ETV Bharat / bharat

झारखंड के 25 साल: धोनी से सलीमा तक, कितनी बदली खेल की तस्वीर

झारखंड के 25 साल होने पर यहां खेलों और इसके खिलाड़ियों के जीवन में आए बदलावों से जुड़ी एक रिपोर्ट.

Jharkhand foundation Day
ग्राफिक्स इमेज (Etv Bharat)
author img

By ETV Bharat Jharkhand Team

Published : November 7, 2025 at 6:30 AM IST

10 Min Read
Choose ETV Bharat

रांची: झारखंड एक ऐसा राज्य जिसे कभी सिर्फ खनिज संपदा, जंगलों और संघर्ष की भूमि कहा जाता था, आज यह देश में खेल प्रतिभाओं की नई पहचान बन चुका है. यह वही धरती है जिसने क्रिकेट में महेंद्र सिंह धोनी, तीरंदाजी में दीपिका कुमारी, हॉकी में सलीमा टेटे और निक्की प्रधान जैसी अंतरराष्ट्रीय सितारों को जन्म दिया. इस मिट्टी से निकले इन खिलाड़ियों ने दुनिया को बताया कि सीमित संसाधनों के बीच भी मेहनत, अनुशासन और जज़्बा हो तो कोई सपना असंभव नहीं. लेकिन सवाल अब भी कायम है, क्या राज्य की खेल नीतियां इन खिलाड़ियों की उपलब्धियों के बराबर हैं?

25 वर्षों में यह कमी जरूर खल रहा है. खिलाड़ी अपना काम कर रहे हैं, लेकिन खेल नीति अब तक इस राज्य में 25 वर्षों में स्पष्ट नहीं हो पाया है. जिसका खामियाजा खिलाड़ियों को भुगतना पड़ रहा है. झारखंड के 25 साल पूरे हो चुके हैं. इन 25 सालों में झारखंड में खेल और खिलाड़ियों के लिए क्या काम हुए, इसके बारे में जानते हैं.

25 सालों में झारखंड में खेल की बदलती तस्वीर (Etv Bharat)

धोनी ने दिखाई राह, राज्य की पहचान बदली

साल 2004 में जब रांची के रहने वाले महेंद्र सिंह धोनी ने भारतीय टीम में कदम रखा, तब झारखंड का नाम खेल मानचित्र पर तेजी से उभरा. रेलवे टिकट चेकर से लेकर भारतीय क्रिकेट टीम के कप्तान बनने तक का धोनी का सफर न केवल संघर्ष की कहानी है, बल्कि इस राज्य के आत्मविश्वास की भी गाथा है. धोनी ने न सिर्फ भारत को टी-20 और वनडे विश्व कप जिताया, बल्कि यह भी साबित किया कि झारखंड सिर्फ कोयले की खान नहीं, बल्कि खेल प्रतिभाओं की खान भी है. उनकी सफलता के बाद रांची, सिमडेगा, खूंटी, गुमला जैसे जिलों से उभरते खिलाड़ियों को भी नया हौसला मिला.

तीरंदाजी में झारखंड की निशानेबाज दीपिका कुमारी

रांची की दीपिका कुमारी का नाम जब भी तीरंदाजी की चर्चा होती है, विश्व पटल पर सम्मान से लिया जाता है. एक छोटे से गांव से निकलकर ओलंपिक मंच तक पहुंचने वाली दीपिका ने विश्व नंबर-1 का दर्जा हासिल कर झारखंड का नाम स्वर्ण अक्षरों में लिखा. उनकी सफलता ने झारखंड की ग्रामीण बेटियों में विश्वास जगाया कि साधन नहीं, संकल्प ही मंजिल तक पहुंचाता है. दीपिका की प्रेरणा से ही राज्य के सैकड़ों बच्चे अब तीरंदाजी को करियर बना रहे हैं.

