न्याय में देरी...5.4 करोड़ केस पेंडिंग; दिल्ली-हरियाणा में केस पेंडेंसी 3 गुना बढ़ी, यूपी-महाराष्ट्र में पेंडिंग केस हुए दोगुना
न्याय में देरी एक गंभीर समस्या बनती जा रही है, जिसे "न्याय से इनकार" माना जाता है. आईए जानते हैं इस संकट की 6 वजहें.

Published : May 4, 2026 at 4:52 PM IST
|Updated : May 5, 2026 at 4:35 PM IST
Delay in Justice: देश में देर से न्याय मिलना एक गंभीर संकट बनता जा रहा है. राष्ट्रीय न्यायिक डेटा ग्रिड (National Judicial Data Grid) के ताजा आंकड़ों के अनुसार, न्यायपालिका के तीनों स्तरों - जिला और अधीनस्थ न्यायालय (District and Subordinate Courts), उच्च न्यायालय (High Courts) और सर्वोच्च न्यायालय (Supreme Court) में 5.4 करोड़ से अधिक मामले लंबित यानी पेंडिंग हैं.
इनमें ज्यादातर केस (लगभग 4.8 करोड़) अधीनस्थ न्यायालयों में हैं. यही नहीं, लगभग 50 लाख से अधिक मामले 10 साल से अधिक समय से चल रहे हैं लेकिन, उनमें कोई फैसला नहीं हुआ. सिर्फ तारीख पर तारीख लग रही है. ETV Bharat Explainer में आईए जानते हैं अदालतों के केस पेंडिंग होने की वजहें क्या हैं? इस पेंडेंसी को खत्म करने के लिए सरकार क्या कर रही है?

लंबित मामलों से सरकारें चिंतित क्यों: लंबित मामलों का मुद्दा न केवल व्यापक है, बल्कि यह बढ़ भी रहा है. 2018 और 2025 के बीच हर साल दर्ज किए गए नए मामलों की संख्या अदालतों द्वारा निपटाए गए मामलों की संख्या से कहीं अधिक रही. लंबित मामलों की बढ़ती संख्या वादियों के लिए बढ़ती देरी का संकेत देती है. इसलिए यह न्यायपालिका और सरकारों के लिए चिंता का एक प्रमुख कारण रहा है.
विधि आयोग का केस पेंडेंसी पर कहना है, 'समय पर न्याय' से वंचित करना स्वयं 'न्याय' से वंचित करने के समान है. मामलों का समय पर निपटारा विधि के शासन को बनाए रखने और न्याय तक पहुंच प्रदान करने के लिए आवश्यक है, जो एक गारंटीकृत मौलिक अधिकार है. हालांकि, न्यायिक प्रणाली मामलों के भारी बैकलॉग के कारण समय पर न्याय देने में असमर्थ है.
10 साल में 80% बढ़ी पेंडेंसी: राष्ट्रीय न्यायिक डेटा के अनुसार, 2025 के अंत तक कुल लंबित मामलों की संख्या 5.4 करोड़ से अधिक थी, जो 10 साल पहले की तुलना में 80% की वृद्धि दिखाता है. निचली अदालतों में लंबित मामलों की संख्या में सबसे बड़ा बदलाव देखने को मिला है. 2014 में जहां 2.6 करोड़ पेंडिंग मामले थे वहीं 2025 के अंत तक ये संख्या 4.8 करोड़ हो गई. यानी 85% की वृद्धि.

इस वृद्धि का एक बड़ा हिस्सा 2019 के अंत और 2021 के अंत के बीच हुआ, जो कोविड-19 महामारी का वह दौर था, जिसके चलते न्यायालय प्रभावी ढंग से काम नहीं कर पाए थे. इस अवधि में सभी हाईकोर्ट्स और सुप्रीम कोर्ट में लंबित मामलों की संख्या में कुल मिलाकर लगभग 50% की वृद्धि हुई.
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किस राज्य में सबसे ज्यादा पेंडिंग केस: देश के कुछ राज्यों में तो लंबित मामलों की स्थिति में काफी बढ़ोतरी देखने को मिली है. दिल्ली और हरियाणा की अधीनस्थ अदालतों में पिछले एक दशक में लंबित मामलों की संख्या 3 गुना बढ़ गई. पहले जो पेंडेंसी लगभग 5 लाख थी वह बढ़कर क्रमशः 16 लाख और 15 लाख हो गई. उत्तर प्रदेश और महाराष्ट्र दो ऐसे बड़े राज्य हैं, जहां इसी अवधि में लंबित मामलों की संख्या दोगुनी हो गई, जो क्रमशः 55 लाख से बढ़कर 113 लाख और 30 लाख से बढ़कर 60 लाख हो गई. वहीं, गुजरात की अधीनस्थ अदालतें ही ऐसी थीं जहां लंबित मामलों में कमी आई.

