Explainer: ग्लेशियर झीलें बनीं नई चुनौती, हिमालयी राज्यों पर जलवायु परिवर्तन का व्यापक असर, पढ़िए पूरी रिपोर्ट
भारतीय प्लेट और यूरेशियन प्लेट में होने वाली भूगर्भीय गतिविधियों के कारण यह पूरा क्षेत्र भूकंपीय रूप से संवेदनशील है. रिपोर्ट- नरेंद्र निषाद.

Published : September 1, 2026 at 7:31 PM IST
धनबाद: तिब्बत में ग्लेशियर और ग्लेशियल झील से जुड़ी प्राकृतिक आपदा के बाद हिमालयी क्षेत्र में मौजूद सैकड़ों ग्लेशियल झीलों को लेकर चिंता बढ़ गई है. जिस तेजी से हिमालय और तिब्बत के ऊंचाई वाले इलाकों में ग्लेशियरों का पैटर्न बदल रहा है और नई झीलें बन रही हैं, उसने वैज्ञानिकों की चिंता बढ़ा दी है.
वैज्ञानिकों के मुताबिक, पिछले दो से तीन दशकों में हिमालयी क्षेत्र के प्राकृतिक भूगोल में तेजी से बदलाव आया है. ग्लोबल वार्मिंग के कारण ग्लेशियर पीछे हट रहे हैं और उनके आसपास पानी जमा होने से नई झीलें बन रही हैं. कई पुरानी ग्लेशियल झीलों का आकार भी लगातार बढ़ रहा है.
झील का प्राकृतिक बांध टूटने पर कितना असर?
ऐसे में सबसे बड़ा सवाल यह है कि अगर किसी झील का प्राकृतिक बांध अचानक टूट गया तो नीचे की घाटियों में इसका असर कितना भयावह हो सकता है? और क्या भूकंप जैसी गतिविधियां इन झीलों के लिए ट्रिगर का काम कर सकती हैं? इन्हीं सवालों को लेकर ईटीवी भारत संवाददाता नरेंद्र कुमार निषाद ने बातचीत की आईआईटी आईएसएम धनबाद के एप्लाइड जियोफिजिक्स विभाग के प्रोफेसर अनूप कृष्ण प्रसाद से.
भूकंपीय रूप से संवेदनशील है हिमालय
उन्होंने बताया कि हिमालय को दुनिया के सबसे युवा और सक्रिय पर्वत क्षेत्रों में गिना जाता है. भारतीय प्लेट और यूरेशियन प्लेट की लगातार होने वाली भूगर्भीय गतिविधियों के कारण यह पूरा क्षेत्र भूकंपीय रूप से संवेदनशील है. एक तरफ यहां लगातार भूगर्भीय हलचल होती रहती है, तो दूसरी तरफ जलवायु परिवर्तन का असर भी हिमालय के ग्लेशियरों पर दिखाई दे रहा है.
समय के साथ बढ़ रहा है झीलों का आकार
ग्लेशियरों के पिघलने से निकलने वाला पानी कई जगहों पर ग्लेशियल झीलों में जमा हो रहा है. समय के साथ इन झीलों का आकार बढ़ता जा रहा है. समस्या तब गंभीर होती है, जब किसी झील का पानी बर्फ, मलबे, चट्टानों और मिट्टी से बने कमजोर प्राकृतिक बांध के पीछे जमा हो, अगर किसी वजह से यह बांध टूट गया, तो जमा हुआ पानी अचानक बेहद तेज गति से नीचे की तरफ बढ़ सकता है. इसके साथ बड़ी मात्रा में बर्फ, चट्टान, मिट्टी और मलबा भी बह सकता है.
भूकंप और ग्लेशियर से जुड़ी घटनाओं के बीच संबंध?
इसी तरह की घटनाओं को ग्लेशियल लेक आउटबर्स्ट फ्लड यानी GLOF के रूप में जाना जाता है, लेकिन तिब्बत में हुई घटना ने एक और महत्वपूर्ण सवाल खड़ा किया है क्या भूकंप और ग्लेशियर से जुड़ी घटनाओं के बीच कोई संबंध हो सकता है?
