संयुक्त रणनीति, सख्त कार्रवाई: नशा तस्करी के खिलाफ सुरक्षा एजेंसियां जब तक एक नहीं होंगी, सिंडिकेट नहीं होगा खत्म!
नशा तस्करी को रोकने के लिए लॉ एंफोर्समेंट एजेंसीज को मिलकर सख्ती से काम करने की जरूरत. पढ़ें राहुल चौहान की ये स्पेशल रिपोर्ट

Published : July 8, 2026 at 8:39 AM IST
नई दिल्ली: नशा और नशा तस्करी पूरे देश में एक बड़ी चुनौती है. नशा और इसकी अवैध तस्करी आज पूरे भारत के लिए एक गंभीर सामाजिक और सुरक्षात्मक चुनौती बन चुकी है. सरकारों और सुरक्षा एजेंसियों के तमाम कड़े प्रयासों के बावजूद, नशा तस्करों का नेटवर्क देश की जड़ों को खोखला कर रहा है. हालांकि, कानूनी मोर्चे पर सुप्रीम कोर्ट के एडवोकेट-ऑन-रिकॉर्ड सुभाष चंद्रन के अनुसार, भारत के पास इससे निपटने के लिए 'एनडीपीएस एक्ट' (NDPS Act) जैसा एक बेहद सख्त और प्रभावी केंद्रीय कानून मौजूद है. देशव्यापी केंद्रीय व्यवस्था के साथ-साथ अब कई राज्यों ने अपनी खुद की नीति के आधार पर तस्करी और नशे पर रोक लगाने के लिए अलग-अलग अभियान चला रखे हैं.
नशा तस्करी रोकने के लिए देश में है सेन्ट्रल एनडीपीएस एक्ट
एडवोकेट सुभाष चंद्रन ने बताया कि नशा तस्करी को रोकने के लिए देश के स्तर पर नारकोटिक्स कंट्रोल ब्यूरो (एनसीबी) की स्थापना की गई है. इसी एजेंसी के माध्यम से एनडीपीएस एक्ट 1985 की कार्रवाई होती है. कई बार पुलिस भी एनडीपीएस एक्ट में नशा तस्करों पर कार्रवाई करती है. सुभाष चंद्रन ने बताया जिस तरीके से अन्य कानूनों का गलत इस्तेमाल होता है उसी तरीके से एनडीपीएस एक्ट के दुरुपयोग के मामले भी सामने आते रहे हैं.

एडवोकेट चंद्रन ने केरल के वर्ष 2023 के एक मामले का उदाहरण देते हुए बताया कि एक व्यक्ति ने अपने रिश्तेदार की पुलिस से यह शिकायत कर दी कि उसके पास प्रतिबंधित ड्रग्स है. उसके बाद सीधे पुलिस ने उसको अरेस्ट करके जेल भेज दिया. उसके बाद उस मैटेरियल की क्लीनिकल जांच शुरू हुई तो 70 दिन के बाद यह पाया गया कि जो मैटेरियल ड्रग बताया जा रहा था वह ड्रग नहीं था. उसके बाद वह व्यक्ति जेल से बाहर आया. लेकिन, इस एक्ट के मिसयूज करने से उसके 70 दिन जेल में बर्बाद हो गए, जो नहीं होने चाहिए थे. इस तरीके से इसके दुरुपयोग के मामले सामने आते रहते हैं.

एनडीपीएस एक्ट 1985 क्या है?
दरअसल, इसका पूरा नाम नारकोटिक ड्रग्स एंड साइकोट्रोपिक सब्सटेंस एक्ट है. इसका उद्देश्य भारत में नशीले पदार्थों के उत्पादन, निर्माण, खेती, कब्जे, बिक्री, परिवहन और सेवन पर पूर्ण रोक लगाना है. NDPS एक्ट एक सख्त नशीली दवाओं विरोधी कानून है जो सजा और पुनर्वास के बीच संतुलन बनाता है. नोडल एजेंसी- नारकोटिक्स कंट्रोल ब्यूरो (NCB) है. यह अधिनियम पूरे भारत और विदेश में स्थित भारतीय नागरिकों पर भी लागू होता है.

