Explainer: मां ने अपनी बेटी के स्कूल बैग में भारी ईंटें क्यों रखीं? बस्ते का बोझ बना सिरदर्द
क्या स्कूल बैग बच्चों के लिए बोझ बनता जा रहा है? मुजफ्फरपुर की घटना ने नए सिरे से बहस को जन्म दे दिया है. रिपोर्ट..

Published : February 19, 2026 at 3:18 PM IST
- रिपोर्ट: कृष्ण नंदन कुमार
पटना: बिहार के मुजफ्फरपुर की व्यस्त सड़क पर एक मां का अपनी छोटी बेटी को सरेआम सजा देने का वीडियो जब से सामने आया है, इस बात को लेकर चर्चा छिड़ गई है कि क्या वह भारी बस्ते से परेशान थीं. उस वीडियो में वह सड़क किनारे न केवल बच्ची को डांटती और मारती दिख रही है, बल्कि सजा के तौर पर उसके स्कूल बैग में ईंटें भर दीं. बच्ची दर्द से रो रही है और मां उसे हाथ पकड़कर घसीट रही है. इस घटना के बाद यह सवाल उठने लगा है कि आखिर मां ने बेटी के साथ क्यों किया? क्या स्कूल बैग का वजन ही परेशानी का असली कारण है?
स्कूल बैग का वजन बना सिरदर्द?: अगर एक मां अपनी बेटी के स्कूल बैग से वाकई परेशान है तो सवाल उठता है कि क्या स्कूल बैग को लेकर जो नियम है, उसका सही से पालन नहीं हो रहा है? नई शिक्षा नीति 2020 में स्पष्ट रूप से कहा गया है कि बच्चों पर अनावश्यक शैक्षणिक बोझ नहीं डाला जाना चाहिए. इसके तहत प्राथमिक कक्षाओं के बच्चों के लिए बस्ते के वजन को शरीर के वजन के 10 प्रतिशत से अधिक नहीं रखने की सिफारिश की गई है.
क्या है स्कूल बैग के वजन को लेकर नियम?: असल में स्कूल बैग को लेकर नियम स्पष्ट है, जिसका सभी स्कूलों के लिए पालन करना अनिवार्य है. नियम के तहत प्री प्राइमरी क्लास के बच्चों को स्कूल बैग ले जाने की जरूरत नहीं है. कक्षा एक और दो के बच्चों का वजन 1.6-2.2 किलो से अधिक नहीं होना चाहिए. तीसरी से पांचवी के लिए 1.7-2.5 किलो, छठी-सातवीं के लिए 2-3 किलो, 8वीं के लिए 2.5-4 किलो, 9-10वीं के लिए 2.5-4.5 किलो और 11-12वीं के लिए 3.5 से 5 किलोग्राम तक होना चाहिए.

शिक्षाविद बीएन प्रसाद कहते हैं कि नई शिक्षा नीति 2020 में स्पष्ट रूप से कहा गया है कि बच्चों पर अनावश्यक शैक्षणिक बोझ नहीं डाला जाना चाहिए. इसके तहत प्राथमिक कक्षाओं के बच्चों के लिए बस्ते के वजन को शरीर के वजन के 10 प्रतिशत से अधिक नहीं रखने की सिफारिश की गई है लेकिन इसके बावजूद अगर इस तरह की शिकायत आ रही है तो यह गंभीर बात है.

"नई शिक्षा नीति का उद्देश्य यह है कि पढ़ाई को बोझ नहीं बल्कि सीखने की प्रक्रिया के रूप में देखा जाए. लेकिन जमीनी हकीकत यह है कि कई स्कूल आज भी मोटी किताबें, कई कॉपियां और अलग-अलग विषयों की भारी सामग्री रोजाना बच्चों के कंधों पर लाद देते हैं. हर विषय में होमवर्क और उसके लिए अलग कॉपी, यह स्थिति सीधे तौर पर शिक्षा नीति की भावना के खिलाफ है." बीएन प्रसाद, शिक्षाविद्

बच्चे भारी बैग से परेशान: हालांकि सरकारी की सख्ती और कड़े नियम के बावजूद स्कूल बैग का वजन लगातार बढ़ता जा रहा है. बच्चे बस्ते के बोझ से दबते जा रहे हैं. पटना के एक स्कूल में एलकेजी के छात्र तेजू भी बैग के वजह से परेशान है. वह कहता है कि बैग तो भारी है. उठा नहीं पाता हूं. रोज लेकर आना-जाना पड़ता है, क्योंकि स्कूल में लॉकर नहीं है.