'तबाही' के लिए ट्रिगर का काम करता है भूकंपीय कंपन
हिमालय भूकंप की दृष्टि से बेहद सक्रिय क्षेत्र है. यहां आने वाला भूकंप सिर्फ जमीन को हिलाता ही नहीं है, बल्कि पहाड़ों की ढलानों, बर्फ और प्राकृतिक संरचनाओं को भी प्रभावित कर सकता है. किसी संवेदनशील क्षेत्र में अगर पहले से ही कमजोर ग्लेशियर या प्राकृतिक बांध मौजूद हो, तो भूकंपीय कंपन उसके लिए ट्रिगर का काम कर सकता है, लेकिन किसी घटना का कारण सिर्फ अनुमान से तय नहीं किया जा सकता. इसके लिए वैज्ञानिकों को सिस्मिक रिकॉर्ड और दूसरी वैज्ञानिक सूचनाओं का विश्लेषण करना पड़ता है.
भूकंप और ग्लेशियर के टूटने से पैदा होने वाले कंपन के सिग्नल में अंतर होता है. भूकंप आने पर सिस्मोग्राफ में एक खास तरह का वेव पैटर्न रिकॉर्ड होता है. वही जब ग्लेशियर का बड़ा भाग टूटता है, चट्टानें खिसकती हैं या बर्फ और मलबे का बड़ा द्रव्यमान नीचे की तरफ गिरता है, तो उससे पैदा होने वाले कंपन का स्वरूप अलग हो सकता है यानी आधुनिक सिस्मिक मॉनिटरिंग के जरिए किसी प्राकृतिक घटना के पीछे की प्रक्रिया को समझने में मदद मिल सकती है. इससे यह पता लगाने में मदद मिलती है कि घटना की शुरुआत भूकंप से हुई, ग्लेशियर टूटने से हुई या फिर किसी दूसरे प्राकृतिक कारण से: प्रो. अनूप कृष्ण प्रसाद, एप्लाइड जियोफिजिक्स विभाग, IIT-ISM
सबसे बड़ी चुनौती हिमालय के दुर्गम इलाकों में लगातार निगरानी
हिमालय में हजारों मीटर की ऊंचाई पर कई ग्लेशियर और झीलें मौजूद हैं. कई इलाकों तक पहुंचना बेहद मुश्किल है. ऐसे में हर झील की जमीनी स्तर पर लगातार निगरानी करना आसान नहीं है. यहीं पर सैटेलाइट इमेजरी और रिमोट सेंसिंग तकनीक महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकती है.

सैटेलाइट तस्वीरों की मदद से समय-समय पर यह पता लगाया जा सकता है कि किसी झील का आकार बढ़ रहा है या नहीं. ग्लेशियर पीछे हट रहा है या नहीं. नई झील कहां बन रही है? और किस झील के आसपास का प्राकृतिक बांध कमजोर हो रहा है.
क्यों अहम है रिस्क मैपिंग
दरअसल, खतरा सिर्फ इस बात से तय नहीं होता कि किसी ग्लेशियल झील में कितना पानी जमा है. यह भी देखना जरूरी है कि झील के नीचे कितनी आबादी रहती है, उसके रास्ते में कितने गांव हैं, कितनी सड़कें, पुल, बिजली परियोजनाएं और दूसरी आधारभूत संरचनाएं मौजूद हैं. अगर किसी झील के टूटने के बाद पानी और मलबा सीधे किसी आबादी वाले इलाके की ओर जाता है, तो उसका नुकसान कई गुना बढ़ सकता है. इसलिए वैज्ञानिकों के लिए सिर्फ झीलों की संख्या गिनना पर्याप्त नहीं है, जरूरत है रिस्क मैपिंग की.
यानी कौन-सी झील कितनी संवेदनशील है, उसका प्राकृतिक बांध कितना मजबूत है, झील का आकार कितनी तेजी से बढ़ रहा है और उसके टूटने की स्थिति में पानी किस दिशा में जाएग, इन सभी पहलुओं का अध्ययन जरूरी है.
ग्लेशियल झील के टूटने का अनुमान लगाना मुश्किल
वहीं संभावित बाढ़ के रास्ते का मॉडल तैयार किया जा सकता है. इससे यह अनुमान लगाया जा सकता है कि अगर झील टूटती है तो पानी और मलबा कितनी दूरी तक पहुंच सकता है और कौन-कौन से इलाके सबसे ज्यादा प्रभावित हो सकते हैं लेकिन यहां एक सवाल यह भी है कि क्या वैज्ञानिक किसी ग्लेशियल झील के टूटने की तारीख और समय पहले से बता सकते हैं? इसका जवाब इतना आसान नहीं है.