हॉकी में झारखंड का वर्चस्व - सलीमा, निक्की, असुंता ने रचा इतिहास

झारखंड का नाम हॉकी से अलग नहीं किया जा सकता. यहां के मैदानों से निकलकर देश की महिला हॉकी टीम को मिला सशक्त चेहरा सलीमा टेटे. सिमडेगा की इस खिलाड़ी ने ओलंपिक और एशियन गेम्स में देश का प्रतिनिधित्व कर इतिहास रचा. उनके साथ निक्की प्रधान, असुंता लकड़ा, अलका डुंगडुंग और सुमिता टोप्पो जैसी खिलाड़ियों ने भी यह साबित किया कि झारखंड की बेटियां अब विश्व स्तर पर झंडा फहरा सकती हैं. आज भी सिमडेगा और खूंटी के बच्चे मिट्टी के मैदानों पर लकड़ी की स्टिक से खेलना शुरू करते हैं, लेकिन उनके सपने एस्टरोटर्फ के पार हैं.

"पिछले 25 वर्षों में झारखंड ने खेल के क्षेत्र में नई ऊंचाइयां हासिल की हैं. हॉकी, आर्चरी, एथलेटिक्स, क्रिकेट, फुटबॉल समेत विभिन्न खेलों में राज्य ने एक से बढ़कर एक खिलाड़ी देश को दिए हैं, जिन्होंने अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भारत का नाम रोशन किया है." - प्रदीप मिर्धा, खेल प्रशासक

खेलों की नई तस्वीर: संरचना और आकांक्षाएं

राज्य गठन के 25 वर्षों में झारखंड ने खेल संरचना के क्षेत्र में बड़ी प्रगति की है. जहां पहले गिने-चुने मैदान हुआ करते थे, अब लगभग हर जिले में आधुनिक स्टेडियम और प्रशिक्षण केंद्र हैं. रांची का JSCA इंटरनेशनल क्रिकेट स्टेडियम देश के सबसे खूबसूरत और तकनीकी रूप से सुसज्जित स्टेडियमों में शुमार है. मोरहाबादी फुटबॉल स्टेडियम को नया जीवन मिला है. खूंटी, सिमडेगा, गुमला और रांची के हटिया-बरियातू में बने एस्ट्रोटर्फ हॉकी स्टेडियम आज राष्ट्रीय स्तर के खिलाड़ियों की नर्सरी बन चुके हैं.

Jharkhand foundation Day
ग्राफिक्स इमेज (Etv Bharat)

"झारखंड का खेल इंफ्रास्ट्रक्चर आज देश में सर्वश्रेष्ठ में से एक है. खिलाड़ियों पर भी निरंतर काम हो रहा है और बड़े आयोजनों की संख्या बढ़ी है. इन 25 वर्षों में इस धरती ने कई उत्कृष्ट खिलाड़ी देश को दिए हैं.” - मधुकांत पाठक, कोषाध्यक्ष, भारतीय एथलेटिक्स महासंघ (AFI)

वर्तमान में राज्य में 40 आवासीय खेल केंद्र, 100 से अधिक डे-बोर्डिंग सेंटर, और 8 सेंटर ऑफ एक्सीलेंस संचालित हैं. साल 2016 में सीसीएल और राज्य सरकार के बीच हुए MOU के तहत बनी झारखंड स्टेट स्पोर्ट्स प्रमोशन सोसायटी (JSSPS) ने खेल प्रतिभाओं को पेशेवर ढांचा दिया है..यहां से निकले खिलाड़ी अब राष्ट्रीय टीमों में जगह बना रहे हैं.

फिर भी अधूरी है तस्वीर: रोजगार और नीति में पिछड़ापन

लेकिन यह भी सच्चाई है कि झारखंड की यह उपलब्धि अधूरी है. राज्य गठन के 25 साल बाद भी सिर्फ 44 खिलाड़ियों को सरकारी नौकरी मिली है, जिनमें से अधिकांश को सिपाही जैसे निचले पदों पर नियुक्त किया गया. कॉमनवेल्थ गेम्स की स्वर्ण विजेता लवली चौबे और रजत विजेता दिनेश कुमार तक को यही पद मिला. वहीं, पड़ोसी बिहार में खिलाड़ियों को उनकी उपलब्धियों के अनुरूप एसडीओ या डीएसपी जैसे उच्च पदों पर नियुक्ति दी जा रही है. इससे झारखंड की खेल नीति की गंभीरता उजागर होती हैं.