NDPS एक्ट के उद्देश्य
- नियंत्रण और विनियमन: चिकित्सा या वैज्ञानिक उपयोग को छोड़कर, नशीली दवाओं और साइकोट्रोपिक पदार्थों के उत्पादन, बिक्री, खरीद, परिवहन और सेवन पर रोक लगाता है.
- अवैध तस्करी रोकना: तस्करी और अवैध व्यापार को रोकने के लिए मजबूत प्रवर्तन शक्तियां प्रदान करता है.
- पुनर्वास: नशीली दवाओं की लत को एक बीमारी के रूप में मान्यता देता है और उन नशेड़ियों को छूट (इम्युनिटी) देता है जो स्वेच्छा से इलाज करवाते हैं.
सभी लॉ एनफोर्समेंट एजेंसी को मिलकर करना होगा काम
एडवोकेट चंद्रन ने कहा कि ड्रग्स की इंटरनेशनल ट्रैफिकिंग होती है, नेशनल ट्रैफिकिंग होती है और इंडस्ट्रियल ट्रैफिकिंग भी होती है. इन सभी चीजों को रोकने के लिए जितनी भी लॉ एनफोर्समेंट एजेंसीज हैं, जिसमें पुलिस, एनसीबी है, सबको मिलकर काम करना होगा. उसके बाद ही इस पर रोक लगा सकते हैं. उन्होंने यह भी कहा कि वैसे अधिकतर मामलों में यह देखने में आया है कि पुलिस के लोग ही खुद नशा तस्करों से मिले हुए होते हैं. उनकी देखरेख में ही सब कुछ काम चल रहा होता है. हर जिले में हर जगह पुलिस वालों को पता होता है कौन क्या बेच रहा है. लेकिन, पुलिस उसको बंद नहीं कराती.
एडवोकेट सुभाष चंद्रन ने कहा कि एनडीपीएस एक्ट में भी 10 साल या 20 साल तक की सजा का प्रावधान है. लेकिन असली खामियां यह है की असली दोषी जो है, वह सजा से बच जाते हैं. इसका कारण उनकी पुलिस और बड़े अधिकारियों से पूरे सिस्टम से मिली भगत रहती है. इसलिए असली अपराधी तक पहुंचना भी कई बार मुश्किल हो जाता है. एडवोकेट चंद्रन ने कहा कि अगर सभी एजेंसी मिलकर काम करें तो नशे को रोका जा सकता है.

बैन के बावजूद धड़ल्ले से कैसे बिकते हैं नशीले पदार्थ
वहीं, नशा तस्करी को लेकर दिल्ली हाई कोर्ट के अधिवक्ता सुनील कुमार का कहना है कि यह बड़े ही दुर्भाग्य की बात है कि जो चीज बैन है उसके बावजूद भी वो आसानी से उपलब्ध हो जाती है. इससे हमारी लॉ एंफोर्समेंट एजेंसीज की लापरवाही उजागर होती है. उन्होंने कहा कि पानी की बोतल ढूंढना एक बार मुश्किल हो सकता है लेकिन नशीले पदार्थों को ढूंढना बहुत आसान है. यह आसानी से उपलब्ध हो जाते हैं.
अधिवक्ता सुनील कुमार का ये भी कहना है कि देश की राजधानी में भी नशे की तस्करी और बिक्री में कोई कमी नहीं है. बड़े स्तर पर सभी काम हो रहे हैं. पुलिस के द्वारा कार्रवाई करने के बावजूद भी यह नशाखोरी का कार्य निरंतर जारी रहता है. अगर सभी एजेंसीज मिलकर इसके खिलाफ सख्ती से अभियान चलाएं तो इसको रोकना मुश्किल नहीं है. लेकिन, सिस्टम के साथ मिलकर ही नशा तस्कर इस तरह का धंधा करते हैं.