किसी प्राकृतिक आपदा के ट्रिगर की सटीक भविष्यवाणी करना आज भी बड़ी चुनौती है. भूकंप कब आएगा, ग्लेशियर का कौन सा हिस्सा कब टूटेगा या प्राकृतिक बांध किस समय कमजोर होकर टूट जाएगा, इसे बिल्कुल सटीक तरीके से बताना मुश्किल है, लेकिन खतरे वाले इलाके की पहचान जरूर की जा सकती है यानी वैज्ञानिक यह पता लगा सकते हैं कि कौन-सी झील ज्यादा संवेदनशील है, कहां प्राकृतिक बांध कमजोर है और किन इलाकों में संभावित नुकसान ज्यादा हो सकता है. यहीं से अर्ली वार्निंग सिस्टम की भूमिका शुरू होती है.
संवेदनशील झील के आसपास तकनीकी निगरानी
अगर किसी संवेदनशील झील के आसपास सेंसर, रिमोट मॉनिटरिंग और सैटेलाइट आधारित निगरानी को मजबूत किया जाए, तो अचानक होने वाले बदलावों का पता लगाया जा सकता है, झील के जलस्तर में असामान्य बदलाव, आसपास की बर्फ या चट्टानों की गतिविधि और प्राकृतिक बांध में होने वाले परिवर्तन को समय रहते पहचानने की कोशिश की जा सकती है. इसके साथ नीचे की घाटियों में चेतावनी प्रणाली को जोड़ना भी जरूरी है, क्योंकि किसी झील के टूटने के बाद सबसे महत्वपूर्ण चीज होती है, समय.

अगर नीचे रहने वाली आबादी को कुछ मिनट या कुछ समय पहले भी विश्वसनीय चेतावनी मिल जाए, तो लोगों को सुरक्षित स्थानों पर पहुंचाने में मदद मिल सकती है.
ग्लेशियर के पिघलने की वजह से झीलों का निर्माण
ग्लोबल वार्मिंग इस पूरी समस्या को और जटिल बना रही है. तापमान में बढ़ोतरी के कारण ग्लेशियरों के पिघलने की प्रक्रिया तेज होती है. ग्लेशियर के पीछे हटने के साथ कई जगहों पर पानी जमा होकर झीलों का निर्माण करता है. एक तरफ ग्लेशियर कम हो रहे हैं और दूसरी तरफ उनके पीछे या आसपास पानी के नए भंडार बन रहे हैं. यही बदलाव हिमालयी पारिस्थितिकी और आपदा प्रबंधन के लिए एक बड़ी चुनौती बनता जा रहा है.
वैज्ञानिक आधार पर खतरे का आकलन जरूरी
हालांकि हर ग्लेशियल झील को खतरा मानना भी सही नहीं होगा. हर झील की भौगोलिक स्थिति अलग है. हर झील का आकार अलग है. उसके आसपास का भूगोल, प्राकृतिक बांध की संरचना और नीचे मौजूद आबादी अलग-अलग है, इसलिए जरूरी है कि खतरे का आकलन वैज्ञानिक आधार पर किया जाए.

किसी झील का आकार बड़ा है, इसका मतलब यह जरूरी नहीं कि वही सबसे खतरनाक है. कई बार छोटी झील भी अगर कमजोर प्राकृतिक बांध के पीछे हो और उसके नीचे घनी आबादी हो, तो वह बड़ा खतरा बन सकती है.
तिब्बत की घटना ने भारत के हिमालयी राज्यों के लिए भी कई सवाल खड़े कर दिए हैं. उत्तराखंड, हिमाचल प्रदेश, सिक्किम, अरुणाचल प्रदेश और दूसरे हिमालयी क्षेत्रों में भी ग्लेशियर और ग्लेशियल झीलें मौजूद हैं.
संभावित खतरे वाले क्षेत्रों में बढ़ी मनुष्य की गतिविधियां
इन इलाकों में पिछले सालों में बाढ़, भूस्खलन, ग्लेशियर टूटने और अचानक जलप्रवाह जैसी घटनाएं सामने आती रही हैं. इसके अलावा इन संवेदनशील घाटियों में सड़क, पुल, जलविद्युत परियोजनाओं और दूसरी आधारभूत संरचनाओं का विस्तार भी हुआ है यानी एक तरफ प्राकृतिक खतरा बढ़ रहा है और दूसरी तरफ उस खतरे के संभावित प्रभाव वाले इलाके में मानवीय गतिविधियां भी बढ़ रही हैं.