हाईकोर्ट में 200% तक बढ़े लंबित मामले: राष्ट्रीय न्यायिक डेटा के अनुसार, राजस्थान, हिमाचल प्रदेश और उत्तराखंड के हाईकोर्ट में लंबित मामलों में उल्लेखनीय वृद्धि देखी गई. राजस्थान के हाईकोर्ट में 200% और उत्तराखंड-हिमाचल प्रदेश में 150% से अधिक की वृद्धि हुई. हालांकि, कुछ हाईकोर्ट ऐसे भी रहे, जिन्होंने अपने लंबित मामलों को कम किया.
इनमें त्रिपुरा, जम्मू और कश्मीर, लद्दाख और कलकत्ता हाईकोर्ट शामिल हैं. ट्रिब्यूनल और विशेष न्यायालय (जैसे फास्ट ट्रैक कोर्ट और पारिवारिक न्यायालय) में भी बड़ी संख्या में मामले लंबित हैं. इनको मामलों के त्वरित निपटाने के लिए स्थापित किया गया था. लेकिन, जजों की कमी ने यहां भी पेंडेंसी बढ़ा दी.
हर दूसरा मामला 5 साल से लंबित: देश की अदालतों में मामले लंबे समय से लंबित हैं. जिला और अधीनस्थ न्यायालयों में लगभग एक तिहाई मामले 5 साल से अधिक समय से लंबित हैं. यही नहीं, 10 में से एक मामला 10 साल से अधिक समय से लंबित है.
हाईकोर्ट में विलंब की स्थिति बदतर है, जहां लगभग हर दूसरा मामला 5 साल से अधिक पुराना है. यही नहीं, हर चौथा मामला 10 साल से अधिक पुराना है. हालांकि, सुप्रीम कोर्ट में स्थिति थोड़ी बेहतर है, जहां 4 में से एक मामला 5 साल से अधिक पुराना है और 45% मामले अपने पहले वर्ष में हैं.

बिहार में आधे से ज्यादा मामले 5 साल पुराने: राष्ट्रीय न्यायिक डेटा के अनुसार, बिहार में आधे से अधिक मामले 5 साल से अधिक पुराने हैं. वहीं त्रिपुरा की निचली अदालतों में केवल 6% मामले ही 5 साल से अधिक पुराने हैं. अन्य छोटे राज्यों की स्थिति भी बड़े राज्यों की तुलना में बेहतर है, जहां अदालतों की संख्या और मामलों की संख्या अधिक है. उत्तर प्रदेश के इलाहाबाद हाईकोर्ट और महाराष्ट्र व गोवा के बॉम्बे हाईकोर्ट के अधिकांश मामले 5 साल से अधिक पुराने हैं.
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किस अदालत में कितने आपराधिक मामले: मार्च 2026 तक निचली अदालतों में लगभग 23% मामले दीवानी और 77% आपराधिक प्रकृति के थे. जबकि, सुप्रीम कोर्ट में 79% दीवानी और 21% आपराधिक मामले थे. हाईकोर्ट में यह अनुपात 70% दीवानी और 30% था. ऐसा इसलिए है क्योंकि, रिट याचिकाएं इन दोनों न्यायालयों के मूल क्षेत्राधिकार का एक महत्वपूर्ण हिस्सा हैं. जो आपराधिक मामलों की तुलना में दीवानी मामलों में अधिक दायर की जाती हैं.

