साइकिल से 37 देश की यात्रा कर बिहार पहुंची समीरा, बोलीं- 'लड़कों की तरह मिले लड़कियों को अवसर'
11 पर्वतों और 37 देशों की साइकिल से यात्रा करने के बाद बिहार पहुंची समीरा खान अब बालिकाओं को जागरुक करने निकली हैं..पढ़ें-

Published : December 22, 2025 at 3:38 PM IST
शेखपुरा : अगर हौसले बुलंद हों तो लड़का हो या लड़की कुछ भी कर सकता है फिर चाहे उसकी राह में लाख रोड़े क्यों न आएं. हम बात कर रहे हैं आंध्र प्रदेश के अनंतपुर की रहने वाली साइकिलिस्ट समीरा खान की. माता-पिता के बिना समीरा का जीवन संघर्षों भरा रहा लेकिन उनकी एक जिद ने उनके जीवन को नई दिशा दिखाई. आज समीरा लाखों-करोड़ों लड़कियों को जागरुक करने के लिए निकल पड़ी हैं. उनकी राह में रोड़े नहीं बल्कि हजारों मीटर ऊंचे पर्वत आए लेकिन अपना मुकाम हासिल करने के लिए उसे भी लांघ गईं.
संघर्ष की मिसाल बनी समीरा : आज समीरा खान संघर्ष की मिसाल बन चुकी है. समीरा की कहानी आज हर किसी के लिए प्रेरणास्रोत है. महज 9 साल में मां के खोने और वर्ष 2015 में पिता के निधन के बाद भी समीरा ने हार नहीं मानी. टूटने के बजाय उन्होंने ठान लिया कि वे कुछ ऐसा करेंगी, जिसे दुनिया याद रखे. मां-बाप को खोने के बाद समीरा वर्ष 2018 में साइकिल से ‘मिशन माउंट एवरेस्ट’ के संकल्प के साथ घर से निकल पड़ीं.
37 देशों की यात्रा कर पहुंची बिहार : इस दौरान उन्होंने न सिर्फ कठिन रास्तों और मौसम का सामना किया, बल्कि सामाजिक चुनौतियों को भी पीछे छोड़ा. अब तक वे साइकिल से फ्रांस, जर्मनी, नॉर्वे, तुर्की, नीदरलैंड, स्पेन, श्रीलंका, थाईलैंड, मलेशिया, दक्षिण अफ्रीका, जापान, नेपाल सहित कुल 37 देशों की यात्रा कर चुकी हैं. इसके साथ ही वे 11 पर्वतों पर चढ़ चुकी हैं, जिनमें से 7 चोटियों को उन्होंने सफलतापूर्वक फतह किया है. नेपाल की 6859 मीटर ऊंची अमा डबलाम चोटी उनकी सबसे कठिन उपलब्धि मानी जाती है.

'भारत में साइकिलिंग कठिन' : समीरा का कहना है कि विदेशों की तुलना में भारत में साइकिल यात्रा अधिक कठिन है. यहां सुरक्षा से लेकर सामाजिक व्यवहार तक कई चुनौतियां सामने आती हैं. उन्होंने बताया कि साइकिलिंग के दौरान लोग घूरते हैं, छेड़ते हैं और मजाक भी उड़ाते हैं. हालांकि बिहार पहुंचने पर राज्य के डीजीपी विनय कुमार द्वारा सम्मानित किए जाने से उनका हौसला और बढ़ा और वे खुद को सुरक्षित महसूस कर रही हैं.

बालिका सशक्तिकरण अभियान : समीरा खान आज साइकिलिंग के माध्यम से बालिका सशक्तिकरण की अलख जगा रही हैं. वे महाराष्ट्र, कर्नाटक, गुजरात, मध्य प्रदेश और उत्तर प्रदेश सहित कई राज्यों की यात्रा कर चुकी हैं और वे सरकारी व निजी विद्यालयों में जाकर छात्राओं को बड़े सपने देखने, आत्मनिर्भर बनने और सामाजिक कुरीतियों के खिलाफ खड़े होने के लिए प्रेरित कर रही हैं.

अभियान के तहत पहुंची शेखपुरा : शेखपुरा पहुंचने पर जवाहर नवोदय विद्यालय में छात्राओं से संवाद कर समीरा खान ने लड़कियों को प्रेरित किया. उन्होंने बातचीत में बताया कि जितना अवसर लड़कों को हमारे समाज में दिया जाता है उतना अवसर बेटियों को भी मिलना चाहिए. बेटिया सिर्फ शादी के लिए नहीं बनीं हैं. उनके भी कुछ सपने हैं जिसे पूरा करने में परिवार और माता-पिता को सहयोग देना चाहिए.

''हम महिला हैं, कमजोर नहीं. हमें अपनी प्रतिभा को निखारकर खुद को शक्तिशाली बनाना है.हम अगर समाज के उस बंधन में बंधे रहते तो समाज के लोग और लड़कियों के जैसे मेरी भी शादी करवा देते. फिर बच्चे पैदा करती और फिर बच्चे बड़े होते और फिर उसका शादी करवाते. यानी शादी और बच्चों के बीच ही हमारी जिंदगी कट जाती. लेकिन हमने अपना मंजिल को चुना और उस मंजिल पर आज भी कायम हूं.''- समीरा खान, साइकिलिस्ट एवं पर्वतारोही

रंग लाएगी समीरा की हिम्मत : कभी हाथ छोड़कर, कभी हाथ जोड़कर और कभी खुशी में झूमते हुए साइकिल चलाने वाली समीरा प्रतिदिन 50 से 60 किलोमीटर की दूरी तय कर लेती हैं. भविष्य में छात्राओं के लिए एक संस्थान स्थापित करना भी उनका लक्ष्य है. वहीं सरकार से अबतक समीरा को किसी तरह का सहयोग नहीं मिला है. संघर्षों से निकली यह कहानी आज देश की बेटियों के लिए उम्मीद और हिम्मत की नई पहचान बन चुकी है.
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