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'6 वर्षों तक बिहार में रहे थे ईसा मसीह..' क्या कहते हैं इतिहासकार?

इतिहासकारों का मानना है कि ईसा मसीह 6 वर्षों तक बिहार के राजगीर में रहे थे. क्या है इसका प्रमाण? पढ़ें पूरी खबर..

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ईसा मसीह का बिहार से नाता पर इतिहासकारों की राय (ETV Bharat)
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By ETV Bharat Bihar Team

Published : December 22, 2025 at 6:39 PM IST

6 Min Read
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नालंदा: 'ईसा मसीह बिहार के राजगीर में 6 वर्षों तक रहे थे.' हालांकि ईसाइयों की प्रमुख धार्मिक ग्रंथ बाइबिल में इसका कोई जिक्र नहीं है, लेकिन इतिहासकारों का मानना है कि ईसा मसीह भारत आए थे और काफी लंबे समय तक रहे. मो. तुफ़ैल अहमद खां सूरी एक इतिहासकार और आर्कोलॉजिकल सर्वे ऑफ़ इंडिया के सदस्य हैं. इन्होंने कई ऐसे सबूत दिए, जिसमें ईसा मसीह के भारत आने का जिक्र है.

क्या है प्रमाण?: मो. तुफैल अहमद खां सूरी कई किताब के हवाले से कहते हैं कि ईसा मसीह भारत भ्रमण पर आए थे. इस दौरान राजगीर में भी रहे. मो. तुफैल हिंदी-उर्दू भाषा की एक किताब 'अगर अब नहीं जागे तो', जिसे भारतीय इस्लामी विद्वान, लेखक सैयद अब्दुल्ला तारिक ने लिखा है और इंग्लिश की 'नो एंड नेवर' की किताब का जिक्र करते हैं.

ई. एस अब्दुल्ला तारीक ने दोनों किताब में जिक्र किया है कि 'हजरत ईशा अलैहिस्सलाम (ईसा मसीह)' सबसे पहले भारत के कश्मीर और लद्दाख में आए. रूसी और अंग्रेजी शोधकर्ताओं ने भी इनका उल्लेख किया है." - मो. तुफैल अहमद खां सूरी, इतिहासकार

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इतिहासकार मो. तुफैल अहमद खां सूरी (ETV Bharat)

ओशो की कीताब में जिक्र: मो. तुफैल अहमद खां सूरी ने कई ऐसे ग्रंथ पढ़े हैं, जिसमें ईसा मसीह का भारत से नाता रहा है. हिंदी पत्रिका 'कादम्बिनी', मार्च 1973 में प्रकाशित 'जीसस का अज्ञात जीवन', जिसे आचार्य रजनीश (ओशो) ने लिखा है. इसमें उन्होंने लिखा था कि जीसस (ईशा) कश्मीर के एक बौद्ध मठ में ठहरे थे. उस समय वे 30 वर्ष के थे. हालांकि फ्रांसीसी लेखक ने लिखा कि 'यह कोई नहीं जानता कि ईसा 30 वर्षों तक क्या किए, कहां रुके' एक कहावत के अनुसार कश्मीर में थे.

बौद्ध ग्रंथों में उल्लेख: इतिहासकार मो. तुफैल कहते हैं कि रूसी पत्रकार सह यात्री निकोलस नोटोविच 1858-1916 के दौरान भारत आए थे. यात्रा के दौरान लद्दाख गए, जहां वे बीमार पड़ गए थे. लद्दाख के प्रसिद्ध हेमिस गुफा में ठहरे थे. वहां रहने के दौरान कई बौद्ध ग्रंथो का उन्होंने अध्ययन किया. उन्होंने अपने यात्रा वृतांत में लिखते हैं कि उस बौद्ध ग्रंथों में जीसस क्राइस्ट के शिक्षा व उनकी यात्राओं के बारे में लिखा हुआ है.

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राजगीर स्थित चर्च (ETV Bharat)

"निकोलस नोटोविच खुद एक किताब लिखी 'द अननोन लाइफ ऑफ जीसस क्राइस्टट' जिसमें लद्दाख और पूर्व के दूसरे देशों की यात्रा की जानकारी दी. उसमें उन्होंने कहा कि जीसस क्राइस्ट लद्दाख के ऊंचे पर्वतों से गुजर कर बर्फीले रास्ते को पार कर कश्मीर के पहलगाम पहुंचे थे." - मो. तुफैल अहमद खां सूरी, इतिहासकार

ईसा का पहलगाम से नाता: निकोलस नोटोविच की किताब का हवाला देकर मो. तुफैल कहते हैं कि ईसा मसीह कश्मीर में लंबे समय तक रहे. पहलगांव में भेड़ बकरियों की देखभाल करते रहे. यहां पर जीसस के कई चिह्न मिले हैं. ऐसी मान्यता है कि जीसस के निवास के बाद यह गांव पहलगाम (चरवाहों का गांव) के नाम से जाना गया. जीसस क्राइस्ट श्रीनगर से जाते हुए इसमुक्कम में रूककर उपदेश भी दिए थे.

