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झारखंड के 25 साल: शिक्षा व्यवस्था में क्या हुआ बदलाव, आगे कैसे होगा सुधार?

झारखंड स्थापना के 25 सालों में झारखंड की शिक्षा व्यवस्था में क्या बदलाव आया है, उससे जुड़ी रिपोर्ट.

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By ETV Bharat Jharkhand Team

Published : November 6, 2025 at 6:33 AM IST

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Updated : November 6, 2025 at 9:02 AM IST

10 Min Read
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चंदन भट्टाचार्य की रिपोर्ट

रांची: 15 नवंबर 2025 को झारखंड राज्य के गठन के 25 वर्ष पूरे हो चुके होंगे. इन दो दशकों से अधिक के सफर में राज्य ने कई उपलब्धियां हासिल की. कई क्षेत्रों में नई उंचाइयां मिलीं. कई क्षेत्रों में उम्मीद के मुताबिक कामयाबी नहीं भी मिली. लेकिन मूलभूत सुविधाओं में जिसे सबसे अहम माना जाता है, उस क्षेत्र में झारखंड के 25 साल कैसे रहें? हम बात कर रहे हैं शिक्षा क्षेत्र की.

झारखंड ने शिक्षा के क्षेत्र में कई उल्लेखनीय उपलब्धियां हासिल की हैं, सरकारी स्कूलों की संख्या बढ़ी, विद्यार्थियों का नामांकन दर सुधरा, विश्वविद्यालयों और तकनीकी संस्थानों की संख्या में वृद्धि हुई, और शिक्षा बजट में लगातार बढ़ोतरी भी हुई. लेकिन, इस प्रगति के समानांतर शिक्षकों की भारी कमी, प्राथमिक स्तर पर कमजोर गुणवत्ता, और बुनियादी ढांचे की चुनौतियां भी अब तक बनी हुई है. जिसे लेकर लगातार सवाल उठते हैं. सरकार से मांगें की जाती हैं. अब जब झारखंड 25 वर्ष पूरे कर चुका है तो इनमें भी सुधार की उम्मीद जताई जा रही है. इस रिपोर्ट में झारखंड के 25 साल में शिक्षा का हाल कैसा रहा, इसके बारे में विस्तार से जानेंगे.

झारखंड में शिक्षा का हाल (ईटीवी भारत)

स्कूलों और छात्रों की संख्या में उल्लेखनीय बढ़ोतरी

राज्य गठन के समय झारखंड में सरकारी स्कूलों की संख्या सीमित थी, लेकिन आज यह संख्या दोगुनी से अधिक हो चुकी है. वर्तमान में राज्य में कुल 35,442 सरकारी स्कूल संचालित हो रहे हैं. इन स्कूलों में कक्षा 1 से 8 तक लगभग 53 लाख बच्चे नामांकित हैं. सरकारी प्रयासों और योजनाओं के कारण नामांकन दर में सुधार हुआ है, खासकर ग्रामीण और जनजातीय इलाकों में. वर्ष 2024-25 में 54,130 आउट-ऑफ-स्कूल और ड्रॉप आउट बच्चों को दोबारा स्कूल से जोड़ा गया, जो एक बड़ी उपलब्धि मानी जाती है.

साक्षरता दर में सुधार, पर राष्ट्रीय औसत से पीछे

साक्षरता के मोर्चे पर झारखंड ने धीरे-धीरे सुधार किया है. वर्तमान में राज्य की कुल साक्षरता दर 66.41 प्रतिशत है, जबकि राष्ट्रीय औसत 72.98 प्रतिशत है. शहरी इलाकों में साक्षरता दर में उल्लेखनीय सुधार देखा गया है, लेकिन ग्रामीण और विशेषकर अनुसूचित जनजाति क्षेत्रों में यह दर अब भी कम है. जनजातीय महिलाओं में साक्षरता की दर तो और भी चिंताजनक है.