विशेषज्ञों के मुताबिक, अब जरूरत सिर्फ आपदा आने के बाद राहत और बचाव तक सीमित रहने की नहीं है. जरूरत है आपदा से पहले तैयारी की. हिमालयी क्षेत्र में मौजूद ग्लेशियल झीलों का एक वैज्ञानिक डेटाबेस तैयार किया जाए. उनकी लगातार निगरानी हो. संवेदनशील झीलों की प्राथमिकता तय की जाए. संभावित फ्लड रूट की मैपिंग हो और नीचे बसे गांवों तथा महत्वपूर्ण आधारभूत संरचनाओं को जोखिम के आधार पर चिन्हित किया जाए.
खतरे से पहले लोगों को अवगत कराना जरूरी
इसके साथ स्थानीय लोगों को भी यह बताया जाना जरूरी है कि अचानक नदी का जलस्तर बढ़ने, असामान्य आवाज सुनाई देने या पहाड़ से तेज मलबा आने की स्थिति में क्या करना है. क्योंकि अर्ली वार्निंग सिस्टम तभी प्रभावी होगा, जब चेतावनी के बाद लोगों को सुरक्षित निकालने की व्यवस्था भी मौजूद हो.
तिब्बत की घटना ने एक बार फिर यह दिखाया है कि हिमालय सिर्फ भूकंप के लिहाज से ही संवेदनशील नहीं है, यहां ग्लेशियरों का पिघलना, ग्लेशियल झीलों का विस्तार, भूस्खलन, चट्टानों का खिसकना और अचानक आने वाली बाढ़, ये सभी खतरे एक-दूसरे से जुड़े हुए हैं. ग्लोबल वार्मिंग इन प्राकृतिक प्रक्रियाओं को प्रभावित कर रही है, जबकि भूकंपीय गतिविधियां किसी संवेदनशील क्षेत्र के लिए ट्रिगर का काम कर सकती हैं. ऐसे में भविष्य की चुनौती सिर्फ यह पता लगाना नहीं है कि हिमालय में कितनी झीलें हैं. सबसे बड़ा सवाल यह है कि कौन-सी झील कब और किस तरह खतरा बन सकती है?
ग्लेशियर और ग्लेशियल झीलों की वैज्ञानिक तकनीक से निगरानी
तिब्बत की तबाही ने हिमालयी क्षेत्र के लिए एक साफ चेतावनी जरूर दी है. अगर ग्लेशियरों और ग्लेशियल झीलों की निगरानी को वैज्ञानिक तकनीक से मजबूत नहीं किया गया, अगर संवेदनशील घाटियों की मैपिंग नहीं हुई और अगर समय रहते लोगों तक चेतावनी पहुंचाने की व्यवस्था मजबूत नहीं की गई, तो भविष्य में किसी प्राकृतिक घटना का असर कई गुना बड़ा हो सकता है.

सैटेलाइट से लेकर सिस्मिक नेटवर्क तक, रिमोट सेंसिंग से लेकर ग्राउंड सेंसर तक, हर तकनीक का इस्तेमाल कर हिमालयी क्षेत्रों के लिए एक मजबूत मल्टी-लेयर अर्ली वार्निंग सिस्टम तैयार करने की जरूरत है. यानी तिब्बत की घटना को सिर्फ एक स्थानीय प्राकृतिक आपदा के तौर पर देखने के बजाय हिमालयी क्षेत्र के लिए एक बड़ी चेतावनी के रूप में देखने की जरूरत है.
वैज्ञानिक तकनीक के इस्तेमाल से कम किया जा सकता है खतरा
ग्लोबल वार्मिंग के कारण बदलते ग्लेशियर, बढ़ती ग्लेशियल झीलें और दूसरी तरफ लगातार सक्रिय हिमालयी भूकंपीय क्षेत्र, इन दोनों परिस्थितियों का मेल आने वाले समय में चुनौती को और गंभीर बना सकता है, हालांकि वैज्ञानिक तकनीक और लगातार निगरानी के जरिए खतरे वाले क्षेत्रों की पहचान की जा सकती है और नुकसान को कम करने की तैयारी भी की जा सकती है.
सवाल अब यह है कि क्या हम आपदा आने का इंतजार करेंगे या उससे पहले हिमालय की इन खतरनाक झीलों और ग्लेशियरों की निगरानी को मजबूत करेंगे?
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