'मत डालो श्याम पिचकारी, मोरी भीगे चुनरिया सारी..' ठुमरी के बिना होली का गायन अधूरा
बिहार के गया की ठुमरी काफी मशहूर है. कहा जाता है कि बिना ठुमरी के आज भी होली अधूरी है. पढ़ें इसकी खासियत..

Published : March 4, 2026 at 1:23 PM IST
- रिपोर्ट: सरताज़ अहमद
गया: आज रंगों का त्योहार होली है. बिहार के गया की होली को अपनी सांस्कृतिक विशेषता के लिए भी याद किया जाता है, क्योंकि होली में संगीत का आनंद भी खास महत्व रखता है. ऐसे में गया की ठुमरी गायन के बिना होली अधूरी मानी जाती है. कथा को गायन की शैली में कहने की एक कला के रूप में ठुमरी है.
ठुमरी गायन को मिठास, लय और विशेष बोल के लिए जाना जाता है. आम भाषा में कहें तो इस के माध्यम से व्यक्ति के इरादे कहे जाते हैं. हालांकि गया में पिछले कुछ सालों पहले ठुमरी गायन के साथ होली मनाने की परंपरा में गिरावट भी आई थी लेकिन अब फिर से वही सदियों पुरानी परंपरा परवान चढ़ रही है.
घरानों में रच बस गई है ठुमरी: गया की सांस्कृतिक विरासत काफी पुरानी है. वर्षों पहले शास्त्रीय संगीत का महत्वपूर्ण केंद्र गया भी हुआ करता था. ठुमरी में गया घराने की ख्याति पूरे देश में रही है. ठुमरी की महफिल खासकर गयापाल पंडा समाज के घरों में सजती थी. ठुमरी को शास्त्रीय संगीत का एक उप शास्त्रीय संगीत भी कहा जाता है. जो पूर्व में लखनऊ बनारस और गया में गाया जाता है, जबकि पश्चिम में पंजाब के क्षेत्र में इसका मधुर संगीत सुनाई देती है. ठुमरी गायन में अगर देखा जाए तो गया घराने की थोड़ी ज्यादा ख्याति प्राप्त रही है, क्योंकि इस का अंदाज भी बिल्कुल अलग है.
रंगों और संगीत की तानों का अनोखा संगम: होली के अवसर पर जब ठुमरी गायन होता है तो फूलों के रंगों और संगीत की तानों का यह अनोखा संगम देखने लायक होता है. प्रसिद्ध छायाकार श्याम भंडारी कहते हैं कि एक समय था, जब शाम ढलते ही गयाजी के विष्णुपद क्षेत्र समेत कई इलाकों में होली की सुरीली महफिलें जमने लगती थी. होली की ये रिवाज महफिल ही नहीं, बल्कि एक संस्कार भी है. यह भी कम दिलचस्प नहीं है कि होली की यह बैठकें आशीर्वाद के साथ खत्म होती थीं. वो एक बोल को दोहराते हैं कि 'मुबारक हो मंजरी फूलों भरी, ऐसी होली खेले जनाबे अली.'

वरिष्ठ छायाकार श्याम भंडारी कहते हैं कि होली में संगीत का आनंद लेना है तो ठुमरी के बिना होली अधूरी है. ठुमरी एक कला है, गायन शैली को कहने की. इस गायन में सपाट शैली नहीं है, बल्कि ठुमक है. यहां गया में जद्दन बाई, ठेला बाई, सविता देवी, शुभा गुड्डू समेत देश के कई बड़े फनकार ने ठुमरी गाए हैं. यही कारण है कि एक समय में कहा जाता था कि गया की ठुमरी और होली एक दोनों के प्राय हैं. इसके बिना होली की कल्पना भी नहीं की जा सकती. आज के दौर में वह संगीत प्रेमी कम हुए हैं.
गाने और सुनने में धैर्य जरूरी: ठुमरी की शुरुआत लखनऊ से हुई. नवाब वाजिद अली शाह के जमाने में ये बड़ी फली-फूली. उसके बाद ठुमरी का विकास बनारस और गया में हुआ. श्याम भंडारी कहते हैं कि गया में ठुमरी इसलिए फैली कि यहां जमींदारी बहुत थी. गया में गयापाल पांडा संगीत में काफी रुचि रखते थे और वो अमीर भी थे.
वे कहते हैं कि लगभग 200 साल पूर्व पंडा समाज के विद्वान कलाकार कन्हैया लाल ने राजस्थान के गायक सोनी सिंह को गया आने का बुलावा भेजा था. सोनी सिंह ठुमरी के बड़े गायक थे. उन्होंने ही गया घराने में ठुमरी की शुरुआत की थी. ये एक ऐसी कला है, जिसमें गाने और सुनने दोनों में धैर्य जरूरी है. बिना धैर्य के आप इस को समझ नहीं सकते.