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शिक्षकों की कमी बनी सबसे बड़ी चुनौती

प्राथमिक शिक्षक संघ के अध्यक्ष गंगा यादव ने बताया कि राज्य में शिक्षा की गुणवत्ता को प्रभावित करने वाली सबसे बड़ी समस्या है, शिक्षकों की कमी. वर्तमान में प्राथमिक और मध्य विद्यालयों में लगभग 50,000 शिक्षकों के पद रिक्त हैं. इनमें से 20,825 पद कक्षा 1 से 5 के लिए और 29,175 पद कक्षा 6 से 8 के लिए हैं. राज्य सरकार ने हाल ही में लगभग 26,000 शिक्षकों की नियुक्ति प्रक्रिया शुरू की है, लेकिन अभी भी हजारों स्कूल बिना स्थायी शिक्षकों के चल रहे हैं.

शिक्षक-छात्र अनुपात भी राष्ट्रीय मानकों से पीछे

शिक्षा विभाग के एक आंकड़े के मुताबिक राज्य में औसतन एक शिक्षक पर 35 छात्र हैं, जबकि राष्ट्रीय औसत 25 छात्र प्रति शिक्षक है. प्राथमिक स्तर पर यह अनुपात 1:30 है, जबकि प्लस-टू विद्यालयों में यह बढ़कर 1:55 तक पहुँच जाता है. सेकेंडरी स्तर पर तो हालात और खराब हैं, जहां एक शिक्षक पर औसतन 66 छात्र हैं, और हायर सेकेंडरी में 87 छात्रों पर एक शिक्षक. यह अनुपात स्पष्ट करता है कि गुणवत्तापूर्ण शिक्षा की सबसे बड़ी अड़चन मानव संसाधन की कमी ही है.

शिक्षक प्रशिक्षण और प्रशासनिक ढांचे में कमी

राज्य के 90 प्रतिशत से अधिक प्राथमिक और मध्य विद्यालयों में प्रधानाध्यापक के पद रिक्त हैं. राज्य गठन के बाद से प्लस-टू विद्यालयों में प्राचार्यों की नियुक्ति नहीं हुई, और अधिकांश कॉलेज भी बिना स्थायी प्राचार्य के चल रहे हैं. डीएसपीएमयू के पूर्व कुलपति डॉ. एस एन मुंडा का कहना है, "झारखंड में भौतिक ढांचा (फिजिकल इंफ्रास्ट्रक्चर) तो है, लेकिन बौद्धिक ढांचे (इंटेलेक्चुअल इंफ्रास्ट्रक्चर) की कमी है. विश्वविद्यालयों में शिक्षकों की नियुक्ति और प्रोन्नति नियमित रूप से नहीं हो रही. शिक्षक-छात्र अनुपात को बेहतर बनाना और रिसर्च संस्कृति को प्रोत्साहित करना अब समय की मांग है."

शैक्षणिक संस्थानों का विस्तार: स्कूल से विश्वविद्यालय तक

पिछले वर्षों में झारखंड सरकार ने उच्च शिक्षा को सुदृढ़ करने के लिए कई नए विश्वविद्यालय और कॉलेज स्थापित किए हैं. वर्तमान में राज्य में कुल 33 विश्वविद्यालय हैं, जिनमें 1 केंद्रीय विश्वविद्यालय (झारखंड सेंट्रल यूनिवर्सिटी, रांची), 12 राज्य विश्वविद्यालय, 18 निजी विश्वविद्यालय, 2 डीम्ड विश्वविद्यालय, साथ ही राष्ट्रीय विधि विश्वविद्यालय जैसे संस्थान भी शामिल हैं.

राज्य में उच्च शिक्षा के क्षेत्र में नई स्किल यूनिवर्सिटी और फिनटेक यूनिवर्सिटी खोलने की योजना भी है, ताकि युवाओं को उद्योगोन्मुख शिक्षा और रोजगार के अवसर मिल सकें.

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मेडिकल शिक्षा में बढ़ते कदम

स्वास्थ्य शिक्षा के क्षेत्र में झारखंड ने उल्लेखनीय प्रगति की है. वर्तमान में राज्य में 10 मेडिकल कॉलेज (9 सरकारी, 1 निजी) संचालित हैं. वर्ष 2025-26 के शैक्षणिक सत्र में एमबीबीएस सीटों की संख्या 1,055 से बढ़कर 1,255 हो गई है.