नशा तस्करों के खिलाफ इस वजह से भी नहीं हो पाती सख्त कार्रवाई
दिल्ली से दूसरे राज्यों तक भी ड्रग्स की तस्करी होती है. कई बार पुलिस ने बड़ी-बड़ी खेप भी पकड़ी हैं. गुजरात में भी दिल्ली पुलिस ने दिल्ली से जाकर बहुत बड़ी खेप पकड़ी थी. इस तरह के सभी मामले कहीं ना कहीं एजेंसियों के तालमेल में कमी और कुछ अधिकारियों के नशा तस्करों के साथ मिले होने के कारण ही रोकथाम नहीं हो पाती है. एडवोकेट सुनील कुमार ने कहा कि दिल्ली में बड़े-बड़े शिक्षा संस्थानों के बाहर भी आसानी से बच्चे आपको नशीले पदार्थ का सेवन करते हुए मिल सकते हैं. गांजा, स्मैक आसानी से बड़ी-बड़ी जगह पर उपलब्ध हो रहा है. जबकि यह चीज पूरी तरह से बैन है.
एडवोकेट सुनील ने कहा कि पुलिस और नशा तस्करों की मिली भगत होती है. पुलिस को सब पता होता है कहां-कहां कौन-कौन सी नशे की चीजें बेची जा रही है. पुलिस कार्रवाई नहीं करती है, क्योंकि पुलिस भी उनके साथ उस धंधे में शामिल होती है. उन्होंने कहा कि जिस तरह से माफिया के लिए बुलडोजर कार्रवाई हो रही है. एक सदस्य की गलती पर पूरा घर तोड़ा जा रहा है इस तरीके की कार्रवाई नशा तस्करों के खिलाफ भी होनी चाहिए, तभी इस पर रोक लगाई जा सकती है.
पूरे साल सख्ती के साथ अभियान चलाने की जरूरत
एडवोकेट सुनील ने कहा कि दिल्ली पुलिस और संबंधित एजेंसीज द्वारा दिल्ली में नशे की रोकथाम के लिए जो प्रयास किया जा रहे हैं वह बहुत ही कम हैं. पूरी ईमानदारी के साथ अगर काम करें तभी यह प्रयास सफल हो सकते हैं. यह अभियान कुछ समय तक नहीं बल्कि पूरे साल चलाने की जरूरत है. लगातार सख्ती के साथ कार्रवाई हो तभी इसकी कुछ रोकथाम हो सकती है. दिल्ली पुलिस ने अपनी कई सेल बना रखी हैं जैसे, स्पेशल सेल, क्राइम ब्रांच है इसी तरह से नशे को रोकने के लिए भी कोई सेल बनाई जानी चाहिए, ताकि प्रभावी रूप से कार्रवाई हो सके.
NDPS एक्ट के दायरे में आने वाले पदार्थ
- नारकोटिक्स - जो सेंट्रल नर्वस सिस्टम को धीमा करते हैं (जैसे अफीम, अफीम के अर्क, कोका डेरिवेटिव्स)
- साइकोट्रोपिक सब्सटेंस - जो मन और व्यवहार को प्रभावित करते हैं (जैसे LSD, एम्फ़ैटेमिन, हेरोइन).
- कैनबिस - गांजा, चरस, हशीश.
- अन्य - सिंथेटिक ड्रग्स और वे रसायन जिनका उपयोग अवैध ड्रग्स बनाने में होता है.

दूसरे देशों में है सख्त कानून, तीन चार महीने के ट्रायल में ही मिल जाती है सजा
एडवोकेट चंद्रन ने बताया कि अगर हम दूसरे देशों की बात करें तो मिडल ईस्ट में तो सीधा एग्जीक्यूशन होता है. अगर किसी के पास से नशीला पदार्थ मिलता है तो उसके ऊपर सीधी कार्रवाई होती है. बहुत ज्यादा लंबा ट्रायल नहीं चलता है. तीन चार महीने के ट्रायल में ही आरोपी को सजा मिल जाती है. इसलिए लोग वहां पर नशे की तस्करी करने से डरते हैं. उन्होंने बताया कि सभी एजेंसियां अगर नशा मुक्ति के लिए मिलकर काम करें तभी इस पर लगाम लगाई जा सकती है. उन्होंने कहा कि कानून में किसी भी तरह की कोई कमी नहीं है. लेकिन, जो लॉ एंफोर्समेंट एजेंसीज हैं, उनके साथ कई नशाखोर एजेंट मिले रहते हैं, जो उन तक सूचना पहुंचाते रहते हैं. इस वजह से बड़ी करवाई नहीं हो पाती है.

