ये है शिक्षा की अलख..! फर्राटेदार अंग्रेजी बोल रहे नक्सल प्रभावित इलाकों के बच्चे
गया का अनोखा विद्यालय, जहां बच्चे नहीं पहुंचते हैं तो घनघनाने लगती है अभिभावकों के फोन की घंटियां. शिक्षा की अलख देखकर रह जाएंगे हैरान.

Published : February 24, 2026 at 7:02 PM IST
रिपोर्ट : रत्नेश कुमार
गया: ''माई नेम इज प्रिंस कुमार एंड आई वॉन्ट टू बिकेम एन आईएएस ऑफिसर, अब मैं किसी से भी इंग्लिश में बात करने से डरता नहीं हूं.'' पांचवीं कक्षा में पढ़ने वाले छात्र प्रिंस कुमार की अंग्रेजी सुनकर और कॉफिडेंस देखकर आप हैरत में रह जाएंगे.
छात्रा पूजा कुमारी कहती हैं, ''आई वॉन्ट टू फुल-फिल ऑल ड्रीम्स ऑफ माई पेरेंट्स, दे डिड नॉट स्टडी बट आई वॉन्ट टू अर्न नेम बाई स्टडिंग.''
फर्राटेदार अंग्रेजी बोलते हुए यह बच्चे आपको आम लग सकते हैं. ऐसा हो भी क्यों ना, इक्क्सवीं सदी में पढ़ने वाले हर बच्चे से हम उम्मीद करते हैं कि उन्हें अंग्रेजी बोलनी तो आती ही होगी. पर क्या ऐसा सच में है, यह एक बड़ा सवाल है? यह बच्चे जो अंग्रेजी में बात कर रहे हैं वह एक ऐसी जगह से आते हैं जो कभी नक्सलियों का गढ़ हुआ करता था.
सरकारी स्कूल के बच्चे बोलते हैं फर्राटेदार अंग्रेजी : बिहार के गया जिला मुख्यालय से करीब 100 किलोमीटर दूर इमामगंज प्रखंड पड़ता है. इस प्रखंड में एक गांव है खड़ाऊ. जहां जाने के लिए रास्ता तक नहीं है. गांव में बुनियादी सुविधाएं मिलनी भी मुश्किल है. हालांकि तब भी यहां के प्राथमिक स्कूल में पढ़ने वाले बच्चे ऐसी अंग्रेजी बोलते हैं जिसे सुनकर आप भी दंग रह जाएंगे. इस इलाके में कई लोग मैट्रिक पास नहीं हैं, नौकरी तक नहीं हैं. फिर भी नक्सल इलाका अब बड़े बदलाव की कहानी लिख रहा है.

प्रिंसिपल की सकारात्मक सोच से बदल रही तस्वीर : गांव में हो रही शिक्षा की पहल भी यहां के प्राथमिक विद्यालय के प्रिंसिपल की सकारात्मक सोच की वजह है. प्रिंसिपल प्रमोद कुमार ने ठान लिया है कि अब वे यहां के बच्चों की पढ़ाई छूटने नहीं देंगे.
''हमारा स्कूल इमामगंज प्रखंड का एक ऐसा विद्यालय है, जहां सारे बच्चे पिछड़े इलाके से हैं. यहां के अभिभावक जागरूक नहीं थे. बार-बार जागरुक कर बच्चों को स्कूल भेजने के लिए आग्रह करना पड़ता है.''- प्रमोद कुमार, प्रिंसिपल, प्राथमिक विद्यालय खड़ाऊ

प्रिंसिपल की शपथ : प्रमोद कुमार कहते हैं कि मेरा सबसे पहला प्रयास है कि किसी न किसी बच्चे को मैं सरकारी नौकरी पाने में मदद कर सकूं. उसे आगे तक पढ़ा सकूं. तब जाकर मैं अपने आप को सफल शिक्षक मानूंगा. यह मेरी शपथ है. स्कूल में प्रतिदिन बच्चों की उपस्थिति 90 प्रतिशत से ज्यादा रहती है. काफी प्रयास से यह संभव हुआ है.