"किताब-कॉपी रखने के लिए स्कूल में कोई लॉकर नहीं मिला है. बैग भारी हो जाता है. दिक्कत होती है ले जाने में, वेट थोड़ा हल्का होना चाहिए." - तेजू कुमार, छात्र, एलकेजी
बच्चे का बैग भारी हुआ तो पेरेंट्स ने उठाया: स्कूल से छुट्टी के बाद अपने बच्चों के बैग को अपने पीठ पर टांगे हुए अभिभावक उज्ज्वल कुमार ने कहा कि बैग भारी हो जाता है, तभी तो वह टांगे हुए हैं. बच्चों ने शिकायत की है कि बैग भारी है और पीठ में दर्द है तो उन्होंने बैग उठाया. बैग के वजन को लेकर नई शिक्षा नीति का जो नियम है, वह फॉलो होना चाहिए लेकिन हो नहीं रहा है.

"बैग का वजन तो अधिक है लेकिन बैग में किताब-कॉपी लेकर जाना भी जरूरी ही है. छोटे बच्चों की 12 किताब है. ऐसे में रोज सभी पुस्तक को नहीं मंगाना चाहिए. जिस दिन जिस किताब से पढ़ाई होगी, वही मंगवाए. सरकार भी देखे कि बच्चों का बैग अधिक भारी न हो, क्योंकि भारी बैग से बच्चे का ग्रोथ प्रभावित होता है."- उज्ज्वल कुमार, अभिभावक
क्यों कम नहीं हो रहा बस्ते का बोझ?: इस बारे में शिक्षाविद बीएन प्रसाद ने बताया कि आज के समय भी अभिभावक अक्सर बच्चों के स्वास्थ्य और मानसिक स्थिति की अनदेखी कर केवल अंक और परीक्षा केंद्रित शिक्षा को प्राथमिकता दे रहे हैं. ऐसे में नई शिक्षा नीति 2020 में तय दिशा-निर्देशों को समझना और उन पर अमल करना बेहद जरूरी हो जाता है. यह दुर्भाग्यपूर्ण है कि इस नियम की अनदेखी हो रही है.
वे कहते हैं कि भारी बस्ता के कारण बच्चों को शारीरिक समस्याएं भी हो रही हैं और उनका सर्वांगिक विकास प्रभावित हो रहा है. बिहार के लगभग सभी स्कूलों की यही स्थिति है और बच्चे के पीठ पर स्कूल जहां किताबों का बोझ लाद दे रहे हैं, वहीं दूसरी ओर अभिभावक अपनी उम्मीदों का बोझ लाद दे रहे हैं. अभिभावकों को स्कूल से बात करनी चाहिए. साथ ही सरकार को भी सख्ती दिखानी चाहिए.

भारी बैग से बच्चों के स्वास्थ्य पर असर: पीएमसीएच के आर्थोपेडिक चिकित्सक डॉ. प्रियम कुमार ने बताया कि भारी बस्ते से बच्चों के शरीर पर सिर्फ थकान ही नहीं होता, बल्कि कई शारीरिक समस्याएं भी होने लगती है. उनके पास आए दिन ऐसे बच्चे आते हैं, जिनका भारी बैग के कारण गर्दन का हिलना-डुलना बंद होने लगता है. सोने बैठने में भी बच्चों को तकलीफ होती है. सामान्य तौर पर 7 साल से 13 साल की उम्र के बच्चे में ऐसी शिकायत बहुत आती है और बच्चा दर्द के मारे कई बार रो रहा होता है. ऐसी स्थिति में कुछ दिन बच्चे की फिजियोथैरेपी चलती है. जब तक ठीक ना हो, वजन उठाने की मनाही होती है.
किस तरह की होती है समस्या?: डॉ. प्रियम कुमार ने बताया कि लगातार अधिक वजन उठाने से बच्चों की रीढ़ की हड्डी पर दबाव पड़ता है, जिससे पीठ दर्द, गर्दन दर्द और कंधों में जकड़न जैसी समस्याएं पैदा होती हैं. कई मामलों में यह समस्या आगे चलकर स्कोलियोसिस जैसी गंभीर बीमारी का रूप भी ले सकती है. बच्चों में केफ्रोटिक डिफॉरमेटी होने की संभावना बढ़ जाती है. इसके अलावे भारी बस्ते के कारण बच्चों की चाल प्रभावित होती है और उनका संतुलन बिगड़ता है, जिससे गिरने और चोट लगने की आशंका बढ़ जाती है. कई बार बच्चे का पोस्चर बिगड़ जाता है और एक तरफ झुक जाते हैं.