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नालंदा के चर्च में क्रिसमस दिवस की तैयारी (ETV Bharat)

'ताड़पत्रों पर लिखा लेख प्रमाण': मो. तुफैल कहते हैं कि निकोलस नोटोविच अपनी किताब में आगे लिखते हैं कि जब वे तिब्बत गए थे तो वहां के हिमोस बौद्ध विहार में ताड़पत्रों पर लिखा हुआ एक प्राचीन ग्रंथ मिले थे. जब वे एक गुफा में गए तब वहां के लामा (आध्यात्मिक शिक्षक) एक देवदूत के बारे में बताया है. जिनका नाम हमलोग बड़े ही सम्मान से ईसा लेते हैं. लामा के पास भी एक प्राचीन ग्रंथ है, जिसमें ईशा के बारे में बहुत कुछ लिखा है. किसी तरह उस ग्रंथ को देखने व चित्र उतारने में निकोलस नोटोविच वे सफ़ल रहे थे.

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राजगीर स्थित चर्च (ETV Bharat)

'ईसा भी एक व्यापारी थे': निकोलस नोटोविच की किताब के चैप्टर 14 पेज 55 में विवरण मिलता है, कि ईसा मसीह भारत आए थे और ज्ञान की प्राप्ति की थी. जब जेरूसलम (इजराइल की राजधानी) से व्यापारियों का दल आया करते थे. जेरूसलम यहूदी, ईसाई और इस्लाम धर्मों के लिए अत्यधिक महत्वपूर्ण शहर है. निकोलस नोटोविच लिखते हैं कि ईसा भी एक व्यापारी थे.

जगन्नाथपुरी से राजगीर यात्रा: मो. तुफैल कहते हैं कि निकोलस नोटोविच की किताब यह भी लिखा है कि ईसा मसीह सभी लोगों पर स्नेह रखते थे. वैश्य-शूद्र सभी से प्यार करते थे. वे जगन्नाथपुरी भी ठहरे थे. जब जगन्नाथ मंदिर के पुजारियों को पता चला कि ईसा शूद्रों से भी मिलते हैं तो नाराज हो गए थे. इसकी भनक ईसा को लगी तो वे जगन्नाथ मंदिर छोड़कर राजगृह (राजगीर का पुराना नाम) चले गए.

"छः साल तक राजगीर में रहने के बाद वे नेपाल के रास्ते तिब्बत पहुंचे. ईसा मसीह 16 वर्षों तक भ्रमण करते हुए ईरान के रास्ते देश लौट गए थे. उस वक्त उनकी उम्र 13 से 29 वर्ष के बीच थी." - मो. तुफैल अहमद खां सूरी, इतिहासकार

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नालंदा के चर्च में क्रिसमस दिवस की तैयारी (ETV Bharat)

'बाइबिल में कोई प्रमाण नहीं': मो. तुफैल के अनुसार राजगीर में जिस जगह ईसा मसीह ठहरे थे, वहां आज कैथोलिक चर्च है. हालांकि यहां के फादर इस बात से इंकार कहते हैं. क्रिसमस डे की तैयारी करने वाले राजगीर के सोहसराय स्थित चर्च के फादर अनूप कहते हैं कि इसका बाइबिल में कोई प्रमाण नहीं मिला है कि ईसा मसीह भारत आए थे.

"भारत या बिहार में ऐसा कोई प्रमाण कहीं नहीं मिला है कि लार्ड ईसा कभी आए थे. कुछ लोग इस तरह की भ्रम फैला रहे हैं. बाइबिल में भी इसका जिक्र नहीं है" - अनूप, फादर, सोहसराय चर्च

सोहसराय चर्च के फादर अनूप (ETV Bharat)

'राजगीर आने का कोई ज़िक्र नहीं': फादर अनूप बताते हैं कि ईसाइयों की प्रमुख ग्रंथ बाइबिल में ईसा मसीह के 13 से 29 साल के उम्र में भारत या राजगीर आने का कोई ज़िक्र नहीं है. राजगीर के धार्मिक मामलों के विशेषज्ञ मामलों के जानकार जनार्दन उपाध्याय की मानें तो ईसा मसीह कभी हिंदुस्तान या राजगीर नहीं पहुंचे थे.

"ईसा मसीह के अनुयायी थॉमस भारत आए थे. ईसा मसीह ईसाई धर्म गॉड मानें जाते हैं, जिन्हें ईश्वर के पुत्र और मानवता का उद्धारकर्ता माना जाते हैं. जिनका जन्म बैथलहम में हुआ था. इस दिन को साल का बड़ा दिन भी माना जाता है." -जनार्दन उपाध्याय, धार्मिक मामलों के विशेषज्ञ

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