इनमें रिम्स रांची, एमजीएम मेडिकल कॉलेज जमशेदपुर, एम्स देवघर, मणिपाल टाटा मेडिकल कॉलेज, नेताजी सुभाष मेडिकल कॉलेज एंड हॉस्पिटल, सरायकेला प्रमुख हैं. इसके अलावा, सरकार ने गोड्डा, साहिबगंज, सरायकेला और पाकुड़ में नए मेडिकल कॉलेज खोलने की योजना बनाई है.

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महिला और वंचित वर्ग की शिक्षा पर विशेष ध्यान

राज्य में महिला शिक्षा को प्रोत्साहन देने के लिए रांची में एक महिला कॉलेज की स्थापना की गई है. सावित्रीबाई फुले किशोरी समृद्धि योजना जैसी योजनाएँ किशोरियों की शिक्षा और आत्मनिर्भरता को बढ़ावा दे रही हैं. वहीं मरांग गोमके जयपाल सिंह मुंडा पारदेशीय छात्रवृत्ति योजना ने आदिवासी, एससी, ओबीसी और अल्पसंख्यक छात्रों के लिए विदेशों में उच्च शिक्षा का मार्ग खोला है. राज्य के कई छात्रों ने इस योजना के तहत ब्रिटेन, अमेरिका और ऑस्ट्रेलिया जैसे देशों में पढ़ाई शुरू की है.

शिक्षा बजट में निरंतर वृद्धि

शिक्षा पर खर्च बढ़ाना राज्य सरकार की प्राथमिकता रही है. वित्तीय वर्ष 2024-25 में स्कूली शिक्षा के लिए 12,314 रुपए करोड़ (11.42%) का बजट आवंटित किया गया था, जबकि 2025-26 में यह बढ़कर 17,607 करोड़ से अधिक कर दिया गया है. सरकार की योजना है कि झारखंड को शिक्षा का हब बनाया जाए, जहां पारंपरिक शिक्षा के साथ तकनीकी, व्यावसायिक और नवाचार-आधारित शिक्षा का समन्वय हो.

गुणवत्ता और आधारभूत संरक्षा की चुनौतियां

हालांकि स्कूलों की संख्या और नामांकन दर बढ़ी है, लेकिन गुणवत्ता और बुनियादी ढांचे की स्थिति अभी भी चिंताजनक है. कई स्कूलों में शौचालय, बिजली, प्रयोगशाला और डिजिटल संसाधनों का अभाव है. प्राथमिक स्तर पर बच्चों का प्रदर्शन राष्ट्रीय औसत से कमजोर है, हालांकि माध्यमिक और उच्च माध्यमिक स्तर पर सुधार देखा गया है. राज्य में शिक्षण-सीखने की प्रक्रिया में टेक्नोलॉजी का समुचित उपयोग अभी सीमित है, खासकर ग्रामीण इलाकों में.

आदिवासी क्षेत्रों में शिक्षा की स्थिति

झारखंड की लगभग 26 प्रतिशत आबादी अनुसूचित जनजाति वर्ग से है. इन इलाकों में शिक्षा तक पहुंच अब भी चुनौती बनी हुई है. हाल के वर्षों में सरकार ने जनजातीय छात्रों के लिए आवासीय विद्यालयों, एकलव्य मॉडल स्कूलों, और एक्सीलेंस स्कूलों की स्थापना की है, जिससे कुछ सुधार देखने को मिला है. फिर भी, जनजातीय लड़कियों का ड्रॉपआउट दर अभी भी ऊंचा है.

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विश्वविद्यालयों की गुणवत्ता और बौद्धिक पूंजी का सवाल

रांची यूनिवर्सिटी के प्रोफेसर कंजीव लोचन ने बताया कि राज्य के विश्वविद्यालयों की संख्या बढ़ने के बावजूद इंटेलेक्चुअल इंफ्रास्ट्रक्चर में सुधार की आवश्यकता बनी हुई है. हमें शिक्षा को सिर्फ सूचना नहीं, बल्कि ज्ञान में बदलना होगा. जब तक विश्वविद्यालयों में विश्लेषणात्मक क्षमता और शोध की संस्कृति विकसित नहीं होगी, तब तक उच्च शिक्षा का असर सीमित रहेगा.

