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'डेथ अनाउंसमेंट पॉइंट', जहां लाउडस्पीकर से दी जाती है मौत की जानकारी

किसी की मृत्यु हो जाए, तो यहां पर लाउडस्पीकर से उसकी जानकारी पूरे इलाके में साझा की जाती है.

Doctor couple karnataka
डॉ सुरेखा रामन्नावर और डॉ महंतेश रामन्नावर (ETV Bharat)
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By ETV Bharat Hindi Team

Published : January 7, 2026 at 7:44 PM IST

8 Min Read
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बेलगावी : अगर किसी की मौत हो जाए और कोई उसके बारे में लाउडस्पीकर से जानकारी दे, तो आप क्या कहेंगे. शायद आप अचरज में पड़ जाएंगे. क्योंकि आमतौर पर किसी की मृत्यु हो जाए, तो लोग व्यक्तिगत रूप से जाकर बताते हैं, या फिर सोशल मीडिया के जरिए जानकारी साझा करते हैं. लेकिन कर्नाटक के बेलगावी में एक डॉक्टर दंपत्ति पिछले आठ सालों से कुछ अलग तरीके से लोगों की मृत्यु के बारे में जानकारी दे रहे हैं. चाहे किसी की भी मौत हो, चाहे उनका धर्म कुछ भी हो, वे सबके लिए एक ही तरीका अपनाते हैं.

वे बेलगावी के बैलहोंगल में रहते हैं और ऐसा करने के लिए वह किसी से भी एक रुपया नहीं लेते हैं. डॉ. महंतेश रामन्नावर और उनकी पत्नी डॉ. सुरेखा रामन्नावर ने बैलहोंगल शहर में अपने घर की तीसरी मंजिल को एक ऐसी जगह बना दिया है, जिसे अब स्थानीय लोग "डेथ अनाउंसमेंट पॉइंट" कहते हैं. अपनी छत पर लगे लाउडस्पीकर का इस्तेमाल करके, वे जाति, धर्म या समुदाय की परवाह किए बिना, मरने वाले लोगों के नाम और डिटेल्स की घोषणा करते हैं. उनके इस प्रयास की खूब सराहना की जा रही है. उसे सामाजिक सद्भाव बढ़ाने वाला कहा जा रहा है. शोक संतप्त परिवारों के लिए एक संवेदनशील लेकिन जरूरी काम को आसान बनाने के लिए व्यापक रूप से उनकी सराहना की गई है.

आम तौर पर ग्रामीण इलाकों में पारंपरिक रूप से लोग घरों में जाकर किसी के निधन की खबर देते रहे हैं. लोगों ने बताया कि कभी-कभी शोक के प्रतीक के तौर पर पवित्र पत्ते को वितरित कर इसकी जानकारी देते हैं, लेकिन समय के साथ यह प्रथा खत्म हो गई है. उन्होंने कहा कि अब तो लोग प्रायः सोशल मीडिया के जरिए ऐसी सूचना देते हैं. परंतु सोशल मीडिया पर जो जानकारी दी जाती है, बुजुर्गों तक उसकी पहुंच नहीं होती है. स्थानीय लोगों ने बताया कि डॉक्टर दंपत्ति ने जो कदम उठाया है, हमलोग उसकी सराहना करते हैं.

डॉ. महंतेश रामन्नावर केएलईबीएमके आयुर्वेदिक मेडिकल कॉलेज में एनाटॉमी डिपार्टमेंट में प्रोफेसर और हेड के तौर पर काम कर रहे हैं. उन्हें डॉ. रामन्नावर चैरिटेबल ट्रस्ट के जरिए बॉडी डोनेशन, ऑर्गन डोनेशन, आई डोनेशन और ब्लड डोनेशन को बढ़ावा देने के लिए भी जाना जाता है. उन्होंने बॉडी डोनेशन के बारे में जागरूकता फैलाने के लिए अपने पिता के शरीर का डिसेक्शन किया था. ऐसा करके उन्होंने एक वर्ल्ड रिकॉर्ड बनाया और ऐसा करने वाले पहले भारतीय डॉक्टर बन गए. उनकी फिलॉस्फी साफ है, "मौत बुरी नहीं है, मौत का डर बुरा है."

डॉ महंतेश ने बताया कि एक बार जब वह सुबह-सुबह टहल रहे थे, तब एक मस्जिद से किसी की मौत की खबर के बारे में सुना. उन्होंने कहा कि उसी वक्त उन्हें ऐसा ख्याल आया. इसके बाद 2017 में उन्होंने बाकायदा एक ट्रस्ट बनाया और पुलिस से इसकी अनुमति भी प्राप्त कर ली. डॉक्टर महंतेश ने बताया कि शुरू-शुरू में उन्हें भी भावनात्मक लगाव से गुजरना पड़ा. लेकिन समय के साथ वह इसमें ढल गए. समाज के महत्व को देखते हुए उन्होंने इसे जारी रखा. शुरुआती दिनों में बाबन्ना यादहल्ली नाम के एक स्थानीय निवासी ने बिना कोई पैसा लिए स्वेच्छा से घोषणाओं का काम संभाला. जब वह यह काम जारी नहीं रख पाए, तो उनकी पत्नी डॉ. सुरेखा रामन्नावर ने यह जिम्मेदारी संभाल ली.

