे थे, न अब कर रहे हैं. बस हमारी मांग इतनी है कि हमें यहां से हटाकर 45 किलोमीटर दूर सावदा घेवरा ना भेजा जाए. हमें यहां से दूर काटेल बाग और साउथ ईस्ट दिल्ली में ही कहीं शिफ्ट कर दिया जाए. सावदा घेवरा में बच्चों की पढ़ाई के लिए अच्छे स्कूल और स्वास्थ्य सेवाओं की कमी है. वहां हमें रोजगार की भी समस्या होगी. यहां का रोजगार अधिक दूरी की वजह से छूट जाएगा. अगर सरकार आसपास कहीं जगह दे देगी तो यहां की नौकरी और बच्चों की पढ़ाई यहीं चलती रहेगी.
शाइस्ता खान ने बताया कि हम इस मामले में मदद के लिए कांग्रेस मुख्यालय 24 अकबर रोड दो तीन बार गए थे. हम राहुल गांधी से मिलर अपनी समस्या रखना चाहते थे. इसलिए रक्षाबंधन वाले दिन हम फिर से गए थे तो राहुल गांधी की ओर से दिल्ली प्रदेश कांग्रेस के अध्यक्ष देवेन्द्र यादव को हमसे बात करने के लिए भेजा गया था. उन्होंने हमें कानूनी रूप से मदद का आश्वासन दिया है. साथ ही अरविंद केजरीवाल की ओर से हमें पहले ही हाई कोर्ट में लड़ने के लिए हमें वकील दिया हुआ है.
इतिहास व विरासत का गवाह है दिल्ली रेस क्लब
दिल्ली रेस क्लब का इतिहास एक सदी पुराना है. इसकी स्थापना 8 मार्च 1926 को हुई थी. शुरुआती दौर में यह दिल्ली जिमखाना रेस क्लब के रूप में विकसित हुआ और बाद में 1940 में दिल्ली रेस क्लब (1940) लिमिटेड के रूप में पंजीकृत हुआ था. इसका प्रमुख उद्देश्य भारतीय नस्ल के घोड़ों व भारतीय जॉकी को प्रोत्साहित करना तथा घुड़दौड़ को खेल के रूप में बढ़ावा देना था.
दिल्ली रेस क्लब राजधानी में घुड़दौड़ व घुड़सवारी से जुड़ी खेल परंपरा का महत्वपूर्ण केंद्र रहा है. यहां रेस ट्रैक, अस्तबल व रेसिंग से जुड़ी अन्य सुविधाएं विकसित हुईं. लुटियंस दिल्ली के प्रमुख इलाके में स्थित होने के कारण यह लंबे समय तक राजधानी की खेल व सामाजिक विरासत का हिस्सा रहा. 8 मार्च 2026 को क्लब ने अपनी स्थापना के 100 वर्ष पूरे किए. क्लब की विरासत केवल घुड़दौड़ तक सीमित नहीं रही, बल्कि इससे जॉकी, प्रशिक्षक, घोड़ों की देखभाल करने वाले कर्मियों व रेसिंग से जुड़े अन्य लोगों की आजीविका भी जुड़ी रही है. इस लिहाज से दिल्ली रेस क्लब राजधानी के खेल इतिहास में एक विशिष्ट स्थान रखता है.
बड़े नामों से जुड़ी रही दिल्ली रेस क्लब की विरासत
दिल्ली रेस क्लब की करीब 100 वर्ष की यात्रा में सेना, वायुसेना और रेसिंग जगत की कई प्रतिष्ठित हस्तियां अध्यक्ष पद की जिम्मेदारी संभाल चुकी हैं. क्लब के आधिकारिक इतिहास में लेफ्टिनेंट जनरल बीएन कौल, मेजर जनरल कंवर भगवती सिंह और एयर चीफ मार्शल ओपी मेहरा जैसे नाम पूर्व अध्यक्षों के रूप में दर्ज हैं.
इनमें पद्मश्री से सम्मानित पी.एस. बेदी का योगदान विशेष रूप से उल्लेखनीय रहा. वह करीब पांच दशक तक क्लब से अलग-अलग भूमिकाओं में जुड़े रहे और अध्यक्ष तथा बाद में चेयरमैन एमेरिटस बने. रेसिंग क्षेत्र में उनके योगदान के लिए टर्फ अथॉरिटीज ऑफ इंडिया ने उन्हें लाइफटाइम अचीवमेंट अवॉर्ड से सम्मानित किया. 25 जुलाई 2019 को उनके निधन को रेसिंग जगत ने बड़ी क्षति माना. क्लब के रिकॉर्ड के अनुसार, जेएस बेदी सितंबर 2016 में अध्यक्ष चुने गए और 2026 के आधिकारिक प्रबंधन रिकॉर्ड में भी अध्यक्ष के रूप में दर्ज हैं.
कोर्ट में रेस क्लब की जमीन का मामला, कब-कब आया बड़ा आदेश:
दिल्ली रेस क्लब की जमीन को लेकर मौजूदा कानूनी विवाद मार्च 2026 में तेज हुआ. केंद्र ने 12 मार्च 2026 को क्लब को 15 दिन में जमीन खाली कर शांतिपूर्ण कब्जा सौंपने का नोटिस दिया. क्लब ने दिल्ली हाई कोर्ट में याचिका दायर की. 25 मार्च को हाई कोर्ट ने फिलहाल बेदखली पर रोक लगा दी. इसके बाद 9 अप्रैल को क्लब की सिविल याचिका इस आश्वासन के साथ निपटाई गई कि बेदखली केवल कानून की उचित प्रक्रिया के तहत होगी.
इसके बाद 17 अप्रैल को पब्लिक प्रिमाइसेज एक्ट के तहत कारण बताओ नोटिस जारी हुआ. 24 अप्रैल को हाई कोर्ट की एकल पीठ ने एस्टेट ऑफिसर की कार्रवाई पर अंतरिम रोक लगाई, लेकिन 26 मई को हाई कोर्ट की डिवीजन बेंच ने यह रोक हटा दी और कहा कि क्लब को एस्टेट ऑफिसर के समक्ष अपना पक्ष रखने का पर्याप्त अवसर मिलेगा. इसके बाद 11 अगस्त 2026 को एस्टेट ऑफिसर ने बेदखली का आदेश दिया. 25 अगस्त को अदालत ने अंतरिम राहत देने से इनकार किया. विवाद की जड़ यह है कि क्लब की 1926 की लीज 31 दिसंबर 1994 को समाप्त हो गई थी और उसके बाद उसका नवीनीकरण नहीं हुआ.
ये भी पढ़ें:

