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Explainer: जानें !  दिल्ली शराब घोटाले से कैसे ढहा सत्तासीनों का क़िला और कैसे लिखी गयी सियासत की नई पटकथा

कोर्ट के फैसले को 'आप ' बता रही है ईमानदारी का सर्टिफिकेट, तो भाजपा की नज़र में सिर्फ सबूतों का अभाव

दिल्ली शराब घोटाले का पतन
दिल्ली शराब घोटाले का पतन (ETV Bharat)
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By ETV Bharat Delhi Team

Published : February 27, 2026 at 6:04 PM IST

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Updated : February 28, 2026 at 12:01 PM IST

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नई दिल्ली/ आशुतोष झा: राजनीति के गलियारों से लेकर अदालत के कक्षों तक बीते चार वर्षों से गूंज रहा 'दिल्ली शराब घोटाला' एक ऐसे मोड़ पर आ खड़ा हुआ है, जिसकी कल्पना शायद ही जांच एजेंसियों ने की थी. शुक्रवार को राउज एवेन्यू कोर्ट द्वारा अरविंद केजरीवाल, मनीष सिसोदिया समेत सभी 23 आरोपियों को सीबीआई मामले में 'बरी' किए जाने का फैसला केवल एक कानूनी आदेश नहीं है, बल्कि यह केंद्रीय जांच एजेंसियों की कार्यप्रणाली, साक्ष्यों की विश्वसनीयता और 'साजिश' के सिद्धांतों पर एक गंभीर न्यायिक टिप्पणी है.

आइए, इस पूरे मामले को गहराई से समझते हैं कि आखिर वह क्या आधार थे जिनसे यह 'पहाड़' जैसा दिखने वाला केस ताश के पत्तों की तरह ढह गया. दिल्ली शराब घोटाले में सीबीआई द्वारा दर्ज मामलों से सभी 23 लोगों के बरी करने के फैसले का अर्थ बड़ा होगा, इसमें कोई शक नहीं है. दिल्ली शराब घोटाले का मामला दिल्ली सरकार की 2021-22 की एक्साइज (शराब) पॉलिसी से जुड़े भ्रष्टाचार के आरोपों से उपजा था, जिसे बाद में विवाद के बीच रद्द कर दिया गया था. सीबीआई का आरोप था कि आप सरकार द्वारा बनाई गई इस नीति ने कम फीस और एक तय मार्जिन के जरिए कुछ खास प्राइवेट कंपनियों का पक्ष लिया, जिससे कथित भ्रष्टाचार हुआ था.

बरी होने पर रो पड़े केजरीवाल (ETV Bharat)

जानिए क्या था दिल्ली शराब घोटाला

मामले की जड़ें साल 2021-22 की नई आबकारी नीति में हैं. दिल्ली सरकार का तर्क था कि पुरानी व्यवस्था में भ्रष्टाचार और माफिया राज था, जिसे खत्म करने के लिए नई नीति लाई गई. इसमें सरकारी दुकानों को हटाकर पूरी तरह निजी हाथों में कमान सौंपी गई. सीबीआई का आरोप था कि एजेंसी का मुख्य तर्क था कि इस नीति को इस तरह 'कस्टमाइज' किया गया ताकि चुनिंदा शराब कारोबारियों (कथित साउथ ग्रुप) को फायदा हो. बदले में 100 करोड़ रुपये की रिश्वत ली गई, जिसका इस्तेमाल 'आप' ने गोवा चुनावों में किया.

कोर्ट के फैसले के 3 बड़े स्तंभ: क्यों बरी हुए आरोपी?

अदालत ने अपने विस्तृत फैसले में उन कड़ियों को काट दिया, जिन पर सीबीआई ने अपनी पूरी चार्जशीट बुनी थी. पहला एलजी की मंजूरी और विधायी प्रक्रिया, कोर्ट ने बचाव पक्ष के उस तर्क को स्वीकार किया कि कोई भी नीति रातों-रात या बंद कमरे में नहीं बनी थी. अरविंद केजरीवाल के वकील विवेक जैन ने प्रभावी ढंग से पक्ष रखा कि नीति को सार्वजनिक फीडबैक के बाद बनाया गया. इसे दिल्ली के उपराज्यपाल ने मंजूरी दी थी. अदालत का सवाल, यदि नीति में 'आपराधिक खामियां' थीं, तो इसे पास करने वाले संवैधानिक अधिकारियों पर आंच क्यों नहीं आई? केवल इसे बनाने वाले मंत्रियों को ही कटघरे में क्यों खड़ा किया गया?

केजरीवाल के खिलाफ कार्रवाई
केजरीवाल के खिलाफ कार्रवाई (ETV Bharat)

दूसरा 'साउथ ग्रुप' शब्द पर न्यायिक प्रहार

जांच एजेंसियों ने 'साउथ ग्रुप' शब्द का इस्तेमाल एक डरावनी साजिश के रूप में किया था. जज जितेंद्र सिंह ने इस पर कड़ी आपत्ति जताते हुए इसे "गलत मंशा वाला" और "काल्पनिक" करार दिया. कोर्ट ने माना कि बिना किसी ठोस आधार के इस तरह की शब्दावली का उपयोग करना आरोपियों की छवि खराब करने जैसा है. साक्ष्यों का अभाव और 'कन्फेशनल स्टेटमेंट' की देरी, अदालत इस बात से नाराज दिखी कि जांच एजेंसियों ने कई महत्वपूर्ण गवाहों के उन बयानों को छिपाया या देरी से पेश किया, जो आरोपियों के पक्ष में थे. अमेरिका के न्यायिक उदाहरणों का संदर्भ देते हुए कोर्ट ने स्पष्ट किया कि 'निष्पक्ष सुनवाई' का अधिकार केवल किताबी नहीं है.

घटनाक्रम की टाइम लाइन
घटनाक्रम की टाइम लाइन (ETV Bharat)
दिल्ली शराब घोटाले में केजरीवाल- सिसोदिया
दिल्ली शराब घोटाले में केजरीवाल- सिसोदिया (ETV Bharat)

तीसरा 'बरी' बनाम 'जमानत': कानूनी और राजनीतिक मायने

अब तक केजरीवाल और सिसोदिया 'जमानत' पर बाहर थे. कानूनी भाषा में जमानत का अर्थ है "ट्रायल चलेगा, लेकिन आप बाहर रह सकते हैं." लेकिन 'बरी' होने का अर्थ है "अदालत ने आपको निर्दोष मान लिया है."

शराब घोटाले में 23 बरी
शराब घोटाले में 23 बरी (ETV Bharat)

बरी' बनाम 'डिस्चार्ज' और भविष्य की राह

अदालत ने इन्हें 'बरी' किया है, जिसका मतलब है कि ट्रायल पूरा होने के बाद अदालत इस नतीजे पर पहुंची कि आरोपी निर्दोष हैं. अरविंद केजरीवाल राजनीतिक रूप से उनकी 'कट्टर ईमानदार' छवि को मजबूती मिलेगी. आगामी चुनावों में वे इसे ढाल की तरह इस्तेमाल करेंगे. मनीष सिसोदिया शिक्षा मॉडल के चेहरे के रूप में उनकी वापसी होगी और प्रशासनिक कार्यों में उनकी भूमिका फिर से प्रभावी होगी. सीबीआई एजेंसी को अपनी चार्जशीट फाइल करने के तरीके और 'साउथ ग्रुप' जैसी अनौपचारिक शब्दावली के उपयोग पर आत्ममंथन करना होगा. यह फैसला न केवल इन नेताओं के लिए व्यक्तिगत जीत है, बल्कि यह भविष्य के हाई-प्रोफाइल भ्रष्टाचार के मामलों के लिए एक नजीर भी पेश करता है कि केवल बयानों के आधार पर किसी को दोषी नहीं ठहराया जा सकता. यह समझना बहुत जरूरी है कि सीबीआई (भ्रष्टाचार) और ईडी (मनी लॉन्ड्रिंग) के मामले तकनीकी रूप से अलग-अलग पटरियों पर चलते हैं, भले ही वे एक ही "अपराध" से पैदा हुए हों.

इस फैसले के बाद ईडी केस के मामले पर प्रभाव

'प्रेडिकेट ऑफेंस' का गिरना, जिसे कानूनी भाषा में, ईडी का मनी लॉन्ड्रिंग केस तभी टिकता है जब उसके पीछे कोई 'प्रेडिकेट ऑफेंस' (आधारभूत अपराध) हो. यहां का केस 'आधार' था. यदि मुख्य मामले सीबीआई में आरोपी बरी हो जाता है, तो PMLA (मनी लॉन्ड्रिंग एक्ट) के तहत ईडी का मामला अक्सर कमजोर पड़ जाता है. वरिष्ठ अधिवक्ता मनीष प्रतिहस्त बताते हैं, सुप्रीम कोर्ट के विजय मदनलाल चौधरी फैसले के अनुसार, यदि आधारभूत अपराध में कोई दोषी नहीं है, तो प्रोसिड ऑफ क्राइम का अस्तित्व ही समाप्त हो जाता है.