डॉ. सुरेखा एक डेंटल सर्जन हैं. वह बैलहोंगल में संगोली रायन्ना सर्कल के पास एक क्लिनिक चलाती हैं. जब भी ट्रस्ट के श्रद्धांजली WhatsApp ग्रुप पर किसी की मौत का मैसेज आता है, तो वह कुछ मिनट निकालकर, अक्सर कंसल्टेशन के बीच बाथरूम में जाकर, अनाउंसमेंट रिकॉर्ड करती हैं. फिर यह ऑडियो मैसेज महंतेश हिट्टानागी को भेजा जाता है, जो उसी बिल्डिंग में एक मेडिकल स्टोर चलाते हैं. वह छत पर लगे लाउडस्पीकर पर एम्प्लीफायर के जरिए अनाउंसमेंट करते हैं.

हर घोषणा "ओम नमः शिवाय" से शुरू होती है और इसमें मृतक का पूरा नाम, उम्र, इलाका, गली और अंतिम संस्कार की जानकारी शामिल होती है. घोषणा तीन बार की जाती है, ताकि यह साफ सुनाई दे. बैलहोंगल और आस-पास के लोग ध्यान से सुनते हैं, और इस सिस्टम ने निवासियों के लिए समय पर मौतों के बारे में जानना और अंतिम संस्कार में शामिल होना बहुत आसान बना दिया है.

ईटीवी भारत से बात करते हुए डॉ. महंतेश रामन्नावर ने कहा कि मौत का कोई धर्म नहीं होता. जो भी पैदा हुआ है, उसे मरना ही है. इसी विश्वास के साथ, वे सभी समुदायों के लोगों की मौत की खबर बिना किसी शुल्क के, पूरी तरह से मानवता की सेवा के तौर पर देते हैं. उन्होंने यह भी बताया कि बैलहोंगल की मस्जिदों ने अब दूसरे धर्मों के लोगों की मौत की घोषणा करना भी शुरू कर दिया है, जो शहर में बढ़ती सांप्रदायिक सद्भाव को दिखाता है.

ट्रस्ट ने लगभग 5,000 सदस्यों वाले पांच श्रद्धांजली WhatsApp ग्रुप भी बनाए हैं, जिनमें इस क्षेत्र के ऐसे लोग शामिल हैं जो अब भारत और विदेश में कहीं और रहते हैं. अब तक, इन ग्रुप्स के जरिए लगभग 2,500 मौतों की जानकारी शेयर की गई है. डॉ. रामन्नावर के अनुसार, कई लोगों ने उन्हें व्यक्तिगत रूप से बताया है कि यह सेवा कितनी मददगार रही है.

कोविड महामारी के दौरान, जब पाबंदियों की वजह से मौत की घोषणाएं कुछ समय के लिए रोक दी गई थीं, तो लाउडस्पीकर सिस्टम को पब्लिक अवेयरनेस कैंपेन के लिए पुलिस और हेल्थ डिपार्टमेंट को सौंप दिया गया था. उन्होंने याद करते हुए बताया कि अधिकारी घर आते थे और इसका इस्तेमाल सुरक्षा संदेश फैलाने के लिए करते थे.

यह पहल इलाके में मुस्लिम समुदाय के लिए एक मॉडल भी बन गई है. पहले मस्जिद की घोषणाएं सिर्फ उसी समुदाय के सदस्यों तक सीमित थीं, लेकिन अब बैलहोंगल में मस्जिदों में हिंदू और दूसरे लोगों की मौत की घोषणाएं भी होने लगी हैं, जो डॉक्टर पति-पत्नी के सबको साथ लेकर चलने वाले नजरिए से प्रेरित है.

वैदिक विद्वान वीरय्या हिरेमठ ने डॉ. रामन्नावर की सेवा को एक नेक काम बताया, और कहा कि मौत की खबर मुफ्त में देना एक दुर्लभ और पुण्य का काम है जिससे पूरे समाज को फायदा होता है. उन्होंने प्रार्थना की कि डॉक्टर दंपत्ति को सेवा जारी रखने की शक्ति मिले.

स्थानीय लोग भी इसी भावना से सहमत हैं. गृहिणी जबीना मोमिन ने कहा कि इन घोषणाओं से मुसलमानों सहित सभी को समय पर मौतों के बारे में जानने और अंतिम संस्कार में शामिल होने में मदद मिलती है. युवा निवासी नागराज टल्लूर ने कहा कि पहले लोगों को मौतों के बारे में कई दिनों बाद पता चलता था, लेकिन अब जानकारी जल्दी पहुंच जाती है, यहां तक कि पांच या छह किलोमीटर दूर के गांवों तक भी. उन्होंने यह भी बताया कि जिन लोगों ने अपने शरीर दान किए हैं, उनके नाम सम्मान के साथ घोषित किए जाते हैं, जिससे सामाजिक ज़िम्मेदारी का संदेश मज़बूत होता है.

डॉ. सुरेखा रामन्नावर के लिए, यह कोशिश उन्हें पर्सनल संतुष्टि देती है. उन्होंने कहा कि हो सकता है कि वह अपने पति की तरह बड़े पैमाने पर समाज की सेवा न कर पाएं, लेकिन इस तरह से योगदान देने से उन्हें खुशी और संतुष्टि मिलती है. डिजिटल शोर और भागदौड़ भरी जिंदगी वाले इस दौर में, बैलहोंगल की एक छत से आने वाली यह शांत आवाज लोगों को साझा इंसानियत, मौत में गरिमा और ईमानदारी से किए गए छोटे-छोटे कामों की ताकत की याद दिलाती रहती है.

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