Jharkhand foundation Day
ग्राफिक्स इमेज (Etv Bharat)

"खेल विभाग और संगठनों के बीच अब पहले की अपेक्षा बेहतर सामंजस्य बना है. राज्य गठन के 25 वर्षों में खेल के क्षेत्र में काफी विकास हुआ है, हालांकि अभी भी सुधार की गुंजाइश है. इंफ्रास्ट्रक्चर तो तैयार हो गए हैं, लेकिन खिलाड़ियों को मूलभूत सुविधाएं देने पर और ध्यान देने की जरूरत है." - सीडी सिंह, अध्यक्ष, झारखंड एथलेटिक्स एसोसिएशन

रेलवे, आर्मी और अर्धसैनिक बलों में झारखंड के खिलाड़ियों को भले रोजगार मिले हों, लेकिन राज्य की अपनी नीति खिलाड़ियों को स्थायी सुरक्षा देने में विफल रही है. कई अंतरराष्ट्रीय स्तर पर पदक जीत चुके खिलाड़ी आज आर्थिक कठिनाइयों से जूझ रहे हैं. सरकार की नौकरी नीति में खेल उपलब्धियों के मूल्यांकन का कोई स्थायी पैमाना तय नहीं है.

"अब संसाधन मिल रहे हैं, बेहतर करने की कोशिश भी हो रही है. यह 25 वर्ष खेल और खिलाड़ियों के लिए बेहतर साबित हुए हैं, लेकिन अभी भी कई खेल ऐसे हैं जहां खिलाड़ियों को पर्याप्त सहयोग नहीं मिलता. अन्य राज्यों में खिलाड़ियों को बेहतर सुविधा और प्रोत्साहन मिलता है, इस दिशा में झारखंड सरकार को और ध्यान देने की जरूरत है.” - शिल्पा कुमारी, एथलेटिक्स खिलाड़ी

झारखंड में खेलों की पढ़ाई और भविष्य की राह

सरकार अब खेल शिक्षा की दिशा में भी कदम बढ़ा रहा है. जल्द ही झारखंड में स्पोर्ट्स यूनिवर्सिटी स्थापित होने जा रही है. यह विश्वविद्यालय न केवल खिलाड़ियों को प्रशिक्षण नहीं देगा बल्कि स्पोर्ट्स साइंस, न्यूट्रिशन, कोचिंग, साइकोलॉजी और फिजिकल एजुकेशन जैसे विषयों की पढ़ाई भी कराएगा. इससे झारखंड न केवल खिलाड़ियों को तैयार करेगा, बल्कि प्रशिक्षकों और विशेषज्ञों की नई पीढ़ी भी गढ़ेगा.

इसके अलावा, खेलो इंडिया और जेएसएसपीएस जैसी योजनाओं के जरिए अब हर जिले में मिनी-सेंटर बन रहे हैं. झारखंड के कई स्कूलों में अब खेलों को पाठ्यक्रम का हिस्सा बनाया जा रहा है, ताकि प्रतिभा को जड़ों से पोषित किया जा सके.