क्या है इस समस्या का निदान?: डॉ. प्रियम कहते हैं कि भारी बैग से बच्चों के मानसिक स्तर पर भी प्रभाव पड़ता है. पढ़ाई के प्रति उसकी रुचि घटती जाती है. इस समस्या का हल डिजिटल एजुकेशन को बढ़ावा देकर हो सकता है, यदि ई-बुक का इस्तेमाल हो. वे कहते हैं कि स्कूल में 8 घंटे के आठ विषय और 8 विषय की आठ कॉपी होने से बैग बहुत भारी हो ही जाता है.
"बच्चे की कंडीशन को देखते हुए उसके मेडिकल प्रिसक्रिप्शन में वह लिखते हैं कि कुछ दिन पीठ पर वजन न उठाने दें अथवा काफी सीमित वजन दें. कई बार अभिभावक यह प्रिस्क्रिप्शन लेकर स्कूल में जाते हैं तो बच्चे को कुछ दिन के लिए भारी बस्ते से छूट मिलती है, जब तक उसका ट्रीटमेंट चल रहा होता है."- डॉ. प्रियम कुमार, आर्थोपेडिक चिकित्सक

क्या कहते हैं मनोवैज्ञानिक चिकित्सक?: पटना की प्रख्यात साइकोथैरेपिस्ट डॉ. बिंदा सिंह कहती हैं कि बच्चों की सुरक्षा के नजरिए से भी देखा जाए तो बैग का बोझ अधिक नहीं होना चाहिए. बच्चे बचपन में रिलैक्स होकर पढ़ना चाहते हैं. ऐसे में किताबों का बच्चों पर इतना बोझ लादना, उनकी फिजिकल समस्याओं को बढ़ा देता है. वह कहती हैं कि मुजफ्फरपुर का जो वीडियो आया है, उसमें बहुत ही दुर्भाग्यपूर्ण घटना दिखी है. एक मां जिस तरह से अपनी बेटी को बीच सड़क पर थप्पड़ से पिटाई कर रही है, उससे बच्ची को इतना बुरा लगे कि वह भविष्य में भी डरी-सहमी रहे और समाज को फेस करने से डरे. इस घटना से बच्ची सोशल फोबिया से भी ग्रसित हो सकती है.
स्कूल मैनेजमेंट से बात करनी चाहिए: डॉ बिंदा सिंह ने बताया कि अगर बच्चे का बैग बहुत अधिक भारी हो रहा है तो अभिभावकों को चाहिए कि शिक्षक और स्कूल मैनेजमेंट से इस विषय पर बात करे. यह सच है कि बच्चों का बचपन किताब के बोझ तले दब गया है लेकिन कोई भी समस्या का समाधान होता है, वह बैठकर बातचीत से होता है. परिवार में, स्कूल में बच्चों के साथ बातचीत कर पेरेंट्स अगर यह सब मामला सुलझा ले तो ऐसी स्थिति नहीं दिखेगी.

"वीडियो में स्पष्ट दिख रहा था कि मां अपनी बच्ची पर अपना फ्रस्ट्रेशन निकाल रही है. बच्ची को पब्लिकली इस प्रकार मारना-पीटना पूरी तरीके से गलत है और इसे सही नहीं ठहराया जा सकता. बच्ची के मन:स्थिति को भी समझना चाहिए कि इतने लोगों के बीच में उसे जलील किया गया तो उसे कैसा लग रहा होगा. जहां तक स्कूल बैग के वजन का सवाल है तो स्कूल को इस पर गंभीरता से विचार करना चाहिए."- डॉ. बिंदा सिंह, मनोवैज्ञानिक चिकित्सक
क्या कहते हैं जानकार?: शिक्षा से जुड़े वरिष्ठ पत्रकार सुनील कुमार पांडे ने कहा कि नई शिक्षा नीति में इसी वजह से किताबों की संख्या कम करने और डिजिटल तथा गतिविधि आधारित शिक्षण पर जोर दिया गया है. वे कहते हैं कि जो वीडियो वायरल हो रहा है, उसमें कानून बहुत कुछ नहीं कर सकता क्योंकि यह एक सामाजिक और पारिवारिक मुद्दा भी है. सरकार कानून ला सकती है लेकिन इसके सामाजिक पक्ष को निभाने की जिम्मेदारी समाज के लोगों की होती है. वायरल वीडियो में बेटी के साथ मां का जो व्यवहार है, उसको देखते हुए निजी रूप से काउंसलिंग कर सॉल्व किया जा सकता है.
डीईओ को करना चाहिए मॉनिटरिंग: उन्होंने कहा कि जहां तक भारी बैग का सवाल है तो यह रोका जाना चाहिए और यह कानून का भी मामला बनता है. जो जिला शिक्षा पदाधिकारी होते हैं, उन्हें निरीक्षण करना चाहिए कि आरटीई और न्यू एजुकेशन पॉलिसी के नियमों का अनुपालन किया जा रहा है या नहीं? अगर कहीं नियमों की अनदेखी हो रही है तो वहां एक्शन लिया जाना चाहिए.