इन देशों में नशीले पदार्थों के खिलाफ कड़े कानून
- बांग्लादेश: खतरनाक ड्रग्स (संशोधन) अधिनियम, 1988 के तहत ड्रग से जुड़े अपराधों के लिए मौत की सज़ा का प्रावधान किया गया था. यह अधिनियम 7 जुलाई 1988 को पारित हुआ था. इस अधिनियम में खतरनाक ड्रग्स की खेती, निर्माण, आयात, निर्यात या तस्करी के लिए मौत की सज़ा को एक वैकल्पिक सज़ा के तौर पर रखा गया है.
- चीन: चीन में ड्रग्स की तस्करी के लिए मौत की सज़ा का प्रावधान क्रिमिनल लॉ (आपराधिक कानून) में किए गए उन संशोधनों के तहत लाया गया था, जिन्हें नेशनल पीपल्स कांग्रेस की स्टैंडिंग कमेटी ने 8 मार्च 1982 को मंज़ूरी दी थी और जो 1 अप्रैल 1982 से लागू हुए थे. ये संशोधन क्रिमिनल लॉ की धारा 171 पर लागू होते हैं, जो अफ़ीम, हेरोइन, मॉर्फ़िन या अन्य नशीले पदार्थों के उत्पादन, बिक्री और शिपमेंट पर रोक लगाती है.
- इंडोनेशिया: 1976 के नारकोटिक्स कानून की धारा 36 में पोस्ता (poppy) और पोस्ता-आधारित नशीले पदार्थों, साथ ही स्वास्थ्य मंत्री द्वारा नशीले पदार्थों के तौर पर तय किए गए उनके किसी भी विकल्प की तस्करी से जुड़े कुछ अपराधों के लिए वैकल्पिक सज़ा के तौर पर मौत की सज़ा का प्रावधान है.
- ईरान: 1959 के एक कानून के तहत नशीली दवाओं के बार-बार उत्पादन या आयात के लिए, और 1969 में कानून में हुए संशोधन के तहत तय मात्रा में नशीली दवाओं की अवैध तस्करी के लिए अनिवार्य रूप से मौत की सज़ा का प्रावधान था। ईरान के शाह की सरकार के दौरान कई दोषी ड्रग अपराधियों को मौत की सज़ा दी गई थी.
- म्यांमार: नारकोटिक्स एंड डेंजरस ड्रग्स लॉ 1974 के तहत नशीले और खतरनाक ड्रग्स बनाने, आयात करने, निर्यात करने या बेचने, और इनमें से कोई भी अपराध करने में मदद करने, कोशिश करने या साज़िश रचने के लिए मौत की सज़ा का प्रावधान है.
- सऊदी अरब: 1987 में ड्रग्स से जुड़े अपराधों के लिए मौत की सज़ा का नियम लागू किया गया था. 18 फरवरी 1987 को सऊदी अरब की सबसे बड़ी धार्मिक संस्था, 'काउंसिल ऑफ़ सीनियर उलेमा' (धार्मिक विद्वान) ने फतवा (धार्मिक आदेश) नंबर 138 जारी किया. इस आदेश में विदेश से ड्रग्स की तस्करी करने या उसे मंगाने पर अनिवार्य रूप से मौत की सज़ा और बार-बार ड्रग्स बांटने पर मौत की सज़ा देने का विकल्प रखा गया है.
- संयुक्त अरब अमीरात: ड्रग्स से जुड़े अपराधों के लिए मौत की सज़ा का प्रावधान 'नशीले पदार्थों के ख़िलाफ़ लड़ाई' से जुड़े फ़ेडरल लॉ 6/1986 के तहत किया गया था. यह कानून अप्रैल 1986 में लागू हुआ. कानून की धारा 50 के तहत, ड्रग तस्करी में शामिल गिरोह के सरगना के लिए मौत की सज़ा एक विकल्प के तौर पर रखी गई है; अगर अपराध दोहराया जाता है, तो यह सज़ा अनिवार्य हो जाती है. धारा 53 में ड्यूटी के दौरान ड्रग एनफोर्समेंट अफ़सर की हत्या करने पर मौत की सज़ा का प्रावधान है
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