Jharkhand foundation Day
ग्राफिक्स इमेज (Etv Bharat)

महिला खिलाड़ियों का उदय झारखंड की असली ताकत

झारखंड के खेल परिदृश्य की सबसे बड़ी ताकत रही हैं इसकी महिला खिलाड़ी. गांवों की गलियों और धूलभरे मैदानों से निकलकर वे देश का तिरंगा लहरा रही हैं. सलीमा टेटे, निक्की प्रधान, अलका डुंगडुंग, असुंता लकड़ा, और दीपिका कुमारी जैसी खिलाड़ी अब रोल मॉडल बन चुकी हैं. इन खिलाड़ियों ने न सिर्फ खेल के मैदान में बल्कि समाज में भी महिला सशक्तिकरण की नई कहानी लिखी है

खेल आयोजन और मेजबानी

खेल आयोजनों की बात करें तो झारखंड में 2011 में राष्ट्रीय खेलों (नेशनल गेम्स) का भव्य आयोजन हुआ था. इसके बाद राज्य ने कई राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय प्रतियोगिताओं की सफल मेजबानी की है. एशियाई चैंपियनशिप, वर्ल्ड क्वालीफाइंग चैंपियनशिप (हॉकी), सब-जूनियर और जूनियर एथलेटिक्स चैंपियनशिप, साउथ एशियन (SAF) जूनियर, सीनियर एथलेटिक्स चैंपियनशिप जैसे प्रतिष्ठित टूर्नामेंट झारखंड की धरती पर आयोजित किए गए.

राज्य में हॉकी, एथलेटिक्स, तीरंदाजी, साइक्लिंग और बॉक्सिंग जैसी विधाओं की राष्ट्रीय प्रतियोगिताओं का आयोजन लगातार होता रहा है. रांची का जेएससीए इंटरनेशनल क्रिकेट स्टेडियम भी समय-समय पर अंतरराष्ट्रीय और वनडे क्रिकेट मुकाबलों की मेजबानी करता रहा है. इन 25 वर्षों में झारखंड ने न केवल खिलाड़ियों को मंच दिया है, बल्कि देश के खेल मानचित्र पर अपनी सशक्त पहचान भी दर्ज कराई है.

खेल विशेषज्ञों का मानना है कि झारखंड को खेलों के लिए केवल मंच नहीं, संरचना और सुरक्षा भी देनी होगी. राज्य की नीति में खिलाड़ियों के लिए पारदर्शी नौकरी प्रणाली, पेंशन और पोस्ट-केरियर योजना का अभाव है. रांची खेल संघ के संजय सिंहा कहते हैं, "झारखंड में टैलेंट की कोई कमी नहीं, लेकिन खिलाड़ियों को नीति, सुविधा और सम्मान की जरूरत है. अगर यह मिला, तो यह राज्य अगले दशक में देश का खेल राजधानी बन सकता है."

Jharkhand foundation Day
ग्राफिक्स इमेज (Etv Bharat)

धोनी से मिली प्रेरणा, सलीमा से दिखती उम्मीद

आज झारखंड खेलों की उस राह पर है जहां संघर्ष और सफलता दोनों साथ चलते हैं. यह वह भूमि है जिसने धोनी जैसे विश्व विजेता को दिया और साथ ही हजारों ग्रामीण बच्चों को सपने देखने का साहस भी. राज्य ने संरचना और अवसर के स्तर पर लंबी दूरी तय की है, लेकिन नीति और रोजगार की दिशा में अभी बहुत काम बाकी है.

अगर सरकार खेल नीति को व्यवहारिक बनाए, खिलाड़ियों को उनकी उपलब्धियों के अनुरूप सम्मान और सुरक्षा देतो आने वाले वर्षों में झारखंड सिर्फ खिलाड़ियों का राज्य नहीं, बल्कि भारत का खेल केंद्र बनकर उभरेगा.

यह भी पढ़ें:

झारखंड में खिलाड़ियों को नहीं मिल रहा खेल नीति का लाभ, आर्थिक तंगी से गुजर रहे कई प्लेयर, ऐसे कैसे होगा स्पोर्ट्स कल्चर का विकास?

राष्ट्रीय खेल नीति 2025 पर झारखंड के खेल मंत्री ने दी प्रतिक्रिया, कहा- समीक्षा के बाद ही क्रियान्वयन संभव

झारखंड के विजेता खिलाड़ियों और प्रशिक्षकों पर गुरुवार को होगी रुपयों की बरसात, जानिए किसको मिलेगी कितनी राशि?