परिणामस्वरूप, हाईकोर्ट में लंबित मामलों की सबसे बड़ी श्रेणी रिट याचिकाओं की है, जिनमें प्रत्येक एक आपराधिक रिट याचिका के लिए 18 दीवानी रिट याचिकाएं लंबित हैं. आपराधिक मामलों को सुनवाई के लिए पहले हाईकोर्ट में नहीं लाया जाता है. आपराधिक मामलों की सुनवाई पूरी तरह से अधीनस्थ न्यायालयों में की जाती है. ये मामले मुख्य रूप से पुलिस द्वारा राज्य का प्रतिनिधित्व करते हुए दायर किए जाते हैं.
केस पेंडिंग होने की क्या है वजह
- भारतीय न्यायपालिका में न्यायाधीशों की कमी है. इससे मामलों के निपटारे में देरी होती है, क्योंकि सुनवाई के इंतजार में मामलों का एक बड़ा बैकलॉग जमा हो जाता है.
- भारत में कई अदालतों के पास दायर होने वाले ढेरों मामलों से निपटने के लिए जरूरी बुनियादी ढांचा और संसाधन नहीं हैं.
- कुछ मामले बहुत जटिल होते हैं और उनके निपटारे के लिए काफी समय और संसाधनों की जरूरत होती है.
- कानूनी प्रक्रिया में अक्सर प्रक्रियागत मुद्दों के कारण देरी होती है, जैसे कि गवाहों का पता न चल पाना या सबूत हासिल करने में देरी होना.
- कुछ मामलों में अदालती आदेशों को लागू नहीं किया जाता है, जिससे मामलों के निपटारे में देरी होती है.
- कानूनी जागरूकता बढ़ने से दायर किए गए मामलों की संख्या में वृद्धि हुई है. इसके अलावा, जनहित याचिका (PIL) जैसे नए तंत्रों के कारण भी अधिक मामले दायर किए जा रहे हैं.
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मामलों का लंबित होना कितना खतरनाक
- समय की कमी के कारण, न्यायाधीशों के पास प्रत्येक मामले के गुण-दोषों पर पूरी तरह से विचार करने के लिए पर्याप्त समय या संसाधन नहीं हो सकते हैं. इससे ऐसे निर्णय आ सकते हैं जो पूरी तरह से तथ्यों पर आधारित न हों, या जो संबंधित मुद्दों का उचित समाधान न करते हों.
- बड़ी संख्या में लंबित मामले न्यायालय प्रणाली पर बोझ डाल सकते हैं, जिससे न्यायाधीशों के लिए मामलों की सुनवाई करना और उन पर समय पर निर्णय देना कठिन हो जाता है.
- केसों के निपटारे में देरी के कारण आम जनता का कानूनी व्यवस्था पर से विश्वास उठ सकता है.
- लंबे समय तक चलने वाले मुकदमे मुकदमेबाजों के लिए महंगे साबित हो सकते हैं, क्योंकि उन्हें अदालत की लंबी कार्यवाही का खर्च उठाना पड़ता है.
- मामलों के लंबित होने के कारण गवाह तथ्यों को भूल सकते हैं. उनकी मृत्यु हो सकती है या वे लापता हो सकते हैं.
- न्याय व्यवस्था में होने वाली देरी का अर्थव्यवस्था पर भी नकारात्मक प्रभाव पड़ सकता है, क्योंकि कानूनी विवादों के अनसुलझे रहने के कारण व्यवसायों में देरी हो सकती है या वे आगे बढ़ने से रुक सकते हैं.
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अदालतों में केस पेंडेंसी कम करने के लिए सरकार क्या कर रही
- ई-कोर्ट परियोजना (e-Courts Mission Mode Project): अदालतों के डिजिटलीकरण के लिए इस परियोजना को तेज किया गया है, जिसके तहत ई-फाइलिंग, ई-समन, और वर्चुअल सुनवाई को बढ़ावा दिया जा रहा है, जिससे कागजी कार्यवाही कम हो और समय की बचत हो.
- राष्ट्रीय न्यायिक डेटा ग्रिड (NJDG): NJDG के डैशबोर्ड को उन्नत किया गया है, जो लंबित मामलों की वास्तविक समय में निगरानी और पहचान करने में मदद करता है.
- वैकल्पिक विवाद समाधान (ADR) तंत्र: मामलों को अदालत के बाहर सुलझाने के लिए मध्यस्थता (Mediation) अधिनियम, 2023 के तहत अनिवार्य किया गया है. लोक अदालतों और ट्रिब्यूनल का उपयोग भी बढ़ाया गया है.
- फास्ट ट्रैक कोर्ट (FTC): यौन अपराधों, महिलाओं, बच्चों और वरिष्ठ नागरिकों से जुड़े मामलों के त्वरित निपटान के लिए 14वें वित्त आयोग की सिफारिश पर विशेष फास्ट ट्रैक कोर्ट स्थापित किए गए हैं.
- न्यायिक बुनियादी ढांचे का विकास: जिला और अधीनस्थ न्यायपालिका के लिए बुनियादी ढांचा सुविधाओं को बेहतर बनाने के लिए केंद्र प्रायोजित योजना के तहत राज्यों को संसाधन प्रदान किए जा रहे हैं.
- सरकारी मुकदमेबाजी में कमी: अदालतों में बड़ी संख्या में मामले सरकारी विभागों से जुड़े होते हैं. सरकार 'राष्ट्रीय मुकदमेबाजी नीति' के माध्यम से अनावश्यक सरकारी मुकदमों को कम करने पर काम कर रही है.
- रिक्तियों को भरना: न्यायपालिका में न्यायाधीशों की रिक्तियों को भरने के लिए केंद्र सरकार उच्च न्यायालय और सर्वोच्च न्यायालय में न्यायाधीशों की नियुक्ति की प्रक्रिया को तेज कर रही है. साथ ही तदर्थ न्यायाधीशों (Ad-hoc judges) की नियुक्ति पर भी विचार किया जा रहा है.
सभी लंबित मामलों को निपटाने में कितना लगेगा समय: देश की अदालतों में लंबित मामलों की यह समस्या न्यायपालिका के निचले स्तरों पर विशेष रूप से गंभीर है. जहां सबसे ज्यादा मामले दर्ज किए जाते हैं. लेकिन, उनको निपटाने के लिए जजों की सबसे ज्यादा कमी है. कई राज्यों में तो लंबित मामलों की संख्या राष्ट्रीय औसत से काफी ज्यादा है. 2010 और 2020 के बीच, सभी अदालतों में लंबित मामलों की संख्या में हर साल 2.8% की बढ़ोतरी हुई. अगर कोई नया मामला दर्ज न किया जाए, तो मौजूदा निपटारे की दर से सभी लंबित मामलों का निपटारा करने में सुप्रीम कोर्ट को 1.3 साल और हाई कोर्ट तथा निचली अदालतों को 3-3 साल लगेंगे.
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