उन्होंने सुझाव दिया कि झारखंड के विश्वविद्यालयों को यूजीसी मानकों के अनुरूप प्रोजेक्ट बेस्ड टीचिंग, रिसर्च पब्लिकेशन और सेंट्रल ऑफ एक्सीलेंस के रूप में विकसित किया जाना चाहिए.

शिक्षा का नया अध्याय, लेकिन सुधार की गुंजाइश अब भी

झारखंड शिक्षा परियोजना परिषद के पदाधिकारी धीरसेन ए सोरेंग ने कहा कि झारखंड ने पिछले 25 वर्षों में शिक्षा के क्षेत्र में जो प्रगति की है, वह उल्लेखनीय है. स्कूलों की संख्या दोगुनी हुई, सीबीएसई पैटर्न पर लगभग 80 सीएम स्कूल ऑफ एक्सीलेंस खोले गए. विश्वविद्यालयों और कॉलेजों की पहुंच बढ़ी, और हजारों बच्चों को शिक्षा के दायरे में लाया गया. लेकिन यह सफर अभी अधूरा है.

"शिक्षकों की कमी, कमजोर बुनियादी ढांचा और ग्रामीण क्षेत्रों में शिक्षा की असमानता जैसी चुनौतियां अब भी राज्य के सामने हैं. राज्य सरकार ने 2025-26 के बजट में शिक्षा को प्राथमिकता देकर एक सकारात्मक संदेश दिया है, पर असली सफलता तभी होगी जब हर गांव और हर बच्चे तक गुणवत्तापूर्ण शिक्षा पहुंच सके. झारखंड अब एजुकेशन हब बनने की दिशा में कदम तो बढ़ा चुका है, अब जरूरत है उस दिशा को स्थायी, संतुलित और समावेशी बनाने की." - धीरसेन ए सोरेंग, पदाधिकारी, झारखंड शिक्षा परियोजना परिषद

डॉ. राजकुमार ने कहा कि झारखंड में शिक्षा व्यवस्था आज भी वहीं ठहरी हुई है, जहां से उसने शुरुआत की थी. प्राथमिक विद्यालयों से लेकर उच्च विद्यालयों और विश्वविद्यालयों तक स्थिति चिंताजनक बनी हुई है. सरकार द्वारा शिक्षकों की बहाली तो की गई है, लेकिन अब भी बड़ी संख्या में पद रिक्त हैं. समय पर किताबें उपलब्ध नहीं हो पातीं, शिक्षण संसाधनों की कमी बनी रहती है और सिलेबस के अनुसार नियमित पढ़ाई नहीं हो रही है.

"सेशन लगातार लेट चल रहा है, जिससे विद्यार्थियों के करियर पर सीधा असर पड़ रहा है. शिक्षक और विद्यार्थियों के अनुपात में भारी असंतुलन है. स्कूल और कॉलेजों की इमारतें तो बन गई हैं, मॉडल कॉलेज भी तैयार हो गए हैं, लेकिन जब शिक्षकों की कमी बनी रहेगी, तो गुणवत्तापूर्ण शिक्षा कैसे संभव होगी." - डॉ. राजकुमार

वहीं, डॉ. कंजीब लोचन ने कहा कि झारखंड शिक्षा के क्षेत्र में लगातार संघर्ष कर रहा है. उपलब्धियों का आकलन केवल कागजों पर नहीं, बल्कि जमीन पर होना चाहिए.

"अगर किसी संस्थान को ‘स्कूल ऑफ एक्सीलेंस’ कहना पड़े, तो इसका मतलब है कि बाकी संस्थान उस स्तर तक नहीं पहुंच पाए हैं. असली उद्देश्य यह होना चाहिए कि हर स्कूल उत्कृष्ट हो, न कि कुछ चुनिंदा संस्थानों को ही विशेष दर्जा दिया जाए. राज्य ने अब तक शिक्षा के क्षेत्र में लंबा रास्ता तय नहीं किया है; अभी बहुत कुछ करना बाकी है, और इसके लिए सतत प्रयास की आवश्यकता है." - डॉ. कंजीब लोचन

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Last Updated : November 6, 2025 at 9:02 AM IST