ठुमरी फिर से हो रही लोकप्रिय: किलकारी में बाजाब्ते इसके गुरु पदस्थापित हैं, जो 7 साल से लेकर 15-20 वर्षों के बच्चे बच्चियों को सिखा रहे हैं जबकि आम लोगों तक फिर से ये धूम मचाए. इसके लिए सुर सलिला संस्था भी प्रयासरत है. सुर सलिला भी बच्चों को निःशुल्क सिखा रहा है. ठुमरी के बड़े कलाकार और संरक्षक राजन सीजूआर इसके लिए सब से ज्यादा कोशिश कर रहे हैं.
"अब तो इस के सुनने वाले बहुत कम हो गए हैं. पहले बहुत होते थे. एक समय ऐसा भी रहा, जब ये सीमित हो गया. पहले तो हर आयोजन में गाया जाता था. मगर अब फिर से हाल के वर्षों में लोगों की जुबान तक पहुंच रही है. इस में गया के किलकारी भवन का भी योगदान है."- श्याम भंडारी, वरिष्ठ छायाकार
ठुमरी है गया की प्राचीन विरासत: प्रसिद्ध गायक दिनेश कुमार महुवार कहते हैं कि गया अति प्राचीन नगरी है. इस वजह से हमारा सांस्कृतिक विरासत भी अति प्राचीन है. गायकी में फागुन के महीने में होली गई जाती है. हमारे गायन की विशेषता है कि हमारे संगीत के तीन घराने हैं. लखनऊ बनारस और गया, जिसमें गया का गाने अंदाज बाकी गानों के अनुसार अलग है. इस में थोड़ा स्थिरता और शांत भाव है. रिदम यानी के लय की जो गति होती है, वह भी बाकी घरानों की अपेक्षा कम रखते हैं. गाने में शब्दों के उच्चारण हमारे स्थानीय प्रभाव यानी के मगध का प्रभाव स्पष्ट रूप से झलकता है.

ठुमरी के बिना होली अधूरी: दिनेश कुमार महुवार कहते हैं कि ठुमरी के बिना होली अधूरी मानी जाती है. गया में ठुमरी के बिना होली पूरी नहीं होती है. आज भी महफिलें सजती है और इसका गायन होता है. गया घराने की ठुमरी का गायन स्वर्गीय पंडित राम जी मिश्रा ने शुरू किया था.
"ठुमरी के साथ की होली की अलग पहचान है. होली में जब ठुमरी की संगत बैठी थी, तब पूरी रात बीत जाती थी. रामजी मिश्रा गया घराने की ठुमरी गायन को बहुत ऊंचाई तक ले गए, यह आज भी पूरे देश में गई जा रही है."- दिनेश कुमार महुवार, कलाकार
किलकारी में छात्रों को ठुमरी का प्रशिक्षण: गया के किलकारी भवन में प्रतिदिन छात्रों को ठुमरी गायन के प्रशिक्षण दिए जाते हैं. इसके कई शिक्षक भी हैं. अपर्णा राज कहती हैं कि यह होली की गीत हमारी परंपरा है. गया की विरासत है. हमें इसको लेकर चलना है. अगर हम इसको लेकर नहीं चलेंगे तो आगे जाकर यह कहीं ना कहीं विलुप्त हो जाएगा. ऐसे में इसे बचाना हमारा कर्तव्य है.

"हम युवा इसे सीख रहे हैं और समझ रहे हैं. हम यह भी चाहेंगे कि बाकी बच्चे भी इसको सीखें और इसका आनंद लें. अगर विलुप्त हो गया तो फिर कहा यही जाएगा कि गया घराने में कोई संगीत था, किसी को याद ही नहीं है. हमें इसे जीवित रखना है. अगर आप पुरानी चीजों को भूल जाएंगे तो फिर भविष्य कैसे बनाएंगे?"- अपर्णा राज, शिक्षक
क्या है ठुमरी?: उत्तर भारतीय शास्त्रीय संगीत की अर्ध-शास्त्रीय गायन शैली ठुमरी में प्रेम, विरह और भक्ति के भाव को व्यक्त किया जाता है. यह शैली 19वीं सदी में विकसित हुई थी. भावुकता, श्रृंगार रस और मधुर शब्दों के लिए यह शैली लोकप्रिय है. लखनऊ और बनारस को ठुमरी के दो मुख्य घराना माना जाता है.
गया घराने की ठुमरी की खासियत?: लखनऊ और बनारस घराने की ठुमरी से गया घराने की ठुमरी थोड़ी अलग है. भाव-भाषा और मधुरता इसकी विशेषता है. इसे बनारस शैली से प्रभावित मानी जाती है. यह घराना रागों के साथ-साथ भाव सौंदर्य, स्वर स्पष्टता और नियंत्रित लयकारी पर जोर देता है.
ये भी पढ़ें: जद्दनबाई के यहां सजती थी ठुमरी की महफिल, बिहार की इस हवेली से है संजय दत्त-नरगिस का संबंध