चुनौती थी.. व्हाट्सएप ग्रुप बनाया, अभिभावकों के मोबाइल नंबर रखे : प्रिंसिपल प्रमोद कुमार बताते हैं, कि बच्चों का स्कूल तक पहुंचना एक बड़ी चुनौती थी. अब तो शत प्रतिशत बच्चे आ रहे हैं. इसके लिए हमने सभी बच्चों के अभिभावकों के मोबाइल नंबर रखे. व्हाट्सएप ग्रुप बनाया. कुछ लोगों के मोबाइल नहीं थे, तो उनके पड़ोसी को इसकी जिम्मेदारी दी गई.
''हमने यह तय किया कि हर माह यहां के लोगों के साथ बैठक करेंगे. मीटिंग में अभिभावकों को समझाते हैं कि अपने बच्चों को हर हाल में स्कूल में पढ़ने के लिए भेजें. अब इसका असर होने लगा है कि सारे बच्चे लगभग आने लगे हैं और बुलंदी से शिक्षा अध्ययन कर रहे हैं.'' - प्रमोद कुमार, प्रिंसिपल, प्राथमिक विद्यालय खड़ाऊ

नक्सली इलाका रहने के कारण शिक्षा की कमी : प्रमोद कुमार बताते हैं कि यदि कोई बच्चा नहीं आता है तो उसके घर हमारे द्वारा फोन किया जाता है. उसके बावजूद भी बच्चा नहीं आता है तो उसके घर पहुंचते हैं और कारण पूछते हैं. कहीं न कहीं नक्सली इलाका रहने के कारण शिक्षा की कमी रह गई है. वहीं, स्कूल ने बच्चों के खेलने के लिए देसी जुगाड़ की व्यवस्था कर रखी है.

प्रिंसिपल बच्चों को अपनी ओर से देते हैं टाई : वहीं, प्रिंसिपल शिक्षा की अलख जगाने में इस कदर लगे हुए हैं कि वे बच्चों को यूनिफॉर्म पहनकर आने पर टाई भी देते हैं. इस नक्सली इलाके में पढ़ाई एक चुनौती थी. पर अब यहां बच्चे पढ़ रहे हैं. प्राथमिक विद्यालय की खासियत यह है कि सारी सुविधाएं सामान्य स्कूलों की तरह है, लेकिन अति पिछड़ा नक्सल प्रभावित समझा जाने वाला इलाके का यह विद्यालय बाकी विद्यालयों के बराबर होकर चल रहा है.

बच्चों को आगे बढ़ते देखने की अभिवावकों की तमन्ना : एक छात्र के अभिभावक अर्जुन सिंह बताते हैं कि बच्चा पढ़े, आगे बढ़े, यही तमन्ना है. बच्चा पहले स्कूल नहीं जाता था. यहां के प्रिंसिपल ने मीटिंग करनी शुरू कर दी. गांव में बैठकर मीटिंग करने लगे. बच्चा जब नहीं जाता, तो फोन आने लगता है.
''बच्चों को किसी प्रकार की तकलीफ विद्यालय में नहीं होती, बल्कि प्रोत्साहन दिया जाता है, जिसके कारण बच्चे अब पढ़ने लगे हैं. अब हम लोग भी चाहते हैं कि बच्चा पढ़े और आगे बढ़े.''- अर्जुन सिंह भोक्ता, छात्र के अभिभावक

स्कूल में पांचवी तक की पढ़ाई : प्राथमिक विद्यालय खड़ाऊं में पहली से पांचवीं तक की पढ़ाई होती है. मिडिल स्कूल नहीं रहने के कारण कई छात्रों की पढ़ाई बाधित हो जाती है. प्रिंसिपल प्रमोद ने बताया कि मिडिल स्कूल यहां से काफी दूर पड़ता है, दूसरे प्रखंड में जाना पड़ता है. जिसके कारण पढ़ाई छोड़कर बच्चे घर के काम में लग जाते हैं. यही वजह है कि इस गांव में कोई भी मैट्रिक पास नहीं है. कोई सरकारी नौकरी में भी नहीं है.

गांव में मिडिल स्कूल बनाया जाए- अभिभावक : खड़ाऊं गांव की तस्वीर अब बदलती नजर आ रही है. बच्चे अनुशासित हो रहे हैं और उनको अंग्रेजी बोलते देख अभिभावकों का भी उत्साह बढ़ रहा है. करीब 80 घरों वाले इस गांव में अभिभावकों की मांग है कि यहां मिडिल स्कूल बनाई जाए, ताकि हमारे बच्चे जो आजादी के बाद के समय से अशिक्षित रह जा रहे हैं, वह शिक्षित होकर आत्मनिर्भर बन सकें.
गांव तक पहुंचने के लिए सड़क तक नहीं : यह इलाका कभी नक्सली गतिविधियों का मुख्य केंद्र हुआ करता था. इस इलाके में पहुंचना मौत को दावत देने के समान था. समय के साथ काफी कुछ बदला. नक्सलियों की गतिविधियां भी एक हद तक थम गई. हालांकि कई बुनियादी समस्याएं आज भी इस इलाके से कोसों दूर है.
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