"मेरा मानना है कि स्कूल के साथ-साथ मां-बाप की भी जिम्मेदारी है कि बच्चों की पढ़ाई और स्कूल बैग समेत अन्य समस्याओं पर बात करें. बाल विकास पदाधिकारी भी स्कूलों में जाकर काउंसलिंग करें कि भारी बैग से बच्चों के शरीर पर जो दुष्प्रभाव हो रहा है, उसके बारे में बताएं. समाज के प्रबुद्ध लोग भी स्कूल मैनेजमेंट से आग्रह करें कि नियमों का पालन करें और बच्चों पर बैग का बोझ ना लादें की पढ़ाई ही बच्चे को बोझ लगे."- सुनील कुमार पांडे, वरिष्ठ पत्रकार
क्या है मामला?: दरअसल, मुजफ्फरपुर का एक वीडियो सामने आया है, जिसमें स्कूल बैग में बच्ची की मां ने ईंट भर कर रखा था और बच्ची के साथ चल रही थी. बच्ची बोझ के मारे ठीक से चल नहीं पा रही है, वह लगातार रो रही है. रोते हुए बच्ची अपने पिता से फोन पर बात भी कर रही है और कहती है, 'बात-बात पर गुस्सा होना सही बात नहीं है पापा.' परेशान बच्ची को देखकर आसपास के लोगों ने रोका तो मां ने कड़ा विरोध किया.
इस दौरान महिला कहती हैं, 'एक सौ बार बोले कि भारी बैग लेकर नहीं चलो.' लोगों ने जब बच्ची के गले से ईंट हटाने की कोशिश की तो मां ने तड़ाक से बेटी को तमाचा जड़ दिया. लोगों ने रोका तो भड़कते हुए कहा, 'आप इसका खर्चा पूरा करियेगा. आपको बहुत सिंपैथी है तो साढ़े तीन हजार फी और 500 रुपये दीजिए. क्यों नहीं करेंगे. हां यही समाधान है. हम ऐसे ही करेंगे.' वहीं, जब लोगों ने डायल 112 पर फोन करने की बात की तो महिला ने चिल्लाते हुए कहा, 'हां करो, जिसको फोन करना है करो. जिसको बुलाना है, बुलाओ. घर जाकर अभी और मारेंगे.'

पेरेंट्स की हुई है काउंसलिंग: हालांकि वीडियो वायरल होने के बाद पुलिस ने एक्शन लिया है. मुजफ्फरपुर एसएसपी कांतेश कुमार मिश्रा ने बताया कि मामले पर संज्ञान लेते हुए बाल विकास पदाधिकारी को बच्ची के घर भेजा गया. जहां बच्ची और मां दोनों की काउंसलिंग की गई, क्योंकि यह एक सामाजिक और पारिवारिक मामला है. इसके कारण एफआईआर दर्ज करने की बजाय मां से बॉन्ड भरवाया गया है कि दोबारा से ऐसा नहीं हो. बच्ची का हेल्थ चेकअप भी कराया गया है.
मां ने मानहानि का केस दर्ज कराया: इधर, विवाद बढ़ने और वीडियो वायरल होने के बाद अब बच्ची की मां ने मुजफ्फरपुर के मिथनपुरा थाने में केस दर्ज कराया है. अपने आवेदन में उसने कहा कि वीडियो और तस्वीर के माध्यम से उनकी छवि को नुकसान पहुंचाया जा रहा है. लिहाजा मामले में उचित कानूनी कार्रवाई की जाए.
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