'साउथ ग्रुप' वाली टिप्पणी का ED पर असर

ईडी ने अपनी पूरी थ्योरी 'साउथ ग्रुप' द्वारा 100 करोड़ रुपये की रिश्वत देने के इर्द-गिर्द बुनी थी. अब जब कोर्ट ने 'साउथ ग्रुप' शब्द के इस्तेमाल को ही अनुचित और "गलत मंशा वाला" करार दिया है, तो ईडी के लिए इस काल्पनिक 'ग्रुप' के जरिए पैसे के लेन-देन को साबित करना और भी चुनौतीपूर्ण हो जाएगा. ईडी के मामले में अब तक सबसे बड़ी बहस यह रही है कि कथित 100 करोड़ रुपये आखिर गए कहाँ? जिस तरह सीबीआई मामले में कोर्ट ने माना है कि साक्ष्य पर्याप्त नहीं हैं. चूंकि ईडी को यह साबित करना होता है कि रिश्वत का पैसा "साफ" करके इस्तेमाल किया गया, इसलिए बिना सीबीआई के ठोस आधार के, ईडी के लिए कोर्ट में यह टिक पाना मुश्किल होगा कि केजरीवाल या सिसोदिया ने किसी काले धन को सफेद किया.

राजनीतिक और प्रशासनिक प्रभाव

अब तक इन नेताओं को सिर्फ "जमानत" मिली थी, जिसका मतलब था कि केस जारी रहेगा. लेकिन "बरी" होने का मतलब है कि वे अब तकनीकी रूप से निर्दोष घोषित किए गए हैं. सिसोदिया और केजरीवाल अब जनता के बीच यह कह सकते हैं कि जांच एजेंसियों ने न केवल उन्हें फंसाया, बल्कि कोर्ट ने उनकी जांच के तरीके (जैसे 'साउथ ग्रुप' शब्द) को भी खारिज कर दिया है.

वीरेंद्र सचदेवा की प्रतिक्रिया
वीरेंद्र सचदेवा की प्रतिक्रिया (ETV Bharat)
जांच एजेंसियों के लिए आत्ममंथन का समयराउज एवेन्यू कोर्ट का यह फैसला भारतीय न्यायपालिका के उस सिद्धांत को दोहराता है कि "न्याय केवल होना नहीं चाहिए, बल्कि होता हुआ दिखना भी चाहिए." केवल बयानों और सरकारी गवाहों के भरोसे किसी को वर्षों तक सलाखों के पीछे रखना और अंत में सबूत न जुटा पाना, जांच एजेंसियों की साख पर सवालिया निशान लगाता है. यह केस भविष्य के लिए एक नजीर है कि हाई-प्रोफाइल मामलों में 'नैरेटिव' से ज्यादा 'एविडेंस' की जरूरत होती है.
अरविंद केजरीवाल का बयान
अरविंद केजरीवाल का बयान (ETV Bharat)

'हमें भारतीय न्याय प्रणाली पर भरोसा'

पिछले कुछ सालों से भाजपा जिस तरह से बार-बार हमारे ऊपर शराब घोटाला का आरोप लगा रही थी, शुक्रवार को कोर्ट ने वे सारे आरोप खारिज कर दिए और जितने भी आरोपी थे, सबको बरी कर दिया. हम हमेशा कहते थे कि सत्य की जीत होती है. हमें भारतीय न्याय प्रणाली पर भरोसा है. मैं जज साहब का बहुत-बहुत शुक्रिया अदा करता हूं, जिन्होंने हमारे साथ न्याय किया. सत्य की जीत हुई. मैं हमेशा कहता था कि भगवान हमारे साथ हैं. पीएम मोदी और अमित शाह ने मिलकर आजाद भारत का सबसे बड़ा राजनीतिक षड्यंत्र रचा. आम आदमी पार्टी को खत्म करने के लिए पार्टी के सबसे बड़े पांच नेताओं को जेल में डाल दिया गया. यहां तक कि सिटिंग मुख्यमंत्री, जो आज तक भारत के इतिहास में कभी नहीं हुआ, सिटिंग मुख्यमंत्री को उनके घर से घसीट कर जेल में डाला गया और छह महीने तक जेल में रखा गया. पूर्व उप मुख्यमंत्री मनीष सिसोदिया को लगभग 2 साल तक जेल में रखा गया. पूरा का पूरा फर्जी केस था." - अरविंद केजरीवाल, संयोजक, आम आदमी पार्टी

"जांच एजेंसी द्वारा सबूतका अभाव में अदालत ने अपना फैसला सुनाया है. लेकिन अभी केस में कई पॉइंट है, हमें भी लगता है सत्य की जीत तय है." - वीरेंद्र सचदेवा, प्रदेश बीजेपी अध्यक्ष

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Last Updated : February 28, 2026 at 12:01 PM IST